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शरद जोशी के 9 नुकीले व्यंग्य बाण, 'बाढ़-अकाल से बचा मुर्गा नेता से नहीं बच सकता'

जानिए इस किताब में समेटे गए शरद जोशी के व्यंग्य के कुछ अंश...

'व्यंग्यर्षि शरद जोशी' किताब का कवर 'व्यंग्यर्षि शरद जोशी' किताब का कवर

'अरे रेल चल रही है और आप उसमें जीवित बैठे हैं, यह अपने आप में कम उपलब्धि नहीं है.'

भारतीय पत्रकारिता और हिन्दी साहित्य में व्यंग्यकार शरद जोशी का समान रूप से दखल है. उनका व्यंग्य दिल-दिमाग दोनों को एक साथ गुदगदाता है. शरद जोशी को किसी विचारधारा के अंदर न समटेते हुए लेखक वागीश सारस्वत ने 'व्यंग्यर्षि शरद जोशी' के नाम से किताब लिखी है.

इस किताब में लेखक ने शरद जी के व्यक्तित्व से लेकर उनके काम तक को लिखा है. एक लेखक के संघर्षों को बयां करती हुई इस किताब में बताया गया है कि भारतीय राजनीति की तरह ही हिंदी साहित्य में कई गुट बने हुए हैं. बिना किसी गुट में शामिल हुए लिखना और मशहूर होना यहां थोड़ा मुश्किल होता है, लेकिन शरद जी ने अपने लेखनी के माध्यम से जनता से सीधे संवाद पत्रकारिता के माध्यम से किया.


जानिए इस किताब में समेटे गए शरद जोशी के व्यंग्य के कुछ अंश:

1. भारतीय रेल हमें मृत्यु का दर्शन समझाती है और अक्सर पटरी से उतरकर उसकी महत्ता का भी अनुभव करा देती है. कोई नहीं कह सकता कि रेल में चढ़ने के बाद वह कहां उतरेगा? अस्पताल में या श्मसान में. लोग रेलों की आलोचना करते हैं.

2. नेताओं पर व्यंग्य करते हुए शरद लिखते हैं, 'उनका नमस्कार एक कांटा है, जो वे बार-बार वोटरों के तालाब में डालते हैं और मछलियां फंसाते हैं. उनका प्रणाम एक चाबुक है, हंटर है जिससे वे सबको घायल कर रहे हैं.'

3. भ्रष्टाचार की व्यापकता पर वे लिखते हैं 'सारे संसार की मसि (स्याही) करें और सारी जमीन का कागज, फिर भी भ्रष्टाचार का भारतीय महाकाव्य अलिखिति ही रहेगा.'

4. जनता को कष्ट होता है मगर ऐसे में नेतृत्व चमक कर ऊपर उठता है. अफसर प्रमोशन पाते हैं और सहायता समितियां चन्दे के रुपये बटोरती हैं. अकाल हो या दंगा, अन्तत: नेता, अफसर और समितियां ही लाभ में रहती हैं.

5. बाढ़ और अकाल से मुर्गा बच जाए, मगर वह मंत्रियों से सुरक्षित नहीं रह सकता है. बाहर भयंकर बाढ़ और अंदर लंच चलता है.

6. अपनी उच्च परंपरा के लिए संस्कृत, देश की एकता के लिए मराठी या बंगला, अपनी बात कहने समझने के लिए हिंदी और इस पापी पेट की खातिर अंग्रेजी जानना जरूरी है.

7. शिक्षक हो जाना हमारे राज्य का प्रिय व्यवसाय है. कहीं नौकरी न मिले तो लोग शिक्षक हो जाते हैं. मिल जाए तो पत्नी को शिक्षिका बना देते हैं. हमारे यहां दूल्हा-दुल्हन सुहागरात को भी एजुकेशन डिपार्टमेंट के बारे में बात करते हैं.

8. जिस दिन गेगरिन अंतरिक्ष यात्रा को गया, उस रोज सिन्हा बाबू खंडवा जाना चाहते थे, पर छुट्टी मंजूर न होने पर मुंह फुलाए बैठे थे. उन्हें पता लगा कि रूस का आदमी आसमान में घूम आया है तो बहुत कुढ़े और बोले,  'देखा दूसरे देश कितनी तरक्की कर रहे हैं, आदमी जहां चाहे जा सकता है और एक हमारा देश है जहां आदमी खंडवा भी जाना चाहे तो जाना मुश्किल है.

9. जो लिखेगा सो दिखेगा, जो दिखेगा सो बिकेगा-यही जीवन का मूल मंत्र है.

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