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भाषाई अध्‍यात्‍म के विरल प्रकाश में 'विरक्‍त'

युवा लेखक अमलेंदु तिवारी का उपन्‍यास 'विरक्‍त' गांव, देहात और पिता के वृहत्‍तर जीवन से होता हुआ मुंबई के निज के संघर्ष की आत्‍मिक बानगी पेश करता है.

अमलेंदु तिवारी के उपन्‍यास 'विरक्‍त' का कवर अमलेंदु तिवारी के उपन्‍यास 'विरक्‍त' का कवर

'सब मन के खेल हैं. मन बड़ा खिलाड़ी है.
यह मन ही हमें तपते सेहरा में पानी के चश्‍मे दिखाता रहता है.' यह पढ़ते हुए मुझे नीरज याद हो आए- 'मन तो मौसम सा चंचल है/ सबका होकर भी न किसी का/ कभी सुबह का कभी शाम का/ कभी हंसी का कभी रुदन का.' -यह सिर्फ एक चमकदार वाक्‍यों का समूह नहीं बल्‍कि जीवन के बीहड़ों से गुजरते हुए महसूस किए गए क्षणों का मूल्‍यांकन है. जीवन कभी-कभी हमें एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर देता है, जब हम अतीत में लौटते हुए सिर्फ कुछ धुंधली पड़ चुकी स्‍मृतियों को सहेज सकते हैं किन्‍तु स्‍मृतियों को हम उम्र भर अपनी पीठ पर लादे नहीं रह सकते. फिर भी स्‍मृतियां हैं कि पीछा नहीं छोड़तीं. साहित्‍या की मौत के बाद आत्‍मिक संकट से गुजरते हुए उपन्‍यास का नायक जिन मोड़ों पड़ावों और तनावों से गुजरता है, 'विरक्‍त' उसकी एक जीवंत झांकी है. अमलेंदु तिवारी ने अपने जीवनानुभवों को जिस त्रयी में बांधने का संकल्‍प लिया है, उसकी पहली कड़ी 'परित्‍यक्‍त' का प्रकाशन कुछ साल पहले ही भारतीय ज्ञानपीठ से हुआ है. परित्‍यक्‍त कहते ही जिस अभाव का बोध होता है, उसकी बानगी यह पुस्तक बखूबी देती है. उसी श्रृंखला की अगली कड़ी है 'विरक्‍त' जो असाधारण रूप से पिता के जीवन के गलियारों, संकरे और प्रशस्‍त चौरस्‍तों से होकर गुजरता हुआ पढ़ने वालों को एक मार्मिक अनुभूति से भर देता है जैसे यह एक पुत्र की पिता के प्रति कृतज्ञ भावांजलि हो.  

अपने पिता के अतीत को खंगालते हुए नायक जिन पेचीदगियों से गुजरता है, पिता के संघर्ष को जिस तरह वह शिद्दत से महसूस करता है, 'विरक्‍त' उन तमाम गुत्‍थियों को खोलता है जिनसे होकर पिता को दो-चार होना पड़ता है. क्‍या विडंबना है कि सात वर्ष की उम्र में अपने पिता को खोकर वह अपना पिता बन गया और शायद खुद अपना पुत्र भी. यह उपन्यास वक़्त की धूल, मिट्टी और राख झाड़कर उसी किरदार की अपने पिता के जीवन में न सिर्फ झांकने की गहरी कोशिश है बल्कि उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर से महानगर मुंबई में विस्थापन के बाद पहाड़-सी ज़िन्दगी में सार्थकता ढूढ़ने की कोशिश भी है. क्योंकि वह पिता की डायरी में दर्ज इस अवधारणा को समझता है कि 'अच्छा या बुरा जो कुछ भी इस क्षण है वह फिर कभी नहीं होगा.' ऐसे अच्‍छे बुरे तमाम क्षणों का यह उपन्‍यास साक्षी है.

यों तो यह उपन्यास 'परित्यक्त-विरक्त-अनुरक्त' की त्रयी का हिस्सा है , पर इसे एक स्‍वतंत्र परिपूर्ण उपन्यास के रूप भी पढ़ा जा सकता है. हममें से अधिकांश लोगों का जीवन आसक्ति से आरम्भ होकर विरक्ति के साथ ख़त्म हो जाता है. काशी की संकरी गलियों की तरह जो यहां वहां से होती हुई आखिरकार गंगा के तट पर बने महाश्मशान पर आकर ख़त्म हो जाती हैं. बचती हैं तो सिर्फ़ स्मृतियां. सैकड़ों, हज़ारों, लाखों, करोड़ों स्मृतियां. इस विराट संसार में मिलती, बिछुड़ती, टकराती, डूबती, तैरती, उभरती स्मृतियां. वह जानता है कि 'एक रोज जब सब कुछ खत्‍म हो जाता है, जब स्‍मृतियों की झील भी सूख जाती है तब आखिरकार एक कहानी ही तो बच जाती है. इंसान की नेकनामी और बदनामी की कहानी और जिस्‍मानी मौत के बावजूद हम उन कहानियों में ज़िन्‍दा रहते हैं.'

