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साहित्य 2021: कथा-कथेतर विधाएं; कहने को हैं कहानियां कितनी!

इधर कुछ सालों से पाठक कहानी व उपन्‍यास से कथेतर विधाओें की ओर मुड़े हैं. वे संस्‍मरणों, आत्‍मकथाओं व जीवनियों में दिलचस्‍पी रखते हैं. सेलीब्रिटीज के जीवन में क्‍या कुछ हो रहा है, यह जानने की जिज्ञासा भला किसे नहीं होती. इसलिए प्रोफाइल लेखन का रास्‍ता प्रशस्‍त हुआ है. कथा और कथेतर विधाओं में साल 2021 में क्‍या कुछ लिखा गया, इसका जायज़ा ले रहे हैं हिंदी के सुधी कवि समालोचक डॉ ओम निश्‍चल

साहित्य 2021: कथा-कथेतर साहित्य 2021: कथा-कथेतर

साहित्य की दुनिया चाहे जितनी भी सुविस्तृत होती जा रही हो, कविता और कथा ये दो विधाएं जैसे उसकी शख़्सियत का एक अहम हिस्सा मानी जाती रही हैं. आज भले ही कहानियों, उपन्यासों के अलावा संस्‍मरण, जीवनी, आत्मकथाओं, रिपोर्ताजों या व्यक्तिपरक लेखन का बोलबाला हो, किस्सागोई उसका प्राणतत्व‍ है. एक समय था, अमृतलाल नागर, भगवतीचरण वर्मा, शिवानी, मालती जोशी, रांगेय राघव, श्रीलाल शुक्ल, रेणु, धर्मवीर भारती, कमलेश्वर, मोहन राकेश, कृष्णा  सोबती, अमरकांत, मनोहर श्याम जोशी, काशीनाथ सिंह, मैत्रेयी पुष्पा, असगर वजाहत, चित्रा मुद्गल, दूधनाथ सिंह, उषा प्रियंवदा आदि क्या कुछ नया लिख रहे हैं, इनकी कौन सी कहानी पत्र-पत्रिकाओं में छप रही है, कौन सा उपन्यास आया है, इस बात की उत्सुकता से चर्चाएं होती थीं. गांवों, कस्बों, महानगरों तक में इनके पाठक थे. पत्र-पत्रिकाएं थीं. आज वह परिदृश्य हमारे सम्मुख नहीं है. पुस्तकालय सिमट गए हैं. वे हैं भी तो बहुत अच्छी हालत में नहीं हैं. पहले किसी बड़े प्रकाशन से छपना बहुत आसान न था. वहां छपने की भी अपनी कसौटियां थीं, आज यह सब सर्वे गुणा: कांचनमाश्रयन्ति- में बदल गया है. पैसा देकर छपने की राहें आसान हुई हैं तो पुस्तकों के नाम पर बहुत सारा उच्छ्वास छप कर अच्छी पुस्तकों की जगह घेर रहा है. इसी दृश्य को देख कर कभी अपनी डायरी 'दिशाओं का खुला आकाश' में कुंवर नारायण ने लिखा था: घटिया पुस्तकों की आबादी खर पतवार की तरह है.

तथापि दो साल से कोरोना की मार झेलते हिंदी प्रकाशन कुछ कुछ पटरी पर लौटने लगा है, तीसरी लहर की आहट के बावजूद साल 2021 में उसके हौसले पस्त नहीं हुए तथा मेले ठेले के सिमट जाने और ऑनलाइन सेल के हवाले प्रकाशन व्यवस्था के सिमट जाने के बावजूद 2021 ऐसी तमाम कथा-कृतियां दे गया जिस पर पाठक भरोसा कर सकते हैं.

उपन्‍यासों की दुनिया
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इस साल उपन्यासों की दुनिया बहुत समृद्ध नहीं रही. तथापि इधर अनेक नामचीन लेखकों पर जीवनीपरक उपन्यासों का जो सिलसिला चल पड़ा है, उसका विस्तार हो रहा है. लेखकों का जीवन भी किस्सागोई में अहम स्थान बना रहा है. इसी का सुपरिणाम है कि हाल ही में रज़ा फाउंडेशन के सहयोग से फणीश्वर नाथ रेणु, नागार्जुन, रघुवीर सहाय और जैनेंद्र कुमार की जीवनियां या कहें जीवनीपरक उपन्यास प्रकाशित हुए हैं. इसी कड़ी में श्याम बिहारी श्यामल का बहु प्रतीक्षित उपन्यास 'कंथा' प्रकाशित हुआ है. प्रसाद हिंदी के छायावादी आंदोलन के प्रमुख कवियों में रहे हैं. हिंदी कविता के स्वर्णयुग के स्तंभ. सुंघनी साहु के रूप में विख्यात इस परिवार में पैदा होकर कारोबारी गणित से दूर होकर जैसा स्वच्छंद साहित्यिक जीवन जिया तथा अनेक कालजयी रचनाएं लिखीं उनके निजी और सार्वजनिक जीवन में ऐसा बहुत कुछ था, जिसे जीवनीपरक उपन्यायस में विन्यस्त किया जा सकता था. पत्रकार श्यामल ने वही किया है. बरसों से बनारस रह रहे श्यामल लगभग दस वर्षों से इस पर कार्यरत थे. पर्याप्त प्रथुलकाय यह उपन्यास ठहर कर पढ़ने योग्य है तथा उस युग की युगीन विशिष्टताओं और विसंगतियों से रूबरू भी कराता है.

