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विश्व-हिंदी दिवस गीतः रस बन के बरस जाए भाषा तो वही है

विश्व हिंदी दिवस के इस ऐतिहासिक दिन पर हिंदी के सुधी कवि-गीतकार डॉ ओम निश्चल ने साहित्य आजतक के लिए विशेष रूप से यह गीत लिखा है, पढ़िए

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विश्व हिंदी दिवस २०२२ः प्रतीकात्मक चित्र विश्व हिंदी दिवस २०२२ः प्रतीकात्मक चित्र

आज 10 जनवरी को समस्त संसार में प्रवास कर रहे भारतवंशी ही नहीं बल्कि हिंदी प्रेमी भी 'विश्व हिंदी दिवस' मना रहे हैं. देश-विदेश हर जगह हिंदी से संबंधित कार्यक्रम और गोष्ठियों का आयोजन किया जा रहा है. हिंदी के प्रचार प्रसार की दिशा में हिंदी दिवस और विश्व हिंदी दिवस दोनों का विशेष महत्त्व है. हम जानते ही हैं कि भारत की संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को हिंदी को संघ की राजभाषा का दर्जा दिया था तथा इसीलिए इस तारीख को हर वर्ष देश में हिंदी दिवस मनाया जाता है तथा इस दिवस को एक सांविधिक दर्जा हासिल है. 

इसी तरह हर साल 10 जनवरी को 'विश्व हिंदी दिवस' मनाया जाता है. उल्लेखनीय है कि प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ. तब से ही इस दिन का एक ऐतिहासिक महत्त्व है तथा इस ऐतिहासिक गरिमामय दिवस को हिंदी के इतिहास में महत्त्व  देने के लिए ही इस तारीख को 'विश्व हिंदी दिवस' के रूप में मनाया जाता है. विश्व हिंदी दिवस मनाये जाने का उद्देश्य विश्व में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए जागरूकता पैदा करना तथा हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठिंत करना है. विदेशों में स्थापित भारत के राजदूतावास  इस दिन को उत्सवपूर्वक मनाते हैं. सभी सरकारी कार्यालयों में विभिन्न विषयों पर हिंदी में व्याख्यान, विमर्श और कवि सम्मेलन आदि आयोजित किये जाते हैं. 

विश्व हिंदी दिवस का उद्देश्य विश्व में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिये जागरूकता पैदा करना, हिंदी को अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में पेश करना, हिंदी के लिए वातावरण निर्मित करना, हिंदी के प्रति अनुराग पैदा करना, हिंदी की दशा-दिशा के प्रति जागरूकता पैदा करना तथा हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रस्तुत करना है. उल्लेखनीय है कि  पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी, 2006  को प्रति वर्ष 'विश्व हिंदी दिवस' के रूप मनाये जाने की घोषणा की थी. उसके बाद से भारतीय विदेश मंत्रालय ने विदेश में 10 जनवरी 2006 को पहली बार 'विश्व हिंदी दिवस' मनाया था और तब से यह परंपरा चलती आ रही है.
 
हिंदी का जो वैश्विक वातावरण बनना चाहिए था वह संयोग से अभी देश में भी नहीं बन पाया है. जबकि होना यह चाहिए था कि संविधान के लागू होने के 72 वर्षों बाद भारत में हिंदी को सरकारी कामकाज के हर क्षेत्र में एक प्रभावी भाषा बन जाना चाहिए था. लेकिन हिंदी के तकनीकी स्तर पर प्रभुत्वकारी होने के बावजूद हिंदी को अभी भी वह स्थान हासिल नहीं हो पाया है जिसकी वह हकदार है. निजी क्षेत्र व बहुराष्ट्रीय कंपनियों में तो हिंदी का प्रवेश अभी प्रतीक्षित ही है. लेकिन यह भी सच है कि पूरे विश्व में संपर्क भाषा के रूप में हिंदी का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हो रहा है. ऐसी स्थिति में विश्व हिंदी दिवस का मनाया जाना उस संकल्प को दुहराना भी है जिस संकल्प के साथ 10 जनवरी, 1975 को पहले विश्व हिंदी सम्मेलन की नींव नागपुर में रखी गयी थी.  

विश्व हिंदी दिवस के इस ऐतिहासिक दिन पर हिंदी के सुधी कवि-गीतकार डॉ ओम निश्चल ने साहित्य आजतक के लिए विशेष रूप से यह गीत प्रेषित किया है. पढ़िए 

रस बन के बरस जाए भाषा तो वही है

पानी की तरह भाषा, भाषा की तरह पानी
बहती हुई-सी नदिया, नदिया में हो रवानी
रम जाए जिसमें यह तन
मंदिर तो  वही अप्रतिम
बह जाए जिसमें मन यह भाषा तो बस वही है.
*
भाषा से खेलने में आनंद जितना आता
भाषा को खोलने में उतना अपार सुख है
थोड़े इधर-उधर से शब्दों में प्राण जगते
भाषा की इस गली में रौनक भी तो बहुत है

भाषा को कबीरों ने प्राणों से अपने सींचा
तुलसी ने लोकचर्या की माधुरी से सींचा
भाषा की पैंजनी तो बस सूर ने सुनी थी
मीरा ने भक्तिरस की मदिरा बहा के सींचा
भाषा न अमीरों की 
भाषा न गरीबों की
जो सब के साथ बहती भाषा तो बस वही है.

**
भाषा में इतना दम है भाषा में इतना खम है
बाहर से ठोस लगती भीतर से किन्तु  नम है
खुशियां  समेट  लेती  अपने दुकूल में यह
कांधे पर हाथ रखती बेशक कि कितना ग़म है

भाषा कराती  झगड़े  भाषा  कराती सुलहें
भाषा में शाम होती  भाषा में होती सुबहें
भाषा ही दरअसल है पहचान आदमी की
भाषा के नक्श ए कदमों पर नाचती है जगहें
भाषा है पान मघई 
चुपचाप घुले हिय में
रस बन के बरस जाए भाषा तो बस वही है.

***
भाषा तो साधु संतों की गोद में पली है
भाषा तो गांव कस्बों सीवान में ढली है
भाषा के कबाड़ी से पूछो तो कभी जाकर
कितनी तरह की भाषा अंबार में मिली है

भाषा में लोरियों की कैसी है मीठी गुनगुन
इसमें है लावनी की इक रागिनी सी रुनझुन
भाषा अशुद्धता की  ही  खाद से सँवरती
इसकी रगों में बहती  है लोकगीत सी धुन.
फीके हैं आभरण सब
संदिग्ध आचरण सब
पुरुषार्थ को जो साधे भाषा तो बस वही है.
बह जाए जिसमें मन यह भाषा तो बस वही है. 
             
                            -डॉ ओम निश्चल 

# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com
 

 

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