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कहानी | मियाँ, बीवी और मर्डर | स्टोरीबॉक्स विद जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

मैं अपनी बीवी का मर्डर करना चाहता था और इसके लिए मैंने एक प्लान किया एक परफेक्ट मर्डर। मैंने उसे बर्फ से ढके उस पहाड़ पर चलने के लिए कहा जहां मेरा इरादा था उसे वहां से धक्का देने का। लेकिन मेरी पत्नी अपने प्लान के साथ आई थी। उसने जो रचा था उसने मुझे हैरान कर दिया था क्या कोई किसी से इतनी नफरत कर सकता है? सुनिए 'मियां, बीवी और मर्डर' जमशेद कमर सिद्दीक़ी की लिखी कहानी 'स्टोरीबॉक्स में'

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कहानी - मियां बीवी और क़त्ल
जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

 

किसी का कत्ल करने वक्त सबसे मुश्किल बात पता है क्या होती है? उस मरते हुए आदमी की आंखों में देखना... जो बुझ रही होती हैं... हमेशा हमेशा के लिए... मरता हुआ आदमी आपको नफरत और थोड़ी हैरानी से देखता है... पर वो कुछ नहीं कर सकता क्योंकि वो जानता है कि उसके पास बस कुछ सेकेंड्स और हैं... और फिर सब खामोश हो जाएगा। उस एक पल में उस तड़पते हुए आदमी की आंखों का सामना करना मुश्किल होता है, बहुत मुश्किल.... और इसीलिए मैंने तय किया था कि मैं अपनी बीवी के सर में गोली मारूंगा ताकि सेकेंड के दसवें हिस्से मे ... वो खत्म हो जाए... और फिर उसे बर्फ से ढके पहाड़ से धक्का दे दूंगा... उसकी लाश भी किसी को नहीं मिलेगी...   (बाकी की कहानी पढ़ने के लिए नीचे स्क्रॉल करें या फिर इसी कहानी को जमशेद क़मर सिद्दीक़ी से सुनने के लिए बिल्कुल नीचे दिए गए SPOTIFY या APPLE PODCAST के लिंक पर क्लिक करें)

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(बाकी की कहानी यहां से पढ़ें) तलाक शब्द सुनकर दुनिया का मन उदासी से भर जाता है पर मुझे लगता है कि तलाक एक खूबसूरत शब्द है... कितना अच्छा तरीका है एक दूसरे से अलग हो जाने का... दोनों लोग जो एक गलत फैसला ले लेते हैं तलाक उसे सुधारने का मौका देती है... पर तलाक लेना या देना उतना आसान नहीं है.. कम से कम अमेरिका के कुछ खास स्टेट में.. जहां तलाक के खिलाफ कानून बहुत सख्त हैं। अदालतों ने तलाक को इतना मुश्किल बना दिया है कि आप कितने भी तर्क दे दें... तलाक नहीं मिलती। 
पर मैं और मेधा... ज़िंदगी के उस मोड़ पर खड़े थे जहां हमारे बीच सिर्फ और सिर्फ नफरत ही फैली हुई थी। कहते हैं कि शादी के सात साल बाद लोग तलाक के बारे में नहीं सोचते... ज़्यादातर तलाक शादी के सातवें साल से पहले होती हैं... लेकिन हमारे मामले में ऐसा नहीं था... हमारी शादी को ग्यारह साल हो गए थे... और इस ग्यारह साल में हमने एक रिश्ते को संवारने की भरपूर कोशिश की... मेधा ने भी और मैंने भी... पर बात नहीं बनी... हम दोनों एक दूसरे के लिए नहीं बने थे... पर पता नहीं उम्र के किस हिस्से में एक हो गए। और अब अलग होना मुश्किल हो रहा था। पर अब मैंने मेधा से छुटकारे का प्लैन बना लिया था। 
संभल कर चलो... इधर फिसलन है.... मैंने बर्फ से ढके उस पहाड़ पर आगे आगे चल रही मेधा को आवाज़ लगाकर कहा। उसने एक बैंगनी रंग की फर वाली जैकेट और जींस के साथ लॉग बूट्स पहन रखे थे... उसने पलटकर मेरी तरफ देखा... और फिर से चलने लगी। वो दूर तक फैली हुई वादियां थीं... बर्फ ढलती हुई शाम में चांदी की तरह बिछी हुई लग रही थी। हवाएं ज़ोर से चल रही थी.. और दूर बुझता हुआ आसमान था। मैंने मेधा को बहुत मुश्किल से मनाया था घर के पीछे वाली पहाड़ी पर साथ चलने के लिए... मैंने उसे बहाने से कहा था कि 