इसी क्रम में वाणी प्रकाशन से राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त के जीवन और आत्म संघर्ष पर आधारित कथाकार रजनी गुप्त का उपन्यास 'कि याद जो करें सभी' -राष्ट्रकवि के उजले धुले व्यक्तित्व के पीछे जीवन की तमाम दुश्वारियों से रुबरू कराता है तथा उनके राष्ट्र प्रेम की बारीकियों में हमें ले जाता है. उनका यह कहना उस युग का ही नहीं, एक शाश्वत मानवीय मूल्य‍ बन चुका है कि 'वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे'. और यह भी कि - 'जियो परन्तु इस तरह कि याद जो करें सभी'. मैथिलीशरण गुप्त को याद करना हिंदी कविता के उस स्वर्णयुग को याद करना है जब कविता हमारे जीवन में घुली मिली थी. वह केवल कवियों के वाग्विलास की वस्तु न थी. छात्र, अध्या‍पक, साहित्यकार, राजनीतिज्ञ, गृहस्थ सब ऐसे कवियों में रुचि लेते थे. आजादी के दौर के ये कवि अपने देश से प्यार करते थे. इनके होठों पर भारत माता के जयकारे बेशक कम लेकिन हृदय में देश की अस्मिता के प्रति अटूट प्रेम था. तब साहित्य का वाकई कुछ प्रयोजन होता था. वह आम आदमी के लिए 'असाध्यवीणा' न हुआ था. इसलिए रजनी गुप्त जी का दद्दा पर प्रकाशित जीवनोपन्यास वाणी एवं रज़ा फाउंडेशन के सौजन्य से सामने आया तो देखते ही समझ आ गया कि अरसे से निजी सुख दुख और समाज के राग विराग को किस्सागोई में रचने वाली रजनी गुप्त ने अपनी अस्थिमज्जा  निचोड़ कर यह बड़ा काम किया है; बल्‍कि कहें कि साहित्य पर उपकार किया है. अब तक उन्होंने लिखा तो बहुत पर उसकी खास चर्चा न हुई. मैथिलीशरण गुप्त के जीवन, कार्यकलापों, चिरगांव के उनके रहन सहन, अनुज सियारामशरण जी के जीवन और भातृ प्रेम, बात-व्यवहार, काव्य-रचना, इष्ट-मित्र, सुख- दुख, जेल जीवन, दिल्ली प्रवास एवं जीवन के अंतिम परिच्छेद इत्यादि को ऐसे औपन्यासिक स्वरूप में रजनी ने बांधा है कि इसमें जीवनी का सुख भी है और एक उपन्यास पढ़ने का भी. उस पर जगह-जगह पर मैथिली शरण जी की काव्य पंक्तियों के उद्धरणों से कविता के रस की भी पूर्ण उदभावना संभव हुई है. ऐसे महनीय कवि पर रजनी गुप्त का जीवनोपन्यास वास्तव में एक किस्सागोई की तरह पढ़ा जा सकता है जिसमें जितना तथ्यों का आलोक है उतना ही कल्पना का समावेश.

कृष्णा सोबती जब तक जीवित रहीं, वे कथा-संसार में एक किंवदन्‍ती बनी रहीं, उनके उपन्यास, उनकी कहानियां समाज की बनी बनाई लीक से लोहा लेती रहीं. उनके स्त्री पात्र समाज की पुरातन मान्यताओं को मुंह चिढ़ाते हुए जीवन का अलग रेखा पथ तैयार करते रहे. वे खुद लेखकों पर अपने लिखे 'हम हशमत' की लेखकीय प्रोफाइल के लिए जानी जाती थीं. जिन लेखकों पर उन्होंने लिख दिया, वे धन्य हो उठते थे. एक कथाकार उपन्यासकार की भाषा लेखकों का जीवन और आत्मवृत्त बुनते हुए खुद किस्साहगोई का जाल बुनने लगती थीं. ऐसी शीर्ष कथाकार कृष्णा सोबती के जीवन लेखन और विचारों पर आधारित उपन्यास 'दूसरा जीवन' रज़ा फाउंडेशन की एक अपूर्व निधि है, जो उसने हिंदी संसार को सौंपी है. अपने बिंदास और स्वतंत्र लेखकीय सत्ता का भरपूर उपभोग करने वाली सोबती ने जो जीवन जिया देखा उसे साहस से सामने रखा तथा अंत तक वे सत्ता के किसी प्रलोभन के वशीभूत न हुईं. उनके व्यक्तित्व, जीवन, विवादित मुद्दों और रचना-संसार पर कविवर गिरधर राठी ने बहुत सूझ-बूझ से उनका जीवन चरित लिखने का जतन किया है और शायद पहली बार गिरधर राठी ने जीवन को गल्प की तरह विन्यस्त करने का काम किया है. एक सिद्ध कथाकार पर एक सिद्ध कवि का यह जीवनोपन्यास इस मामले मे काबिलेगौर है कि इससे हम कृष्णा सोबती के जीवन से जुड़े उन सारे पहलुओं को यहां एकाग्र देख पढ सकते हैं, जिनके लिए वे पूरे जीवन भर जानी पहचानी जाती रहीं. यह और बात है जो भाषा में जो बात कृष्णा सोबती के यहां थी, वह गिरधर राठी के यहां नहीं है. वे कवि तो हैं पर एक तार की चासनी वाला गद्य उनके पास नहीं है, तो भी यह पुस्तक एक कहानी की तरह पढ़ी जा सकती है.

