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अमिताभ बच्चन के हाथ पहुंची आशीष कौल की 'दिद्दा-दि वारियर क्वीन ऑफ कश्मीर'

महानायक अमिताभ बच्चन के हाथ पहुंच कर 'दिद्दा-दि वारियर क्वीन ऑफ कश्मीर' किताब को एक नया मुकाम मिला है. कश्मीर की अद्वितीय योद्धा, महानायिका रानी दिद्दा पर यह कॉरपोरेट अधिकारी रहे आशीष कौल की चर्चित किताब है

'दिद्दा-दि वारियर क्वीन ऑफ कश्मीर' के साथ अमिताभ बच्चन और लेखक आशीष कौल 'दिद्दा-दि वारियर क्वीन ऑफ कश्मीर' के साथ अमिताभ बच्चन और लेखक आशीष कौल

मुंबईः यों तो 'दिद्दा-दि वारियर क्वीन ऑफ कश्मीर' किताब जब से आई है, चर्चा में है, पर बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन के हाथ पहुंच कर इसे एक नया मुकाम मिला है. यह कहना है इस पुस्तक के लेखक आशीष कौल का. कश्मीर की पृष्ठभूमि पर छपी कौल की पहली किताब रिफ्युजी कैंप भी काफी चर्चा में रह चुकी है.

इतिहास के पन्नों में छिपी कश्मीर की अद्वितीय योद्धा, महानायिका रानी दिद्दा से महानायक अमिताभ बच्चन को मिलवाकर आशीष कौल ने जैसे एक परिक्रमा पूरी कर ली. उन्होंने अपनी इस बेस्टसेलर  किताब 'दिद्दा-दि वारियर क्वीन ऑफ़ कश्मीर' का लोकार्पण अमिताभ बच्चन के हाथ से कराया.

इस वाकिए से गदगद कौल का कहना था, ''मेरे पास शब्द नहीं हैं अपनी ख़ुशी व्यक्त करने के लिए कि इस सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने अपने अगले एक साल तक के तयशुदा व्यस्त समय में से मेरी किताब  'दिद्दा-दि वारियर क्वीन ऑफ़ कश्मीर' के लोकार्पण के लिए समय निकाला. वैसे भी यह किताब ४४ साल तक देश की सीमाओं को आक्रांताओं से सुरक्षित रखने वाली महायोद्धा कश्मीर की रानी दिद्दा की कहानी है, तो इसके लोकार्पण के लिए इसी धरती के महानायक से बेहतर कौन हो सकता है भला?"  

दिद्दा-द वारीयर क्वीन ऑफ कश्मीर अपनी तरह की एक अनूठी कहानी है. इस कहानी की नायिका ‘दिद्दा’ के जीवन में व्यक्तिगत, सांस्कृतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक के साथ-साथ शारीरिक चुनौतियां तो हैं ही, उसकी कहानी को और दिलचस्प बनाती है उसके जीवन की वह यात्रा, जो एक अनचाही, शारीरिक रूप से विक्षिप्त, मां-बाप द्वारा त्याग दी गयी नन्हीं बच्ची से कश्मीर जैसे सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण साम्राज्य की सफलतम रानी बना देती है.   

इस उपन्यास के माध्यम से दिलचस्प है दिद्दा के उस रणनीतिज्ञ दिमाग को समझना, जिसके चलते महमूद गजनी जैसे दुर्दांत हमलावर को एक नहीं दो-दो बार मुंह की खानी पड़ी. इतना ही नहीं दिद्दा ने ईरान के राजा की 32800 के योद्धाओं की सेना को अपने सिर्फ 500 सैनिकों  वाली  सेना की मदद से न सिर्फ 44 मिनट में काबुल के युद्ध में हराया, बल्कि देश की सीमाओं को 44 साल तक सुरक्षित रखा. दिद्दा ने न केवल युद्ध जीते बल्कि पुरुष सत्तात्मक समाज के बने बनाए नियम तोड़े और अपने नियम बनाए.

याद रहे कि 'दिद्दा-दि वारियर क्वीन ऑफ़ कश्मीर' किताब ने अपने पहले ही हफ्ते में किताबों की विश्व क्रम-तालिका में न सिर्फ दसवां स्थान पाया बल्कि समीक्षकों और पाठकों से भी भरपूर प्यार मिला. दिद्दा, फोकलोर एंटरटेनमेंट के चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर आशीष कौल द्वारा निर्मित 'स्त्रीदेश- कश्मीर की 13 पराक्रमी स्त्रियां' नाम की फ़िल्म परियोजना के तहत एक अनूठे प्रयास का हिस्सा है.

लेखक आशीष कौल का दावा है, "भारत और विशेषकर कश्मीर में कई ऐसी महिलाएं हुई, जिन्होंने कई महत्त्वपूर्ण खोज और व्यवस्था की नींव रखी, फिर चाहे वो सहकारी बैंक हों, जल व्यवस्था हो या फिर प्रजातांत्रिक व्यवस्था ही क्यों न हो, यहाँ तक की विश्व की पहली वैतनिक सेना भी कश्मीर की रानी ने ही दी. विडंबना यह है कि एक के बाद एक आये आक्रांताओं और इतिहासकारों ने इतिहास को जिस तरह से लिखा उसमें इन रानियों का योगदान गौण कर दिया गया और उन सारी व्यवस्थाओं और की गयी खोज का श्रेय पश्चिम को दे दिया गया जो दरअसल हमारी थी. 'दिद्दा-दि वारियर क्वीन ऑफ़ कश्मीर' कश्मीर की भुलाई जा चुकी उस महानायिका को मेरी श्रद्धांजलि है."

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