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वह एक उजला दिन थाः निर्मल वर्मा की पुण्यतिथि पर उपन्यास 'वे दिन' के अंश

 25 अक्तूबर को निर्मल वर्मा की पुण्यतिथि है. इस मौके पर साहित्य आजतक पर पढ़िए उनके उपन्यास 'वे दिन' का अंश

 निर्मल वर्मा के उपन्यास 'वे दिन' का कवर [सौजन्यः वाणी प्रकाशन] निर्मल वर्मा के उपन्यास 'वे दिन' का कवर [सौजन्यः वाणी प्रकाशन]

हिंदी कथा क्षेत्र में आधुनिकता बोध और विदेशी तानेबाने व परिवेश पर काव्यमय गद्य लिखने में निर्मल वर्मा का कोई शानी नहीं है. वह भारतीय मनीषा की उस उज्ज्वल परम्परा के प्रतीक-पुरुष हैं, जिनके जीवन में कर्म, चिन्तन और आस्था के बीच कोई फाँक नहीं रह जाती. कला का मर्म जीवन का सत्य बन जाता है और आस्था की चुनौती जीवन की कसौटी.

वह नई कहानी आंदोलन के ध्वजवाहकों में शुमार थे. उनका जन्म 3 अप्रैल 1929 को शिमला में हुआ और निधन 25 अक्तूबर 2005 को नई दिल्ली में. कहा जाता है कि उनके समकालीनों और बाद के रचनाकारों में शायद ही कोई ऐसा है, जिसने निर्मल वर्मा से कुछ न लिया हो. वह एक ऐसे लेखक मनीषी थे, जो अपने होने की कीमत देता भी है और मांगता भी है. अपने जीवनकाल में गलत समझे जाना उसकी नियति है और उससे बेदाग उबर आना उसका पुरस्कार. निर्मल वर्मा के हिस्से में भी ये दोनों बखूबी आये. अपने जीवनकाल में निर्मल वर्मा साहित्य के लगभग सभी श्रेष्ठ सम्मानों से समादृत हुए, जिनमें 1985 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1999 का ज्ञानपीठ पुरस्कार, 2005 में साहित्य अकादमी का सर्वोच्च सम्मान साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता उल्लेखनीय हैं. वह साल  2002 में देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मभूषण से भी सम्मानित हुए थे.

आज उनकी पुण्यतिथि पर हम वाणी प्रकाशन से छपे उनके उपन्यास 'वे दिन' का अंश साहित्य आजतक के पाठकों के लिए दे रहे. इस उपन्यास के पात्र, निर्मल वर्मा के अन्य कथा-चरित्रों की तरह सबसे पहले व्यक्ति हैं. अगर दूसरे शब्दों में कहें तो मनुष्य के तौर पर वे कहीं भी कम नहीं, बल्कि बढ़कर हैं, किसी भी मानवीय समाज के लिए उनकी मौजूदगी अपेक्षित मानी जाएगी. उनकी पीड़ा और उस पीड़ा को पहचानने, अंगीकार करने की उनकी इच्छा और क्षमता उन्हें हमारे मौजूदा असहिष्णु समाज के लिए मूल्यवान बनाती है. वह चाहे रायना हो, इंदी हो, फ्रांज हो या मारिया, उनमें से कोई भी अपने दुख का हिसाब हर किसी से नहीं मांगता फिरता. तो पढ़िए यह उपन्यास अंश

