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हिंदी के प्रसिद्ध लेखक गंगा प्रसाद विमल का श्रीलंका में सड़क हादसे में निधन

हिंदी के जाने माने लेखक गंगा प्रसाद विमल की श्रीलंका में हुए एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई. इस सड़क हादसे में उनके परिवार के 2 अन्य सदस्यों की भी मौत हो गई है. पुलिस ने बुधवार को इस बात की जानकारी दी है. घटनास्थल पर ही तीनों लोगों की मौत हो गई.

हिंदी के जाने माने लेखक गंगा प्रसाद विमल (फोटो साभार: फेसबुक) हिंदी के जाने माने लेखक गंगा प्रसाद विमल (फोटो साभार: फेसबुक)

  • हिंदी के जाने माने लेखक गंगा प्रसाद विमल का निधन
  • श्रीलंका में हुई एक सड़क दुर्घटना का शिकार हुए विमल

हिंदी के जाने माने लेखक, अनुवादक और जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय के पूर्व प्रोफेसर गंगा प्रसाद विमल की श्रीलंका में हुए एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई. वह 80 वर्ष के थे. इस सड़क हादसे में उनके परिवार के 2 अन्य सदस्यों की भी मौत हो गई है. पुलिस ने बुधवार को इस बात की जानकारी दी है. घटनास्थल पर ही तीनों लोगों की मौत हो गई.

जानकारी के मुताबिक गंगा प्रसाद विमल अपने परिजनों के साथ दक्षिण गेले टाउन से कोलंबो की ओर एक वैन में सवार होकर जा रहे थे, तभी वैन दुर्घटनाग्रस्त हो गई. इस हादसे में वैन ड्राइवर की भी मौत हो गई है. ड्राइवर पश्चिमी श्रीलंका के वड्डआ टाउन का रहने वाला है. दो अन्य लोग भी इस हादसे में घायल हुए हैं जिन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है. उनकी हालत गंभीर बनी हुई है.

अभी पार्थिव शरीर नहीं आया भारत

श्रीलंका पुलिस के मुताबिक उनके वाहन के ड्राइवर को गाड़ी चलाते समय नींद आ गई थी, जिस वजह से उनके गाड़ी की एक ट्रक से टक्कर हो गई. उत्तराखंड के उत्तरकाशी में 3 जून 1939 में जन्मे विमल की पुत्री और नतिनी की भी इस  दुर्घटना में मृत्यु हो गई. अभी तीनों का पार्थिव शरीर भारत नहीं आ पाया है.

1965 में पंजाब विश्वविद्यालय से की थी पीएचडी

आपको बता दें कि विमल केंद्रीय हिंदी निदेशालय के निदेशक भी रह चुके थे. वह ओस्मानिया विश्विद्यालय और जेएनयू में शिक्षक भी रहे थे तथा दिल्ली विश्विद्यालय के जाकिर हुसैन कॉलेज से भी जुड़े थे. पंजाब विश्विद्यालय से 1965 में पीएचडी करने वाले विमल महत्वपूर्ण कवि, कहानीकार, उपन्यासकार और अनुवादक भी थे.

20 से ज्यादा किताबें छपीं

विमल का पहला काव्य संग्रह 1967 में विज्जप नाम से आया था. पहला उपन्यास अपने से अलग 1972 में आया था. उनका पहला कहानी संग्रह कोई भी शुरुवात 1967 में आया था. उन्होंने चंद्रकुंवर बर्थवाल संचयन का संपादन किया था और प्रेमचंद तथा मुक्तिबोध पर किताबें लिखी थी. उनकी करीब 20 से अधिक पुस्तकें छपी थीं और कई राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले थे.

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