महाशिवरात्रि पर्व को लेकर तैयारियां जारी हैं. मंदिरों और शिवालयों में सजावट हो रही है. इसी के साथ शिवजी के अनेक रूप भी संवारे जा रहे हैं. आमतौर पर शिवजी की पूजा उनके इंसानी आकार और शिवलिंग दो ही तरह से होती है, लेकिन शिव पुराण, स्कंद पुराण और लिंग पुराण में शिवजी के कई रूपों और कई अवतारों का जिक्र भी मिलता है.
शिवजी के मानवी स्वरूप का जिक्र होता है तो उनकी दो बातें सामने आती हैं. एक तो यह कि शिव श्मशान में रहते हैं और दूसरा यह कि शिव चिता की भस्म को अपने शरीर पर मलते हैं. शिवजी ऐसा क्यों करते हैं?
शिवजी का बाल स्वरूप
शिवजी के रूप भी उनके सरल स्वभाव की तरह ही हैं. यानी वह बहुत दैवीय या चमत्कारी नहीं हैं, बल्कि इंसानी भावनाओं को सबसे आसान तरीके से सामने रखने वाले हैं. शिवजी के तमाम रूपों की चर्चा होती है, इसी में एक है 'अक्षोभ्य शिव'. यानी शिव का ऐसा रूप जो क्षुब्ध न हो. ये नाम आपको समझने में कठिन लग सकता है, लेकिन जब आप इस रूप को देखेंगे तो इसकी सरलता आपका मन मोह लेगी.
क्या आपने बालरूप, नए जन्मे बच्चे की तरह मुंह में उंगली डालकर रोते शिव की कल्पना की है? लेकिन शिव का यह बालरूप श्रीराम और श्रीकृ्ष्ण से भी अधिक खूबसूरत है. इस रूप में शिव अपनी बाघम्बरी मे लिपटे हुए हैं और उन्हें उनकी मां दूध पिला रही हैं.
सवाल उठता है कि शिव की मां कौन हैं? उन्हें कौन दूध पिला रहा है?
यह सवाल ही हमें उस पौराणिक कहानी की ओर ले जाता है, जो समुद्र मंथन से जुड़ी है. समुद्र को मथने के दौरान सबसे पहले हलाहल विष निकला. यह इतना तेज जहर था कि सारी दुनिया को खत्म कर देने की ताकत रखता था. सभी ने इस जहर को नकार दिया और दूरी बना ली. लेकिन महदेव ने इस जहर को अपनाया. उसे वैसे ही स्वीकार किया और पी लिया जैसे सभी अमृत को पी जाना चाहते हैं. लेकिन शिव ने जहर पिया, बिना किसी शिकन और बिना किसी अफसोस के वह इसे पूरा पी गए.

लेकिन... जहर पीना उनके लिए भी उतना ही पीड़ादायक हो गया, जैसा कि किसी आम इंसान के लिए होता. शिव का शरीर अंदर से जलने लगा. उन्होंने इस जहर को कंठ में ही रोक लिया. इससे ताप और बढ़ा जो शिव के लिए असहनीय होने लगा. इस जहर ने उनके कंठ को नीला कर दिया. देवता जय-जयकार करने लगे. लोगों ने उन्हें नीलकंठ कहकर उनकी स्तुति आरती की. लेकिन शिव पीड़ा में थे.
शिवजी की पीड़ा दूर करने प्रकट हुईं माता उग्रतारा
इस पीड़ा को केवल शक्ति (पार्वती) ही गहराई से समझ पाईं. उन्होंने तुरंत ही अपनी भीतरी शक्तियों को पुकारा. एक महिला के अंदर प्रेम दो तरह से मौजूद होता है. एक प्रेमिका के रूप में दूसरा मां की ममता के रूप में. पार्वती की ही पुकार पर आसमान के तारों में रहने वाली देवी उग्रतारा प्रकट हुईं. लाल मुंह, नरमुंड की माला, जलता हुआ शरीर और चेहरे पर उग्र तेज.