वे दिन

             - निर्मल वर्मा

वह एक उजला दिन था. सर्दियों में कभी-कभी अचानक ऐसे दिन आ जाते थे, जब लगता, सर्दियाँ ख़त्म हो रही हैं. बीच का एक गर्म उज्ज्वल दिन- पानी लिखी हुई कॉपी के बीच एक अनलिखा, कोरे पन्ने-सा सफ़ेद और विस्मयकारी. वह सपने-सा लगता. ट्राली बस की तारों पर पक्षियों की काली क़तार लग जाती, धूप में अपने पंख सेंकती हुई.
हम इन्हें 'झूठे बसन्त' के दिन कहा करते थे. वे ज़्यादा टिकते नहीं थे. लेकिन जब वे आते थे, लोग आतुरता से उन्हें निचोड़ लेते थे- आखिरी बूंद तक. शहर की सड़कें लोगों से भर जातीं. एम्बेंकट की बेंचों पर बूढ़ी औरतें, अपने-अपने पैरम्बुलेटर के समय ऊँघती रहतीं.
तब सहसा मुझे वह आवाज़ सुनाई दी थी. आवाज़ भी नहीं- महज़ एक सरसराहट- बर्फ़ और धूप में दबी हुई. मुझे हमेशा यह आवाज़ अचानक अकेले में पकड़ लेती थी, या शायद जब मैं अकेला होता था, तभी उसे सुन पाता था. वह दरिया की ओर से आती थी- किन्तु वह दरिया की ही आवाज़ है, इसमें मुझे सन्देह था. वह सिर्फ़ हवा हो सकती थी- तीख़ी सफ़ेद और आकारहीन. या सिर्फ़ शहर का शोर, जो पुराने मकानों के बीच आते ही अपना स्वर बदल देता था. घरों के बीच एक गिरता हुआ नोट-पेड़ों, छतों, गलियों के ‘की-बोर्ड' पर सरसराता हुआ बर्फ़ की सफ़ेदी पर एक भूरी-सी आहट-सा.
 
मैं अब इन पुराने मकानों के बीच चल रहा था. सड़क का नाम था- विनोहरादी-अंगर लताओं का स्क्वायर. बरसों पहले यहाँ शराब बनाई जाती थी. फ्रांज़ इस स्क्वायर के अन्तिम छोर पर रहता है- या रहता था. अब उसका एपार्टमेंट खाली है. लेकिन उस दिन वह वहाँ था और तब कोई. नहीं जानता था कि कछ दिनों बाद वह प्राग में नहीं होगा.
 
उसके एपार्टमेंट से पहले चेखोवी-गार्डस आते थे और मैं हमेशा उनके बीच से गुज़रकर सड़क पार किया करता था. सर्दियों में सब पेड़ों के पत्ते झर जाते थे, लेकिन चेखोवी- गार्डंस के पाइन वृक्षों की सूइयाँ अलग नहीं होती थीं. वे नीचे झुक जाती थीं- एक ठिठुरते जानवर की तरह, जो सर्दी से बचने के लिए अपने सब अंग समेट लेता है; और तब लगता था जैसे बर्फ़ के सफ़ेद सागर के बीच वह एक नीला द्वीप हो-अपनी ही गर्मी में लिपटा हुआ. उस दिन सारा बाग वीरान था. नंगे तोपोल पेड़ों के नीचे पर की बेंचें ख़ाली पड़ी थीं. मुझे जुलाई-अगस्त की वे रातें याद हो आईं जब यूनिवर्सिटी के छात्र अपनी-अपनी लड़कियों के साथ बाग़ के अँधेरे कोनों में बैठे रहा करते थे. बीचों-बीच कवि चैख़ की काली मूर्ति चुपचाप खड़ी रहती लोग शराब और बियर की बोतलों को मूर्ति के 'पेडेस्टल' पर छोड जाते थे- फिर देर रात में ग़रीब बूढ़ी औरतें प्रेतनियों की तरह बाग़ में घुस आती थीं और ख़ाली बोतलों को अपनी स्कर्ट्स की लम्बी जेबों में ठुँसकर अँधेरे में गायब हो जाती थीं.
 
