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जब खिचड़ी के कारण चला राजा का वंश... मकर संक्रांति की वो कहानी जो गंगा किनारे सुनी जाती है

माघ संक्रांति के दिन खिचड़ी खाने और बांटने की परंपरा एक पुरानी लोककथा से जुड़ी है जिसमें एक बूढ़ी माई की भक्ति और कृष्ण भगवान की कृपा से एक राजा को पुत्र प्राप्त हुए.

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खिचड़ी से जुड़ी कई लोककथाएं प्रसिद्ध हैं
खिचड़ी से जुड़ी कई लोककथाएं प्रसिद्ध हैं

भारत की व्रत और त्योहार परंपरा सिर्फ पौराणिक कहानियों से नहीं चलती है. इसे पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने का काम करती हैं किवदंतियां, दंतकथाएं और लोककहानियां. जैसे कि लोक के कवि घाघ ने खिचड़ी और माघ महीने को लेकर कहा, माघ महीना खिच्चड़ खाय. यानी माघ के महीने में खिचड़ी खानी चाहिए. खिचड़ी एक ऐसा आहार है जो आसानी से बन भी जाता है और उससे भी आसान होता है इसे पचाना. इसलिए खिचड़ी को देव भोजन कहा जाता है. 

संक्रांति के मौके पर स्नान और दान की परंपरा
देश के हर इलाके में जितने तरीके से खिचड़ी बनाई और खाई जाती है, इससे जुड़ी कहानियां उससे कहीं अधिक हैं. अब जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार आदि में माघी संक्रांति का स्नान किया जाता है. इस स्नान के बाद घाट पर ही तिल और खिचड़ी का दान किया जाता है और महिलाएं समूह में बैठकर वहीं कथा भी सुनती हैं.

ये कथाएं चमत्कार से भरी, विचित्र, अविश्वसनीय लग सकती हैं लेकिन इनके कभी पुराने न पड़ने का सिर्फ एक कारण है, इन कथाओं से जुड़े फल में श्रद्धालुओं का विश्वास. जैसे आप ये बिल्कुल यकीन नहीं करेंगे कि खिचड़ी खाकर पुत्र का जन्म हो सकता है और एक राजा का राज्य बच सकता है, लेकिन लोककथा में दर्ज है तो है और आपके पास ये मानने के सिवा कोई चारा नहीं है.

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बूढ़ी माई की कथा जो माघ का व्रत करती थी
कहानी कुछ ऐसी है. किसी गांव में एक बूढ़ी माई रहती थी. बूढ़ी माई माघ का व्रत करती थी, नियम से गंगा स्नान करती थी और व्रत रखकर श्रीकृष्ण का भजन करती थी. उसके व्रत खोलने के समय कृष्ण भगवान आते और उसके पास एक कटोरा खिचड़ी रखकर चले जाते थे. बुढ़िया के पड़ोस में एक औरत रहती थी. वह उससे जला करती थी. वह हर रोज यह देखती कि बूढ़ी के पास दिनभर तो खाने के लिए कुछ होता नहीं फिर ये व्रत करके रोज-रोज खिचड़ी कहां से खाती है. 

एक बार माघ संक्रांति के दिन बूढ़ी माई गंगा स्नान के लिए गई. उधर, कृष्ण भगवान उसका खिचड़ी का कटोरा लेकर आए और रख गए. पड़ोसन ने बूढ़ी के आंगन में जब खिचड़ी का कटोरा रखा देखा और देखा कि बुढ़िया नही है तब उसने घर के पीछे के दरवाजे की सड़क किनारे खिचड़ी फेंक दी और कटोरा भी वहीं डाल दिया. स्नान के बाद बूढ़ी मां घर आई तो उसे खिचड़ी का कटोरा नहीं मिला और वह भूखी ही रह गई. 

बार-बार एक ही बात कहती कि कहां गई मेरी खिचड़ी और कहां गया मेरा खिचड़ी का कटोरा. दूसरी ओर पड़ोसन ने जहां खिचड़ी गिराई थी वहां एक पौधा उगा जिसमें दो फूल खिले. 

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राजा ने रानी के लिए तोड़ लिए दोनों फूल
उस राज्य का राजा बड़ा दयालु था. उसके पास धन-वैभव सब कुछ था लेकिन एक भी संतान नहीं थी. जिससे राज्य में उत्तराधिकार की भी समस्या थी और राजा भी परेशान रहता था. एक बार राजा उस ओर से निकला तो उसकी नजर उन दोनो फूलों पर पड़ी और वह उन्हें तोड़कर घर ले आया. घर आने पर उसने वह फूल रानी को दिए जिन्हें सूंघने पर रानी गर्भवती हो गई. कुछ समय बाद रानी ने दो पुत्रों को जन्म दिया. 

वह दोनों जब बड़े हो गए तब वह किसी से भी बोलते नही थे, लेकिन जब वह दोनो शिकार पर जाते तब रास्ते में उन्हें वही बूढ़ी माई मिलती जो अभी भी यही कहती कि कहां गई मेरी खिचड़ी और कहां गया मेरा कटोरा ? बुढ़िया की बात सुनकर वह दोनों कहते कि हम हैं तेरी खिचड़ी और हम हैं तेरा कटोरा. हर बार जब भी वह शिकार पर जाते तो बुढ़िया यही बात कहती और वह दोनो वही उत्तर देते. 

एक बार राजा के कानों में यह बात पड़ गई. उसे आश्चर्य हुआ कि दोनो लड़के किसी से नहीं बोलते तब यह इस बूढ़ी से कैसे बात करते हैं. राजा ने उस वृद्ध महिला को राजमहल बुलवाया और कहा कि हम से तो किसी से ये दोनों बोलते नहीं है, तुमसे यह कैसे बोलते हैं ?  बुढ़िया ने कहा कि महाराज मुझे नहीं पता कि ये कैसे मुझसे बोल लेते हैं.

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राजा को चला सच का पता
मैं तो माघ का व्रत करती थी और कृष्ण भगवान मुझे खिचड़ी का कटोरा भरकर दे जाते थे. एक दिन मैं स्नान कर के वापिस आई तो मुझे वह खिचड़ी नहीं मिली. जब मैं कहने लगी कि कहां गई मेरी खिचड़ी और कहां गया मेरा कटोरा ? तब इन दोनों लड़कों ने कहा कि तुम्हारी पड़ोसन ने तुम्हारी खिचड़ी फेंक दी थी तो उसके दो फूल बन गए थे. वह फूल राजा तोड़कर ले गया और रानी ने सूंघा तो हम दो लड़को का जन्म हुआ. हमें भगवान ने ही तुम्हारे लिए भेजा है.

सारी बात सुनकर राजा ने बूढ़ी मां को महल में ही रहने दे दिया. इस तरह बूढ़ी माई के दिन फिर गए और राजा को भी अपने लिए खिचड़ी के प्रसाद से दो पुत्र रत्न मिल गए. राजा ने बड़े पैमाने पर खिचड़ी बनवाकर बूढ़ी माई के साथ मिलकर कृष्ण जी का भोग लगवाया और लोगों को भी प्रसाद बांटा. इस तरह संक्रांति के दिन खिचड़ी खाने और बांटने की परंपरा चल पड़ी.

(यह सामग्री केवल प्रचलित लोककथाओं पर आधारित है. इसका उद्देश्य किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा देना कतई नहीं है.)

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