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कविता: 2021- रचनात्मकता के जादुई आकर्षणों से भरे कवि और उनके संकलन

कविता के पाठक अन्य विधाओं से बहुत कम होते हैं फिर भी यह विधा सारी विधाओं पर हमेशा भारी रहती है. 2021 में कोरोना के संकट के कारण छपाई प्रकाशन इत्यादि के काम में एक तरह की मंदी जरूर छायी रही फिर भी साल के मध्य और आखिर तक सैकड़ों कविता संग्रह बाजार में आ चुके हैं.

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2021 में हिंदी काव्य-जगत को समृद्ध करने वाले संकलन 2021 में हिंदी काव्य-जगत को समृद्ध करने वाले संकलन

कविता के पाठक अन्य विधाओं से बहुत कम होते हैं फिर भी यह विधा सारी विधाओं पर हमेशा भारी रहती है. कविता जीवन समाज दर्शन और मानवीय चिंतन को जिस तरह अपनी लघु काया में विन्यस्त करती है उसके लिए आख्यान का एक बड़ा व्यूह रचना होता है. 2021 में कोरोना के संकट के कारण छपाई प्रकाशन इत्यादि के काम में एक तरह की मंदी जरूर छायी रही फिर भी कविता का काम रूका नहीं. भले ही वरिष्ठ कवियों के बहुत कम संकलन आए हों या कुछ कम महत्त्वपूर्ण पर युवा कवियों की बहार छायी रही. पिछले वर्ष विश्व पुस्तक मेले का आयोजन स्थगित रहा इसलिए पुस्तकें अपेक्षाकृत कम प्रकाशित हुईं, पर इस साल की शुरुआत से ही अनेक संग्रहों ने दस्तक दी तथा साल 21 के मध्य और आखिर तक सैकड़ों कविता संग्रह बाजार में आ चुके थे.

कविता के वरिष्ठ नागरिक
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पहले बड़े कवियों के संग्रहों का जायज़ा लेते हैं. अशोक वाजपेयी का संग्रह 'थोड़ा-सा उजाला' कोरोना काल के संकटों पर आधारित कविताओं और कभी-कभार की टिप्पणियों का मिला-जुला संग्रह है जिसमें उनका क्रिटिकल अंदाजेबयां देखा जा सकता है. ऐसे अश्लीलता-भरे समय में जब आजादी के अमृत महोत्सव की दुंदुभि मच रही है, काशी की रंगशाला में रोशनियां जगमग हैं. न मरे हुओं का शोक है न डरे और बचे हुओं का कोई शाश्‍वत उपचार. लिहाजा एक तरह की राजनीतिक निर्लज्जता हर तरफ पसरी है. एक कवि ऐसे में 'अंधेरे में' जैसी कविताएं न लिखे तो क्या करे. वह सत्ता की उत्सवता के पीछे का आर्तनाद सुनता है कि इस दुंदुभि में कैसी-कैसी आवाजें अनसुनी की जा रही हैं और इस उत्सवता पर प्रश्नचिह्न लगाने वाला संशय के घेरे में होता है. कोरोना के एकांत में कवियों की सक्रियता अपनी तरह से रही है; इधर अनेक संग्रह आए हैं, अनेक बन रहे हैं. स्वातंत्र्योत्तर व साठोत्तर की तरह ही अब कोरोनोत्तर जैसे पद एक विभाजक रेखा की तरह इस्तेमाल किए जा रहे हैं. इस कोरोनोत्तर दौर की कविताओं और टिप्पणियों में अशोक वाजपेयी की कविताएं भी शुमार की जाएंगी जो उनके हाल ही प्रकाशित संग्रह 'थोड़ा-सा उजाला' में संग्रहीत हैं.

