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पुस्तक अंशः स्वाँग- जहां जयहिंद, बस एक चुटकुला है

ज्ञान चतुर्वेदी का नया उपन्यास 'स्वाँग' कोटरा गांव के जनजीवन के जरिये समाज की विद्रूपता को दिखाता है. वह बताता है कि किसी समय मनोरंजन के लिए किया जाने वाला स्वांग अब लोगों के जीवन का ऐसा यथार्थ बन चुका है, जहां पूरा समाज एक विदूषक की स्थिति को प्राप्त है.

 'स्वाँग' का आवरण चित्र [सौजन्यः राजकमल प्रकाशन] 'स्वाँग' का आवरण चित्र [सौजन्यः राजकमल प्रकाशन]

उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के मऊरानीपुर में 2 अगस्त, 1952 को जन्में डॉ ज्ञान चतुर्वेदी व्यंग्य के क्षेत्र में काफी स्थापित नाम हैं. मध्य प्रदेश इनकी कर्मभूमि है, जहां आप हृदयरोग विशेषज्ञ के रूप में ख्यात हैं. आपके लेखन की शुरुआत सत्तर के दशक में धर्मयुग पत्रिका से हुई. पहला उपन्यास 'नरक-यात्रा' खूब चर्चित रहा. इसके बाद 'बारामासी', 'मरीचिका' तथा 'हम न मरब' जैसे उपन्यास और 'प्रेत कथा', 'दंगे में मुर्गा', 'मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएं', 'बिसात बिछी है', 'खामोश! नंगे हमाम में हैं', 'प्रत्यंचा' और 'बाराखड़ी' नामक व्यंग्य-संग्रहों से आपने खूब लोकप्रियता हासिल की.

अब राजकमल प्रकाशन से आपका नया उपन्यास आया है, 'स्वाँग'. स्वांग कभी बुंदेलखंड सहित समूची हिंदी पट्टी की बेहद लोकप्रिय लोकनाट्य विधा रही है. यह नाटक, नौटंकी, रामलीला से थोड़ी इतर होती है. इसमें न मंच की जरूरत होती है, न परदा, न ही कोई विशेष वेशभूषा. बस अभिनय होता है. स्वांग का मज़ा इसके असल जैसा लगने में है. एकदम असली, गोकि वहां सब नकली होता है: नकली राजा, नकली सिपाही, नकली कोड़े, नकली जेल, नकली साधु, काठ की तलवार, नकली दुश्मन और नकली लड़ाइयां. नकली नायक, नकली खलनायक. वही नायक, वही खलनायक. सब जानते हैं कि अभिनय है, नकली है सब, नाटक है यह; पर उस पल वह कितना जीवंत प्रतीत होता है. एकदम असल जैसा.
 
लोकनाट्य तो ख़ैर समय के साथ डूब गए. अब बुंदेलखंड के गांवों में स्वांग नहीं खेला जाता. परन्तु हुआ यह कि अब मानो पूरा समाज ही स्वांग खेलने में मुब्तिला हो गया है. चतुर्वेदी का नया उपन्यास 'स्वाँग' कोटरा गांव के जनजीवन के जरिये समाज की विद्रूपता को दिखाता है. वह बताता है कि किसी समय मनोरंजन के लिए किया जाने वाला स्वांग अब लोगों के जीवन का ऐसा यथार्थ बन चुका है, जहां पूरा समाज एक विदूषक की स्थिति को प्राप्त है. आलम यह है कि सामाजिक, राजनीतिक, न्याय और कानून व्यवस्था का सारा तंत्र ही एक विराट स्वांग में परिवर्तित गया है. हर तरफ एक नकलीपना हावी है.

अपने अनूठे कथ्य में यह उपन्यास न केवल बुंदेलखंड के बल्कि हिंदुस्तान के समूचे तंत्र के एक विराट स्वांग में तब्दील हो जाने की कहानी है. परिवेश का तटस्थ अवलोकन, मूल्यहीन सामाजिकता का सूक्ष्म विश्लेषण और करुणा से पगा निर्मम व्यंग्य इस उपन्यास की खासियत है. उपन्यास के मारक व्यंग्य की एक बानगी को प्रस्तुत करता एक अंशः

जहां जयहिंद, बस एक चुटकुला है

"जयहिंद महात्माजी."
"जयहिंद बेटा."