नई हिंदी वाले उपन्यास
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कह चुका हूं कि इस साल बहुत कम उल्लेखनीय उपन्यास प्रकाशित हुए हैं तथापि कुछ की चर्चा यहां की जा सकती है.  हिंदयुग्म  की नई चाल की हिंदी की गति इधर तेज हुई है. जब से नीलोत्पल मृणाल की उपन्यासिका 'डार्क हार्स' को हिंद युग्म ने अपने यहां छापा है, नीलोत्पल के लेखन में युवाओं की आस्था बढ़ी है. 2021 में उनका उपन्यास 'यार जादूगर' आया है जो नीलोत्पल के देशज और ठेठ गंवई कस्बाई मिजाज की बिंदास झलक देता है. मैजिक रियलिज्म की नई परिभाषा गढ़ता हुआ यह उपन्यास अनेक धीर-गंभीर दिखने वाले उपन्यासों पर छाया रहा. इधर क्राइम थ्रिलर या अपराध उपन्यास लिखने का सिलसिला भी आगे बढ़ा है. इसी साल वेस्टेलेंड-एका से आया अपराध उपन्या्स 'पिशाच' पूरे साल चर्चा में रहा. एक हाई प्रोफाइल मर्डर की कहानी, तहकीकात में लगी एजेंसियों, उनकी बारीक परतों, हत्या की व्यूह रचना से लेकर निष्कर्ष तक पहुंचने का जो रहस्य रोमांच संजीव पालीवाल ने बुना है, वह उनकी ऐसे ही क्राइम थ्रिलर 'नैना' की राह को लांघ कर लोकप्रियता और पाठकीय कसौटियों पर नए सिरे से कसे जाने की मांग करता है. लेखकीय, पत्रकारीय और प्रकाशन की दुनिया के भीतर की पतन की मनोभूमि को तलाशता हुआ यह उपन्यास पढ़ते हुए ऐसे अपराधों के बारे में तहकीकात के तमाम कुलाबे भिड़ाती हुई मीडिया की तमाम कारगुजारियों की याद ताजा कर देता है. यह इसलिए इतना जीवंत बन पड़ा कि लेखक स्वयं मीडिया संस्थान का एक जाना पहचाना हस्ताक्षर है तथा मीडिया ट्रायल्स के तमाम लूप होल्स का द्रष्टा है. 'पिशाच' की राह पर ही चलते हुए साधना जैन का उपन्यास 'जुहू चौपाटी' हिंद युग्म से आया है जो एक अभिनेत्री की हत्या से जुड़ी किस्सागोई है. अपराध कथा के रूप में ही रणविजय के उपन्यास 'ड्रेगन्स गेम' की चर्चा की जा सकती है जो दक्षिण भारत की राजनीतिक उठापटक के साथ खुफिया कार्रवाइयों का एक ऐसा लोमहर्षक वृत्तांत रचता है जो पूरे समय अपनी किस्सागोई से बांधे रहता है.  अयोध्या विवाद को एक सार्थक निष्कर्ष भले ही मिल गया हो, पर इस देश में हिंदु मुसलमान करने वाली शक्तियों को कभी चैन नहीं मिलेगा. हिंद युग्म से ही आया राकेश कायस्थ का उपन्यास 'रामभक्त रंगबाज' एक मुस्लिम रामभक्त की कहानी है जिसका घर दंगाइयों की जद में आता है तथा लूटपाट की हिंसक घटनाओं के बीच उसकी रामभक्त अकाट्य है पर क्या इस रामभक्त का घर लुटने से बच सकेगा, इस बिन्दु को विस्तार से सहेजता रामभक्त रंगबाज इस विवाद की पृष्ठभूमि का एक नया दृष्टिकोण देता है.