यह पिछली गर्मियों में था...और उससे पिछली गर्मियों में जो इस शहर में मेरी पहली गर्मियाँ थीं. उन्हीं दिनों पहली बार में फ्रांज से मिला था. प्राग-स्प्रिंग का एक कन्सर्ट था, जिसमें मैं और टी.टी. गए थे. वही कन्सर्ट-हॉल के गलियारे में टी.टी. ने मेरा परिचय फ्रांज़ से कराया था. उसी शाम उसने मुझे और टी.टी. को अपने 'स्टूडियो' में आमन्त्रित किया था. मैंने सोचा, यह पेंटर है. वह लग भी रहा था. उसकी बड़ी ऑलकोहलिक आँखें, लम्बा जिप्सी-टाइप स्वेटर और लम्बे मैले नाख़ून. उसने अपना एक हाथ बहत ही सीधी-सादी लड़की के कन्धे पर रखा था. "यह मेरी लड़की है," उसने हमसे कहा. वह हँसने लगी थी. वह मारिया थी, यह हमने बाद में जाना था. हम बाद में उससे कई बार मिले थे, फ्रांज़ के स्टूडियो में ही.
 
वह स्टूडियो नहीं था और न फ्रांज़ पेंटर ही. उस शाम जब हम उसके कमरे में गए तो सिर्फ़ एक बड़े पियानो और सोफ़ा के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं दिया. कमरे के बीच में ही एक तार लगी थी जिस पर उसके मोज़े और अंडरवियर सूख रहे थे. पियानो के सामने दीवार पर नियिन्सकी का एक चित्र था...पेत्रोश्का के वेश में...उसके साथ ही स्त्राविन्सकी खड़े थे.
 
'क्या कभी तुमने शैतान और ईश्वर को एक साथ देखा है ?' उसने पाइप सुलगाते हुए मेरी ओर देखा. फिर उस फ़ोटो की ओर इशारा किया. 'मैं दोनों को ही अपने स्टूडियो में रखता हूँ,' उसने हँसते हुए कहा.
 
यह हमारे परिचय की शुरुआत थी.
सारी शाम वह अपने बारे में ही बोलता रहा था. उसे अपने बारे में ही बोलना अच्छा लगता था- एक ईगोइस्ट की तरह नहीं; एक बच्चे की तरह, जो अपने स्टैम्प-एलबम हर आदमी को गर्व से दिखाता है. यह कहने की बजाय कि देखो, यह अर्जनटाइना का टिकट है, यह ग्रीनलैंड का वह सिर्फ़ यह कहता था कि देखो, यह मेरा प्रेम है, यह मेरी घृणा. मैं इस पर मर सकता हूँ. मैं उस पर थूकता भी नहीं. उसके पास शब्द ज़्यादा नहीं थे. वह जर्मन था और अंग्रेजी बहुत कम आती थी. चेक उससे भी कम. वास्तव में सिनेमाटोग्राफी के छात्रों को चेक सीखने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी. (फ्रांज़ को पूर्वी जर्मन से यहाँ सिनेमा-स्कूल में अध्ययन करने का स्कॉलरशिप मिला था.) जब कभी बोलते हुए उसे अंग्रेज़ी का शब्द नहीं मिलता था, वह उसका जर्मन शब्द मारिया को बता देता था और मारिया हमारे लिए उसका अनुवाद चेक में कर देती थी. मारिया को अंग्रेज़ी आती थी, पर वह बोलती थी चेक में. फ्रांज़ को चेक नहीं आती थी. मुझे और टी.टी. को जर्मन. और कभी-कभी हम जल्दी में बोलते हुए हड़बड़ा जाते थे कि किसके साथ हमें किस भाषा में बोलना चाहिए. यह सिर्फ़ पहले ही दिन हुआ था. बाद में हम आदी हो गए थे.
***

पुस्तकः वे दिन
लेखकः निर्मल वर्मा
विधाः उपन्यास
प्रकाशकः वाणी प्रकाशन
पृष्ठ संख्याः 210
मूल्यः
हार्ड बाउंड रुपए 525/
          पेपर बैक रुपए 195/

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