इस अंधेरे समय में जब उजाले का सबसे ज्यादा गान हो रहा है- आस्था और भक्ति के कांधे पर अभी भी जड़ीभूत आसक्ति सिर टिकाए हुए है, अशोक वाजपेयी की ये कविताएं इस संकट को अपनी तरह से मूर्त करती हैं. उनकी कविता के अंश-
नि:शब्द प्रार्थनाओं की चिथड़ा हो गयी चिन्दियां
फहरा रही हैं-
दहलीज़ पर इतिहास
भुला दी गयीं घिसी चप्पलों सा रखा हुआ है
कोई पुरखा पुकारता है:
आंगन में कोई सिसकता है मुँह अँधेरे.
             (समय एक ढहता हुआ मंदिर है. अशोक वाजपेयी)
नेपाल के रायल कवि बसंत चौधरी का संग्रह 'अनेक पल और मैं' बहुत सजधज के साथ प्रकाशित हुआ है जिसमें कवि की गहरी अनुरागमयी संवेदना दिखती है. राजेश जोशी का संग्रह 'उल्लंघन' इस मायने में महत्त्वपूर्ण है कि उनमें प्रतिरोध की आंच है. वे मानते ही हैं कि उल्लंघन तो कवि का स्वभाव है. कवि होना अपने आप में प्रतिपक्ष में होना है, राजेश जोशी इस संग्रह की कविताओं में यह सिद्ध करते हैं. प्रगतिशील कवियों में समय को लेकर जो एक साफगोई है, अपनी अभिव्यक्ति को लेकर खतरे उठाने का जोखिम है, व्यवस्था द्वारा पहचान लिए जाने के खतरे हैं- उन सबसे रूबरू होते हुए वे उस हर आदत का उल्लंघन करने को तैयार दिखते हैं जिसे व्यवस्था ने अपने हित के लिए एक स्थायी स्वभाव में बदलने का काम किया है. राजनीतिक आर्थिक संकट और महामारी से गुजरते इस निर्मम समय में कविता की ओर जब जब हम लौटते हैं, वही है जो अपना दरवाजा खोल कर सबसे पहले आदमी का कुशल क्षेम पूछती है. पूछती है सब कुशल तो है- कविता में और समाज में भी? बहुत वर्षों से लीलाधर जगूड़ी का पहला संग्रह 'शंखमुखी शिखरों पर' उपलब्ध न था जिसे लगभग 55 वर्षों बाद उनकी लंबी भूमिका के साथ पुनर्प्रकाशित कर संभावना प्रकाशन ने बड़ा काम किया है. इससे शुरुआती दौर के जगूड़ी के कविता विकास को यहां लक्ष्य किया जा सकता है. जगूड़ी इस संग्रह में अपने कवि होने के आत्मसंघर्ष का किस्सा मार्मिक तरीके से बयान करते हैं कि कैसे वे तालीम के लिए राजस्थान और बनारस भटकते रहे, किन-किन कवियों से मिले, भूमिका लिखाने के लिए निराला, पंत और महादेवी के घरों के चक्कर लगाए, कैसे शंभुनाथ सिंह, बच्चन सिंह और शिवप्रसाद सिंह से मिलने के बाद इस कवि का कायाकल्प हुआ, यह जानने के लिए यह संग्रह पढ़ना जरूरी है. इसी संग्रह में उनकी नये की प्रतीक्षा कविता, कविता में नये के आवाहन का एक ऐसा प्रस्थान बिन्दु है जहां से जगूड़ी अब तक मौलिक उदभावनाओं के कवि बने हुए हैं. इसी तरह वरिष्ठ कवि कृष्ण कल्पित के पिछले तीन अनुपलब्ध संग्रहों 'बढ़ई का बेटा', 'बजता हुआ इकतारा' और 'एक शराबी की सूक्तियां' को मिला कर 'वापस जाने वाली रेलगाड़ी' शीर्षक संग्रह भी संभावना ने प्रकाशित किया है. कोरोना से गुजरे वरिष्ठ कवि नरेंद्र मोहन का आखिरी संग्रह 'किरदार निभाते हुए भी' संभावना ने छापा है. इस संग्रह की पहली ही कविता 'कविता मुझे बचा लो' - बहुत ही बेचैन कर देने वाली कविता है जिससे उनके भीतर की रचनात्मक जिजीविषा का परिचय मिलता है. वे हिंदी के ही एक सजग अध्येता आलोचक गुरचरण सिंह के अनन्य मित्र थे- आसपास रिहाइश भी थी. कितना दुर्योग की दोनों लेखक लगभग कुछ दिनों के अंतराल पर विदा हुए. अकसर कुछ तो बचा रह जाएगा, बचा रहेगा प्रेम वगैरह बहुत बहुत दुहराई जाने वाली पंक्तियों पदावलियों के हम अभ्यस्त हो चुके हैं. कुछ नयापन नए संग्रहों में भी कम मिलता है पर यह कविता कुछ अलग है- 'कविता भी बचा सकती है, बेचैनियां जगा सकती है' इसे यह कवि बताता है अपनी अंतिम यात्रा पर निकलने से पहले. देखिए, इस कविता के कुछ अंश-

कविता मुझे बचा लो
मेरे भीतर अपनी बेचैनियां भर दो.

झूठ बोलने में बकबक में माहिर हो चुका हूं
वाक् छल में अव्वल
जोखिम के अंदेशे-भर से घबराने लगा हूं
एक अंधेरे से दूसरे में जाते हुए लानत मलामत हुई इस तरह की
सच से दूर जा पड़ा हूं
सच की चौखट तक उजाले में ले आओ
कविता मुझे बचा लो.
***
शब्द के कुएं में झांकता था दूर तक
उड़ता था अनन्त में
उतरता था शब्द‍ संग समुद्र में
चमकीला वह शब्द नाद अब कहां संभव
सनसनाती पत्तियों में एक खंजर और चीत्कारों का
भयावह सिलसिला यहां से वहां पता नहीं कहां कहां
कंपकपाती रूह
कल्पना काठ
कविता मुझे बचा लो
मेरे भीतर अपनी बेचैनियां भर दो. (किरदार निभाते हुए. नरेंद्र मोहन)

इसकी अनेक कविताओं से गुजरते हुए लगता है वे मृत्यु की आती हुई पदचाप भांप चुके थे. पर मृत्यु से मुठभेड़ का मन भी बना चुके थे. वे जैसे कह रहे थे- मृत्यु से मुझे डर नहीं है/ वह आए और मुझे उड़ा ले जाए/ मैं उसकी आंखों में देखता रहूं/ जैसे मैं देखता हूं तुम्हा‍री आंखों में. (खाली भरा) नरेंद्र मोहन के आखिरी दिनों के कवि मन को समझने के लिए यह संग्रह जरूरी है जैसे कुंवर नारायण के उत्तरजीवन के कवि मन को समझने के लिए उनका आखिरी संग्रह -सब इतना असमाप्त. वरिष्ठता की पायदान पर अब विमल कुमार, निलय उपाध्याय भी आते हैं जिनके संग्रह इसी साल आपस पब्लिशर्स अयोध्या से प्रकाशित हुए हैं. 'मृत्यु की परिभाषा बदल दो' विमल कुमार की काव्यकृति है जिसे पढ़ते हुए उनके नाराज़ तेवर को बहुत निकट से जाना समझा जा सकता है. एक पत्रकार के आलोचकीय तेवर और एक कवि होने के दायित्व से बंधे विमल कुमार की इन कविताओं में कहीं ठहराव है तो कहीं हड़बड़ी भी जो उनके जाने पहचाने कवि-मिजाज का परिचायक है. यायावरी को अपने स्वभाव में अपनाए निलय उपाध्याय लोकमन की कविताओं के लिए जाने जाते हैं. अपने संग्रह 'दहन राग' में वे चावल की गंध के लुप्त हो जाने से चिंतित दिखते हैं जब कहते हैं-
होड़ में लगी रही कतरनी
लड़ती रही जंग कतरनी देने वाली
गरम हो गया माटी का मिजाज
पानी पगला कर बीमार पड़ गया
खाद खाकर बीज उगे, फसल लगी
गंध मर गई. (दहन राग. निलय उपाध्याय)

