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मांग पर दोबारा छपी साहित्य वार्षिकी

समय बदल चुका है. इंटरनेट पर सूचना और साहित्य के अनगिनत भंडारों के गेट खुल गए हैं. ऐसे में साहित्य वार्षिकी!" जी, ऐसे जाने कितने अंदेशे जताए गए थे, डेढ़ दशक बाद इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी छापे जाने के विचार पर. लेकिन पत्रिका के छपने के दो माह के भीतर ही इसके ''आउट ऑफ स्टॉक" होने की सूचनाएं पहुंचने लगीं.

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समय बदल चुका है. इंटरनेट पर सूचना और साहित्य के अनगिनत भंडारों के गेट खुल गए हैं. ऐसे में साहित्य वार्षिकी!" जी, ऐसे जाने कितने अंदेशे जताए गए थे, डेढ़ दशक बाद इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी छापे जाने के विचार पर.

लेकिन 8 नवंबर को साहित्य आजतक में इसका विमोचन होने के दो महीने के भीतर ही इसके ''आउट ऑफ स्टॉक" होने की सूचनाएं पहुंचने लगीं. कई जगहों के पाठकों को दूसरे राज्य के किसी विक्रेता से लेकर वार्षिकी पहुंचाई गई. अंत में ''नहीं मिल पाने" के शिकवे शुरू हुए.

आखिरकार, इसे फिर से छपवाया गया और अब यह देशभर में न्यूजस्टैंड पर उपलब्ध है. एक सुझाव बार-बार सुनने को मिल रहा था—कई दफा तो चेतावनी की हद तक—कि ''इसे शुरू तो किया है पर अब बंद न होने दीजिएगा."

शुरू में इसकी कीमत (150 रु.) को लेकर कुछेक हलकों से सवाल उठे लेकिन बाद में ऐसी भी चिट्ठियां आने लगीं कि इसके कलात्मक पक्ष को देखते हुए कीमत कतई ज्यादा नहीं. कुछ पाठकों-समीक्षकों को इसका कहानी खंड ज्यादा मजबूत लगा तो कइयों को संवाद और संस्मरण वाले हिस्से पसंद आए.

मऊरानीपुर (झांसी) के एक सुधी पाठक ओमप्रकाश बबेले ने मो. आरिफ की कहानी टोनी लाइव को रेखांकित किया. ''सात साल की पौत्री को थोड़ा सुनाकर छोड़ दिया, लेकिन कभी जिज्ञासा से और कभी हंसकर वह पूछती कि श्फिर क्या हुआ टोनी का?" स्कूली शिक्षा में छोटे बच्चों की संवेदनाओं के साथ होते खिलवाड़ पर यह कहानी हमें परेशान कर जाती है."

साहित्य वार्षिकी, 2018

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