नजाकत और नफासत की खुशबू संजोए लखनऊ साहित्य, कला और मनोरंजन के रंगों से सराबोर है. 'साहित्य आजतक लखनऊ' के दूसरे दिन साहित्य और संस्कृति प्रेमियों ने 'शायराना लखनऊ' सेशन में इस शहर की कैफियत और यहां के मिजाज को करीब से महसूस किया. सेशन में मशहूर किस्सागो और दास्तानगो हिमांशु बाजपेई ने अपने खास अंदाज़ में लखनऊ की तहज़ीब, नफासत और मोहब्बत को शेरों में पिरोकर महफिल को यादगार बना दिया.
लखनऊ है तो महज गुम्बद-ओ मीनार नहीं…
हिमांशु ने शुरुआत अपने गुरु लेखक और इतिहासकार योगेश प्रवीण को याद करते हुए की. उन्होंने उनके मशहूर शेर से लखनऊ की अलग की तस्वीर खींची जो लखनऊ की पहचान बन चुकी है.
लखनऊ है तो महज गुम्बद-ओ मीनार नहीं,
सिर्फ एक शहर नहीं, कूचा-ओ-बाजार नहीं,
इसके दामन में मोहब्बत के फूल खिलते हैं,
इसकी गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं.
फिर श्रोताओं से मुखातिब होकर कहा कि अगर लखनऊ को समझना है तो दूर से नहीं, करीब से देखिए.
लखनऊ जो समझना है जरा पास आइए,
इस काम के लिए बतौर-ए-खास आइए,
गोमती नगर में लखनऊ मिलता नहीं हुजूर,
अमीनाबाद, चौक या नक्खास आइए.
तालियों की गूंज के बीच फिर उन्होंने वो जुमला दोहराया जो पूरे सत्र की जान बन गया, 'लखनवी वो नहीं जो लखनऊ में रहता है, लखनवी वो है जिसमें लखनऊ रहता है.'
तहज़ीब, तमीज और पुराने शहर की खुशबू
राजा बाजार के अपने बचपन को याद करते हुए उन्होंने बदलते शहर की तस्वीर पेश की. उन्होंने कहा कि हम जब राजा बाजार में रहते थे तो गोमती नगर बहुत दूर लगता था. अब बहुत दूर तक फैल गए है.
जाने आलम की कोई निशानी नहीं,
हजरत मीर की खुशबयानी नहीं,
लखनऊ अब वहां तक है फैला जहां,
लखनऊ की कोई भी निशानी नहीं.
उन्होंने पुराने लखनऊ और नवाब वाजिद अली शाह के दौर की नफासत का जिक्र करते हुए कहा कि हम जब बड़े हो रहे थे बहुत जिक्र होता था वाजिद अली शाह जैसे लोगों का. वो जो लखनऊ था यहां बात भी ऐसे की जाती थी जैसे सुबह सुबह फूलों पर शबनम गिरती है...नरमी से, एहतियात से, अदब के साथ. लखनऊ को समझने के लिए आपको पुराने लखनऊ को समझना होगा.
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'हर वक्त पहले आप…' -लखनऊ का जवाब
जब उनसे पूछा गया कि 'लखनऊ-लखनऊ करने से क्या हासिल?' वो लखनऊ तो है नहीं जिसके किस्से सुनाते हो. उन्होंने नज्म के जरिए जवाब दिया. अपना वो शेर उन्होंने जिस अंदाज में सुनाया, श्रोताओं ने खूब तालियां बजाईं.
पूछा किसी ने आज फिर?