अनूप अशेष का संग्रह 'कोहरा टंगा-सा क्यों है' के साथ उनका गीत चयन 'लोक के देश का स्थायी पता' आया है. एक दौर के चर्चित नवगीतकार अनूप अशेष गीत और छंद की अनेक विधाओं में महारत रखते हैं- उनके गीत समाज की मनोभूमि के गहरे उद्गाता है, इसमें संदेह नहीं. वरिष्ठ कवि बालस्वरूप राही ने जैसे जीवन ही ग़ज़लों के लिए समर्पित कर दिया. 'चलो फिर कभी सही' -संग्रह में उनकी ग़ज़लों का तेवर देखते ही बनता है. रमेशचंद्र शाह का संग्रह 'बंधु थे पड़ाव सभी' शीर्षक से नरेश मेहता के शीर्षक यह पथ बंधु था- की याद दिलाता है. 'कल्पना' के दिनों में अधिकतर प्रकाशित ये कविताएं भले ही आज की कविता के दौर में वैसा प्रभाव न छोड पाएं पर शाह की कविताई के बुनियादी स्वाभाव से तो अवगत कराती ही हैं. पेशे से इंजीनियर राजेश जैन के संग्रह 'परमाणु अगर परिंदे होते'- में विज्ञान प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण आधारित कविताएं हैं. हिंदी एवं विश्व कविता का यंत्र राग कहने वाले जैन की ये कविताएं हिंदी में नए आस्वाद का परिचायक तो हैं जैसे एक समय मदन वात्स्यायन की कविताएं पर इंजीनियरिंग की संवेदना का जो मंद-मंद प्रवाह बिम्ब और रूपक में ढल कर नरेश सक्सेना के यहां आता है, वैसा स्पर्श इन कविताओं में नहीं है.

अरसे तक अफ्रीका के बोत्सवाना में रही मीना सिंह के दो संग्रह इसी साल आए हैं. पहला, 'काली कविताएं: दक्षिणी भूखंड और मैं' शीर्षक से; दूसरा, 'अशुभ वेला की शुभ कविताएं'. साहित्य में ब्लैक ऐस्थेटिक्स पर ज्यादा काम नहीं हुआ है पर अफ्रीकी कविता, नीग्रो कविताओं और दलित व आदिवासी चेतना की कविताओं को इस कसौटी पर रख कर देखा जाना चाहिए. काली कविताएं अफ्रीका की स्त्रियों के हालात के निर्मम उदघाटन से भरी हैं कि कैसे वे यौनशोषित और रंगभेद का शिकार रही हैं. कोरोना के प्रभाव में रचित 'अशुभ वेला की शुभ कविताएं' में- मीना सिंह के कवित्व का रंग गाढ़ा नज़र आता है. यथार्थ को वे बहुत गहरे उतर कर सामने लाती हैं. उक्त संग्रहों के अलावा 'दुनिया के बाजार में' -जयप्रकाश कर्दम, 'पृथ्वी आकाश' -उदभ्रांत, 'मीठे पानी की मटकियां' -ज्योति कृष्ण वर्मा, 'पैदल इंडिया' -देवेंद्र आर्य और 'शब्दों का देश' -राकेश मिश्र, 'जब बोलना जरूरी हो' -अशोक शाह और 'हत्यारे फिर आएंगे' -असंगघोष के संग्रह भी अपने वक्त की संवेदना और यथार्थ को व्यक्त करते हैं.  विनोद पदरज का हाल में आया संग्रह 'आवाज अलग अलग है' सचमुच जैसे ढाणियों की महक से भरा दिखता है. अपने पिछले संग्रह देस के ही समतुल्य अर्थ की मार्मिकता से भरी पदरज की कविताएं हिंदी की मुख्य धारा के कवियों के मध्य ध्यानाकर्षण का केंद्र हैं. राजस्थान के ही कवि कलाविद अशोक आत्रेय का संग्रह 'बहुत कुछ बिखरा हुआ' मौसम बुक्स से प्रकाशित हुआ है जिसमें उनकी अब तक की चुनिंदा कविताएं संग्रहीत हैं.

युवा कवियों के अंदाजेबयां
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युवा कवियों में अधिकांश के बेहतरीन संग्रह इस साल आए हैं. अमिताभ चौधरी, बाबुषा कोहली, हरेप्रकाश उपाध्याय, विशाखा मुलमुले, स्मिता सिन्हा, यतीश कुमार, नीलोत्पल, अनामिका अनु, सौम्य मालवीय, अनुज लुगुन, मानव कौल और पूनम वासम सभी के संग्रहों में वह बात है जो उन्हें एक उत्तरदायी कवि के रूप में सामने लाती है.