किसी ने जयहिंद कहा और गजानन बाबू गद्गद हो गए. वे हो जाते हैं. तुरन्त हो जाते हैं. कभी उनसे 'जयहिंद' बोलकर तो देखो, ऐसे गदगदाते हैं कि हंसी रोकना मुश्किल. वैसे, वे इस इलाके के जाने-माने स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं परन्तु कोटरा वाले इस एक बात पर लगभग सर्वसहमत हैं कि देशभक्ति की चपेट में आकर पगला गए हैं बब्बा. सब उनकी इज़्ज़त करते हैं, पर उन पर हंसते भी हैं. कोटरा ने उनको एक इज्ज़तदार नाम भी दे दिया है- 'पग्गल महात्मा'. वे पागल ही तो हैं. जब देश के सारे समझदार स्वतंत्रता-सेनानी देशभक्ति के झंझट से बाहर निकल आए, जब तुम्हारे साथ के छुटभैयों तक ने बड़ी-बड़ी कुर्सियां हथिया लीं तब तुम खद्दर, देशभक्ति, गांधीजी, सर्वोदयी झोला, जयहिंद और सत्य के दकियानूसी प्रतीकों में ही उलझकर बैठे रह गए. सही कहते हैं सब; पग्गल महात्मा ही तो हैं गजानन बाबू.
इलाक़े के पुराने स्वतंत्रता-सेनानी हैं, सो उनके मुंह पर तो नहीं हंसा जा सकता, पर मज़ा तो लिया ही जा सकता है न? सब उनका मज़ा लेते हैं. "जयहिंद" बोलने पर उनका यूं अटूट गदगदाना एक खेल-सा बन गया है कोटरा में. लोग उन्हें देखते ही मुस्कुराते हैं. लौंडे उन पर हंसते हैं. बच्चे ताली बजाकर उनका पीछा करते हैं. बुजुर्ग उन पर तरस खाते हैं कि ऐसे खांटी देशभक्त का अन्ततः ऐसा हाल हुआ. लोग उनके इस हाल पर दुखी भी होते हैं. और क्यों न हों? ...पग्गल हैं, पर हैं तो महात्मा ही न! लोग उन्हें टंटा बब्बा भी कहते हैं.
गजानन बाबू का हर व्यक्ति से अभिवादन के लिए 'जयहिंद' कहना एक चुटकुला बन चुका है कोटरा में.
किसी कोटरावासी के साथ कभी बाहर गांव से आया हुआ कोई रिश्तेदार हो, और उसे गजानन बाबू दिख जाएं तो वह अपने रिश्तेदार को लगभग खींचता हुआ गजानन बाबू के पास लेकर जाता है कि चलो, आज तुम्हें एक तमाशा दिखलाते हैं. ...कैसा तमाशा? ...जैहिंद वाला तमाशा. अरे, आओ तो. सामने से वे जो बब्बा आ रहे हैं न? बस, जरा और पास आ जाएं तो आप उनसे तनिक ज़ोर से जैहिंद बोलिएगा, ठीक?...पर उससे क्या? ...यार, आप ज़रा बोल के तो देखिए. बोलिए, बोलिए, बड़ा मज़ा आएगा.
"जयहिंद बब्बा!"
"जयहिंद, जयहिंद."
"गजानन बाबू जयहिंद सुनते ही भावविभोर हो जाते हैं. उनके पूरे व्यक्तित्व में एक नृत्यभाव आ जाता है. बल्कि नाच ही उठते हैं वे. ऐसे गद्गद होते हैं कि फिर देर तक उनका पोर-पोर गदगदाता रहता है. ...देखा? हमने कहा था न आपसे?" दोनों हंसते हैं.
***
गजानन बाबू बाज़ार में बने एक चबूतरे पर बिराजे हुए मिल जाते हैं, अक्सर.
यहां चुपचाप बैठे हुए वे न जाने क्या-क्या सोचते रहते हैं. लोग यह मानते हैं कि वे देश के बारे में ही सोचते होंगे. ऐसा ही अंटशंट सोच-सोच के तो पगलाए हैं. यार, देश के बारे में अगर इत्ता सोचोगे तो पगला तो जाओगे ही न! कोई भी पगला जाएगा. वैसे, सब यह भी मानते हैं कि उनका इस तरह पागल होना कोई छोटी-मोटी बात नहीं है; बहुत ही बड़ी बात है भाई! तभी तो गजानन बाबू और उनके पागलपन की बड़ी इज़्ज़त भी करते हैं कोटरावासी.
गजानन बाबू फिलवक़्त भी चबूतरे पर विचारमग्न बैठे हैं.
सुबह का वक़्त है. अभी बाज़ार धीरे-धीरे खुलना शुरू ही हुआ है.