इस साल उषा किरण खान किस्सागोई में छायी रहीं. उनके दो उपन्यास 'रतनारे नयन' और 'पानी पर लकीर' नई किताब प्रकाशन से आए तो उन पर आधारित अनेक मूल्यांकन पुस्तकें भी प्रकाशित हुईं. लेकिन नई किताब से आया प्रदीप सौरभ का उपन्यास 'ब्लाइंड स्ट्रीट' अंधों पर आधारित एक मार्मिक उपन्यास बन पड़ा है तो भावना शेखर ने अपने उपन्यास 'एक सपना लापता' में एक ऐसे पर्वतारोही की संघर्षपूर्ण कहानी लिखी है जो उसके दुस्साहस और संकल्प की भी मिसाल कही जा सकती है. भावनाशेखर की किस्सागोई दिनों दिन निखर रही है. यहां भी उनकी भाषा और किस्सागोई अलग से पहचानी जा सकती है. इस साल आए अन्य उपन्यासों में रुथ वनिता का उपन्यास 'परियों के बीच', सुधाकर अदीब का उपन्यास 'महापथ' और सुनील विक्रम सिंह का उपन्यास 'ताजमहल के आंसू' और रामकठिन सिंह का उपन्यास 'थोड़ा सा खुला आसमान' भी पठनीय उपन्यासों में परिगणित किया जाना चाहिए. 'अथ प्रयाग कथा' जैसा औपन्या‍सिक रिपोर्ताज लिखनेवाले ललित मोहन रयाल का अनामिका पब्लिशर्स से आया उपन्यास 'चाकरी चतुरंग'  किस्सा गोई के गैर पारंपरिक ढांचे में लिखा गया है, किन्तु पढ़ने में एक उपन्यास सा ही सुख देता है. अफसरों और बाबुओं से भरी कार्यालयीन व्यवस्था को रयाल ने जिस शिद्दत से देखा व महसूस किया है उसके वृत्तांत पग पग पर इस कृति में दिखते हैं. इस उपन्यास के शुरू में वे चाणक्य का यह कथन उद्धृत करते हैं कि आकाश में उड़ते हुए पक्षियों की चाल जानी जा सकती है परंतु छिपे दिल सरकारी नौकरों की चाल को जान लेना सर्वथा दुस्साध्य है. इसलिए यदि यह कहा जाय कि प्रशासनिक मशीनरी के उच्च पद पर रहे रयाल ने प्रशासन को अंत:पुर के निवासी की तरह देखा है तो अत्युक्ति न होगी.

शिवना प्रकाशन से आया हरि भटनागर का दूसरा उपन्यास 'दो गज ज़मीन' इस बात को अपने कथ्य में रखता है कि मनुष्यता को बचाने के लिए उच्च कुलीन होना जरूरी नहीं लाला के रूप में एक साधारण इंसान होकर भी जीवन और समाज के लिए मनुष्यता के उच्चादर्श कायम किए जा सकते हैं. छोटे छोटे कामकाजी लोगों की जद्दोजहद को हरि भटनागर बहुत ही कुशलता से सामने लाते हैं. कहा जाए तो हरि भटनागर कहानियों में भी साधारण दृश्यों  घटनाओं और पात्रों के पास जाते हैं और वैसी ही कहानियां बुनने रचने के अभ्यस्त हैं. यहीं से अंजू शर्मा का उपन्यास- 'मन कस्तूरी रे' भी आया है. कहानियों उपन्‍यासों में अपनी अलग पहचान बनाने वाले गोविंद्र मिश्र का नया उपन्‍यास 'हवा में चिराग़'  इस साल अमन प्रकाशन से आया है. कोरोना व्‍याधि से उपजी सोशल डिस्‍टैंसिंग आगे आने वाले दिनों में मानवीय संबंधों को किस तरह मुर्दा और निस्‍संग बना देगी इन आशंकाओं से घिरे जीवन और भविष्‍य को बुनता गुनता एक बेहतरीन उपन्‍यास है यह.

नरेंद्र कोहली मिथकों के पुनर्रचना के लिए विख्यात रहे हैं. महाभारत और रामकथा को ही पुन: लिखने रचने में उनका जीवन बीत गया और आज भी उन्हें पढ़ने वालों की संख्या में कमी नही आई है. राजपाल एंड संस से आया उनका उपन्यास 'सेतु भंजन' इसी कोटि का है जिसमें भारत और श्रीलंका को जोड़ने वाले सेतु की रामकथा को वे एक औपन्यासिक रुप देते हैं. मिथक, फैंटेसी, पुराण और तत्कालीन वैज्ञानिक विजन को उन्होंने किस्सागोई के रसायन में ऐसे बांधा है कि मन खिंचा चला जाता है. उनकी कल्पित पात्र वरुणपुत्री की एक ऐसी रहस्यमयी भूमिका यहां दिखती है जो पूरे कथानक को बांधे रखती है. ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यास 'स्वांग' की इधर चर्चा रही है तो राजकमल पेपरबैक्स से आये विजय सिंह के उपन्यास 'जया गंगा: प्रेम की खोज में एक यात्रा' और राजीव शुक्ल के उपन्यास 'तीन समंदर पार' की भी.