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मेधा, देखो मैं जानता हूं कि न तुम मेरे साथ रहना चाहती हो.. न मैं तुम्हारे साथ... पर अदालत हमें तलाक नहीं देगी... और जब तक कोई और रास्ता नहीं है... तब तक साथ रहने की कोशिश करते हैं... और कोई रास्ता नहीं है अपने पास... मुझे तुम्हारा साथ पसंद नहीं है... और मैं तलाक की कोशिश बी करता रहूंगा... लेकिन कम से कम जब तक तलाक नहीं मिलती... सुकून ढूंढने की कोशिश करते हैं... चलो... वो घर के पीछे वाली पहाड़ी है न... जहां बर्फ जमी हुई है... चलो चलते हैं... साथ साथ जैसे शादी के शुरुआती दिनों में जाते थे... मेधा ने ज़ाहिर है ना कर दी लेकिन फिर उसे मेरी बात लॉजिकल लगी। सालों से झगड़ा करते करते वो भी थक चुकी थी। उसने हां में सर हिलाया। हम लोग तैयार होने लगे... और उसी वक्त मैंने अपने लॉग कोट की अंदुरूनी जेब में पिस्तौल छुपा ली। मेरा प्लैन यही था कि मेधा को पहाड़ पर जाऊंगा... और वहां किनारे सुसाइड प्वाइंट पर जहां शाम के वक्त कोई नहीं होता... वहां पर उसे गोली मारूंगा... और ढलती हुई शाम के अंधेरे में उसे वहां से धक्का दे दूंगा... काम खत्म... लाश भी नहीं मिलेगी उसकी... 
उधर चले क्या... वहां उस तरफ आगे आगे चलती मेधा ने पलटकर आवाज़ दी... तो मैंने देखा कि वो जिस तरफ चलने को कह रही है... उधर कुछ सैलानी थे, जो होटल की तरफ लौट रहे थे। मैं नहीं चाहता था कि मेधा उस तरफ जाए... मैं उसे उधर ले जाना चाहता था... सुसाइड प्वाइंट की तरफ जहां अंधेरा होने के बाद कोई नहीं जाता था। जब मेधा ने इस तरफ चलने को कहा तो मैंने कहा, नहीं इधर नहीं, उस तरफ चलते हैं... उधर से व्यू देखते हैं... चलो
मेधा एक मिनट के लिए ठिठकी... और उसने मेरी तरफ देखा... मेरे माथे पर पसीना आने लगा। जैसे मेरा प्लैन उसे पता चल गया हो... लेकिन फिर उसने कहा, ठीक है... मेरी जान में जान आई। मैंने कहा, रुको साथ साथ चलते हैं। मैं कुछ तेज़ कदमों से उसके पास बढ़ने लगा। वो मेरे ठहरी... और बर्फ में मेरे पैरों को धंसाते हुए जब मैं अपनी स्टिक को संभालते हुए उसके पास पहुंचा तो उसने कहा “उधर अंधेरा काफी है.. जाना ठीक रहेगा? मैंने कहा .. अरे कोई अंधेरा नहीं, देखो लोग लौट रहे हैं... चलो आओ.... मैंने अपनी बंदूक जो कोट की जेब में थी... उसे संभालते हुए कहा। उसने उस तरफ देखा जहां से कुछ लोग लौट रहे थे... फिर हां में सर हिलाया और चल दी। 

