कहानी - मिट्ठू बेटे
शौकत थानवी
"हिरामन तोते का बच्चा" यह थी वह आवाज़ जो गर्मियों की चिलचिलाती दोपहर में लूँ के झोंकों के साथ बेगम साहिबा के कान तक पहुँची और वह पंखा-वंखा छोड़कर हड़बड़ाकर उठ बैठीं। पहले तो हमारी तरफ देखा, लेकिन हम पहले ही समझ गए थे कि यह होने वाला है और अब हमसे कहा जाएगा कि इस धूप में निकलकर तोते वाले को बुलाएँ, इसलिए हमने जल्दी से आंखे बंद कर ली, जैसे सो रहा हूं। आखिर बेचारी ने गुलशन जो घर में काम करती थी, उसे बुलाकर तोते वाले को बुलाने की ड्यूटी सुपुर्द कर दी, “देख मेरी गुलशन, कहीं तोते वाला निकल न जाए। भागो, लपककर बुला ले। अरे खड़ी क्यो हो जाओ...”
गुलशन ने दौड़ कर आवाज़ दी। आवाज़ दी तो लगा तोते वाला घर ही पर मौजूद था। पट कर बोला, जी ये देखिए तोता, ऐसा नाज़ुक खूबसूरत और कीमती तोता कहीं मिलेगा नहीं। और कहते हुए गुलशन के हाथ में एक, दो, तीन, चार, पाँच, मतलब यह कि दर्जनों तोते के बच्चे बेगम साहिबा को पसंद कराने के लिए भेजे जाने लगे जिनमें से एकाध पर दाम भी लगाए गए, लेकिन आखिर थोड़ी देर की दस आना और छह आना की हां नहीं के बाद एक डरावनी शक्ल का तोते का बच्चा सात आने में खरीदा गया और पैसे लेकर तोते वाला विदा हो गया। अब हम भी जाग चुके थे यानी हमने आंखे खोल ली थीं। हमको भी वह तोते का बच्चा इस शौक के साथ दिखाया गया, मानो कोई होनहार औलाद दिखाई जा रही हो। लेकिन हमने उस तोते के बच्चे को हाथ में तो खैर लिया ही नहीं, और देखा भी तो घिनौनी नजरों से। बिना पंखो का वो परिंदा मुझे तो गोश्त की बोटी सा लग रहा था। लेकिन गौर से देखा तो और ही कुछ पाया। तोता तो खैर वह कहीं से लगता ही न था लेकिन उसको छोटी कौम के ऊँट का बच्चा कहा जा सकता था। वही लंबे-लंबे पैर थे। वही लंबी-सी गरदन पर रखा हुआ हाँडीनुमा सिर। वही लटका हुआ पोटा और वही कूबड़ की जगह बेपर के बाजू, चोंच तो खैर थी, लेकिन दुम वगैरह का पता नही चलता था। यानि यूं समझ लीजिए कि देखकर सख्त मतली आई, पर कुछ न कह सके कि बेगम साहिबा को बुरा लगेगा। भई उनका प्यारा हो गया था। वह तो किस जोश से तोते के बच्चे को गोद ले रही हैं और हम उसके बारे में ऐसी बात कहें, ठीक नहीं होगा। इसलिए यही कहकर रह गए, “अभी बहुत छोटा है, कहीं मर न जाए! "
लेकिन बेगम साहिबा को यह भी बुरा लगा और वह जरा बिगड़कर बोलीं, “खुदा न करें यह मरे। मरने क्यों लगा? यह तो बड़ा अच्छा निकलेगा। देख लीजिएगा, हाँ!"
" जाहिर है"
" जाहिर क्या है? जरा बढ़ने दीजिए, फिर देखिए कि कैसा फरफर बोलता है! आप उसके लिए कल एक खूबसूरत सा पिंजरा और दो छोटी-छोटी प्यालियाँ ला दीजिएगा।"
हमने हाँ-हूँ करके बात टाल दी कि अब अगर ज्यादा बातचीत की तो तोते के लिए मोटर और साइकिल वगैरह की फरमाइश भी हो जाएगी। हम चुप होकर दूसरे कामों में लग गए। बेगम साहिबा भी अपने तोते का बच्चा देखने के लिए घर-भर की औरतों को कहने के लिए चली गई। जब वो चली गयीं। और तोता अकेला था, तब हम आहिस्ता से उसके पास पहुंचे पूरे ध्यान से उसे देखा। देखा न गया। हमने छोड़ दिया उसको उसके हाल पर। मुझे तोता-वोता यूं भी पसंद नहीं है। दिनभर घर में चें चे होती ही रहती है अब टें टें भी सुनों।
तो हमारे मिट्ठू बेटे धीरे धीरे बड़े होने लगे। खुदा ने वह दिन भी दिखाया कि उसके पर भी निकल आए और वह बाकायदा तोते की शक्ल का हो गया। अब उसकी पढ़ाई लिखाई की फिक्र बेगम साहिबा को चैन नहीं लेने देती थी। और बेगम साहिबा के अलावा खुद मेरी नाक में दम था— जब देखिए तब वह पिंजरा सामने रखे पाठ पढ़ा रही है। और हम सर दाएं-बाएं सर हिलाते हुए चूं..चूं करते हुए देख रहे हैं। कई बार ऐसा हुआ कि कलम लिए बैठे हैं और कुछ लिखने का इरादा है, लेकिन बेगम साहिबा की चरचर और तोते की टें टें दिमाग में गूंज रही है और कुछ समझ में नहीं आता कि क्या लिखें। बड़ी मुश्किल से जबर्दस्ती लिखने का इरादा ही किया था कि बेगम साहिबा की आवाज और उनके प्यारे शागिर्द की टें टें इस इरादे को भी ले उड़ी। आखिर हमने हाथ से कलम रख दी और देखने लगा कि आखिर कैसे एक तोते को इल्म ओ तरबियत देकर आलिम बनाया जाता है।
बेगम साहिबा पढ़ा रही थीं, “पुच, पुच मिट्ठू बेटे, बोलो सलमावालेकुम। बोलो... "
और मिट्ठू बोले, "टें... टें... टें... "
“सलामवालेकुम ... अलहम्दोलिलाह, इंशाअल्लाब, माशाल्लाह, सुभानअल्लाह.. बोलो बेटे,”
"टें... टॅ..."