माता उग्रतारा ने अपने योगबल से शिवजी को नवजात बालक जैसा बना दिया. तब कष्ट झेल रहे शिव मुंह में उंगलियां दबाकर वैसे ही रोने लगे जैसे बच्चा भूख लगने पर रोता है. माता उग्रतारा के मन में ममता उमड़ आई और हमेशा क्रोधित और उग्र रहने वाली देवी ममता की ऐसी मूरत बनीं कि उन्होंने शिवजी को अपनी गोद में लेकर उन्हें अपना दूध पिलाया.
तंत्र परंपरा के अनुसार, देवी तारा को शिवजी से भी ऊंचा दर्जा दिया जाता है. उनके अमृत जैसे दूध से ही शिवजी को जहर के असर से मुक्ति मिली. उनकी जलन शांत हुई और उन्हें शारीरिक कष्ट से मुक्ति मिली. इसीलिए देवी तारा को ‘जगत-जननी’ और संकटों से मुक्ति देने वाली महाशक्ति माना जाता है. यहां एक अनोखा भाव दिखता है. जहां शिव सृष्टि के पालनहार हैं, वहीं देवी तारा उन्हें भी मां की तरह संभालती हैं. इस रूप में तारा को शिव की मां कहा जाता है. तंत्र ग्रंथों में उनके भैरव को अक्षोभ्य शिव कहा गया है, वही शिव जिन्होंने हलाहल विष का पी लिया था.
कैसा है देवी उग्रतारा का रूप?
देवी तारा का रूप साधारण नहीं है. उनका निवास स्थान महा-श्मशान है, यानी वह स्थान जहां चिताएं जलती रहती हैं. तारादेवी को जलती चिता के ऊपर खड़ी मुद्रा में दिखाया जाता है. वह कभी नग्न अवस्था में होती हैं तो कभी बाघ की खाल धारण किए हुए नजर आती हैं. उनके गले में नरमुंडों और हड्डियों की मालाएं हैं. सर्प उनके आभूषण हैं और तीन नेत्रों से वे सृष्टि को देखती हैं. उनका उग्र तारा स्वरूप पहली नजर में भयावह लगता है, लेकिन यह भय विनाश का नहीं, बल्कि अज्ञान और अहंकार के नाश का प्रतीक है.
यहां यह समझने की जरूरत है शिव अपने शरीर पर उग्रतारा की ही सारी निशानियां पहनते है. यानी बाघ की खाल, सांपों की माला, नरमुंड और राख-भस्म से शृंगार. शिव का ऐसा पहनावा उनके भीतर के बालक की उनकी मां (यानी उग्रतारा) से करीबी दिखाता है. शिव श्मशान में इसीलिए रहते हैं कि क्योंकि इस तरह वह अपनी मां के करीब रहते हैं.

शिवजी क्यों श्मशान में रहते हैं?
उग्र तारा को तमोगुण का रूप माना जाता है. श्मशान सिर्फ महादेव की ही नहीं उनका भी स्थान है. यहां जीवन अपने अंतिम सच के तौर पर बिखरा दिखाई देता है. वहां रूप, अहंकार, गर्व, जाति, वैभव और भेदभाव सब कुछ राख हो जाता है. शिव का श्मशान में रहना यह संदेश देता है कि वे मृत्यु और भय से परे हैं. वे उस सत्य के स्वामी हैं, जिससे मनुष्य सबसे ज्यादा डरता है. श्मशान वैराग्य और अंतिम मुक्ति का प्रतीक है, और शिव उसी मुक्ति के देवता हैं.
महाशिवरात्रि की रात जब हम शिव की पूजा करते हैं, तो यह केवल जल चढ़ाने या मंत्र जपने तक सीमित नहीं है. यह उस गहरे रहस्य को समझने का मौका है, जिसमें शिव जहर को भी अमृत में बदल देते हैं. जहां देवी तारा जैसी महाशक्ति उन्हें भी मां की तरह संभालती हैं. श्मशान का अंधकार हो या जीवन का संकट, शिव और तारा दोनों मिलकर यह संदेश देते हैं कि हर पीड़ा का खात्मा संभव है और हर भय के पार मुक्ति है.