आज से भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा की शुरुआत हो गई है. जगन्नाथ रथ उत्सव 10 दिन तक मनाया जाता है. सैकड़ों साल से मनाए जाने वाले इस उत्सव में शामिल होने के लिए लाखो की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. इस बार भी इस महोत्सव में पुरी में करीब दो लाख श्रद्धालुओं के आने की संभावना जताई जा रही है जो कि पिछले साल के मुकाबले 30 प्रतिशत से ज्यादा है. भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा से जुड़ी सभी तैयारियां ओडिशा में पूरी कर ली गई है. आइए जानते हैं इस पर्व से जुड़ी 7 खास बातें.
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-रथयात्रा उत्सव के दौरान भगवान जगन्नाथ को रथ पर बिठाकर पूरे नगर में भ्रमण कराया जाता है. भगवान जगन्नाथ विष्णु के 8वें अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित है. ब्रह्म और स्कंद पुराण के अनुसार यहां भगवान विष्णु पुरुषोत्तम नीलमाधव के रूप में अवतरित होकर सबर जनजाति के देवता बन गए. इतना ही नहीं यहां लक्ष्मीपति विष्णु ने तरह-तरह की लीलाएं भी की थीं.
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-पुराणों में इसे धरती का वैकुंठ कहा जाता है. यह भगवान विष्णु के चार धामों में से एक है. इसे श्रीक्षेत्र, श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र, शाक क्षेत्र, नीलांचल, नीलगिरि और श्री जगन्नाथ पुरी भी कहते हैं.
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-पहले के समय में कबीले के लोग अपने देवताओं की मूर्तियों को काष्ठ से बनाते थे. सबर जनजाति के देवता होने के कारण यहां भगवान जगन्नाथ का रूप कबीलाई देवताओं की तरह बनाया गया है. ज्येष्ठ पूर्णिमा से आषाढ़ पूर्णिमा तक सबर जाति के दैतापति जगन्नाथजी की सारी रीतियां करते हैं.
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-स्कंद पुराण के अनुसार पुरी एक दक्षिणवर्ती शंख की तरह है और यह 16 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है. माना जाता है कि इसका लगभग 2 कोस क्षेत्र बंगाल की खाड़ी में डूब चुका है. जबकि इसका उदर समुद्र की सुनहरी रेत है जिसे महोदधी का पवित्र जल धोता रहता है. सिर वाला क्षेत्र पश्चिम दिशा में है जिसकी रक्षा महादेव करते हैं. शंख के दूसरे घेरे में शिव का दूसरा रूप ब्रह्म कपाल मोचन विराजमान है.
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-हिंदू मान्यताओं के अनुसार भगवान ब्रह्मा का एक सिर महादेव की हथेली से चिपक गया था और वह यहीं आकर गिरा था, तभी से यहां पर महादेव की ब्रह्म रूप में पूजा होती हा. शंख के तीसरे वृत्त में मां विमला और नाभि स्थल में भगवान जगन्नाथ रथ सिंहासन पर विराजमान रहते हैं.