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साइंस न्यूज़

Big-Eyed Cockroach: अंबर में फंसा मिला 10 करोड़ साल पुराना बड़ी आंखों वाला डरावना कॉकरोच

big eye cockroach
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वैज्ञानिकों ने बताया है कि यह कॉकरोच अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से दुनिया को देखता था. यह नायाब था. अब इसकी प्रजाति वर्तमान धरती पर नहीं है. इस कॉकरोच का वैज्ञानिक नाम हुआब्लाटुला हुई (Huablattula hui) है. लेकिन यह पहली बार है कि जब वैज्ञानिकों ने इस कॉकरोच की आंखों को इतनी बारीकी से देखा और जांचा है. (फोटोः रियो तानीगुची/द साइंस ऑफ नेचर)

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जापान स्थित होकाइडो यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ नेचुरल हिस्ट्री साइंसेज के ग्रैजुएट स्टूडेट रियो तानीगुची ने कहा कि यह प्राचीन कॉकरोच 10 करोड़ साल से इस अंबर में कैद है. अच्छी बात ये है कि यह पूरी तरह से सुरक्षित है. इसके सभी बाहरी अंग स्पष्ट तौर पर दिखाई देते हैं. वह भी अपनी पूरी डिटेल्स के साथ. (फोटोः रियो तानीगुची/द साइंस ऑफ नेचर)

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जानवर अपने सेंसरी अंगों का उपयोग आमतौर पर नेविगेशन यानी दिशा समझने के लिए करते हैं. या फिर खाना खोजने के लिए, शिकारियों से बचने के लिए या फिर प्रजनन के लिए साथी खोजने के लिए. क्योंकि जीवों के सेंसरी अंग उनकी लाइफस्टाइल के मुताबिक ढले हुए होते हैं. वैज्ञानिक इन अंगों का अध्ययन करके यह पता कर सकते हैं कि किस समय का जीव किस अंग का उपयोग किस काम के लिए करता था. क्योंकि आमतौर पर जिस अंग का उपयोग जानवर सबसे ज्यादा करते हैं, वो मजबूत और बड़े होते हैं. (फोटोः गेटी)
 

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उदाहरण के लिए उल्लुओं के पास एसिमेट्रिकल हीयरिंग (asymmetrical hearing) की क्षमता होती है. वो शिकार और शिकारियों दोनों के आवाजों को एकसाथ सुनकर उन्हें अलग-अलग समझ सकते हैं. वहीं गुफा में रहने वाली मछलियों की आंखें बाहर निकली हुई होती है, ताकि वो अंधेरे में देख सकें. लेकिन कई बार ऐसी आंखों का कोई उपयोग भी नहीं रहता. (फोटोः गेटी)

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रियो तानीगुची ने कहा कि जो प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं. खासतौर से कीड़े. उनकी आंखें, एंटीना, कान, जीभ सब बेहद संवेदनशील होते थे. ये मिट्टी में सही जीवाश्म नहीं बन पाते थे. उनके सेंसरी अंगों को पढ़ना आसान नहीं रह जाता था. लेकिन अंबर में कैद जीवों के ये अंग भी सुरक्षित रहते हैं. इनकी जांच करना आसान होता है. अंबर में कोई भी वस्तु जीवाश्म के तौर पर करोड़ों साल तक सुरक्षित रहती है. (फोटोः गेटी)

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अंबर किसी भी चीज को जीवाश्म बनाने के लिए उपयुक्त पदार्थ होता है. यह आमतौर पर पेड़ों से गिरने वाला चिपचिपा तरल पदार्थ होता है, जिसमें कीड़े फंसकर मर जाते हैं. फिर यह पदार्थ धीरे-धीरे कठोर पारदर्शी रूप ले लेता है. जिस हुआब्लाटुला हुई कॉकरोच को खोजा गया है यह एक नर है. (फोटोः गेटी)

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हुआब्लाटुला हुई (Huablattula hui) कॉक्रोच क्रिटेशियस काल (Cretaceous Period) का है. यह म्यामांर (Myanmar) से मिला था. रियो तानीगुची और उनके साथियों ने कई तरह की तकनीकों का उपयोग करके इसका अध्ययन किया. उसके फोटोग्राफी की. माइक्रो सीटी-स्कैन किया गया. आंखों की जांच माइक्रोस्कोप के जरिए किया गया. आंखों के अंदर की परतें भी दिखाई दी. (फोटोः गेटी)

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हुआब्लाटुला हुई (Huablattula hui) कॉकरोच के एंटीना का अध्ययन करने के लिए थिन-सेक्शनिंग (Thin Sectioning) तकनीक का उपयोग किया गया. इसमें अंबर की पतली परत काटी जाती है, जो कि 200 माइक्रोमीटर चौड़ी होती है. यानी इंसान के बाल से थोड़ा ज्यादा मोटा. इसके बाद तो एंटीना से संबंधित बारीकियां निकल कर सामने आईं, वो चौंकाने वाली थीं. (फोटोः गेटी)

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रियो तानीगुची ने बताया कि आजकल के कॉक्रोच की आंखें पूरी तरह से विकसित नहीं होती. जबकि उनके पूर्वजों की थीं. ये कंपाउंड आंखें थीं. बाहरी संरचना को देख कर लगता है कि प्राचीन कॉकरोच का विजुअल सिस्टम काफी ज्यादा मजबूत था. यानी ये कॉकरोच के वर्तमान रिश्तेदार मैंटीसेस (Mantises) से मिलते-जुलते थे. मैंटीसेस दिन में भी अपना शिकार या खाना खोजते हैं. (फोटोः गेटी)

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Livescience की खबर के अनुसार इस समय दुनिया में कॉकरोच की 4600 जीवित प्रजातियां है, जो अंधेरे में अपने काम करती हैं. वर्तमान कॉकरोच हुआब्लाटुला हुई (Huablattula hui) प्रजाति के वंशज तो नहीं है. आधुनिक कॉकरोच ने खुद को समय के अनुसार बदला है. यह स्टडी हाल ही में द साइंस ऑफ नेचर जर्नल में प्रकाशित हुई है. (फोटोः गेटी)