अमिताभ चौधरी राजस्थान के सक्रिय युवा कवियों में हैं. अपने स्थापत्य में शमशेर की सी भाव भंगिमा का अहसास कराने वाले अमिताभ की कविताएं उसके अपने अंदाजेबयां में प्रतिबिम्बित होती हैं. हर कविता क्लोज आब्जर्वेशन्स  से भरी हुई. उनके पहले संग्रह 'अर्थात्' की एक ऐसी ही एक कविता देख कर अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि यह कवि किस हद तक अपने फ़न का उस्ताद है --
जाओ!
मेरी कठोरता से दूर जाओ!
तापे गए लौह पर
हुँफ हुँफ हथोड़े की चोटों के निकट

मेरे भय का शीलभंग हुआ है.
मैं अपने से इतना संगठित हो गया हूं

कि बहुत बरसातों के लिए
मुझे खुले में छोड़ जाओ!
जाओ!  (अर्थात्. अमिताभ चौधरी)

युवा कवियों में सबसे मोहक पहचान रखने वाले मानव कौल जैसे कवि-अभिनेता भी हमारे बीच हैं जिनके कई कथा संग्रह आ चुके हैं. उनकी कविताओं का संग्रह 'कर्ता ने कर्म से'- हिंद युग्म के अन्य  दो चर्चित संग्रहों 'तट से नहीं, पानी से बंधती है नाव' -बाबुषा कोहली और 'घर एक नामुमकिन जगह है' -सौम्‍य मालवीय  की ही तरह इस साल चर्चा में रहेगा इसमें संशय नहीं. विनोद कुमार शुक्ल की कथा-शैली के मुरीद मानव कौल की इन कविताओं में भी मानवमन की बारीकियां दृष्टिगत होती हैं.  
युवा कवियों में गौरव पांडेय का भी पहला संग्रह 'धरती भी एक चिड़िया है'- साहित्य अकादेमी से आया है. इस कवि को पढ़ कर लगता है कि कवि पंरपरा से सीख लेने वाला कवि है यह. कवियों के सरोकारों में अरसे से कुदरत का कोई न कोई उपादान होता है. गौरव ने धरती को उपादान बनाया है और संग्रह को गंवई गंध से ओतप्रोत भी बनाया है. एक तरह की पारिवारिकता का बोध भी यहां है. औसत से बहुत ऊपर जा कर कविता को पूरी अंत:वेदना से महसूस करना और स्त्रियों, लड़कियों, मां-पिता, बच्चों, पत्नी, बहन, बेटे, पेड़, किसान-मजदूर को कविता के केंद्र में रखना एक प्रखर कवि के प्रारंभिक लक्षण हैं जिसकी बानगी 'एक निवाला उठाओ तो धन्यवाद करो'- कविता में देखी जा सकती है. इसी पीढ़ी के सौम्य मालवीय का पहला संग्रह भी उनकी अथक रचनात्मक जिजीविषा और निर्बल के प्रति पक्षधरता का प्रमाण है. घर एक नामुमकिन जगह है- बाजार की शर्तों के प्रतिकूल रची गयी कविताओं का संग्रह है जो एक तरफ अपने मंतव्य में राजनीतिक हैं तो दूसरी तरफ भाषा के ब्राह्मणों के लिए चुनौती फेंकती हुई.

अनामिका अनु पेशे से वैज्ञानिक लेकिन सुदूर केरल में कविताओें का एक नया विन्यास रच रही हैं. इस साल के आखिर में वाणी-रज़ा फाउंडशेन से आया उनका संग्रह 'इंजीकरी' उनके सधे हुए पहले कदम की गवाही देता है. 'इंजीकरी' जिस तरह एक ऐसी करी है जिसमें सैकड़ों रेसिपीज का स्वाद है, उसे एक रूपक में ढाल कर जैसे कवयित्री कह रही हो कि इस संग्रह में मेरे कवि व्यक्तित्व का पूरा सत्व समाया हुआ है तमाम आस्वादों को अपने में सहेजे हुए. यों तो अनेक कविताएं अपने अनूठेपन से मोहती हैं पर कवयित्री को पहचानने में उसी की कविता- लड़कियां जो दुर्ग होती हैं- एक विधायक तत्व की तरह है-
वे न परंपरा ढोती हैं न त्योहार
वे ढूढ़ती हैं विचार
वे न रीति सोचती हैं
न रिवाज़
वे सोचती हैं आज
नयी तारीख लिखती
इन लड़कियों की हर यात्रा तीर्थ है (इंजीकरी. अनामिका अनु)

नीलोत्पल का संग्रह 'समय के बाहर सिर्फ पतझर है'- उनकी परिपक्वता के आयाम लिए हुए हैं. अनाज पकने का समय- उनका पहला संग्रह था जहां से इस संग्रह तक एक लंबी साधना उन्होंने की है. यों तो उनकी अनेक कविताओं में एक ठहराव का आकर्षण है पर बारिश अंतराल में गिरती है- की आखिरी पंक्तियां उनके अंदाजेबयां का एक उदाहरण हैं-
सिर्फ बारिश अंतराल में गिरती है
पतझड़ की भूरी आंखें देखती हैं स्वप्न
सुनसान किसी टीले पर गिरते हैं अनंत तारे
यकीनन मृत्यु चुनती है जीवन के अनेक रंगों में से एक रंग
वह रंग पूर्णता का है (समय के बाहर सिर्फ पतझर है. नीलोत्पल)  
अनुज लुगुन आदिवासी संवेदना की ताजगी के साथ सामने आए थे. अघोषित उलगुलान से चर्चित अनुज ने आदिवासी जीवन की दुश्वारियों को जिस बेधक अंदाज में सामने रखा उसने उन्हें खासा चर्चा दी. किन्तु इस कवि में राजनीतिक चेतना की चिन्गारियां भी खूब हैं जो उसके संग्रह 'पत्थलगढ़ी' में उद्घाटित हुई हैं. जीवन समाज असमानता और सामाजिक न्याय के मोर्चे के साथ साथ अब उनकी कविता भीमा कोरेगांव के इतिहास से जूझती हुई दिखती है तथा अपनी सच्ची नागरिकता का प्रमाण चाहती है:
मुझे मेरी नागरिकता दे दो
मुझे मेरी अस्मिता दे दो
मानचित्र की उलझी रेखाओं में नहीं
आदमी होने की भाषा में मुझे नागरिकता दे दो. (पत्थलगड़ी. अनुज लुगुन)
साधारण अभिधा में किन्तु चोट करती हुई भाषा के कारण अनुज की बेबाकी साहसिक और कहीं-कहीं दुस्साहसिक भी दिखती है.

