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दिल्ली: नामवर, ओम पुरी समेत कई दिग्गजों ने गजल भरी शाम में की शिरकत

'दिमाग पर दिल हावी है. दिल भर गया है दिमाग खाली है.' वरिष्ठ आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने ये पंक्तियां हिंदी अकादमी की ओर से आयोजित युवा गजलकार आलोक श्रीवास्तव के भावपूर्ण एकल गजल पाठ के बाद भावुक लहजे में कही.

ओम पुरी, आलोक श्रीवास्तव और नामवर सिंह ओम पुरी, आलोक श्रीवास्तव और नामवर सिंह

'दिमाग पर दिल हावी है. दिल भर गया है दिमाग खाली है.' वरिष्ठ आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने ये पंक्तियां हिंदी अकादमी की ओर से आयोजित युवा गजलकार आलोक श्रीवास्तव के भावपूर्ण एकल गजल पाठ के बाद भावुक लहजे में कही.

इस कार्यक्रम में मशहूर अभिनेता ओम पुरी, हिंदी के वरिष्ठ आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने शिरकत की. इस मौके पर ओम पुरी ने कहा कि आलोक की गजलों की भाषा इतनी सादी होती है कि किसी लफ्ज के मायने समझने की जरूरत ही नहीं होती.

दिल्ली के त्रिवेणी सभागार में यह कार्यक्रम आयोजित किया गया. आलोक ने इस मौके पर 'असर बुजुर्गों की नेमतों का हमारे अंदर से झांकता है, पुरानी नदियों का मीठा पानी नए समंदर से झांकता है.' जैसी गजलों से श्रोताओं का दिल लुभाया. गौरतलब है कि गजलकार आलोक श्रीवास्तव गजल संग्रह 'आमीन' के लिए खास लोकप्रिय हैं. उनका एक चर्चित कथा-संग्रह 'आफरीन' भी आ चुका है.

आलोक श्रीवास्तव की गजल अम्मा और बाबूजी को काफी लोकप्रिय हैं. हिंदी अकादमी के कार्यक्रम में भी आलोक ने ये गजलें गाईं और लोगों को काफी पसंद भी आईं. यहां पढ़िए आलोक श्रीवास्तव की मशहूर गजल अम्मा और बाबू जी.

अम्मा...
धूप हुई तो आंचल बन कर कोने-कोने छाई अम्मा,
सारे घर का शोर-शराबा, सूनापन तनहाई अम्मा.
सारे रिश्ते- जेठ दोपहरी, गर्म-हवा, आतिश, अंगारे,
झरना, दरिया, झील, समंदर, भीनी-सी पुरवाई अम्मा.
उसने खुदको खोकर मुझमें एक नया आकार लिया है,
धरती, अंबर, आग, हवा, जल जैसी ही सच्चाई अम्मा.
घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे,
चुपके-चुपके कर देती है, जाने कब तुरपाई अम्मा.
बाबूजी गुजरे आपस में सब चीजे तक्सीम हुईं, तब-मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से आई अम्मा.

बाबूजी
घर की बुनियादें दीवारें बामों दर थे बाबूजी,
सबको बांधे रखने वाला खास हुनर थे बाबूजी.
तीन मुहल्लों में उन जैसी कद-काठी का कोई न था,
अच्छे-खासे, ऊंचे-पूरे, कद्दावर थे बाबूजी.
अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है,
अम्माजी की सारी सजधज, सब जेवर थे बाबूजी.
भीतर से खालिस जज्बाती, और ऊपर से ठेठ पिता,
अलग, अनूठा, अनबूझा-सा, इक तेवर थे बाबूजी.
कभी बड़ा-सा हाथ खर्च थे, कभी हथेली की सूजन,
मेरे मन का आधा साहस, आधा डर थे बाबूजी.

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