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व्यंग्य लेखन की नई परिभाषा गढ़ता है 'कबीरा बैठा डिबेट में'

व्यंग्यकार जब अपनी लेखनी से सिस्टम, समाज, सरकार वगैरह पर एक-एक हंटर चलाता है, तो उससे ज्यादा वह हंटर उसकी पीठ पर भी चलता है. पीयूष पांडे एक ऐसे ही व्यंग्यकार हैं जिनकी नई रचना 'कबीरा बैठा डिबेट में' अब बाजार में है.

'कबीरा बैठा डिबेट में' का कवर [सौजन्यः प्रभात प्रकाशन] 'कबीरा बैठा डिबेट में' का कवर [सौजन्यः प्रभात प्रकाशन]

व्यंग्य को पढ़ना और उसका आनंद लेना जितना आसान होता है, उसको लिखना उतना ही मुश्किल, क्योंकि व्यंग्यकार जब अपनी लेखनी से सिस्टम, समाज, सरकार वगैरह पर एक-एक हंटर चलाता है, तो उससे ज्यादा वह हंटर उसकी पीठ पर भी चलता है. खासकर तब, जब वह एक संवेदनशील व्यक्ति हो. पीयूष पांडे एक ऐसे ही व्यंग्यकार हैं जिनकी नई रचना 'कबीरा बैठा डिबेट में' अब बाजार में है. यह पुस्तक विश्व पुस्तक मेले में आई. पीयूष को मैं 16 वर्षों से जानता हूं. इनकी दो व्यंग्य रचनाएं पहले भी आ चुकी हैं और उनको पढ़ना आह्लादकारी अनुभव था. इस तीसरे को इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए कि पीयूष ने इसमें मीडिया को अपना 'शिकार' बनाया है.
 
मीडिया देश का विमर्श तैयार करता है लेकिन कैसे खुद मीडिया ही विमर्शहीन होता जा रहा है, इसको कबीर के माध्यम से पीयूष ने समझाया है. जैसा कि पुस्तक का शीर्षक है, 'कबीरा बैठा डिबेट में', उसमें एक व्यंग्य है कि टीवी न्यूज की डिबेट में किसी कबीर के लिए कोई जगह नहीं है. कबीर यानी सत्ता की ठकुरसुहाती नहीं करने वाला शख्स. कबीर यानी अपनी बात खरी-खरी सुना देने वाला शख्स. कबीर यानी धर्म के नाम पर विभाजित देश में धर्म के ठेकेदारों की पोल खोलने वाला शख्स. कबीर यानी रुढ़िवाद और कूपमंडूकता पर सीधा प्रहार करने वाला शख्स. लेकिन ऐसा शख्स अगर टीवी बहस में आ जाए तो हिंदू और मुसलमान में देश को बांटने वाले ही नहीं, भक्ति भाव में डूबा एंकर भी कबीर की दाढ़ी नोंचने को खडा हो जाता है.
 
पीयूष ने मीडिया की हर विधा में काम किया है. लेकिन उससे ज्यादा समाज की वेदना और पीड़ा को परखा और पढ़ा है. उसी का प्रभाव है कि उनका हर व्यंग्य आपको सोच की नई ऊंचाई पर ले जाता है. चाहे पत्रकारिता में अनुप्रास अलंकार हो या बगदादी के जब तब मरने की आने वाली खबर. टीवी पर ऐसी चीजों को देखकर आपको या तो गुस्सा आता होगा या दुख होता होगा. लेकिन गुस्से और दुख को आप हंसी में अभिव्यक्त करना चाहते हैं तो पीयूष की किताब पढ़िए.

समाज, खासकर भारतीय समाज, विविधताओं से भरा है. इसमें सत्ता के शिखर पर बैठे शख्स की अपनी कहानी है तो प्रेम और विरह के बीच जलते इंसान की अपनी कहानी. हर कहानी एक दूसरे से अलग है, उनके भाव और प्रभाव अलग हैं लेकिन हर कहानी आपको व्यंग्य की एक नई ऊंचाई पर ले जाएगी. कट्टा और प्रेमिका ऐसे ही व्यंग्य लेखन का एक उदाहरण है.

लेकिन इन सबसे ज्यादा आप इसलिए भी इस व्यंग्य संग्रह को पढ़िए कि इससे मिलने वाला पैसा यमुना के जल संरक्षण और उसको प्रदूषण मुक्त करने के काम में जा रहा है. जिस वक्त पुस्तक विमोचन हो रहा था, उसी वक्त पीयूष ने रॉयल्टी का पैसा यमुना के जल संरक्षण के लिए काम करने वाले एक संगठन को दे दिया. ऐसा होता नहीं लेकिन ये बताता है कि एक संवेदनशील व्यक्ति जब कलम चलाता है तो उसका दिल उन सवालों से भी टकराता है, जो हमारी सभ्यता, समाज, पर्यावरण से लेकर पड़ोस तक के सरोकारों से जुड़े हैं. और जब संवेदना के इस महान स्तर पर खड़ा इंसान व्यंग्य लिखता है तो वो सिर्फ आपको हंसाने के लिए नहीं, बल्कि उससे चार कदम आगे बढ़कर आपको कुछ सोचने के लिए भी मजबूर करता है. 'कबीरा बैठा डिबेट में' पढ़िएगा जरूर.

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पुस्तकः कबीरा बैठा डिबेट में
लेखकः पीयूष पांडे
विधाः व्यंग्य
प्रकाशकः प्रभात प्रकाशन
मूल्यः रुपए 220/
पृष्ठ संख्याः  250

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