'विरक्त' एक ऐसे इंसान की नियति का दस्तावेज़ लिखने की असमाप्त जद्दोजेहद है जिसकी किस्सागोई की सघनता हमें भाषाई अध्यात्म के विरल  प्रकाश में खो जाने का अवसर देती है. यह अनुभव, संवेदना और जिजीविषा की अनूठी जीवनकथा कहने वाले अमलेंदु तिवारी का बेहतरीन उपन्यास है जहां पग-पग पर रचे-बसे सुभाषित हमें अवाक कर देते हैं तथा जीवन में बार-बार प्रवेश करने का न्योता भी देते हैं.

आखिर इस बेहद निजी सी लगती कहानी में ऐसा क्‍या है जो हमें बांधता है. यह एक युवा शख्‍स के संघर्ष की दास्‍तान है जो कैरियर के अनेक उजले धुले पदों पर होने के बजाय एक लेखक होने का सपना संजोता है. उसकी पृष्‍ठभूमि उत्‍तर प्रदेश के उस तराई बेल्‍ट की है जो उर्वर वसुंधरा के साथ अनेक प्राकृतिक आपदाओं का पर्याय भी है. वह अपने पिता को खो चुका है, जो अपने इलाके के नामी वकील थे. वह भी कानून की पढ़ाई कर मुंबई आ गया है तथा एक अदद नौकरी की तलाश में है, जहां व्‍यवस्‍थित होकर वह अपनी मां को पास रख सके. एक लेखक बन सके. उसके अध्‍ययन में उच्‍चस्‍तरीय क्‍लासिक्‍स शामिल हैं, वे महत्‍वाकांक्षाएं शामिल हैं जो उसे लेखक के उच्‍च आसन पर बिठा सकें. मुंबई वह आ तो जाता है पर किराये की तंगी के कारण परेल में एक दोस्‍त से फ्लैट साझा करता है. इस बीच कुछ दिन दोस्‍त के बाहर चले जाने के बीच वह टाइफाइड से ग्रस्‍त हो जाता है. पड़ोस के लोग मदद करते हैं. खास कर ब्रीच कैंडी हास्‍पिटल में नर्स मायरा जो उसके फ्लैट के बगल ही रहती है, उसका इलाज कराती है. मायरा ऐंग्‍लो-इंडियन परिवार से है जिसके मां-पिता एक दुर्घटना में नहीं रहे. इस देखभाल से वे एक-दूसरे के कुछ नजदीक आते हैं, चर्च या घूमने फिरने की जगहों पर मायरा की नाजुक दृष्‍टि में उसे अनाहूत आकर्षण सा दिखता है, किसी ऐसे ही नाजुक क्षणों में उसके होठों पर आमंत्रण की एक स्‍मिति भी झांकती है, वे एक दूसरे पर झुक आए फूल-पत्‍तियों की तरह परस्‍परावलंबित भी महूसस करते हैं और एक खूबसूरत मोड़ पर आ खड़े ही होते हैं कि अचानक उसे लगता है कि लिखने पढ़ने के लिए एक स्‍वतंत्र वातावरण चाहिए, जहां वह शहर से मां को भी लाकर रख सके. सो वह परेल को छोड़ कर दूसरे इलाके में फ्लैट का बंदोबस्‍त करता है. मायरा से विदा के ये क्षण भी कितनी कशिश भरे हैं.

यहीं से उसकी जिन्‍दगी का एक दूसरा संघर्ष शुरू होता है. ट्यूशन, लीगल फर्म में नौकरी और साथ में अधूरे नॉवेल पर काम. वह इस बीच मुंबई के स्‍वभाव, अतीत और वर्तमान का खूब अध्‍ययन करता है. उसकी तहरीरें बताती हैं कि वह मुंबई के मिजाज को कुछ ही दिनों में बखूबी समझ गया है. मुंबई की बारिश अवसाद भी देती है तथा दिल को सुकून भी पहुंचाती है, यह संघर्ष करना सिखाती है तो कामयाब होना भी. वह जानता है संघर्ष और त्‍याग मुंबई का स्‍वभाव है, जिसके बिना कुछ भी पाने की आशा करना खुली आंखों से स्‍वप्‍न देखने जैसा है. इस बीच अपने शहर लौटता है तो सत्रह साल पहले गुजरे पिता शिद्दत से याद आते हैं. मां ने उनकी सारी चीजें एक संग्रहालय की तरह सहेज रखी हैं. स्‍टडी, आरामकुर्सी, दीवान, किताबों की शेल्‍फ, छड़ी, चश्‍मा, पेन, खड़ाऊं, गाउन, उनकी डायरियां और बहुत कुछ. उसके पिता उसके जेहन में एक चरित्र की तरह उभर रहे हैं. तमाम पुरानी चिट्ठियां, पोस्‍टकार्ड, और डायरी भी जिसका एक इंदराज कि 'अच्‍छा या बुरा जो कुछ भी इस क्षण है वह फिर कभी नहीं होगा.' उसे अचानक बांध लेता है.

