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Sahitya Aajtak Lucknow:'फिक्शन लिखने के लिए नॉनफिक्शन पढ़ना होगा...', युवा लेखकों ने बताया फॉर्मूला

साहित्य आजतक लखनऊ 2026 के मंच पर आखिरी दिन 'हिंदी फिक्शन लेखन और यूथ की पसंद' सत्र में जाने-माने युवा लेखक नीलोत्पल मृणाल और दिव्य प्रकाश ने कई मजेदार बातें कही और लोगों को अपने बेबाक अंदाज से गुदगुदाया भी.

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साहित्य आजतक की मंच पर नीलोत्पल मृणाल और दिव्य प्रकाश दुबे
साहित्य आजतक की मंच पर नीलोत्पल मृणाल और दिव्य प्रकाश दुबे

लखनऊ में साहित्य आजतक के अंतिम दिन शनिवार को स्टेज टू पर 'हिंदी फिक्शन लेखन और यूथ की पसंद' सत्र का आयोजन हुआ. इसमें दो युवा फिक्शन लेखकर नीलोत्पल मृणाल और दिव्य प्रकाश दुबे चर्चा के लिए शामिल हुए. दोनों ही लेखकों ने फिक्शन लेखन और युवाओं की पसंद पर हास्य विनोद के साथ अपनी बातें रखी और मजेदार मशविरा भी दिया. 

युवा लेखक नीलोत्पल मृणाल ने युवा पाठकों की पसंद और फिक्शन लेखन पर बहुत सारी बातें कही. उन्होंने कहा कि किताब लिखने का कोई फॉर्मूला नहीं होता. बस लिखते रहना है. क्योंकि उपन्यास पढ़कर कोई उपन्यास लिखना नहीं सीख सकता. जैसे कि होटल ताज का कढ़ाई पनीर खाकर, हम उसे बनाना नहीं सीख सकते. इसके लिए हमें रेसिपी सिखना होगा. इसलिए जो सोच रहे हैं कि इस बार पुस्तक मेला में मैंने बहुत किताबें खरीदी हैं और उसे पढ़कर लिखूंगा तो ऐसा नहीं है. 

अगर आपको फिक्शन लिखना है तो इसके लिए आप इतिहास पढ़ो, पॉलिटी पढ़ो, फॉरेन पॉलिसी पढ़ो, वर्ल्ड बिजनेस पढ़ो. अगर आप नॉन फिक्शन वाली चीजें नहीं पढ़ोगे तो सोचेंगे कहां से. इसलिए फिक्शन लिखने के लिए नॉन फिक्शन पढ़ना जरूरी है, क्योंकि यह हमारी सोच के लिए इंधन का काम करता है. यहां मैं सिर्फ एक किताब का जिक्र करूगां और  मैं चाहूंगा कि हिंदुस्तान का हर युवा दिनकर जी का 'संस्कृति के चार अध्याय' जरूर पढ़े.  सिखाने के मोह से निकलना है और सीखते रहना है. लिखने का कोई फॉर्मूला नहीं है

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इससे पहले नीलोत्पल ने युवाओं के संघर्ष और युवा पाठकों  को लेकर कई मजेदार कहानियां सुनाई. उन्होंने कहा कि ऐसा कहा जाता है कि युवा किताबों के शौकिन नहीं हैं. अभी बगल में भोजपुरी के गायक परफॉर्म कर रहे हैं, लेकिन ये युवा यहां किताबों पर चर्चा को सुन रहे हैं. इससे ये साबित होता है कि युवाओं में किताबों के प्रति आकर्षण कम नहीं हुआ है, युवा वर्ग भी अच्छे पाठक हैं. 

हमलोग फुलटाइम राइटर हैं और हमलोग जानते हैं कि हिंदी में पढ़ने वाले युवा पाठकों की संख्या इतनी ज्यादा है कि अब कोई हिंदी का लेखक पाठक के आभाव का रोना नहीं रोएगा. ये आश्वासन हमारे हिंदी के यही युवा पाठक देते हैं.

लेखन, साहित्य नियति को बदलने वाला मंत्र है. ये हल्के में लेने वाली बात नहीं हैं. आज जो काम संस्थान नहीं कर पा रहे हैं, स्कूल-कॉलेज नहीं कर पा रहे हैं, महापुरुषों की तस्वीरें नहीं कर पा रही है, वो काम अपने-अपने समय का लेखन कर ले रहा है. क्योंकि, पाठकों को लगता है कि ये तो मेरी कहानी है. राइटर ने मेरी कहानी को सामने लाकर रख दिया है.

तैयारी कर रहे युवाओं का मोटिवेशन क्या है?
नीलोत्पल मृणाल ने कहा कि मैं जब यूपीएससी की तैयारी कर रहा था, तब हमारे कमरे में विवेकानंद टंगे हुए थे. उनका काम ही था कि इन लोगों को किसी तरह प्रीलिम्स क्वालीफाई करवाना है. क्योंकि, उनकी तस्वीर के नीचे लिखा रहता था- उठे, भागो और तब तक नहीं रुको जबतक की मंजिल न मिल जाए. एक महीने के बाद विवेकानंद जी के पोस्टर की जगह दीवार पर बदल जाती थी. क्योंकि, हमलोग तो जगते नहीं थे. थककर वहीं चलते-चलते इस दीवार से उस दीवार तक पहुंच जाते थे और उनका कोटेशन भी बदल जाता था- अरे कब उठेगा रे, कब जागेगा रे, कब भागेगा रे. 

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तब मैं एक मोटिवेशनल क्लास में गए, मोटिवेट होने के लिए. पिता जी ने कहा बेटा मोटा बेसन ले लोगो और उसमें आलू काटकर डालो और सरसों तेल में पकौड़ी बनाकर खाओ, वो ज्यादा फायदा करेगा. जिस देश को विवेका नंद मोटिवेट नहीं कर पा रहे हैं, उसको कोई और कैसे मोटिवेट कर लेगा.

