किताब: संघर्षों का राही
संपादन: चारु तिवारी
पब्लिकेशन: उत्तराखंड लोकभाषा साहित्य मंच
कीमत: 200 रुपये
कुमाऊं के सुप्रसिद्ध लोककवि, गीतकार और गायक हीरा सिंह राणा से हर कोई उत्तराखंडवासी परिचित है. उत्तराखंड के गीतकारों और गायकों में राणा जी का नाम बड़े ही अदब से लिया जाता है. लोग उनको प्यार से ‘हिरदा कुमांऊनी’ नाम से भी पुकारते हैं. आज भी लोग उनके गानों को बहुत ध्यान से सुनते हैं. उत्तराखंड में अधिकतर लोग अब प्रवासी हो गए हैं और रह-रहकर उन्हें प्रदेश की याद आती है. ऐसे में उत्तराखंडी लोग ‘हिरदा’ के गानों को सुनकर सुकून महसूस करते हैं. इस बीच राणा जी पर किताब आ जाए, तो उनके चाहने वालों के लिए यह सोने पर सुहागा से कम नहीं है. ‘हिरदा’ पर पत्रकार चारू तिवारी की संपादित पुस्तक ‘संघर्षों का राही’ उनके 50 वर्षों की रचना-यात्रा पर बारीकी से नजर डालती है.
क्यों पढ़ें यह किताब...
यह पुस्तक राणा जी के जीवन पर है और राणा जी के साथ पूरी तरह से न्याय करती है. इस पुस्तक में चारु तिवारी के साथ-साथ अन्य कवियों, लेखकों, पत्रकारों, साहित्यकारों और कहानीकारों ने राणा जी के हरेक पहलू को छूने की कोशिश की है. इस किताब को पढ़कर आप राणा जी के संघर्ष को बहुत ही करीब से समझ सकते हैं. इस किताब में राणा जी के विविध प्रकार के गीतों का संग्रह भी हैं. इन विविध विधाओं में राष्ट्रप्रेम, चेतना के गीत, सामाजिक गीत, श्रृंगार गीत, कविताएं हैं. बहुत कम लोग ये जानते हैं कि राणाजी ने स्वतंत्रता संग्राम पर नाटक भी लिखा है.
किताब में कुमाऊंनी शब्दों का बखूबी इस्तेमाल किया है यही वजह है कि यह किताब पहाड़ (उत्तराखंड) के लोगों को बहुत पसंद आएगी. इतनी ही नहीं इसमें लिखने वाले लोग किसी ना किसी रूप में राणा जी से परिचित हैं. यही वजह है कि यह पुस्तक राणा जी के कई पहलुओं पर बारीकी से नजर डालती है. फिर चाहे राणा जी के पारिवारिक स्थिति हो या आर्थिक स्थिति या फिर उनके जीवन के शुरुआत लम्हे जब उन्होंने गीतों को गाना और लिखना शुरू किया.
किताब के कुछ अंश...
शायद ही कोई ऐसा हो जो राणा जी के गीतों से परिचित ना हो. लेकिन सबको उनके पहाड़ के प्रति प्यार, पारिवारिक जीवन-संघर्ष के बारे में पता हो जरूरी नहीं. किताब में विचार व्यक्त करने वाला हर कोई लेखक, पत्रकार, कहानीकार उनके गीतों का जिक्र जरूर करते हैं. जिन गीतों का जिक्र करते हैं उनमें ‘आज हम पहाड़ी भल हन रिवाड़ी..., लश्का कमर बांदा..., मनखों पड्यौव में..., आलिली बकिरीं लिली..., मेरी मानिलै डानी हम तेरी..., अजकल हैरे ज्वाना म्येरि नौली पराणा...प्रमुख हैं.
मंचन देख शास्त्री जी की पत्नी के आए आंसू
पुस्तक में राणी जी इंटरव्यू के दौरान बताते हैं कि उन्होंने अपना पहला गाना ‘हिरदा की पीड़ा...’ गाया. बातों-बातों में वे ये भी बताते हैं कि दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान ‘आ ली ली बाकरी...’ गाया और इसका मंचन भी किया. इस कार्यक्रम में तब के रेलमंत्री लाल बहादुर शास्त्री पत्नी से साथ पहुंचे थे. राणा जी बताते हैं कि कैसे मंचन को देख शास्त्री जी की पत्नी के आंसू आ गए.
ऐसे लोगों के जो राणा जी के निजी जीवन को समझने या जानने की कोशिश करते हैं उनके लिए चारु दा संपादित यह किताब बेहद उपयोगी साबित होगी. राणा जी को चाहने वालों इस किताब के माध्यम से उन्हें और भी करीब से जान पाएंगे. किताब के संपादन में चारु तिवारी ने बेहतरीन काम किया है. उम्मीद है कि चारु तिवारी का यह प्रयास पाठकों को जरूर सराहनीय लगेगा.