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गुनाहों का देवताः देश की सबसे दर्द भरी प्रेमगाथा है धर्मवीर भारती का यह उपन्यास

युवाओं की नज़र में 'गुनाहों का देवता' हिंदुस्तान की सबसे दुखांत प्रेम कहानियों में से एक है. आखिर ऐसा क्या लिखा धर्मवीर भारती ने इस उपन्यास में...

गुनाहों का देवता, अलग- अलग दौर में गुनाहों का देवता, अलग- अलग दौर में

आज धर्मवीर भारती की पुण्यतिथि है. 25 दिसंबर 1926 को इलाहाबाद में जन्में धर्मवीर भारती का 4 सितंबर 1997 को निधन हुआ, पर इससे पहले ही वह हिंदी साहित्य में अपनी अमर रचनाओं की धमक छोड़ चुके थे. उनकी प्रमुख कृतियों में कहानी संग्रह: मुर्दों का गाव स्वर्ग और पृथ्वी, चांद और टूटे हुए लोग, बंद गली का आखिरी मकान, सास की कलम से, समस्त कहानियां एक साथ; काव्य रचनाएं: ठंडा लोहा, अंधा युग, सात गीत वर्ष, कनुप्रिया, सपना अभी भी, आद्यन्त शामिल है.

उपन्यास: गुनाहों का देवता, सूरज का सातवां घोड़ा, ग्यारह सपनों का देश, प्रारंभ व समापन तथा निबंध: ठेले पर हिमालय, पश्यंती के अलावा धर्मयुग पत्रिका के प्रधान-संपादक के तौर पर उन्होंने हिंदी साहित्य को जो दिया वह अद्भुत है. उनकी कई कहानियों और उपन्यास पर फिल्म भी बन चुकी है, पर आज हम बात करेंगे 'गुनाहों का देवता' की. क्या उपन्यास था यह और कैसी थी इसकी प्रेम कहानी? आज भी युवाओं के बीच इस कहानी की चर्चा इसके दुखांत अंत के चलते होती है.

युवाओं की नज़र में यह हिंदुस्तान की सबसे दुखांत प्रेम कहानियों में से एक है. सोशल मीडिया पर लिखी टिप्पणियां इस बात की गवाह हैं.

कौन सा गुनाह ? कैसा गुनाह ?
किसी से जिंदगी भर स्नेह रखने, प्रेम करने का गुनाह...
स्नेह और प्रेम जब अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचने लगे तो उसका त्याग करने का गुनाह...
है ना अजीब बात!
पर यही तो किया चंदर ने अपनी सुधा के साथ!
इस भुलावे में कि दुनिया प्यार के ऐसी पवित्रता के गीत गाएगी...
प्यार भी कैसा...
घर भर में अल्हड़ पुरवाई की तरह तोड़-फोड़ मचाने वाली सुधा, चंदर की आँख के एक इशारे से शांत हो जाती थी. कब और क्यूँ उसने चंदर के इशारों का यह मौन अनुशासन स्वीकार कर लिया था, ये उसे खुद भी मालूम नहीं था और ये सब इतने स्वाभाविक ढंग से इतना अपने आप होता गया कि कोई इस प्रक्रिया से वाकिफ नहीं था........... दोनों का एक दूसरे के प्रति अधिकार इतना स्वाभाविक था जैसे शरद की पवित्रता या सुबह की रोशनी.... "

धर्मवीर भारती की गुनाहों का देवता सबसे पहले 1959 में प्रकाशित हुई थी. 60 साल बीत चुके हैं, पर आज भी लड़के-लड़कियां ऐसे इश्क से दोचार होते हैं. इस कहानी का ठिकाना अंग्रेजों के समय का इलाहाबाद था. इस कहानी के चार मुख्य किरदार हैं. हीरो चन्दर, प्रेमिका सुधा, और चंदर की दो और दीवानी बिनती और पम्मी. गुनाहों का देवता की पूरी कहानी इन्हीं किरदारों के इर्दगिर्द घूमती है. चन्दर यानी इस प्रेम कहानी का हीरो सुधा के प्रोफेसर पिता के प्रिय छात्रों में से एक है. इसी के चलते प्रोफेसर के घर वह किसी रोकटोक के आता-जाता रहता है.  इसी दौरान प्रोफेसर की बेटी सुधा कब उसे दिल दे बैठती है, पता ही नहीं चलता. साठ के दशक का यह प्रेम आज के प्रेम से बिल्कुल अलग था. यह कोई साधारण प्रेम नहीं था. इस प्रेम में तन के खिंचाव से ज्यादा मन का लगाव था. चन्दर सुधा का देवता था और सुधा ने हमेशा एक भक्त की तरह ही उसे सम्मान दिया था.

