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केरल के कवि और उनकी कविताएं: अनामिका अनु के हिंदी अनुवाद पर एक नज़र

अनुवाद के जरिए भारतीय भाषाओं का क्षितिज व्‍यापक हो रहा है, इसका एक ताजा उदाहरण है अनामिका अनु द्वारा अनूदित केरल के कवियों की कविताएं. इस चयन और कवियों के कवित्‍व पर एक रोशनी

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केरल से अनामिका अनुः केरल के कवि और उनकी कविताएं केरल से अनामिका अनुः केरल के कवि और उनकी कविताएं

केरल अपनी कुदरत के कारण सदैव आकर्षण का केंद्र रहा है. विविधताओं वाले इस देश में केरल और उसका जनजीवन साहित्य में छन-छन कर आता रहा है. मलयालम के अनेक कवियों को बहुत चाव से हिंदी में पढ़ा जाता रहा है जिनमें हम अय्यप्प पाणिक्कर, अक्कितम, के सच्चिदानंदन, गोपीकृष्ण कुट्टूर, मीरा नायर आदि से वाकिफ हैं. के सच्चिदानंदन की कविताओं के बहुतेरे अनुवाद हुए हैं. अय्यप्प के भी. अभी डॉ अनामिका अनु जो हिंदी की युवा कवयित्री हैं और हाल ही में जिनका 'इंजीकरी' नामक कविता संग्रह आया है, ने केरल के कुछ कवियों को अपने हिंदी अनुवाद में प्रस्तुत किया है. अनुवाद करना एक कला है, कविता का अनुवाद तो और भी सघन कलात्मकता चाहता है और यह कला दुःस्साध्य है. इसे अर्जित करना होता है. जैसे स्वयं कवि होना होता है. अनामिका ने यह काम अपने भीतर के कवि कौशल से किया है. पेशे से वैज्ञानिक किन्तु हृदय से कवयित्री अनामिका की पृष्ठ भूमि बिहार की है जो हिंदी का गढ़ कहा जाता है. इसका लाभ उन्हें उनकी कविता और अनुवाद को मिला है. 
केरल के कवि और उनकी कविताएं में के सच्चिदानंदन, अय्यप्प पणिक्ककर, गोपीकृष्णन कुट्टूर, जोर्ज आर, चंद्रमोहन एस, गीता जानकी, मीरा नायर, नीरदा सुरेश, मैथ्यू जैस्प‍र, गीता नायर और सोनी सोमाराजन की कविताएं अनूदित हैं. अनुवाद के क्षेत्र में खास कर मलयालम कविता के अनुवाद के क्षेत्र में इससे पूर्व संतोष अलेक्स, रति सक्‍सेना के साथ गिरधर राठी, अनामिका के साथ कई हिंदी कवियों का योगदान भी अविस्मरणीय है जिन्होंने के सच्चिदानंदन, अय्यप्प पणिक्कर और अक्कितम के अनुवाद किए हैं. मुझे याद है अक्कितम की कविताओं का अनुवाद दिवंगत कवि उमेश कुमार चौहान ने भी बहुत पहले किया था. वे भी रससिद्ध कवि थे. 
अनामिका के साथ अच्छी बात यह है कि वे रोजी रोटी के कारण केरल गयीं लेकिन वहां वह अपने में ही रमी नहीं रहीं. केरल को अपने भीतर जिया, वहां के अहिंदी भाषी माहौल में घुटन का अनुभव नहीं किया, कवियों से रब्त जब्त कायम किया और अपनी कविता लिखने के साथ-साथ मलयालम के कवियों से घना रिश्ता कायम किया. इसके बिना आप यांत्रिक अनुवाद तो कर सकते हैं कविता के जलवायु के साथ सहबद्ध नहीं हो सकते. अनामिका ने केरल को गए डेढ़ दशकों से समझा जाना और परखा है. यहां के शब्दबोध, लय ताल रिद्म, दर्शन और विचार के साथ नजदीकियां पैदा की हैं. यहां के सांस्कृतिक और कर्मठ जीवन की चिन्गारियों ने उनके कवि जीवन को प्रभावित और प्रेरित किया है. इसी का सुपरिणाम है यह संचयन. 
के सच्चिदानंदन को वे कविता का विश्वविद्यालय कहती हैं. वे हैं भी. बरसों साहित्य अकादेमी के सचिव रहे. उनकी कविता एक सच्चे संवेदनशील कवि की कविता है. मलयालम में उनके तीस संग्रह आ चुके हैं. हिंदी भी बखूबी समझते हैं और हिंदी के नामचीन और युवा कवियों को सीधे हिंदी में पढ़ने का सलीका रखते हैं. उनकी कविता की ध्वन्यात्कमता गहरी है, उसकी मौलिकता अबाध है, एक धड़कती काव्यानुभूति उनके कथ्य को सौष्ठवता के साथ सामने लाती है. अनेक पुरस्कारों के स्‍वामी सच्चिदानंदन को हम विश्व के चुनिंदा कवियों के समकक्ष रख सकते हैं. वे मानते हैं कि चिड़ियों का अपना राष्ट्र  होता है. पंख उनके परचम. जिन्हें वे आकाश मे फहराते हुए उड़ते हैं. बकौल कवि - वे सूरज और चांद के बीच में बैठ कर स्वप्न देखते हैं. लेकिन इस कविता में एक स्थल पर जब कवि कहता है, ''एक दिन मैंने चिड़ियों की तरह रहने की कोशिश की/ मैंने अपनी राष्ट्रीयता खो दी.'' तो मुझे उर्दू शायर मुनव्वर राणा द्वारा फुटपाथ पर रहने वालों के लिए कहे गए शब्द बेहद याद आए. "सो जाते हैं फुटपाथ पर अखबार बिछा कर/ मजदूर कभी नींद की गोली नहीं खाते." किन्‍तु जनता में यही सोच है कि जो फुटपाथ पर रहते हैं, वे मनुष्य नहीं हैं. उनके बारे में सच्चिदानंदन कहते हैं-