वह लिखने की उधेड़बुन में ही होता है कि उसे जैसे पिता की पूरी जिन्‍दगी एक महागाथा जैसी लगती है. वह इस कथा की पृष्‍ठभूमि में प्रवेश करता है तो पाता है तमाम चीजें उसके जन्‍म से पहले की हैं. इसलिए यह कथा वह कतई वैसे नहीं कह पाएगा जैसे कि यह हुई होगी. इसलिए यह कथा वह वैसे कहेगा जैसे कि वह जानता है. जाहिर है कि तमाम जानकारियों का स्रोत मां रहीं हैं. पूरी कहानी इतनी संश्‍लिष्‍ट और गुंथी हुई है कि एक बार इसकी तहरीरों से गुजरते हुए इसे असमाप्‍त नहीं छोड़ा जा सकता. मुझे सबसे बड़ी बात यह लगती है जो कि इस उपन्‍यास की खूबी भी है कि पग-पग पर यह हमें एक अनूठी प्रतीति और जीवन सारांश के सम्‍मुख करता है. उसे इस पूरी गाथा में 'समतल, मरुस्‍थल और खाइयां' नज़र आती हैं और फिर बाबा, दादी और परिवार की पूरी पृष्‍ठभूमि से होते हुए वह पिता के जीवन पर आता है, जिन्‍होंने पत्‍नी की असामयिक मृत्‍यु से एक विरक्‍त जीवन जिया, बच्‍चों को पालने-पोसने के लिए दूसरा विवाह करना पड़ा. इस बीच बुआ ने जैसे-तैसे बच्‍चों को सम्‍हाला. हालांकि सौतेली मां की नेकनीयती पर बुआ ने संदेह भी उछाले. पेशे से वकील पिता की सामाजिकता के रुतबे के बारे में सुना तो एक दिन वह पिता पर लिखते हुए जैसे खुद अपना पिता बन गया. मुंबई की व्‍यस्‍त जिन्‍दगी किन-किन अनुभवों से दो-चार करती है, उस सबका बयान इतनी चुस्‍त भाषा में है कि उपन्‍यासकार का लोहा मानना पड़ता है. पिता के जीवन की काशी को तो उसने एक चित्र की तरह जैसे उकेर दिया है. अपनी पूरी धार्मिक सांस्‍कृतिक आभा के साथ काशी जैसे उसकी स्‍मृतियों में निखर उठती है.

हम जानते हैं कि शास्‍त्र में काव्‍य के हेतु बताए गए हैं, उपन्‍यास के नहीं. वह आख्यान है उपदेश नहीं. फिर भी पग-पग पर यहां जीवन के अनुभव सूक्‍तियों में ढल गए हैं. पहला तो यही कि 'अगर आप महान इंसान नहीं हैं तो कोई आपकी कहानी नहीं कहेगा, यह काम आपको खुद ही करना पड़ेगा.' उदाहरण के लिए उपन्‍यास में आए कुछ मोती सरीखे वाक्‍य उद्धृत कर रहा हूं जो जगह-ब-जगह मणियों की तरह चमकते हैं, जिनमें नायक के अनुभव, संघर्ष, राग, विराग, हंसी, खुशी, मनोवेगों और अनुभूतियों का एक संपुट छिपा है.
 
कुछ उदाहरणों से इन सूक्‍तियों के पीछे अनुभवों की तासीर का अनुमान किया जा सकता है-

