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महिला दिवस: सुबह उठते ही निहारती हैं आंखें हथेलियों को...

महिला दिवस के मौके पर महिलाओं की स्थिति बयां करती एक कविता.

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हर दिन सुबह आंख खोलते ही
निहारती हैं हम हथेलियों को
देखती हैं अपने किस्मत की रेखा
जाने रात भर में
क्या बदल गया होगा
बदलता कुछ नहीं
पैरों में वही चकर घिन्नी लगी है
जो पैदा होते वक्त
धरती मां से खोइन्छे में मिली थी

रोबोट की तरह
सेट हो चुका है अपना माइंड सेट
अब उसी कण्ट्रोल बटन से चलता है
अपने जीवन का कारोबार
इसलिए कभी कभी याद भी नहीं रहता
अगले दिन इतवार है या सोमवार
तो भला कैसे याद रहेगा
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का त्योहार
जिसमे हमें याद दिलाया जाता है
कि हमें भी हैप्पी होना है
साल के तीन सौ पैंसठ दिनो में से
अब भला कैसे याद रहे
अदना सा 8 मार्च का एक दिन
जबकि इस दिन अपने परिवार में से
किसी का जन्मदिन भी तो नहीं पड़ता
और ना ही होता है
दीवाली, ईद, गुरु-पूरब, ईस्टर
या कोई राष्ट्रीय त्योहार

आज भी
स्कूल की किताबों में नहीं होता
वुमन के हैप्पी होने का कोई चैप्टर
वो मर्दानी झांसी की रानी हो सकती है,
या हो सकती है
ममता की नदी सी मदर टेरेसा या
करुणा की लौ लिए नाईट-एंगल
बाजू का दम दिखाती मेरीकॉम या
उड़नपरी पी टी उषा हो सकती है
वो हो सकती है
पुचकारने वाली मां,
लाड दिखाने वाली बहन
प्यार लुटाने वाली पत्नी
और ख्याल रखने वाली बेटी या बहू

लेकिन नहीं हो सकती तो बस
खुल कर आजाद ख्यालों से
जिन्दगी जी लेने वाली आम लड़की
थोपी हुई सोच की दल-दल से निकल कर
खुली हवा में सांस लेने वाली स्त्री
लिंगानुपात की ही तरह
इसे भी महिला दिवस का नाम देकर
एक दिन में समेट दिया गया है
जहां हम उसी रोबोटिक माइंड सेट की तरह
उस दिन खुश हो जाते हैं
रटे-रटाये ज़ुबान से कहते हैं
'हैप्पी वुमेंस डे'

(ये कविता वाराणसी में रहने वाली रेनू मिश्रा ने लिखी है)

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