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मैंने देखा कि वो लोग जो सुसाइड प्वाइंट से लौट रहे थे वो हमारे बराबर से निकले.... और दूसरी तरफ जाने लगे। मैंने मेधा के साथ बर्फ पर चलते चलते उन लोगों को चोर नज़रों से देखा कि वो लोग दूर चले जाएं ताकि जब मैं उसे गोली मारूं और उसकी लाश को नीचे तेज़ बहती नदी में फेंक दूं। मैंने उसे चलते हुए देखा.... मैं सोचा कि यही मेधा जो अभी कान ढके चली जा रही है... कुछ देर में खून से लथपथ होगी... थोड़ी देर में इसका ये जिस्म पानी के तेज़ बहाव में बहता हुआ दूर चला जाएगा... और फिर गहरी खाइ में होता हुआ... वहां चला जाएगा जहां किसी को उसकी खबर भी नहीं होगी। अफसोस तो हो रहा था पर क्या करता .. और कोई रास्ता नहीं था... इंसान कभी-कबार इतना मजबूर हो जाता है कि उसके पास और कोई रास्ता नहीं बचता। मेधा की मौत मेरी आज़ादी और उसकी मुक्ति थी। 
मुझे पता है तुम मुझे यहां क्यों लाए हो... अचानक मेधा ने रुक कर कहा... तो मेरे चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। पेट में हज़ारों तितलियां सी उड़ने लगीं... गला सूखने लगा... वो बोली... तुम्हें क्या लगता है... मुझे पता नहीं चलेगा … कि तुम दुनिया को दिखा सको कि तुमने फिर से ये शादी बचाने की कोशिश की थी... तुम बहुत नेक हो... तुम बहुत दरियादिल हो... फिर उसने मेरी मेरी आंखों में ग़ौर से देखा और करीब आकर कहा किसी गुमान में मत रहना.... ये मैं नहीं होने दूंगी... 
मैंने राहत की सांस तो ली थी कि जो मैं समझ रहा था वो बात नहीं है, मेधा को ये नहीं पता चला कि मैं उसे मारने आया हूं... वो कुछ और ही समझ रही थी। पर अब वो जिस तरह से मेरी तरफ बढ़ रही थी... मुझे घबराहट हो रही थी। मैंने अपनी बंदूक जो कोट की अंदर की जेब में छुपी थी उस पर बाहर से हाथ टटोला... मेधा की आंखों में अजीब सी कैफियत थी... जैसे यहां आने का प्लैन मेरा नहीं ..... उसका था... बोली... मैं तुमसे नफरत करती हूं... बेइंतिहा नफ़रत... और मुझे पता है तुम भी मुझसे करते हो... लेकिन तुम एक मर्द हो.... तुम एक औरत की नफरत को नहीं समझ सकते... औरत की नफरत का अंदाज़ा तुम कभी नहीं लगा सकते... तुम नफरत में आकर कुछ भी कर सकते हो.... पर तुम वो... सोच भी नहीं सकते.... जो मैं करने वाली हूं.... मैंने ये करने का प्लैन तभी बना लिया था... जब तुमने मुझे यहां आने के लिए कहा था... मैंने उसी वक्त सोच लिया था कि मैं ये करूंगी.... मेरे हाथ कांपने लगे वो क्या ... करने वाली थी... मुझे... मुझे कुछ समझ नहीं आया... हड़बड़ाहट में मैं कुछ कर पाता इससे पहले ही वो मुझसे लिपट गयी... और खुद ही लिपट कर ज़ोर ज़ोर से बचाओ... बचाओ ... और मुझे छोड़ दो... मुझे मारो चिल्लाने लगी.... वो ये चिल्लाते हुए उस रास्ते की तरफ ग़ौर से देख रही थी जिधर से कुछ देर पहले ही दो-तीन लोग गुज़रे थे... वो शायद उन लोगों का इंतज़ार कर रही थी... ताकि उन लोगों के सामने वो कर सके .. जो वो करना चाहती थी... पर वो क्या करना चाहती थी... पता नहीं... वो बस चीख रही थी... और लोगों के आने का इंतज़ार कर रही थी... 
छोड़ दो मुझे... मुझे मत मारो.... मत मारो मुझे... 
कुछ ही पल गुज़रे थे कि वो लोगों की आहट सुनाई देने लगी.... और जैसे ही वो लोग सामने आए... मेधा ने मेरा हाथ पकड़कर अपने कंधे पर चोट की... और फिर खुद ही डिसबैलेंस होने की एक्टिंग की.... जैसे मैंने उसे धक्का दिया हो.... वो झटके से किनारे पर पहुंची और... और मेरी तरफ देखते हुए ... पीठ के बल... पहाड़ से नीचे गिर गयी।
मेधा..... मैं चीखा.... हड़बड़ाते हुए किनारे पर आया... मैंने देखा .... मेधा नीचे गिर रही थी.... उसका चेहरा मेरी तरफ था... और सेकेंड से सत्तरवें हिस्से में मेरी और उसकी नज़रें मिली....और फिर वो अंधेरी धुंध में खो गयी। सड़क के मुहाने पर खड़े लोग मेरी तरफ दौड़े... और शोर सा मचा... देखो उसने अपनी बीवी को मार डाला... पकड़ो उसे.... लोग मेरी तरफ भागे... और उन्होंने मुझे पकड़ लिया। कई लोगों की पकड़ के बीच मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट थी-  क्या सही खेल खेला उसने भी... मुझे जेल भेजने के लिए खुद जान दे दी... याद आ रही थी उसकी बात – औरत की नफरत की इंतिहा को मर्द नहीं समझ
इस वाकिये को कई साल हो गए हैं....मैं आपको ये कहानी जेल की एक अंधेरी कोठरी में सख्त बिस्तर पर बैठकर सुना रहा हूं। मुझे इस अंधेरी की आदत हो गयी है लेकिन हां, मैं रात को तब तब चीख पड़ता हूं जब मुझे याद आता है सेकेंड का वो सत्तरवें हिस्सा जब – मेधा खाई में गिर रही थी और उसका चेहरा मेरी तरफ था.... और मैं... मैं  एक मरते हुए शख्स की आंखों में देख रहा था... बेहिसाब नफरत, बेहिसाब बद्दुआएं और उनके बीच चमकती उसकी जीत की खुशी... 
 

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