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Makar Sankranti 2025: मकर संक्रांति-षटतिला एकादशी एकसाथ, अब कैसे खाएंगे चावल की खिचड़ी? ये रहा तोड़

14 जनवरी को मकर संक्रांति और षटतिला एकादशी का दुर्लभ संयोग 23 साल बाद बन रहा है. संक्रांति पर चावल की खिचड़ी का दान-भोग होता है, जबकि एकादशी में चावल वर्जित हैं. इसी वजह से 14 जनवरी को खिचड़ी खाने और दान करने को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है.

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मकर संक्रांति पर षटतिला एकादशी का संयोग करीब 23 वर्ष के बाद बना है.
मकर संक्रांति पर षटतिला एकादशी का संयोग करीब 23 वर्ष के बाद बना है.

Makar Sankranti 2026: 14 जनवरी को मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाएगा. संयोगवश इस दिन षटतिला एकादशी भी है. मकर संक्रांति पर षटतिला एकादशी का संयोग करीब 23 वर्ष बाद बना है. इससे पहले यह संयोग साल 2003 में बना था. हालांकि यह दुर्लभ संयोग एक असमंजस भी पैदा कर रहा है. दरअसल, मकर संक्रांति पर चावल से बनी खिचड़ी दान करने और खाने की परंपरा है. यही कारण है कि कई जगहों पर मकर संक्रांति को खिचड़ी भी कहा जाता है. जबकि एकादशी के दिन चावल खाना वर्जित है. अब सवाल उठता है कि एकादशी के रहते मकर संक्रांति पर खिचड़ी का दान और भोग कैसे करें.

ज्योतिषविदों ने इसका तोड़ निकाल लिया है. हिंदू पंचांग के अनुसार, माघ कृष्ण एकादशी तिथि 13 जनवरी को दोपहर 03 बजकर 17 मिनट पर शुरू होगी. और इसका समापन 14 जनवरी को शाम 05 बजकर 52 मिनट पर होगा. ऐसे में 14 जनवरी को मकर संक्रांति तो पूरे दिन रहेगी, लेकिन एकादशी तिथि शाम 05.52 बजे समाप्त हो जाएगी. एकादशी तिथि के समाप्त होते ही लोग चावल की खिचड़ी बनाकर दान कर सकते हैं और खुद ग्रहण भी कर सकते हैं.

एक तर्क यह भी है कि सनातन परंपरा में सभी शुभ तिथियां और व्रत त्योहार नियम और बाध्यता से मुक्त होते हैं. इसलिए पर्व-त्योहारों पर कोई भी शुभ कार्य या रीति-रिवाज निसंदेह पूरा किया जा सकता है. वैसे भी 14 जनवरी को मकर संक्रांति है. इस दिन सूर्य उत्तरायण के हो जाएंगे. यानी इस दिन से सूर्य उत्तर दिशा की ओर संचरण करेंगे. शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का काल माना गया है. और देवताओं के काल में किए गए किसी भी संस्कार का फल कई गुना अधिक शुभ होता है.

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मकर संक्रांति की पूजा विधि
मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव की आराधना को विशेष फलदायी मानी गई है. इस दिन सूर्योदय से पहले पवित्र नदी में आस्था की डुबकी लेने से आदमी के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं. जिनके लिए नदियों के घाट पर जाना संभव नहीं है, वो लोग घर में ही स्नान के जल में गंगाजल और काले तिल मिलाकर स्नान कर सकते हैं. इसके बाद तांबे के लोटे में जल, लाल फूल, अक्षत और तिल डालकर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें. अर्घ्य देते समय ‘ॐ सूर्याय नमः’ या ‘ॐ घृणि सूर्याय नमः’ मंत्र का जाप करें. आखिरी में अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंदों को तिल, गुड़, चावल, वस्त्र या धन का दान करें.

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