सेतु प्रकाशन से जया जादवानी का उपन्यास 'देह कुठरिया' आया है तो संभावना प्रकाशन ने फ्रेंच साहित्य के अध्येता मदनपाल सिंह का पश्चिमी उप्र के ग्राम्य जीवन पर 'हरामी' उपन्यास प्रकाशित किया है. अरसे से अनुपलब्ध 'वायदा माफ गवाह' का नया संस्करण भी आ गया है जिससे अशोक अग्रवाल को अस्सी के दशक में काफी चर्चा मिली थी. वाणी से नरेंद्र कोहली का 'सुभद्रा' उपन्यास आया है. प्रभा खेतान के दो उपन्यास: 'अपने अपने चेहरे' व 'आओ पेपे घर चलें'--  जो अब तक अनुपलब्ध थे, इसी साल आए हैं. शिवना प्रकाशन से ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित दो उपन्यास 'हरदौल' -वंदना अवस्थी दुबे एवं 'उमेदा: एक योद्धा नर्तकी' - प्रकाशित किया है. भावना प्रकाशन ने अभिधा शर्मा का कैनवास पर 'बिखरे यादों के रंग', शची मिश्रा का 'चाय काफी उर्फ तीसरी दुनिया' व पृथीपाल सिंह का उपन्यास 'पतझड़ बीत गया' प्रकाशित किया है. प्रवासी लेखकों में शिवना प्रकाशन से सुधा ओम ढींगड़ा का उपन्यास 'दृश्य से अदृश्य का सफर' और भावना प्रकाशन से अनिल प्रभाकुमार का उपन्यास 'सितारों में सूराख' प्रवासी लेखन की यात्रा को कुछ और चटख रंग प्रदान करते हैं.

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कहानियों की दुनिया
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हिंदी का कहानी संसार इस साल बहुत उम्दा नहीं रहा तथापि विभिन्न  प्रकाशनों से कहानी संग्रहों की आमद अच्छी रही. शिवना प्रकाशन ने इस साल कई कहानी संग्रह छापे- रज्जो मिस्त्री (प्रज्ञा), कुहासा छँट गया (ममता त्यागी), द-देह, दरद और दिल (विभा रानी), अपनी सी रंग दीन्हीं (सपना भट्ट), कोई खुशबू उदास करती है (नीलिमा शर्मा), गीली पोंक (उषा किरण खान) और शह और मात (मंजुश्री) हैं. हिंद युग्म से दिव्यप्रकाश दुबे का कहानी संग्रह 'आको बाको' व मीराकांत का कहानी संग्रह 'ताले में शहर आया' तो अनीता रश्मि का 'सरई के फूल' और शरद त्रिपाठी का 'नाइंटीज वाला प्यार'. भावना प्रकाशन से 'पापा आर यू ओके' (राजेंद्र राजन), 'वो फोन काल' (वंदना वाजपेयी) दो बेहतरीन कहानी संग्रह आए हैं. राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित कुंदन यादव का संग्रह 'गंड़ासा गुरु की शपथ', राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित अशोक शाह का कथा संग्रह 'अजोर' व सामयिक प्रकाशन से आया सच्चिदानंद जोशी का कथा संग्रह 'पुत्रिकामेष्टि' -इस साल चर्चा में रहा है. एक विशेष कथा संग्रह किताबघर से जाने-माने उपन्यासकार कमलाकांत त्रिपाठी का आया है- -बड़की बहू. बोधि प्रकाशन से द्वारिका प्रसाद अग्रवाल का संग्रह 'तेरी मेरी कहानी है' में भी रोचक कहानियों का संसार दिखता है. हाल ही में शुरू हुए रुद्रादित्य प्रकाशन ने जयश्री राय की नई कहानियों का संग्रह 'निस्संग' का प्रकाशन किया जिसमें उनकी अनेक संवेदनशील एवं मार्मिक कहानियां शामिल की गयी हैं. इसकी निस्संग, दुर्गंध और मां का कमरा कहानियां बहुत ही मार्मिकता से बुनी गयी हैं. प्रभात प्रकाशन से कथाकार उषा यादव का संकलन 'अग्नि राग' भी इसी साल आया. प्रवासी कथाकार तेजेंद्र शर्मा की कहानियों का नया संकलन  'तू चलता चल' -अमन प्रकाशन से आया है. वे इस मायने में प्रवासी लेखकों से अलग हैं कि उनकी कहानियां व्‍यर्थ के नास्‍टैल्‍जिक संसार की परिक्रमा नहीं करतीं बल्‍कि प्रवासी पृष्‍ठभूमि की मार्मिक कहानियों की खोज करती हैं.