वे न आते हैं न ही वे जाते हैं
वे न जन्म लेते हैं न ही वे मरते हैं
उनकी बीमारी को भूख कहते हैं
और उनके प्रेम को प्यास (पृष्ठ 15)
वसंत को वे किस तरह महसूस करते हैं, यह उनकी कविता एक छोटा वंसत से जाना जा सकता है. ''एक छोटा वसंत, एक टीस/ मेरे होठ कामनाओं से थरथरा उठे हैं/ चीयर्स.'' इसी तरह गरीबी कविता भी हमें अपने सुदूर संवेदी संकेतों से हतप्रभ कर देती है. के सच्चिदानंदन की एक और कविता 'परछाइयां' के जिक्र के साथ इस चर्चा को विराम देना चाहता हूं. जो चले गए- जाने वालों को लेकर अनेक कविताएं आपने पढ़ी होंगी. कोरोना तो जैसे सामूहिक विदा गीतों का दौर ही रहा है. तथापि यह कविता एक शोकधुन के साथ हृदय की तरंगों को छेड़ती है-
जो चले गए 
आहिस्ता, आहिस्ता सब चले गए
जिन्होंने स्तनपान कराया और हमें बिस्तर पर लिटाया
जिन्होंने कड़ी मेहनत की ताकि हमें स्कूल और कालेज भेज सकें
जिन्होंने हमें फटकारा और सजा दी
जिन्होंने सम्मान दिया और हमसे ईर्ष्या की 
जिन्होंने गले लगाया और चाहा हमें
एक-एक करके, आहिस्ता आहिस्ता. (पृष्ठ 23 )
अय्यप्प की कविता मलयालम में आधुनिकता के नवाचारों की कविता है. अनेक संग्रह उनके प्रकाशित हो चुके हैं. तमाम पुरस्कार उनके खाते में हैं. समाचार कविता देखें -
मौत की खबरों से भरी अखबारें
भाषणों की संख्या और लंबाई निरंतर बढ़ती जा रही है
कान बेकार हो गए हैं 
और आंखें अंधी 
अनंत कठिनाइयां 
मुझे अपने कान, आंख और दिमाग कब वापस मिलेंगे
मुझे बताओ मेरे दोस्त क्या तुम सर्वज्ञ नहीं हो? (पृष्ठ 42)
यों तो यह कविताओं का चयन है ही, एक से एक विभिन्न अर्थछायाओं वाली कविताएं तथापि जोर्ज आर. की कविता 'व्यक्तिगत नोट' विभिन्न क्षणिकाओं के साथ क्या खूब कविता बन पड़ी है- 
मैं पहाड़ी की ढलान पर की मुलायम घास था
जहां हवा कभी नहीं सोई
एक दिन सांझ में
बुद्ध नन्ने मेमने की तरह आए
मुझे खाया और तृप्त हुए. (पृष्ठ 53)
अब कुछ बातें अनुवाद पर. यों तो सहज ही अनुवाद किए हैं अनामिका ने पर कई कविताएं अनुवाद के बावजूद अपनी अर्थच्छायाओं में उतनी प्रगाढ़ और संवेद्य नहीं बन सकीं. एकाधिक जगह पर व्यवहार के विपरीत भाषा भी बाधक बनी है जैसे 'मौत की खबरों से भरी अखबारें' में 'अखबारें' का प्रयोग वैसे ही खलता है जैसे संवेदना की जगह कोई अनभ्यस्त व्यंक्ति 'संवेदनाएं' कहे. अच्छी भाषा की झलक अनुवाद में भी झलकनी चाहिए और उसे एक मौलिक चुंबन की तरह प्रतीत होना चाहिए. अनुवाद में भी कविता जैसी मंजाई होनी चाहिए. वरना वह शुष्कंवृक्षंतिष्ठत्यग्रे- जैसा हो जाता है, नीरस तरुरिह विलसित पुरत: जैसा नहीं. 'एक छोटा-सा बसंत जो एक डिबिया में आ जाए' की जगह मैं इसे 'एक डिबिया में समा जाए' कहता. तथापि यह विश्‍वासपूर्वक कहा जा सकता है कि अनामिका का केरल की कविताओं को हिंदी में सामने लाना भारतीय कविता को सुदूर दक्षिण की कविता की रसगंध से भरना है जो कार्य सांस्कृतिक जुड़ाव के लिए ज्यादा जरूरी है. 
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पुस्तकः केरल से अनामिका अनु; केरल के कवि और उनकी कविताएं
संचयन, संपादन, अनुवादः अनामिका अनु  
विधाः कविता
भाषाः हिंदी
प्रकाशकः लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
पृष्ठ संख्याः 110
मूल्यः 250 रुपए
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डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक, कवि एवं भाषाविद हैं. शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब, कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान और यूको बैंक के अज्ञेय भाषा सेतु सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं. संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली 110059
फोन 9810042770, मेल dromnishchal@gmail.com
 

 

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