पहले संग्रह के लगभग दस साल बाद आए हरेप्रकाश उपाध्याय का संगह 'नया रास्ता' भी कविता में व्यंजना और व्यंग्य का नया रास्ता तैयार करता है. संग्रह की पहली ही कविता अब यह देश की पहली तीन पंक्तियां इस देश के हालात की बेबाकबयानी कही जा सकती हैं-
अब यह देश
एक ऐसा अंधा कुआं है
जिसमें जब भी झांकिए
किसी किसान की लाश तैरती हुई मिलती है.
यह अति यथार्थ हो सकता है पर कवि का काम अब केवल यथार्थ से नहीं चलता, यथार्थ का उद्भेदन करने वाले अतियथार्थ से चलता है. इस संग्रह की कई कविताएं सामाजिक न्याय की तुला पर देश को तौलती तथा लानत भेजती नजर आती हैं. 'प्रेम गिलहरी दिल अखरोट'- की सीधी सादी किन्त बांकी चितवन से निहारती कविताओं से जानी पहचानी गयी. बाबुषा कोहली में शब्दों का ऐसा संसार मिलता है जो नए-नए अर्थों के अंत:जगत में ले जाता है. उसके पास एक सूफियाना लहज़ा है तो अपनी वक्रताओं और उक्ति वैचित्र्य से चमत्कृत कर देने की सिफत भी. बीच में बाबुषा ने गद्य के प्रशस्त ललाट को भी शिद्दत से चूमा पर बीच-बीच में वे ऐसी कविताएं लिखती रहीं जो पढ़ने वालों को कविता का पारंपरिक स्वाद भी मुहैया कराए. यों तो उसका हर कथन किसी कविता किसी चिंतन किसी लक्ष्यार्थ का उदभावक है, उसका यह कहना ही उसे कवित्व की आभा और पाठकों को आश्वस्ति  के भाव से भर देता है:
ऋतुएं बदल रहीं एक अकंप प्रार्थना में
दिन-ब-दिन मैं हो रही हूं पृथ्वी.
बाबुषा अभी युवा हैं पर वे धीरे-धीरे कविता के एक कल्ट में बदल रही हैं. उसे उसके ही अंदाजेबयां में पहचाना जा सकता है जैसे-
तुम्हें औषध मिले, पीर न मिले
दृष्टि मिले, दृश्य न मिले
नींदें मिलें स्वप्न  न मिलें
गीत मिलें धुन न मिले
नाव मिले नदी न मिले
प्रिय.
तुम पर प्रेम के हजार कोड़े बरसें
तुम्हारी पीठ पर एक नीला निशान तक न मिले.
***
जो पुरुष मेरे प्रेम में पड़े उनके शहरों में नदियां थीं
जो पुरुष मेरे द्वार की चौखट छू कर लौट गए
वे नदियों के प्रेम में पड़े
जो पुरुष नदी किनारे मेरे संग बैठे
वे जान गए
कि तट से नहीं
पानी से बंधती है नाव.
                  (तट से नहीं.. पानी से बँधती है ना. बाबुषा कोहली)
युवाओं के बीच विशाखा मुलमुले के संग्रह में भी एक अपूर्व ताजगी है. 'पानी का पुल जिस नाम से' उनका यह संग्रह आया है. इस शीर्षक कविता से ही हम जान सकते हैं कि वे कविता में अभी तक कितने गहरे उतर पायी हैं- मैं तुम्हें आब से चीन्हती हूं/ तुम मुझे करुणा से/ दोआब पर बैठे हम शांत समय में/ संगम पर पांव पखारते हैं. ....रक्त संबंध से नहीं जुडे हम/ पानी का पुल है हमारे मध्य/ और दो अनुरागी साध लेते हैं/ पानी पर चलने की सबसे सरलतम कला. (पानी का पुल) सेतु प्रकाशन से आया 'बोलो न दरवेश' -स्मिता सिन्हा का पहला संग्रह है पर पहलौठी के इस संग्रह में बहुत सादगी है बहते हुए पानी की तरह भाषा है और कवि मन बावरा सा जो दरवेश को संबोधित करते हुए खुद ही दरवेश-सा हुआ जाता है. भाषा और शिल्प की बहुत ऊंची उड़ान तो नहीं, पर कवि होने की आश्वस्ति  से यह संग्रह हमें भरता है, इसमें संदेह नहीं. राजकिशोर राजन के संग्रह 'जीवन जिस धरती का'- में भी एक ऐसी आश्वस्तिदायी कौंध है मार्मिक अभिव्यंजना की जो कवि के गंवई और कस्बाई मन की अतल गहराइयों में ले जाती हैं. पूनम वासम के संग्रह 'मछलियां गाएंगी एक दिन पंडुम गीत'- में बस्तर बोलता है. जंगल है हमारी पहली पाठशाला कहने वाली पूनम वासम मनुष्यता के बीच लतर की तरह फैलती असमानता बांचती हैं. उसके लिए बस्तर होने का अर्थ है इस सचाई को जानना-
यहां, जहां खड़ी है आज तुम्हारी चमकती गाड़ी
वहीं उसके पहिए के नीचे दफ़न है
एक दूल्हे की शेरवानी,
बहन की रेशमी राखी
माँ के हाथों की बनी गुदड़ी .