  • मुंबई की बारिश मानव मन के अवसाद को और बढ़ा देती है...फिर यही बारिश हमारे जख्‍मों को धो कर उन पर मरहम भी लगाती है.
  • मुंबई का चरित्र बहुरुपिया है, उसकी संस्‍कृति की तरह.
  • इस विराट संसार में बिना मां बाप के रहना अभिशाप है.
  • कामातुरता का ज्‍वार दो पल में हमें इंसान से जानवर बना देता है.
  • युद्ध, अशांति और पेट की भूख इंसान को अपनी जड़ों से मीलों दूर ला पटकती है.
  • भय और ग्‍लानि में भय को चुनना सही होता है क्‍योंकि भय तो बस कुछ समय ही रहता है लेकिन ग्‍लानि आजीवन पीछा नहीं छोड़ती है.
  • दुनिया की कोई भी जगह हो, पढ़ाने की कला हमें भूखे मरने से बचा लेती है.
  • इंसान के हाथों से ही सब कुछ होता है. साज में छुपे गीत इन्‍हीं हाथों से पैदा होते हैं और जीवन का अंत करने वाले हथियार भी.
  • संघर्ष और त्‍याग मुंबई का स्‍वभाव है, जिसके बिना कुछ भी पाने की आशा करना खुली आंखों से स्‍वप्‍न देखने जैसा है.
  • इंसान का आत्‍मविश्‍वास उसकी शिक्षा और काबिलियत से भी ज्‍यादा मह्त्त्वपूर्ण है.
  • एक अच्‍छा लेखक वह है जो अपने सबसे बुरे वक्‍त में भी अपने जीवन की सबसे बेहतरीन लाइनें लिख पाता है.
  • कभी कभी मौत इतनी क्रूर होती है कि अलविदा कहने का मौका भी नहीं देती है.
  • पहला प्‍यार ही असली प्‍यार होता है, बाकी तो उसकी उतरन होती है.
  • दिन की आवाजें हमें उतना नहीं जोड़तीं जितना रात का सन्‍नाटा.
  • बेहतरीन इंसार होना बेहतरीन कलाकार होने की अनिवार्य शर्त है, इसका कोई अपवाद नहीं है.
  • सिनेमा एक कमाल का धोखा है.
  • उस पीड़ा जैसी कोई पीड़ा नहीं होती, जब आप उसे अपनी आंखों के सामने किसी और के साथ जाते हुए देखते हैं, जिसके साथ आप अपना पूरा जीवन गुजारना चाहते थे.
  • अंतत: हम वही बन जाते हैं जैसा होना हम चुनते हैं. मेहनत और भाग्‍य के बाद बाकी सब कुछ हमारे चुनाव पर ही निर्भर करता है.
  • दिनोंदिन जटिल होता अर्थतंत्र अब मानवीय संबंधों पर भी हावी होने लगा है.
  • छोटी बड़ी चाहे जैसी भी हो, दुनिया में अपने घर से खूबसूरत जगह कोई नहीं होती है.
  • हम सबका जीवन आसक्‍ति से आरंभ होकर एक विरक्‍ति पर ही तो खत्‍म होता है और अंतत: जब सब खत्‍म ही हो जाता है तब कब, क्‍यों, कहां और कैसे क्‍या मायने रखते हैं?
  • आरंभ में ही उसका अंत छुपा होता है और अंत में सदैव एक आरंभ.

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'विरक्‍त' एक ऐसी ही कहानी है जिसमें आत्‍मकथा का रुचिर विस्‍तार है; रोजमर्रा की जद्दोजेहद से कमाए हुए जीवनानुभव हैं; देखे, बरते और भोगे हुए संसार की आकृतियां, विकृतियां, आसक्‍तियां और अनुरक्‍तियां हैं. जैसे मुक्‍तिबोध ने कहा था, 'कभी भी खत्‍म होती नहीं कविता', कहानी भी कभी खत्‍म नहीं होती. जैसे कुंवर नारायण कहते हैं, 'मृत्‍यु इस पृथ्‍वी पर जीव का अंतिम वक्‍तव्‍य नहीं है.' पत्‍नी के निधन के बाद भी जीवन खत्‍म नहीं होता, वह पुन: पल्‍लवित और विकसित होता है. 'विरक्‍त' की कथा भी जैसे एक असमाप्‍त नैरंतर्य है. मुक्‍तिबोध की कविता पंक्‍ति है: 'छोटी-सी निज जिन्‍दगी में जी ली हैं जिन्‍दगियां अनगिन/ जिन्‍दगी हर एक ज्‍वलित ईंधन का चंदन है.' अमलेंदु तिवारी का यह उपन्‍यास भी निज के अनुभव और संघर्ष-भरे वृत्‍तांत में पगी स्‍मृतियों का एक धड़कता हुआ दस्‍तावेज़ है.
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पुस्तकः विरक्‍त
लेखकः अमलेंदु तिवारी
विधाः उपन्यास
प्रकाशक: राजपाल एंड संस
मूल्‍यः 325 रुपए
पृष्‍ठ संख्याः 208

# समीक्षक डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुपरिचित कवि-आलोचक व भाषाविद हैं. तीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित. हिंदी अकादमी दिल्ली, उ.प्र. हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद्र शुक्ल आलोचना पुरस्का‍र, विचारमंच कोलकाता के प्रो. कल्याणमल लोढ़ा साहित्य सम्मान एवं जश्ने अदब के शाने हिंदी खिताब से समादृत हैं. संपर्क: जी-/506 ए, दाल मिल रोड, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059. मेल: dromnishchal@gmail.com

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