दुकानदार बंधु, चबूतरे के पास से निकलते हुए गजानन बाबू को 'जयहिंद' बोलते चले जा रहे हैं. हर 'जयहिंद' के जवाब में वे अपनी जगह से लगभग छह इंच उचककर बुलंद आवाज में 'जयहिंद' कहते हैं. उनका यूं उचकना लोगों को मज़ा दे जाता है. कुछ मुस्कुराते हैं, कुछ खुलकर हंसने लगते हैं. गजानन बाबू को लोगों की इस हंसी से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है. वे हर जयहिंद पर उसी उत्साह से उचकते रहते हैं. आते-जाते स्कूली छात्र और फुरसतिया युवा लौट-लौटकर उनको 'जयहिंद' करते हैं. उन लोगों की हर 'जयहिंद' पर भी वे उसी तरह बार-बार उचकते हैं. लड़कों के लिए यह सब एक खेल जैसा है. वे बब्बा की हर 'जयहिंद' पर हंसते हैं और रह-रहकर उनको 'जयहिंद' करते हैं. चबूतरे पर बैठे अन्य कुछ बूढ़े अवश्य इन लौंडों को फटकारते रहते हैं. ...पहिचानते भी हो इनको? स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों की लाठी खाई है इनने. गांधीजी के पीछे-पीछे चले हैं नमक आन्दोलन में. ...तिरंगा ले के मूँड़ पे डंडे खाए हैं; और तुम स्साले इनका ही मज़ाक़ बना रहे हो? ...लड़के ढीठ हैं. डांटने पर भी हंसते रहते हैं. हंसकर तर्क देते हैं: "हम तो बस जयहिंद बोल रहे थे चच्चा. मज़ाक थोड़ेई है, जयहिंद है." कहकर ज़ोर से हंसते हैं वे. गजानन बाबू मुस्कुराते हुए बैठे रहते हैं.
"जयहिंद बब्बा."
"जयहिंद बेटा. ...जयहिंद."
गजानन बाबू का गद्गद होना उजागर है.
"महात्मा गांधी की जय."
"महात्मा गांधी की जय."
गजानन बाबू गद्गद होते जाते हैं. दिव्य स्तर के गदगदायमान. लोगों को इसी में तो मज़ा आ जाता है. ...चलो, चलो, अपुन टंटा बब्बा की जयहिंद करें.
गजानन बाबू अभी चबूतरे पर हैं. वैसे उन्हें जाना भी कहां है? यहां से उठेंगे तो गांव में बस चार-पांच जगह और जाएंगे; बस अड्डा, स्कूल का गेट, पंचायत भवन, छुट्टन की पुलिया और कड़ा की बरिया (बरगद); और वहां भी बस, ऐसे ही बैठे मिलेंगे, कुछ न कुछ सोचते, जयहिंद करते. हर जगह, बस जयहिंद लेंगे, देंगे या चुपचाप बैठे रहेंगे. प्रायः कोई भी नहीं उलझता उनसे. किसी ने कभी भूले से कोई बात कर ली तो वे तुरन्त अपनी बड़ी-बड़ी बातें शुरू कर देंगे. फिर वे बोलते ही चले जाएंगे. रुकेंगे ही नहीं. ...इनसे तुम कोई भी बात न करियो भैया वर्ना इनकी बिना ब्रेक की गाड़ी चल पड़ेगी. मूँ से देशभक्ति की इत्ती भाप भकभका के निकलेगी कि तुमें भागते गैल न मिलेगी. ...माना कि महात्मा आदमी हैं पर पगला भी तो गए हैं न? ऐसे पग्गल महात्मा का आदमी आखिर क्या करे- बताइए? इसीलिए इन्हें तो बस चुपचाप बैठे रहने दो. छेड़ो मती. इनसे बात-फात न करो. हां, कभी मजा लेने का मन करे तो जयहिंद करके छेड़ भर दो. फिर देखो मजा.
"जयहिंद महात्माजी."
"जयहिंद!"
"महात्मा गांधी की जय."
"महात्मा गांधी की जय!"
दिन भर वे लोगों से जयहिंद सुनते हैं. दिन भर गद्गद होते हैं. लोग मात्र ठिठोली के लिए बार-बार 'जयहिंद' बोल रहे हैं- वे यह भी जान जाते हैं; ऐसे पागल भी नहीं हैं गजानन बाबू. पर वे इसका बुरा नहीं मानते. बोलने दो. मज़ाक़ में ही सही, लोग कम से कम 'जयहिंद' तो बोलते हैं न? यही क्या कम है कि इन्हें 'जयहिंद' की याद है! हंसी उड़ाने के लिए ही सही, लोग महात्मा गांधी की जय तो बोलते हैं न. देश का नागरिक महात्मा गांधी और जयहिंद को याद रखे रहे, बस; तो देखना कि एक दिन यह देश ज़रूर बदलेगा. देश में रामराज्य ज़रूर आएगा एक दिन. ...यही सब सोचते रहते हैं गजानन बाबू. सोचते-सोचते मुस्कुराने लगते हैं वे. अभी भी नयन मूंदे, चबूतरे पर अधलेटे मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं वे. ...कि अचानक ही आंखें खोल दीं उन्होंने. फिर न जाने क्या सोचते हुए वे उठे और एक जोरदार नारा लगाकर बोले, "जयहिंद!"
बुलंद नारा सुनकर आस-पास के लोग चौंक पड़े.
"पगलट हैं", किसी ने कहा.
इधर गजानन बाबू फिर से आंखें मूंदकर विचारमग्न हो चुके हैं.
***
• पुस्तक: स्वांग
• लेखक: ज्ञान चतुर्वेदी
• विधाः उपन्यास
• प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
• भाषा: हिंदी
• पेपरबैक: 392 पेज
• मूल्य: 269/- रुपए

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