और हां, ग़र तौल सको तो तौल कर देखना
कई किलो सिन्दूर की डिबिया भी होगी
एक सुनहरे बालों वाली मटमैली-सी गुड़िया की कहानी भी
दम तोड़ चुकी होगी. (मछलियां गाएंगी एक दिन पंडुम गीत. पूनम वासम)

कविताओं के प्रकाशन मे बोधि प्रकाशन भी अग्रणी है. इस साल लाल्टू का संग्रह 'थोड़ी सी जगह', मंजुला विष्ट का संग्रह 'खॉंटी ही भली' और अनेक संग्रह यहां से आए हैं. अमेरिका की रेखा भाटिया का संग्रह 'सरहदों के पार दरख्तों के साये में' -शिवना प्रकाशन ने छापा है. युवतर की सीमा से पार नरेश अग्रवाल के भी दो संग्रह 'हारता नहीं हूं कभी मैं' एवं 'हथियार की तरह' भारतीय ज्ञानपीठ से आए हैं जिनसे इस कवि का सतत काव्याभ्यास सिद्ध होता है.

ग़ज़लों और गीतों की दुनिया
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कविताओं के प्रशस्त वैचारिक संसार के बीच गीतों गजलों की दुनिया भी अग्रसर रही है. किन्तु इस साल अच्छे संग्रहों की आमद कम रही. कोरोना के प्रभाव में प्रकाशक वित्तीय जोखिम उठाने से बचते भी रहे. तथापि किस्सागोई के उस्ताद पंकज सुबीर की ग़ज़लें 'यही तो इश्क है' साल के शुरू में ही आ गया था. ग़ज़ल में पंकज का चेहरा बहुत ही पाक साफ दिखता है. यह जैसे उनकी मासूमियत का दर्पण हो. आज ग़ज़ल का हर तरफ बोलबाला है. हिंदी ग़ज़ल के पाठ्यक्रम बन रहे हैं. उसने यथार्थ की बारीकियों के साथ समय की पीठ पर निशान दर्ज किए हैं. पंकज ने छोटी बड़ी दोनों तरह की बहर ग़ज़लों में आजमाई है और उन्हें कहने में कामयाबी पाई है. एक संयम और सामर्थ्य यह भी कि उनकी हर ग़ज़ल यहां लगभग सात-सात अशआर की हैं. यानी काफिये रदीफ पर मास्टरी इस कदर कि कोई भी शेर एक दूसरे से उन्नीस न हो. कुछ अशआर मुलाहिजा हों --
है मगर तुम पर मुझे इतना भरोसा भी नहीं
तुम अगर क़ातिल नहीं हो तो मसीहा भी नहीं

खैर मैं जैसा भी हूं हॅस के गले मिलता तो हूं
माफ़ करना आपको इतना सलीका भी नहीं
***
उसके चेहरे पर जब इक हंसी खिल उठी
हमकों ऐसा लगा जिन्दगी खिल उठी

थी उदासी में डूबी हुई कल तलक
बादलों ने छुआ तो नदी खिल उठी.
वरिष्ठ ग़ज़लगो बाल स्वरूप राही ने आज तक गीत व ग़जलों का दामन नहीं छोड़ा. डायमंड से आई उनकी ग़ज़लों के संग्रह 'चलो फिर कभी सही'- को पढ़ते हुए उनकी सिद्ध गजलगोई का मुरीद होना पड़ता है. युवा शायर वंदना वर्मा अनम की ग़जलों और मुक्तकों का संग्रह 'पलकें नाजुक हैं बहुत' वाकई नाजुक खयाल ग़ज़लों का संग्रह बन पड़ा है. ग़ज़लों की लोकप्रियता ही है कि आज वह गायकों की पहली पसंद है तो पाठकों की भी. राजपाल एंड संस से जाने माने शायर फरहत अहसास के संपादन में एक चयन आया है: 'कहने में जो छूट गया' नाम से जिसमें समकालीन उर्दू शायरी के पांच अहम शायरों मनीष शुक्ल, मदन मोहन दानिश, शारिक कैफ़ी, खुशवीर सिंह शाद व फ़रहत एहसास की ग़ज़लें शामिल हैं. ये शायर इधर ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं. आज ग़ज़ल जिस बोलचाल की जबान को अपना दोस्त़ बनाए हुए है उसके उदाहरणस्व‍रूप कुछ अशआर --
थाल पर थाल सजाने से नहीं जाती है
भूख अंदर हो तो खाने से नहीं जाती है

तार ही घर के तसव्वुर से जुड़ें हों जिसके
वो उदासी कहीं जाने से नहीं जाती है. (शारिक़ कैफ़ी)

बहुत भरोसा ल़फ़्जों पर मत किया करो
कहने में जो छूट गया है, सुना करो.

पेड़ के नीचे बैठ के साये में दानिश
धूप से अच्छी अच्छी बातें किया करो. (मदन मोहन दानिश)

तुमको दुनिया का तलबगार नहीं होना था
पास जाना था गिरफ्तार नहीं होना था.