ये जो करते हो लखनऊ-लखनऊ का जाप,
हर वक्त पहले आप, पहले आप,
ये तुम जैसों का, फकत शोशा है,
अदब कुछ नहीं है, धोखा है…
हमने कहा-
लखनऊ को बर्बाद करने में,
इसपे जुल्म बेदाद करने में
जो बड़ी भूमिका निभाते हैं,
वही कहते हैं
लखनऊ में कुछ भी नहीं, सिर्फ बातें हैं…
अस्ल में ये जो बेखबर रेला
रोज लखनऊ पे चढ़ता आता है
जाने किस-किस जगह से लुट-पिटकर
इसकी जानिब ही बढ़ता आता है
लखनऊ जो हंसी-ख्याल सा था
इसी रेले में खोकर रह गया है
सच तो ये है कि यही रेला
शहर-ए-लखनऊ होकर रह गया है
ये जो सब लखनऊ में रहते हैं
और जो रोज रहने आते हैं
थोड़ा लखनऊ भी इनमें रह जाए
इसलिए हम कहानियां सुनाते हैं...
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मोहब्बत, मजाज और लखनऊ का इश्क
प्रेम की बात चली तो उन्होंने मजाज लखनवी को याद किया और उनकी पंक्तियां सुनाईं.
अपने दिल को दोनों आलम से उठा सकता हूं मैं,
क्या समझती हो कि तुम को भी भुला सकता हूं मैं.
दिल में पैदा करो तुम मेरी तरह जुर्रतें
फिर देखो तुमको क्या बना सकता हूं मैं...
उन्होंने लखनऊ पर लेखक योगेश प्रवीण की शायरी भी सुनाई जो लखनऊ की तस्वीर बयां करती है.
ये सच है कि जिंदादिली की कोई किताब है तू
अदब का इल्म, हुनर का हसीं शबाब है तू
सर-ए-चमन जिसका जलवा है वो गुलाब है तू
लखनऊ आज भी दुनिया में लाजवाब है तू...
फिर मुस्कराकर बोले, 'ये लखनऊ है, यहां आशिक अपनी महबूबा से मिलने चॉकलेट नहीं, मीठा पान लेकर जाते हैं.'
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जायकों में बसा शहर
लखनऊ के जायकों पर उन्होंने एक नज़्म सुनाई जिसकी कुछ लाइनें इस तरह थीं.
लखनऊ के जायकों की अगर बात आएगी,
एक कहकशां है नामों की, जो साथ आएगी,
शोहरत है आसमान पे टुंडे कबाब की,
नंदू की शिकंजी में है मस्ती शराब की
हैं सबके मनपसंद, पसंदे मुबीन के
वर्मा वो बेकरी है के खा जाओ छीन के
बिरयानी में इदरीस ने जौहर है दिखाया…
मुन्ना के समोसों में बड़ा लुत्फ है आया
खुटबा के साथ किस्से भी हैं नौसीं जान में
पाए रहीम के हैं यहां सबके ध्यान में
पूड़ी हों नेतरामी, बताशे रवि के हों
क्या खूब यार मजे जिंंदगी के हो..
आगे कहा-
माशूक के लबों के ही जैसी कहें जिसे
बरफी तो त्रिवेदी की, बर्फी कहें जिसे
और फिर कहा
किस-किस का नाम लूं मैं, हजारों का नाम है,
लखनऊ के जायकों का सफर नातमाम है.
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दिल टूटने पर भी लखनवी अंदाज़
जब दिल टूटने की शायरी की फरमाइश हुई तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा-
दिल टूटने से थोड़ी सी तकलीफ तो हुई,
लेकिन तमाम उम्र को आराम हो गया.
और नज़ाकत भरे लहजे में एक और शेर सुनाया जो इस शहर की नाजुकी और अंदाज-ए-बयां की एक बानगी है.
दोश-ए-नाज़ुक पर दुपट्टा फिर न ठहरा बार से,
कल जो रंगने में जरा गहरा गुलाबी हो गया.
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जुबान का इत्र सिर्फ लखनऊ में मिलता है
सत्र के अंत में हिमांशु बाजपेई ने कहा कि एक होता है दुकान का इत्र, जो हर जगह मिलता है. और एक होता है ज़ुबान का इत्र, जो सिर्फ लखनऊ में मिलता है. उन्होंने कहा कि लखनऊ एक कैफियत का नाम है, एक अवस्था का नाम है, एक मिज़ाज का नाम है. शहर का नाम है, लेकिन ये बाद में है.