"बीवी का प्यारा प्यारा मिट्ठू है, मिट्ठू बेटा है। पुच, पुच!"
"सलाम करो बेटे... अच्छा कहो आदाब”
"बोलो.. अरे बोलता क्यो नहीं है, बोल स्लालेकुम”
"टें... टें... "
अब बताइए कि ऐसी हालत में हमारा दिमाग किस काम का रह सकता था और हमारे दिमाग में इसके सिवा और क्या आ सकता था कि “मिट्ठू बेटे, बोलो सलालेकुम... बोलो वालेकुमसलाम" मिट्ठू बेटे तो खेर क्या दुआ सलाम सीखते, पर उलटा हम सबकुछ भूल गए। बल्कि कभी कभी तो हमको तो यह महसूस होने लगा था कि हम खुद मिट्ठू बेटे होकर रह गए हैं। वह तो कहिए कि मिट्ठू बेटे कुछ ऐसे गधे थे कि उनको याद ही नहीं होता था। और वह बस 'टें-टें' करके रह जाते थे। फिर भी सिर्फ उनकी 'टें-टें' आपकी दुआ से इतना असर जरूर रखती थी और दिमाग में गूँजकर दिमाग के पार हो जाया करती थी। खास तौर से उस वक्त जब कोई पिंजरे पर हाथ रख देता या उनके खाने की प्यालियों को निकालने के लिए पिंजरे में हाथ डाला जाता, उस समय तो बस कुछ न पूछिए ! लगता था जैसे कयामत आ गई हो।
एक तरफ तो वह अपने पंख फड़फड़ाकर पिंजरे से ज़मीन और आसामान एक कर देते थे और दूसरी तरफ उनकी लगातार 'टें-टें' हमारे दिमाग को झनझना देती थी। यह तो चलिए उनकी नासमझी और नादानी यानी बचपन का दौर था, लेकिन जब वह जवान हो गए और बुरे-भले की तमीज करने लगे तब और मुसीबत आई। अब तो नेवले का दिखाई देना, बिल्ली का नज़र आना, यह सब मुसीबत हो गया। बिल्ली को देखकर तो यह इस तरह चीखते थे कि मानो आखिरी बार चीख रहे हों और उसके बाद उनको हमेशा के लिए चुप हो जाना है। मज़े की बात ये है कि एक तरफ तो वह चीखते थे और दूसरी ओर बेगम साहिबा अपना जरूरी से जरूरी काम छोड़कर 'हट हट हट बिल्ली हट – बिल बिल बिल कहती हुई दौड़ती थीं। हज़ार बार कहा कि तुम बेकार दौड़ती हो, बंद पिंजरे से बिल्ली तोते को थोड़ी निकाल सकती है, लेकिन उनको तो यह शक थी कि कहीं बिल्ली को देखकर उनके तोते को हार्ट अटैक न आ जाए।
वैसे, बिल्ली से बचाने के लिए जो एहतियात किए गए थे, वे जरूरत से भी कुछ ज्यादा थे। जैसे एक तो पिंजरा खुद इतना छोटा था कि उसमें बिल्ली का गुजरना नामुमकिन। फिर दिन भर वह पिंजरा बेगम साहिबा के दम के साथ ही रहता था और रात को जमीन से छह फुट की ऊँचाई पर टांग दिया जाता था कि बस बिल्ली की नज़रें तो जा सकें, लेकिन वह खुद न पहुँच सके। ये तो कुछ भी नहीं, बिल्ली की गंदी नज़रों से बचाने के लिए पिंजरे पर एक कपड़ा भी डाल दिया जाता था। कहने का मतलब ये कि बेगम साहिबा ने मिट्ठू बेटे को बिल्ली तो छोड़िये, मुनकर-नकीर (मौत के फ़रिश्ते) से भी छुपाने का इंतज़ाम कर लिया था, लेकिन इस किस्म की बातें अल्लाह मियाँ को बुरी लगती हैं। इसलिए रहन देते हैं।
ख़ैर तो एक रात जब सारा घर गहरी नींद के खर्राटे ले रहा था, एक धमाके की आवाज़ के साथ मिट्ठू बेटे की 'टें-टॅ' ने सबको हड़बड़ा कर उठा दिया और इसी के साथ बेगम साहिबा की आवाज "हाय मेरा मिट्ठू, हाय मेरा तोता" गूंजी। उनकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि शायद घर से निकलकर मोहल्ले वालों को भी जगा देने के लिए काफी थी। हम आँखें मलते हुए बौखलाए हुए पिंजरे की ओर दौड़े। धड़कनें वैसे ही बढ़ी हुई थी, इस पर बेगम साहिबा और हाथ-पैर फुलाए देती थीं। हम बिल्ली का पीछा भी कर रहे थे और बेगम साहिबा से कहते भी जाते थे कि “अरे ठहरो तो सही, जरा सब्र करो! चुप तो रहो! अरे कुछ नहीं होगा उसको” लेकिन वह थीं कि बेकाबू हुई जाती थीं।
To be continued
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