कथेतर विधाओं में आई कृतियां
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कथेतर विधाओं का विन्यास आलोचना, आत्मकथा, यात्रा वृत्तांत, डायरी, संस्मरण आदि तक फैला है. लेखन की दुनिया में अब विधाओं की जकड़बंदी टूट रही है.

आलोचना विधा में भले सामान्य़ पाठक रुचि न लेते हों पर हिंदी की शोध और अध्ययन की दुनिया इससे बखूबी वाबस्ता है. आलोचना में इस साल कई महत्वपूर्ण कृतियां आई हैं. राजकमल प्रकाशन समूह से आधुनिक उर्दू कहानी का सफर (शमीम हनफी), नयी पंरपरा की खोज (शिवकुमार यादव); कहानी की अर्थान्वेषी आलोचना (शशिभूषण शीतांशु); दिनकर -पुनर्मूल्यांकन (कुमार निर्मलेंदु); पितृवध (आशुतोष भारद्वाज), सिनेमा और संसार (कुमार साहनी), मध्यंकालीन कविता का पुनर्पाठ (करुणाशंकर उपाध्याय), छायावादोत्तर हिंदी कविता (सुमन जैन), दलित यथार्थ और हिंदी कविता (दीपक कुमार पांडेय), आलोचना का स्त्री पक्ष (सुजाता) जैसी महत्वुपूर्ण कृतियां प्रकाशित हुईं तो वाणी प्रकाशन ने निम्नलिखित कृतियों का प्रकाशन किया : रंगमंच की कहानी (देवेंद्रराज अंकुर), उदय प्रकाश: एक कवि का कथादेश (विनय कुमार मिश्र), रश्मिरथी: एक पुनर्पाठ. यहीं से विष्णु खरे पर एक सुविवेचित आलोचना - 'तुम्हें खोजने का खेल खेलते हुए'--  जिसमें अनौपचारिक आलोचना के गुणसूत्र अधिक हैं, व्योमेश शुक्ल ने लिखी जिसमें खरे के कवि व्यक्तित्व का बहुत ही रोचक अंदाज में मूल्यांकन किया गया है. इसी तरह वरिष्ठ लेखक इंद्रनाथ चौधरी की कृति 'आधुनिक युग नयी आधुनिकता' आधुनिक समय में आधुनिकता के आयामों का एक जायज़ा लेती है. साहित्य की भारतीय परंपरा पर श्रीभगवान सिंह की पुस्तक सामयिक बुक्स से आई तो उन्हीं की एक अन्य पुस्तक 'भारतीय मानस तथा साहित्य', यश पब्लिकेशंस से प्रकाशित हुई. कथा साहित्य का पुनर्पाठ नाम से करुणाशंकर उपाध्यामय की कृति भी यहीं से आई  जो अकादेमिक आलेाचना का ही उत्पाद है.

आलोचना के केंद्र में नामवर
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नामवर सिंह नहीं रहे पर आलोचना के केंद्र में वे आज भी हैं. उन पर केंद्रित अनेक कृतियां इस साल आईं. राजकमल से किताबनामा का संपादन आशीष त्रिपाठी ने किया तो वाणी प्रकाशन की 'नामवर सिंह की दृष्टि में मुक्तिबोध' का संपादन विजय प्रकाश सिंह एवं ए अरविंदाक्षन ने किया है. पर इस पुस्तक में कुल मिलाकर महावीर अग्रवाल अपने सवालों के साथ छाये हैं. नामवर सिंह की 1951-52 के दिनों के डायरी अंशों को उनके पुत्र विजय प्रकाश सिंह ने 'पन्नों पर कुछ दिन' में संजोया है. इसी तरह 'जीवन क्या जिया' में नामवर सिंह का आत्मवृत्त प्रकाशित है. ध्यातव्य है कि नामवर सिंह के मूल ग्रंथों के अलावा पिछले कुछ सालों में आशीष त्रिपाठी ने आलोचना, संवाद इत्या.दि उनके बिखरे- बोले गए भाषणों को सहेज कर संपादित किया है जिससे नामवर सिंह की आलोचना का एक संपूर्ण स्‍वरूप  अपने नीर क्षीर विवेक के साथ दृष्टि गत होता है.