आजकल जो डिप्रेशन, सेपरेशन, विप्रेशन जैसा नया फैशन आया है. हम इस जहर के सामने किताब लेकर इसलिए खड़े हुए हैं कि हम बता पाएं कि हमारे समय में जो कुछ भी टूट रहा है, उसको बटोर कर उसे जोड़कर फिर से एक मूरत बनाने का माद्दा भी इन्हीं युवाओं में हैं जिनके भीतर कुछ टूट रहा है. हम उसी टूटन के रेशे से किताब बुनते हैं और उसी टूटन के रेशे से एक नया आदमी बनाने की कवायद में लगे हैं. तो हमारे समय का लेखन काफी महत्वपूर्ण है.

युवाओं को युवा से ही मिल सकता है मोटिवेशन
हमारा कोई रूमेट कोई सेलेक्ट हो जाता है तो वह छह महीने बाद फिर से लौटकर मुखर्जी नगर आता है. यह देखने के लिए कि अब वहां गरीबी कितना है. फिर से उसी रेलिंग पर झुककर नीचे देखता है, जिसपर से पहले झुककर पीटी और मेंस का डेट पूछता था. अभी भी तैयारी कर रहे दोस्त सोचता है कि आधिकारी बनकर आया है तो अब कुछ रंगीन होगा. वहीं अधिकारी दोस्त बोलता है कि मसालेदार खाकर ऊब गया हूं यार कुछ सादा होना चाहिए. इसके बाद कोई जूनियर आएगा और वीडियो बनाएगा कि फलां भाइया आईएएस बनने के बाद आज भी जमीन से जुड़े हुए हैं, देखिए उन्हें दाल-भात चोखा खाते हुए. फिर इस वीडियो पर लाइक और कमेंट आएगा. 

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हम जैसे तैयारी करने वाले दोस्तों को सिलेक्ट हो चुके ऐसे ही दोस्त दो हजार - पांच हजार रुपया देकर बोलते हैं कि नीलोत्पल टिके रहना टॉप फ्लोर पर, तैयारी करते रहना. इसलिए मैं यही कहना चाहता हूं कि हमारे मोटिवेशन यही दोस्त है. यही हमारे-आपके बीच के युवाओं की कहानी ही युवा वर्ग के लिए मोटिवेशन का काम करता है. आज हम भारत के जिस 70 प्रतिशत युवाओं के दम पर विश्वगुरु बनने की बात कर रहे हैं. उन युवाओं के बीच की कहानियों को सामने लाना होगा. वही तो मुख्यधारा है. इनकी कहानियां हम अगर किताबों में नहीं लाएंगे तो हम किस मुख्यधारा की बात कर रहे हैं.

गांव, देहात और छोटे कस्बों से लड़के जा रहे हैं सिविल सेवा में, उन्होंने असल संघर्ष देखा है. कितना भी कुछ हो जाए, लोक सेवा की जो मूल चेतना है जो भी बचा हुआ है, इन्हीं गांव-देहात के लड़कों में बचा हुआ है. क्योंकि इन्होंने अपने-पिता और चाचा को दारोगा के सामने जमीन विवाद का एफआईआर करवाने के लिए गिड़गिड़ाते देखा है. जब ये लड़के आईपीएस बनकर जाएंगे तो कभी धोती वाले बुजुर्ग पर या उस तबके के लोगों पर नहीं चिल्लाएंगे. 

इसलिए मैं गांव को बच्चों को कहता हूं कि सरकारी नौकरी और लोकसेवा में जाओ, तब ही देश में लोकसेवा लोकोन्मुखी बनेगा. क्योंकि, असल में लोगों के बीच से जाने वाले लोग ही अंतिम पंक्ति तक के लोगों की समस्या समझ सकते हैं. लोक के बीच से लोक सेवक को लाना होगा.

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वहीं दिव्य प्रकाश दुबे ने नीलोत्पल मृणाल की विचारों से सहमति जताते हुए कहा कि एक महीना पहले हमलोग दिल्ली बुक फेयर में थे. उस वक्त हमलोग ढाई दिन के करीब वहां रहे और इस दौरान हमलोगों को दो मिनट का भी ब्रेक नहीं मिला. क्योंकि, कोई न कोई हमेशा वहां पहुंच रहे थे कि सर, इस बुक पर साइन कर दीजिए. हमलोग शाम में जब थककर आते हैं तो सोचते हैं कि लोग 20-20 मिनट इंतजार करके हमसे मिलने आते हैं. तब हम उनसे बोलते हैं कि आपके इस 20 मिनट के इंतजार के लिए हमलोगों ने 13-14 साल इंतजार किया है. 

जब आप चार-पांच किताब लिख लेते हैं तो आप पर दबाव होता है कि अब आप अगली रचना ऐसी ही लिखेंगे. क्योंकि, पाठक के हाथ में एक तलवार भी होता है. इसलिए जब मैं छठी किताब 'इब्नेबतूती' लिख रहा था तो मुझे लगा कि ये गलत दिशा में जा रही है. तब मैंने ये सोचा कि मैं ये प्रेशर अपने दिमाग से हटाउंगा और ये समझकर ही कोई बुक लिखूंगा कि ये मेरी पहली किताब है और आगे इसी से मैं पहचाना जाऊंगा. एक किताब मैं लिख रहा था- आको-बाको. मैं जब इसमें एक कहानी लिख रहा था, तब मुझे लगा कि इस एक कहानी को लिखने के लिए मैंने पिछली 5 किताबें लिख दीं.

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