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लमही ने कथाकार प्रबोध कुमार के साहित्यि‍क अवदान को किया याद

प्रबोध कुमार मुंशी प्रेमचंद के दौहित्र थे. उनका नाम अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के मानव विज्ञानियों में लिया जाता है. जहां तक साहित्यिक रचनाधर्मिता का प्रश्न है, उनकी अनेक रचनाएं कहानियां, आलोचना, कल्पना, कहानी, कृति और वसुधा आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं.

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प्रबोध कुमार पर अंक के साथ 'लमही' के विशेषांकों का सिलसिला जारी है प्रबोध कुमार पर अंक के साथ 'लमही' के विशेषांकों का सिलसिला जारी है

विशेषांकों की श्रृंखला में लमही ने यों तो अनेक लेखकों, कवियों, कथाकारों पर अंक निकाले हैं, जिनमें भगवत रावत, रवींद्र कालिया, शिवमूर्ति, फणीश्‍वरनाथ रेणु, अमृत राय आदि शामिल हैं. इसके अलावा दो खंडों में औपन्यासिक और तीन खंडों में हमारा कथा समय, भी प्रकाशित हुआ है, किन्तु अभी हाल ही में आया प्रबोध कुमार विषयक विशेषांक कुछ खास कारणों से विशेष चर्चा में है. प्रबोध कुमार जहां एक बेहतरीन कथाकार थे, वहीं एक बेहतरीन समीक्षक, गद्यकार और साहित्य के एक समर्पित कार्यकर्ता भी. किन्तु साहित्यिक आलोचना में उन्हें ढंग से याद नहीं किया गया. यहां तक कि पिछले वर्ष जब उनका निधन हुआ तब भी उनकी अनुपस्थिति चर्चा का विषय न बन सकी. संयोग से 'लमही' ने यह दायित्व निभाया. प्रेमचंद के पुत्र एवं जाने माने कथाकार, निबंधकार, अनुवादक अमृत राय पर इसका बहुवस्तुस्‍पर्शी विशेषांक अभी पिछले ही साल आया है और अब यह विशेषांक प्रेमचंद के परिवार के ही कथाकार प्रबोध कुमार पर, जिससे हम साहित्य में उनके अवदान को बखूबी समझ पाते हैं. 

कौन थे प्रबोध कुमार?
प्रबोध कुमार मुंशी प्रेमचंद के दौहित्र थे. उनकी मां का नाम कमला देवी श्रीवास्‍तव और पिता का नाम वासुदेव प्रसाद श्रीवास्तव था. उनका जन्म 8 जनवरी, 1935 को हुआ था. प्रारंभिक शिक्षा वाराणसी में हुई. उसके बाद उन्होंने डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से एंथ्रोपालोजी में एमए किया. वे पटियाला और सागर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर एवं अध्यक्ष रहे. वे कैनबरा-आस्ट्रेलिया, पोलैंड के वारसा और जर्मनी के दो विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर भी रहे. उनका नाम अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के मानव विज्ञानियों में लिया जाता है. जहां तक साहित्यिक रचनाधर्मिता का प्रश्न है, 1956 से लेकर 1963-64 तक उनकी अनेक रचनाएं कहानियां, आलोचना कल्पना, कहानी, कृति और वसुधा आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं. 'सी-सॉ' उनका कहानी संग्रह है तो 'निरीहों की दुनिया' उपन्‍यास. वे बेबी हालदार की 'आलो आंधारि' एवं 'ईषत् रुपांतर' के बांग्ला से हिंदी अनुवाद के लिए साहित्य में विशेष चर्चा में आए. उनका निधन पिछले वर्ष 20 जनवरी, 2021 को हुआ. 

प्रबोध कुमार का लेखक व्यक्तित्‍व 
'लमही' के इस अंक में बहुत करीने से प्रबोध कुमार की शख्‍सियत के हर पहलू को सामने लाया गया है. इसमें प्रबोध कुमार पर बेहतरीन संस्मरण लिखने वालों में कृष्णा सोबती, कमलेश, शंख घोष, प्रयाग शुक्ल, आग्नेय, गिरधर राठी, उदयन वाजपेयी, रमेश दीक्षित, प्रभाकर सिन्हा, प्रभा प्रसाद, जयावती श्रीवास्तव, अनिल राय, चित्रा श्रीवास्तव, राहुल श्रीवास्तव, बालेश्वर राय, डॉ लखवीर सिंह, डॉ वीरेन्द्रपाल सिंह, माइकल सोलका-प्रेजिबिलो, डॉ कुसुम प्रभा आदि प्रमुख हैं. उनकी कृतियों के अंश तो यहां प्रकाशित हैं ही, उनकी कृतियों पर हिंदी के नामचीन लेखकों के मूल्यांकन भी प्रस्तुत किए गए हैं. कथाकार योगेंद्र आहूजा, संजय गौतम और रणेंद्र ने उनके उपन्यास 'निरीह की दुनिया' पर डूब कर लिखा है तो कथाकार हरियश राय व डॉ अंकिता तिवारी ने प्रबोध कुमार की कहानियों का मूल्यांकन किया है. बेबी हालदार से शर्मिला जालान ने बात की है, जिन्होंने प्रबोध कुमार के घर में नौकरानी के रूप में एक अरसा बिताया और 'आलो आंधारि' की रचना से खासा चर्चित हुईं. बेबी हालदार ने उनके जीवन में अहमियत को बहुत ही मार्मिकता से रेखांकित किया है. 

प्रबोध कुमार के रचना-संसार की एक झलक 
यह अंक न केवल प्रबोध कुमार के बारे में संस्मरणों पर आधारित है बल्कि उनके रचना संसार की भी एक झलक देता है. यहां उनके उपन्‍यास निरीह की दुनिया से कुछ अंश उद्धृत हैं तो उनकी कुछ कहानियां भी यहां शामिल की गयी हैं. यहां अशोक सेकसरिया के कथा संग्रह 'लेखकी' व अलका सरावगी के उपन्यास 'कलिकथा वाया बाईपास' पर उनके रिव्यूज प्रकाशित हैं तो तसलीमा नसरीन व नासिरा शर्मा पर लेख भी. काजी नजरूल इस्लाम पर उनका यहां लेख है, तो नानी पर उनका एक कोमल संस्मरण भी. कुछ टिप्पणियां और खतो किताबत भी यहां शामिल हैं जिनसे प्रबोध कुमार की साहित्यिक गतिविधियों की पूरी झलक मिल जाती है. 

आज दुनिया प्राय: सफलता की पायदान चूमने वाले लेखकों के परचम फहराती चलती है; एक कोने में रह कर खामोशी से अपनी रचनात्मकता को अंजाम देने वाले लेखकों को वह विस्मृति के नेपथ्य में डाल देती है. हम ध्यान से देखें तो अपने प्रचार प्रसार के लिए रणनीति बना कर लेखक संघों के जरिये अनेक लेखक चर्चा में रहते हैं, जबकि संघनिरपेक्ष लेखकों के अवदान को हम भुला देते हैं. प्रबोध कुमार गुमनामी में चले गये होते यदि हाल ही में हुए उनके निधन के बाद लमही ने उन्हें यों याद न किया होता. 'लमही' के इस अंक के लिए प्रधान संपादक व महताब राय के दौहित्र विजय राय का बहुत-बहुत साधुवाद.
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com
 

 

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