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स्नान, दान, भोजन, मालिश... तिल के छह प्रयोग, भगवान विष्णु ने खुद बताया था षटतिला एकादशी का महत्व

माघ मास की षटतिला एकादशी सनातन धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है, जो नरक से मुक्ति और मोक्ष दिलाने वाला है. इस दिन तिल का विशेष महत्व होता है, जिसका उपयोग स्नान, दान, तर्पण और पूजा में किया जाता है.

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षटतिला एकादशी के दिन तिल के दान का महत्व है
षटतिला एकादशी के दिन तिल के दान का महत्व है

माघ माह सनातन धर्म में नरक से मुक्ति और मोक्ष दिलाने वाला माना जाता है. यह एकादशी बताती है कि धन के बजाय बहुत कम ही सही लेकिन अन्नदान सबसे बड़ा दान है. ऋषि पुलस्त्य ने नर्क से मुक्ति पाने के उपाय के विषय में बताते हुए कहा- मनुष्य को माघ महीने में अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हुए क्रोध, अहंकार, काम, लोभ और चुगली आदि का त्याग करना चाहिए. माघ मास के कृष्णपक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी व्रत किया जाता है. 

इस दिन तिल का विशेष महत्त्व है. पद्म पुराण के अनुसार इस दिन उपवास करके तिलों से ही स्नान, दान, तर्पण और पूजा की जाती है. इस दिन तिल का इस्तेमाल स्नान, प्रसाद, भोजन, दान, तर्पण आदि सभी चीजों में किया जाता है. तिल के कई प्रकार के उपयोग के कारण ही इस दिन को षटतिला एकादशी कहते हैं. तिल का आयुर्वेद में बड़ा ही महत्त्व हैं.

तिलस्नायी तिलोद्वर्ती तिलहोमी तिलोदकी । 
तिलभुक् तिलदाता च षट्तिलाः पापनाशनाः ।। 

यानी तिल मिले जल से स्नान, तिल के तेल से शरीर में मालिश, तिल से ही यज्ञ में आहुति, तिल मिले जल को पीना और भोजन में तिल का प्रयोग और तिल का दान षट्तिला में तिल के ये छह प्रकार के कार्य करने से पर्व का लाभ मिलता है और पाप नष्ट हो जाते हैं. इस बार मकर संक्रांति और षटतिला एकादशी एक ही दिन है और सनातन परंपरा में दोनों ही पर्व तिल के महत्व को बताने वाले हैं.

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पद्मपुराण में दर्ज है तिल के महत्व की कथा
एक समय नारद मुनि भगवान विष्णु के धाम बैकुंठ पहुंचे. वहां उन्होंने भगवान विष्णु से षटतिला एकादशी व्रत के महत्व के बारे में पूछा. नारद जी के पूछने पर भगवान विष्णु ने बताया कि, प्राचीन काल में पृथ्वी पर एक ब्राह्मणी को उपवासों और पति सेवा के फल से वैकुण्ठ मिला. वह मेरी भक्त थी और श्रद्धा भाव से मेरी पूजा करती थी. एक बार उसने एक महीने तक व्रत रखकर मेरी उपासना की. व्रत के प्रभाव से उसका शरीर तो शुद्ध हो गया लेकिन वह कभी ब्राह्मण और देवताओं के निमित्त अन्न दान नहीं करती थी, इसलिए मैंने सोचा कि यह स्त्री बैकुंठ में रहकर भी अतृप्त रहेगी.

ऐसे में मैं खुद एक दिन उसके पास भिक्षा मांगने गया. जब मैंने उससे भिक्षा याचना की तो उसने मेरे भिक्षा पात्र में एक मिट्टी का ढेला दिया था, इसलिये वैकुण्ठ में उसे सुंदर सा मिट्टी का घर मिल गया. लेकिन दान में एक दाना भी अन्न किसी को न देने से उसे वहां अन्न बिल्कुल भी नहीं मिला. तब उसने मेरे कहने से षटतिला व्रत किया और इसके प्रभाव से उसे सब कुछ मिल गया. उसकी कुटिया अन्न और धन से भर गई और वह सभी सुखों के साथ अपने घर में प्रसन्नता पूर्वक रहने लगी.

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