तुम पे पत्थर न उठा लें ये ज़माने वाले
तुम को मजनूँ का तरफ़दार नहीं होना था. (मनीष शुक्ल)

अंदर के हादिसों पे किसी की नज़र नहीं
हम मर चुके हैं और हमें इसकी ख़बर नहीं.

आबाद इस तरह हैं कि वीरान हैं ये शहर
घर इस तरह बसाए गए हैं कि घर नहीं. (फ़रहत एहसास)

वंदना वर्मा अनम की नाजुकख्याली को नुमायां करता यह शेर देखें-
रेत पर घर बनाने वाली थी
उसकी बातों में आने वाली थी

ये तो अच्छा के ख्वाब टूट गया
मैं तो दुनिया बसाने वाली थी.

मेरे सब ख़त हवा ने छीन लिए
मैं तेरा ख़त जलाने वाली थी. (पलकें नाजु़क हैं बहुत)
गर्म रोटी के ऊपर नमक तेल था- लोक और शहर के मन मिजाज की मिली जुली ग़ज़लों के संग्रह में वशिष्ठ अनूप ने गांव की सोंधी खुशबू टॉंकी है तो बदलते कस्बाई यथार्थ से भी परिचित कराया है.

गीतों का स्वर्ण युग अब धीरे-धीरे विदा हो रहा है, अब जहँ तहँ करैं प्रकास की तर्ज पर कुछ नक्षत्र टिमटिमाते नजर आते हैं. किन्तु् यह संयोग है कि कुछ गीत के रथी हैं जो इस मोर्चे पर शिद्दत से डटे हुए हैं. वरिष्ठ कवि अनूप अशेष के दो संग्रह इसी साल आए हैं. एक उनके नवगीतों बघेली गीतों इत्यादि का चयन 'लोक के देश का स्थायी पता' व एक नवगीत संकलन 'कोहरा टँगा टँगा सा क्यों है'. यथार्थ की हूक से भर कर वे लिखते हैं--
दिन पांवों में चलते मील थे.
जले हुए पेड़ नहीं,
हम काले भील थे.
ऋतुएं थीं बहिनें
मां पिता जैसे महुए
डोंगे के रस से हब सब रहे चुए
धूप भरे गमछे थे,
पसीने में झील थे. (कोहरा टँगा टँगा सा क्यों है. अनूप अशेष )
 
वरिष्ठ कवि नवगीतकार गुलाब सिंह का संब्रह 'अंत में पहला पाठ' श्वेतवर्णा प्रकाशन से आया है. श्वेतवर्णा से ही गणेश गंभीर का गीत संग्रह 'नहीं के आसपास' भी आया है. वे भी लगातार समर्पित भाव से गीतयात्रा के संगी बने हुए हैं. नवगीत के कथ्य, शिल्प और व्याकरण को नई ऊंचाई देने का काम गुलाब सिंह ने बखूबी किया है. देश का नारा उठाने वाले दल तो बहुत हैं पर दिल में देश कहां हैं, इस मौजूं पर क्या खूब लिखा है गुलाब सिंह ने-
दिल के भीतर देश कहां है?
देश प्रेम में पगे लोग हैं
नहीं किसी के सगे लोग हैं
मैराथन में आगे बढ़ने
की कोशिश में लगे लोग हैं
बाकी सब कुछ जहां तहां है.
दिल के भीतर देश कहां है? (अंत में पहला पाठ. गुलाब सिंह)
मनोज जैन नवगीत के उभरते हुए हस्ताक्षर हैं जिनका संग्रह - 'धूप भर कर मुट्ठियों में'- गीतों का श्रृंगार करता दिखाई देता है. पर कुल मिलाकर गीतों नवगीतों की दुनिया गुमसुम है जब कि उसे इस वक्त सबसे ज्यादा बोलना चाहिए. आज ऐसा बहुत कम लिखा जा रहा है जो ध्यातव्य हो. मंच पर भी उसका स्वीकार बहुत नहीं है. हास्य व्यंग्य और चुटकुलेबाजी ने गीतों नवगीतों को जैसे हाशिए में समेट दिया है. कभी-कभी बुद्धिनाथ मिश्र जैसा एक बूढा विदग्ध स्वर मंच पर गुनगुनाता नजर आता है. बाकी प्रतिभाएं जैसे वाह-वाह की भेंट चढ़ चुकीं. सुधांशु उपाध्याय और जयकृष्ण राय तुषार के नवगीत संग्रहों के आने की सूचना भर है जिसकी सुगंध दूर तक फैली ही नहीं. अनुभव प्रकाशन से भी गीतों के कई संग्रह आए हैं.

