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साहित्य आजतक के मंच पर हुई लखनऊ के 'गैर-नवाबी' इतिहास की चर्चा

साहित्य आजतक के मंच पर ‘गैर-नवाबी वेजिटेरियन’ सत्र में मेहमानों ने लखनऊ के खानपान की विरासत और खासियत पर चर्चा की. उन्होंने इस मौके पर बताया कि खाना परोसना भी लखनऊ में एक समय पर कला हुआ करती थी.

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साहित्य आजतक के मंच से मेहमानों ने लखनऊ के खानपान की खासियत बताई (Photo: ITG)
साहित्य आजतक के मंच से मेहमानों ने लखनऊ के खानपान की खासियत बताई (Photo: ITG)

साहित्य आजतक के मंच पर रविवार को गैर-नवाबी वेजिटेरियन सत्र में आए मेहमानों ने लखनऊ के खानपान पर खास चर्चा की. नवलकांत सिन्हा, अर्शना अजमत और हेमेन्द्र धर ने कई दिलचस्प बातें बताई. कार्यक्रम की शुरुआत में नवलकांत सिन्हा ने लखनऊ के इतिहास को लेकर अहम बातें कहीं.

नवलकांत  ने बताया कि लखनऊ के नाम में ही उसकी शक्ति छिपी है यह 'अवध' था, जिसका अर्थ है 'जिसका वध न हो सके'. लखनऊ के वैभव का इतिहास अत्यंत प्राचीन और विविधतापूर्ण रहा है. यहां सूर्यवंशी राजाओं के प्रताप के बाद चंद्रवंशी शासकों का दौर आया.

इतिहास के पन्नों को पलटें, तो सन 1000 से 1030 के कालखंड में लाखन पासी एक पराक्रमी शासक के रूप में उभरे, जिनके नाम पर इस शहर की पहचान जुड़ी. उनके बाद, लगभग 1190 के आस-पास बिजली पासी ने यहां की सत्ता संभाली. कालचक्र बदला और यहां शेखजादों का आगमन हुआ.

लखनऊ में मौसमी सब्जियां भी फेमस


हेमेन्द्र धर ने कहा लोग अक्सर कहते थे “आप लखनऊ से हैं, वहां तो कबाब मिलता होगा.” लखनऊ में पहले मौसमी सब्जियों का भी खूब जोर हुआ करता था. जैसे निमोना एक डिश है, जिसे सर्दियों में खाया जाता है. इसके बाद अरबी का सालन भी यहीं मिलता था.

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इसके अलावा तहरी का भोज भी यहां होता था. इसमें सब्जियों को मसालों के साथ भूनकर चावल के साथ पकाया जाता था. नवाबों ने भी लखनऊ के खानपान में काफी योगदान दिया है. वे खाने के बड़े शौकीन थे.

ब्राह्मण परिवारों में जब खाना बनता था तो कटहल की बिरयानी जैसी चीजें मिलती थीं. वहीं कायस्थों के खाने में सबसे ज्यादा वैरायटी मिलती थी, क्योंकि वे शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह के व्यंजन खाते थे.

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Photo: ITG

अर्शना अजमत बताती हैं कि वेजिटेरियन डिशेज का कोई खास डॉक्यूमेंटेशन नहीं था, इसलिए इनके बारे में ज्यादा बातें दर्ज नहीं हुईं. उन्होंने कहा नवाब वेजिटेरियन भी थे. नवल कहते हैं कि नवाबों के यहां ज्यादातर खाना मर्द ही बनाते थे, जबकि सामान्य परिवारों में महिलाएं खाना बनाती थीं.

पहले खाना बनाने को बोझ नहीं समझा जाता था, बल्कि इसे एक कला माना जाता था. खीर हमारा बहुत पुराना व्यंजन है, जिसके तीन अलग-अलग वर्जन लखनऊ में विकसित हुए. यहां के नवाब योद्धा नहीं थे, वे अंग्रेजों से लड़ते नहीं थे. उन्हें डिप्लोमेसी से भी खास मतलब नहीं था. उनका काम नाचना-गाना, खाना बनाना आदि था.

खास है लखनऊ का पान

नवल बताते हैं कि खाना परोसना भी लखनऊ में एक कला थी. पान तक देने के तरीके होते थे. यहां तक कि बर्तनों को रखने का भी एक खास तरीका हुआ करता था. पान को भी चार हिस्सों में काटकर बनाया जाता था. अर्शना कहती हैं कि पान हमारे एथिकेट्स को दर्शाता है. एक जमाने में जब यहां शादी होती थी तो देखा जाता था कि पानदान कितना बड़ा है. पानदान से दुल्हन को मिलने वाली पॉकेट मनी भी अहम मानी जाती थी.

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हेमेन्द्र धर बताते हैं कि पान तो पूरे हिंदुस्तान में खाया जाता है, लेकिन लखनऊ का पान खास होता है. बिरयानी भी लखनऊ की अलग पहचान है. कोलकाता को बिरयानी देने वाले हम ही लोग थे.

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