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शोर से शांति की ओर बढ़ रहे Gen-Z, पहाड़ की बजाय मंदिरों की ओर रुख

Gen-Z में बड़ा सांस्कृतिक बदलाव दिख रहा है. पार्टी, क्लब और शोर-शराबे से दूर यह पीढ़ी नए साल जैसे मौकों पर मंदिरों और धार्मिक स्थलों की ओर रुख कर रही है. भक्ति, अध्यात्म और ‘मेंटल डिटॉक्स’ उन्हें सुकून दे रहा है. साथ ही Gen-Z शराब से दूरी बनाकर ‘सोबर ड्रिंकिंग’ और स्वस्थ जीवनशैली को अपना रही है.

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Gen-Z अब पार्टीज और ट्रेंडिंग स्पॉट्स को नज़रअंदाज़ कर आस्था और संस्कृति को तवज्ज़ो दे रहे हैं (Photo: ITG)
Gen-Z अब पार्टीज और ट्रेंडिंग स्पॉट्स को नज़रअंदाज़ कर आस्था और संस्कृति को तवज्ज़ो दे रहे हैं (Photo: ITG)

समय की धारा जब एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के तट को छूती है, तो सिर्फ चेहरे ही नहीं बदलते, बल्कि सोचने-समझने और ज़िंदगी जीने के आयाम भी बदल जाते हैं. ये बदलाव आज की युवा पीढ़ी में साफ देखा जा सकता है. देर रात तक मोबाइल में डूबे रहने वाली, सुबह देर से जागने वाली, हर शक्ति के विरोध में प्रतिशक्ति खड़ी करने वाली, परंपराओं को रूढ़ियां और अपने विचारों को सर्वश्रेष्ठ मानने वाली Gen-Z का झुकाव अध्यात्म की ओर देखने को मिल रहा है. ये पीढ़ी शोर नहीं, शांति की ओर बढ़ रही है. 

हाल ही में नए साल का आगाज़ हुआ. जिसमें ये बात साफ हो गई कि Gen-Z अब पार्टीज और ट्रेंडिंग स्पॉट्स को नज़रअंदाज़ करते हुए अपनी आस्था और संस्कृति को ज्यादा तवज्ज़ो दे रहे हैं. मसलन, उन्होंने सिर्फ पहाड़ों या क्लबों में जाना नहीं चुना. बल्कि उन्होंने चुना मथुरा, काशी, अयोध्या और वैष्णो देवी जैसे धार्मिक स्थलों पर जाकर नए साल को सेलिब्रेट करना. आज की Gen-Z जिसे हम कल तक केवल स्क्रीन, सेल्फी और शोर-शराबे वाली महफिलों की पीढ़ी समझते थे, वह एक बहुत बड़े आंतरिक परिवर्तन से गुजर रही है. वह पीढ़ी जो कल तक पब और क्लबों की 'नियोन लाइट्स' में सुकून ढूंढती थी, आज मंदिरों की चौखट पर दीये की मद्धम लौ में खुद को तलाश रही है.

वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में नए साल पर युवाओं का ऐसा सैलाब उमड़ा कि दर्शन व्यवस्था को ही बदलना पड़ा. वहीं, मथुरा-वृंदावन में बांके बिहारी, बरसाना, नंदगांव, राधावल्लभ और गोकुल में मंदिरों के गलियारों में युवा भक्ति के रंग में सराबोर दिखे. सोशल मीडिया पर ऐसी तमाम रील्स वायरल हो रही हैं, जिनमें Gen-Z 'दम मारो दम...' पर नहीं, बल्कि 'हरे कृष्णा-हरे रामा...', 'श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी...' जैसे भजनों पर झूमते दिखे. मतलब साफ है जब महफिलों का शोर रूह को थकाने लगे, तो मन मंदिरों में मिलने वाले सुकून की तरफ मुड़ ही जाता है. मंदिरों, मठों और आश्रमों में उन्हें वह शांति मिलती है, जो स्मार्टफोन के नोटिफिकेशंस के बीच कहीं खो गई थी. यह उनके लिए धार्मिक कर्मकांड से ज्यादा एक 'मेंटल डिटॉक्स' की प्रक्रिया है.

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नए साल पर जयपुर से भी एक तस्वीर सामने आई, जिसने मेरा ध्यान खींचा. जयपुर के सेंट्रल पार्क में लगे बोर्ड पर लिखा था 'दारू नहीं, दूध से करें नववर्ष की शुरुआत'. लिहाजा सांगानेर में अलग-अलग जगहों पर 50 हजार लोगों को दूध पिलाने का टारगेट सेट किया गया. इतना ही नहीं, जयपुर के मंदिरों में 'कीर्तन जैमिंग' जैसे सेशन हुए. जिनमें Gen-Z को आकर्षित करने के लिए पारंपरिक भक्ति संगीत को आधुनिक वाद्ययंत्रों और समूह गायन के साथ प्रस्तुत किया गया. 

1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी जो Gen-Z कहलाती है, वो सिर्फ भजन-भक्ति ही नहीं, शराब से तौबा भी कर रही है. उमसें 'जाम' से ज्यादा 'ज्ञान' की तलब है. उनके लिए 'ड्रिंक' करना अब कूल होने की निशानी नहीं रही. लिहाजा, Gen-Z अब सोशल गैदरिंग में शराब नहीं पी रहे, बल्कि काफी मात्रा में नॉन-अल्कोहॉलिक ड्रिंक्स ले रहे हैं. दरअसल, पीने के शौकीन एक ऐसे ऑप्शन की तलाश में हैं, जो उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक ना हो. यही ट्रेंड 'सोबर ड्रिंकिंग' या 'सोबर क्यूरियस' हैं. वे अगली सुबह सिरदर्द के साथ नहीं, बल्कि क्लियैरिटी के साथ जागना चाहते हैं.  हाल ही में एक स्टडी में कहा गया है कि युवा पीढ़ी, खासकर Gen-Z में शराब के प्रति रुझान तेजी से घटा है. यह पीढ़ी पिछली पीढ़ियों की तुलना में न सिर्फ कम शराब पी रही है, बल्कि बड़ी संख्या में युवा पूरी तरह परहेज भी कर रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया की फ्लिंडर्स यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के मुताबिक जो युवा शराब पीते भी हैं, उनकी साप्ताहिक खपत पहले की पीढ़ियों की तुलना में काफी कम है. 

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Gen-Z का मंदिरों की ओर मुड़ना और क्लबों को छोड़ना उनके 'स्व' (सेल्फ) की ओर लौटने की यात्रा है. ये बदलाव बताता है कि आज की युवा पीढ़ी समझदार है, वो सिर्फ चकाचौंध से प्रभावित नहीं है, उसे रपटीली और कंकरीली राहों का बोध है, वो सिर्फ रील्स ही नहीं सरका रही, बल्कि भारतीय संस्कृति की ओर भी रुख कर रही है. चेतना को जागृत करने की चाह पाल रही है. ये पीढ़ी समझ चुकी है कि असली 'हाइप' बाहर की चमक-धमक में नहीं, बल्कि भीतर की चमक में है.

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