आलोचना के दूसरे स्तंभ अशोक वाजपेयी पर अरुण देव के संपादन में माटी का अंक तो आया ही, संभावना प्रकाशन से 'आजीवन अशोक' और 'दिल से भी गुफ्तगू रहे'-- ये दो कृतियां आईं; साथ ही अर्चना त्रिपाठी ने उपस्थति नाम से अशोक वाजपेयी के लेखन का विवेचन प्रस्तुत किया है. उप्र हिंदी संस्थान से विष्णुकांत शास्त्री पर प्रेमशंकर त्रिपाठी की विवेचनात्मक पुस्तक आई है तो महावीर अग्रवाल ने श्रीप्रकाशन से कथाकार कृष्णा सोबती शीर्षक पुस्तक का प्रकाशन किया है. महावीर अग्रवाल सापेक्ष के संपादक रहे हैं तथा इंटरव्यू के मामले में शायद ही कोई उनसे अग्रणी हो. कृष्णा सोबती से समय समय पर लिए इंटरव्यूज को उन्होंने इस कृति में सहेजा है. कृष्णा सोबती पर ही प्रकाशन विभाग भारत सरकार से राकेश रेणु के संपादन में एक बेहतरीन पुस्तक आई है- सोबती की सोहबत में-- जिसमें कई विद्वान लेखकों के लेख शामिल हैं. मिथक और कुंवर नारायण को लेकर एक गंभीर अध्ययन सुस्मित सौरभ ने किया है जो बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ हे. अशोक वाजपेयी की कविताओं के साथ कोरोना काल की टिप्पणियों को वाणी ने उनकी कृति ''थोडा सा उजाला'' मे सहेजा है. मंगलेश डबराल के मृत्योपरांत दो विशिष्ट  कृतियां सामने आईं. एक उन पर लिखे संस्मरणों की अनुराधा सिंह की किताब पुस्तकनामा से; दूसरी स्वप्निल श्रीवास्तव की किताब: 'ताकि स्मृति बची रहे' आपस प्रकाशन से. इसी तरह विष्णु खरे पर अंशु कुमार चौधरी और शुभ्रा शर्मा के संपादन में 'विष्‍णु खरे: विलाप का आलाप' शीर्षक से आई पुस्तक गंभीरता से कवियों का याद करने का एक नायाब उदाहरण है. कला विवेचन के क्षेत्र में आलोचना के अभाव की पूर्ति की दिशा में दो विशेष कृतियां इस साल आईं. दोनों अपने गंभीर अध्ययन के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं: एक सैयद हैदर रज़ा पर यशोधरा डालमिया की कृति: 'सैयद हैदर रज़ा: एक अप्रतिम कलाकार की यात्रा' और दूसरी गुलाम मोहम्महद शेख की- 'निरखे वही नज़र'. लगभग छह दशकों तक के कला अनुभव के स्वामी गुलाम मोहम्मद शेख भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय कला आंदोलनों को गहराई से समझने और विवेचित करने वाले विरल कला इतिहासज्ञ हैं. अपनी मातृभाषा में कला के अध्ययन अध्यापन के लिए उत्सुक गुलाम मोहम्मद शेख को यह बात खलती है कि गुजरात में कला की कोई आधुनिक समझ विकसित करने का विशेष प्रयास नहीं हुआ. कला के बारे में गुजराती या हिंदी में ही लिखने में भाषाई व पारिभाषिकी संबंधी जो समस्याएं आती हैं वे छोटी नहीं हैं. कला को व्याख्यायित करने या उसे इतिहासबद्ध करने का काम अंग्रेजी में निपुणता से हुआ है. वे समय समय पर अपने समय के जर्नल्स में जो कुछ लिखते रहे हैं उसका एक चयन मित्रों कलाप्रेमियों के सहयोग से तैयार हुआ: 'निरखे वही नज़र'  जिसका खूबसूरत प्रकाशन रज़ा न्यास और राजकमल के सहयोग से संभव हुआ है. रज़ा पर आया अखिलेश का वृत्तांत 'रज़ा: जैसा मैने देखा' भी रजा को समझने का एक बेहतरीन प्रयास है. इसी सिलसिले में राजकमल से आई 'गीज़र्स'- रजा और उनके अन्य कलाकार मित्रों के बीच के पत्राचार का संकलन है जिससे उस दौर के संवाद और कला गतिविधियो को समझने में मदद मिलती है.

अमीर खुसरों की पहेलियां ही नहीं, वे खुद हिंदी वालों के लिए एक पहेली की तरह रहे हैं. उन्हे सुलझाने के प्रयत्न  समय समय पर होते रहे हैं. इस साल एक ऐसा ही प्रयत्न गोपीचंद नारंग ने किया है अपनी कृति: 'अमीर खुसरो: हिंदवी लोक काव्य संकलन' में. गोपीचंद नारंग जी की ही एक अन्य महत्वपूर्ण पुस्तक गालिब को लेकर साहित्य अकादेमी से आई है: 'गालिब: अर्थवत्ता, रचनात्मकता एवं शून्यता.' पीवी कोटमे की पुस्तक 'गांधी जी: महात्मा बनने की प्रेरणा' गांधी को लेकर एक गंभीर पुस्तक है जो किताबघर प्रकाशन से आई है. मीडिया और पत्रकारिता पर लगातार लिखने वाले कृपाशंकर चौबे की पुस्तक 'राष्ट्र निर्माताओं की पत्रकारिता' पत्रकारिता के छात्रों के लिए पठनीय पुस्तक बन पड़ी है. डीएनए पुरातत्‍व और वैदिक संस्‍कृति पर दिव्‍येंदु त्रिपाठी की पुस्‍तक और सुमन सिंह की भारतेतर हिंदी साहित्‍यकार पर सर्वभाषा ट्रस्‍ट से प्रकाशित पुस्‍तकें अत्‍यंत पाठकोपयोगी हैं तथा हिंदी के सामर्थ्‍य का परिचायक भी.