चंदर सुधा से प्रेम तो करता था, लेकिन सुधा के पिता के उस पर किए गए अहसान ने उसे कुछ ऐसे घेरे रखा कि वह चाहते हुए भी कभी अपने मन की बात सुधा से नहीं कह पाया. सुधा की नजरों में वह देवता ही बने रहना चाहता था, और होता भी यही है. गुनाहों का देवता में सुधा से उसका नाता वैसे ही रहता है, जैसे एक देवता और भक्त का होता है. प्रेम को लेकर चंदर का द्वंद्व पूरे उपन्यास में इस कदर हावी है कि सुधा की शादी कहीं और हो जाती है, और अंत में वे पूरे जीवन दर्द भोगते हैं.

पम्मी इस कहानी का त्रिकोण है. वह एक एंग्लोइंडियन लेडी है, जो तलाक के बाद चंदर की तरफ खिंचती है. उसे चंदर और सुधा के प्यार का पता है. एक बार वह कहती है, "शादी और तलाक के बाद मैं इसी नतीजे पर पहुँची हूँ कि चौदह बरस से चौंतीस बरस तक लड़कियों को बहुत शासन में रखना चाहिए...इसलिए कि इस उम्र में लड़कियाँ बहुत नादान होती हैं...जो कोई भी चार मीठी बातें करता है, तो लड़कियाँ समझती हैं कि इससे ज्यादा प्यार उन्हें कोई नहीं करता... इस उम्र में जो कोई भी ऐरा-गैरा उनके संसर्ग में आ जाता है, उसे वे प्यार का देवता समझने लगती हैं और नतीजा यह होता है कि वे ऐसे जाल में फँस जाती हैं कि जिंदगी भर उससे छुटकारा नहीं मिलता."

धर्मवीर भारती ने अपने उपन्यास में पम्मी और चंदर के संबंधों की गहराई से बताते हुए थोड़ा सेक्सुअल टच तो दिया है, पर वल्गैरिटी कहीं नहीं रखी. उसमें सिहरन है, रोमांच व रोमांस है, पर उत्तेजना नहीं. एक जगह चंदर जब पम्मी को छुता है, तो उसके अनुभव के बहाने धर्मवीर भारती आदमियों को लेकर औरतों की समझ का बयान यों करते हैं.

"औरत अपने प्रति आने वाले प्यार और आकर्षण को समझने में चाहे एक बार भूल कर जाये, लेकिन वह अपने प्रति आने वाली उदासी और उपेक्षा को पहचानने में कभी भूल नहीं करती। वह होठों पर होठों के स्पर्शों के गूढ़तम अर्थ समझ सकती है, वह आपके स्पर्श में आपकी नसों से चलती हुई भावना पहचान सकती है, वह आपके वक्ष से सिर टिकाकर आपके दिल की धड़कनों की भाषा समझ सकती है, यदि उसे थोड़ा-सा भी अनुभव है और आप उसके हाथ पर हाथ रखते हैं तो स्पर्श की अनुभूति से ही जान जाएगी कि आप उससे कोई प्रश्न कर रहे हैं, कोई याचना कर रहे हैं, सान्त्वना दे रहे हैं या सान्त्वना माँग रहे हैं। क्षमा माँग रहे हैं या क्षमा दे रहे हैं, प्यार का प्रारम्भ कर रहे हैं या समाप्त कर रहे हैं। स्वागत कर रहे हैं या विदा दे रहे हैं। यह पुलक का स्पर्श है या उदासी का चाव और नशे का स्पर्श है या खिन्नता और बेमानी का।"

एक जगह वह कहते हैं, शरीर की प्यास भी उतनी ही पवित्र और स्वाभाविक है जितनी आत्मा की पूजा. आत्मा की पूजा और शरीर की प्यास दोनों अभिन्न हैं.

चंदर की जिंदगी में सुधा व पम्मी साथ ही बिनती भी आई होती है. वह उसकी जीवन साथी भी बनती है. पर उसे पता होता है कि सुधा व पम्मी से टूट चुका चंदर उसे मिला है...इस उपन्यास की आखिरी लाइनें हैं... "सितारे टूट चुके थे. तूफान खत्म हो चुका था. नाव किनारे पर आकर लग गयी थी- मल्लाह को चुपचाप रुपये देकर बिनती का हाथ थामकर चन्दर ठोस धरती पर उतर पड़ा...मुर्दा चाँदनी में दोनों छायाएँ मिलती-जुलती हुई चल दीं. गंगा की लहरों में बहता हुआ राख का साँप टूट-फूटकर बिखर चुका था और नदी फिर उसी तरह बहने लगी थी जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो.

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