कविता चयन. संचयन
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साल 2021 में निरंजन श्रोत्रिय के संपादन में आठवां द्वादश आया जिसमें 12 युवा कवियों आभा दुबे, वीरू सोनकर, रुचि भल्ला, पल्लवी त्रिवेदी, संध्या  नवोदिता, कमलजीत चौधरी, अरुणश्री, राहुल देव, मृगतृष्णा, पम्मी राय, अस्मुरारी नंदन मिश्र व यशस्विनी पांडेय की कविताएं शामिल हैं. यद्यपि अब तक इस सीरीज में 96 युवा कवि आ चुके हैं किन्तु गुणवत्ता की दृष्टि से इनमें से बहुतेरे औसत प्रतिभा वाले कवि हैं. इन दिनों स्त्री-विमर्श, आदिवासी विमर्श व दलित विमर्श के नाम पर कुछ भी परोसा जा रहा है. सामूहिक चयनों की भरमार है इन दिनों. समकाल की रटन लगी है पर उसमें कवित्व का घोर अकाल है. पर सौभाग्य से कुछ चयन/संचयनों के साथ यह बात नहीं है. रजा फाउंडेशन से पूनम अरोड़ा के संपादन में आया स्त्री कवियों का चयन 'बारिश आने से पहले' -और भी उम्दा हो सकता था यदि वाकई इन कवियों का चयन सख्ती से किया गया होता. आज अधिकांश कवियों में फेसबुकीय चाकचिक्य तो बहुत नजर आता है, गहराई और संवेदना कम. यह संग्रह भी इस व्याधि का शिकार है. तो भी इसके सुघर संपादन की प्रशंसा की जा सकती है. दस युवा कवयित्रियों का एक चयन 'वर्जनाओं से बाहर' झारखंड के पत्रकार कवि अखिलेश्वर पांडेय ने संपादित किया है जिसमें लवली गोस्वामी, पल्लवी प्रकाश, सीमा संगसार, ज्योति देशमुख, संध्या सिन्हा, आभा विश्वकर्मा, अमृता सिन्हा, निदा रहमान, रजनीश आनंद एवं सुप्रिया तिवारी की कविताएं शामिल की गयी हैं. किन्तु् इन रचनाओं में वर्जनाओं से बाहर क्या कुछ छन कर आया है, इसका साक्ष्य ये कविताएं कम देती हैं. कविताओं के साझा संग्रहों के उपक्रम में ही वाम प्रकाशन की ओर से संजय कुंदन के संपादन एवं कुमार अम्बुज की भूमिका के साथ अनेक युवाओं की कविताएं यहां प्रस्तुत की गयी हैं, जिनमें रूपम मिश्र, पराग पावन, अंचित, अर्चना लार्क, कमलजीत चौधरी और श्रुति कुशवाहा की कविताएं निश्चय ही आश्वस्ति के बीज बोने वाली कही जा सकती हैं.

प्रेम कविताओं के अब तक के सबसे बड़े चयन के रूप में सर्वभाषा ट्रस्ट की ओर से सुमन सिंह के संपादन में आये संचयनों - 'खिल गया जवाकुसुम', 'सदानीरा है प्यार', 'प्रेम तुम रहना' एवं 'प्रेम गलिन से' - में कुल मिला कर तीन सौ कवियों की प्रेम कविताएं शामिल की गयी हैं. इससे पहले प्रेम कविताओं का जो संग्रह याद आता है वह था 'प्रेम के रूपक' जिसे मदन सोनी ने संपादित किया था, किन्तु इन संचयनों के चयन में जो लोकतांत्रिक सार्वजनिक स्वीकृति है वह उस चयन में नहीं दिखती. यह बहुत अच्छी बात है कि मशहूर उपन्यासकार, स्टोरी टेलर व आजतक के सीनियर एक्जीक्यूटिव एडिटर संजीव पालीवाल इसकी कविताओं का धारावाहिक वाचन भी 'साहित्य तक' के लिए कर रहे हैं, जिसे काफी सुना और सराहा जा रहा है. इसी तरह रानी श्रीवास्तव और शहंशाह आलम ने मिल कर बारिश पर एक नायाब चयन संपादित किया है: 'आकाश की सीढ़ी है बारिश' नाम से. यह चयन भी ऐसा नायाब बन पड़ा है कि इसकी कविताओं में बृष्टि पोरे टुपुर टुपुर- की ध्वनि सुनाई देती है. एकल चयन के लिहाज से सेतु प्रकाशन ने मंगलेश डबराल की समग्र कविताओं का प्रकाशन किया है जिससे मंगलेश के संपूर्ण कविता संसार का अवगाहन किया जा सकता है. देश की अग्रणी साहित्य संस्था साहित्य अकादेमी नई दिल्ली से प्रतिनिधि बाल कविता संचयन का प्रकाशन हुआ है, जिसे दिविक रमेश ने संपादित किया है. यहीं से आधुनिक ईरानी कविताओं का चयन भी अज़ीज़ मेंहदी के संपादन में आया है. शंभु बादल के संपादन में 'शमशेर रचना संचयन' भी अकादेमी की बेहतरीन पेशकश है. चयन संचयन के इस क्रम में रजा पुस्तकमाला की पहल प्रशंसनीय है जिसके सहयोग से संभावना प्रकाशन ने विदेशी कविताओं के चयन का प्रकाशन वंशी माहेश्वरी के संपादन में किया है. इस श्रृंखला में तीन चयन- खी नदी पर खाली नाव'; 'प्यास से भरती एक नदी' एवं 'दरवाजे में कोई चाबी नहीं'- नाम से आए हैं जो पर्याप्त प्रथुलकाय हैं तथा इसमें 'तनाव' में प्रकाशित सभी कवियों की कविताओं को सहेजा गया है. इसी पुस्तक माला के अंतर्गत अजित कुमार की रचनाओं का चयन 'अंजुली भर फूल' का संपादन पल्लव ने किया है. उदयन वाजपेयी का रचना चयन 'दस्तंकें' व मदन सोनी का रचना संचयन 'कांपती सतह पर'  भी सेतु-रजा फाउंडेशन से प्रकाशित हुए हैं. वाणी और रजा के सहकार में गोपेश्वर सिंह के संपादन में 'विजयदेव नारायण साही का रचना संचयन' का प्रकाशन भी सुखद है. उन की रचनाएं काफी दिनों से ओझल थीं जिनके प्रकाशन से साही पर शोध और अध्ययन का मार्ग प्रशस्त होगा. इस तरह यह साल कोरोना की आक्रामकता के बावजूद रचनात्मकता के जादुई आकर्षणों से भरा रहा और कविगण अपनी अपनी व्यासगद्दी पर बैठ कर अपने समय का महाभारत लिखते रहे.
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

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