स्त्री विमर्श पर निवेदिता मेनन की पुस्तक 'नारीवादी निगाह से' इस साल चर्चा में रही तो स्त्री विमर्श पर सुजाता की आलोचनात्मक कृति भी गंभीरता से किया गया स्त्री-अध्ययन है. स्त्री विमर्श पर कुछ अन्य कृतियां भी ध्यातव्य रहीं - जिनमें- बेड़ियां तोड़ती स्त्री- अरविंद जैन कानूनी पहलुओं की दृष्टि से ध्यातव्य है.

संस्मरण विधा में इस साल ममता कालिया की पुस्तक 'जीते जी इलाहाबाद' खासा पसंद की गयी. इससे पूर्व 'रविकथा' को भी पाठकों ने बेहद पसंद किया था. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की समय की स्मृति में उनके नवीनतम संस्मरण दर्ज हैं.  वरिष्ठ लेखक रामदरश मिश्र की सुरभित स्मृतियां पुस्तक हंस प्रकाशन से आई तो आपस प्रकाशन से आई स्वप्निल श्रीवास्तव की कृति 'लेखक की अमरता'  ऐसी ही स्मृतियों का संकलन है. साहिर में दिलचस्पी  रखने वाले पाठकों के लिए वाणी प्रकाशन से आई सुरिन्दर देओल की पुस्तक: 'हर पल का शायर'- इस साल खासा चर्चा में रही है तो प्रभात प्रकाशन से आई शोमैन राजकपूर (रितु नंदा) पुस्तक आम पाठकों में खूब पसंद की जाने वाली पुस्तक सिद्ध हुई. गुलशन ग्रोवर की प्रभात प्रकाशन से आई पुस्तक 'बैडमैन: एक आत्मकथा' भी -गुलशन ग्रोवर की जिन्द‍गी में झांकने वालों को पसंद आएगी. यात्रा वृत्तांत की भी कई पुस्तकें इस साल आईं. डॉ हरिओम का यात्रा वृत्तांत 'कैलास मानसरोवर यात्रा' अंतिका प्रकाशन से आया तो संभावना प्रकाशन ने 'कथा कहो यायावर' जैसी देवेंद्र मेवाड़ी की पुस्तक छापी जो अपनी दूरस्थ अनुभवबहुल यात्राओं में हमें साथ ले जाती है. हरिओम पटु कवि कथाकार व रिपोर्ताजकार हैं. कैलास मानसरोवर का उनका यह वृत्तांत उनकी गजलों की तरह ही मोहक अदायगी से भरा है. व्यंग्य विधा में नाम तो बहुतेरे हैं पर ज्ञान चतुर्वेदी का जवाब नहीं. राजपाल एंड संस से आई उनके व्यंग्य का संकलन 'नेपथ्य‍ लीला' निस्संदेह रुचि लेकर पढी जाने वाली किताब है. डायरी विधा में लीलाधर मंडलोई की विशेष सक्रियता रही है. इस साल उनकी डायरी का संग्रह 'ईश्वर कहीं नहीं' सूर्य प्रकाशन मंदिर बीकानेर से आया है. मंडलोई की डायरी अमूर्तन से अपने आसपास के दृश्य को पकड़ती है तथा कुदरत के साथ एक अटूट संवाद करती है. उनकी डायरी में तिथियां नहीं होतीं केवल अहसास होते हैं जो तिथियों के मोहताज नहीं होते. इस डायरी में उनका कवि रूप भी अक्सर खिलखिलाता हुआ दिख जाता है तब लगता है यहां मंडलोई जी डायरी नहीं, कविता लिख रहे हैं. साहित्‍य अकादमी से कैलाश वाजपेयी पर विनिबंध (ओम निश्‍चल) का प्रकाशन किया गया जो कि अपने समय के बहुत महत्‍वपूर्ण कवि थे और यह संभवत: उन पर पहली आलोचनात्‍मक कृति है.

इस तरह कथा और कथेतर विधाओं में जितना कुछ कोरोना काल के बावजूद आया है वह कम नहीं है. केवल परिमाण में ही नहीं बल्कि स्तरीयता की दृष्टि से भी यह कमतर नहीं है. मुश्किल यही है कि गुण न हेरानो गुणगाहक हेरानो है. ऐसे में शंभुनाथ सिंह का एक पद याद आता है:
लिखने को हैं चुनौतियां कितनी
कहने को हैं कहानियां कितनी
सुनने वाला ही नहीं कोई है
पास किसके हैं छुट्टियां इतनी.

बावजूद इस सचाई के कथा व कथेतर का यह परिदृश्य निराश करने वाला नहीं है.
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

 

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