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MP: थाली नहीं तो रद्दी कागजों पर परोस दिया हलवा-पूड़ी, गणतंत्र दिवस पर शर्मसार हुई शिक्षा व्यवस्था

Food Served on Waste Paper: MP के मैहर जिले से आई यह तस्वीर न केवल शिक्षा विभाग के लिए शर्मनाक है, बल्कि यह मासूम बच्चों के स्वास्थ्य और उनके स्वाभिमान पर भी एक गहरा आघात है. गणतंत्र दिवस, जिसे हम अपनी लोकतांत्रिक गरिमा का प्रतीक मानते हैं, उसी दिन बच्चों को रद्दी कागजों पर भोजन परोसना सिस्टम की संवेदनहीनता को उजागर करता है.

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मैहर में रद्दी कागज पर परोसा खाना.(Photo:ITG)
मैहर में रद्दी कागज पर परोसा खाना.(Photo:ITG)

मध्य प्रदेश के मैहर जिले से एक शर्मनाक तस्वीर सामने आई है, जिसने शिक्षा विभाग और प्रशासनिक दावों की पोल खोलकर रख दी है. जहां पूरा देश गणतंत्र दिवस के पावन पर्व पर बच्चों को देश का भविष्य बताकर उन्हें सम्मानित करने की बातें कर रहा था, वहीं मैहर के शासकीय हाई स्कूल भटिंगवा में इन मासूमों के आत्मसम्मान और स्वास्थ्य के साथ भद्दा मजाक किया गया. गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित विशेष भोज के दौरान बच्चों को गरिमापूर्ण तरीके से भोजन कराने के बजाय उन्हें रद्दी कॉपियों और स्कूल की किताबों के फटे पन्नों पर पूड़ी-हलवा परोस दिया गया.

सोशल मीडिया पर वायरल हुए इस घटना के वीडियो ने पूरे प्रदेश में आक्रोश पैदा कर दिया है. वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि स्कूल के मासूम छात्र-छात्राएं कड़ाके की ठंड के बीच खुले आसमान के नीचे जमीन पर बैठे हैं. उनके सामने न तो भोजन की थाली है और न ही सामान्य तौर पर इस्तेमाल होने वाले पत्तल.

इसके उलट, स्कूल प्रबंधन ने निर्दयिता की सारी हदें पार करते हुए पुरानी रद्दी कॉपियों के पन्नों को फाड़कर फर्श पर बिछा दिया और उसी स्याही वाले कागज पर बच्चों को निवाला दिया गया. मजबूरी और व्यवस्था के बीच दबे ये बच्चे चुपचाप उसी गंदे कागज से खाना उठाकर खाने को विवश नजर आए.

स्वास्थ्य से खिलवाड़

यह मामला केवल कुप्रबंधन का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर बच्चों की जान से खिलवाड़ का है. चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, किताबों या अखबारों में इस्तेमाल होने वाली प्रिंटिंग स्याही में लेड (सीसा) और अन्य जहरीले रसायन होते हैं. जब गर्म भोजन इन कागजों के संपर्क में आता है, तो यह रसायन पिघलकर खाने में मिल जाते हैं, जो बच्चों के शरीर में पहुंचकर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों और पाचन तंत्र की गंभीर समस्याओं का कारण बन सकते हैं. सवाल यह उठता है कि क्या स्कूल प्रशासन इतना भी जागरूक नहीं था कि वह इन मासूमों को इस खतरे में धकेलने से पहले एक बार सोचता.

सरकारी आंकड़ों और नियमों की बात करें तो मिड-डे मील के लिए बर्तनों की खरीद और रखरखाव के लिए सरकार अलग से बजट आवंटित करती है.

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इसके बावजूद, एक राष्ट्रीय पर्व के दिन ऐसी स्थिति का निर्मित होना भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता की ओर इशारा करता है. स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यह बच्चों के बुनियादी अधिकारों का हनन है और यह घटना दर्शाती है कि सरकारी तंत्र में बैठे कुछ लोग गरीब बच्चों को किस नजर से देखते हैं.

इस पूरे शर्मनाक घटनाक्रम पर प्रशासनिक अमला अब सफाई देने की मुद्रा में है. जिला परियोजना समन्वयक (DPC) विष्णु त्रिपाठी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच के आदेश जारी किए हैं.

न्होंने स्पष्ट किया है कि वायरल वीडियो के आधार पर ब्लॉक संसाधन समन्वयक (BRC) को मौके पर जाकर रिपोर्ट तैयार करने को कहा गया है.

प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि इस घोर लापरवाही के लिए जो भी शिक्षक या कर्मचारी जिम्मेदार पाया जाएगा, उसके खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी.

हालांकि, बड़ा सवाल अब भी यही बना हुआ है कि क्या दोषियों पर होने वाली कार्रवाई भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोक पाएगी और क्या इन बच्चों को वह सम्मान वापस मिल पाएगा जिसके वे हकदार थे.

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