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सुरेन्द्र मोहन पाठक की आत्मकथा 'हम नहीं चंगे, बुरा न कोय' का लोकार्पण

सुरेन्द्र मोहन पाठक के जीवन से यह जानना वाकई दिलचस्प होगा कि उन्होंने अपने उपन्यासों द्वारा किस तरह पाठकों के बीच इतनी लोकप्रियता हासिल की.

किताब का लोकार्पण किताब का लोकार्पण

सुरेन्द्र मोहन पाठक की आत्मकथा का पहला भाग 'न कोई बैरी न कोई बेगाना' नाम से प्रकाशित हुआ था, जिसमें उन्होंने अपने बचपन से लेकर कॉलेज के दिनों के जीवन के बारे में लिखा है. उससे आगे का जीवन संघर्ष उनकी आत्मकथा के दूसरे भाग ‘हम नहीं चंगे, बुरा न कोय’ में लिखा है. बीते 6 दशकों में सुरेन्द्र मोहन पाठक ने लगभग 300 से अधिक उपन्यास लिखे हैं और दूर-दराज के गांवों तक एक नया पाठक वर्ग तैयार किया. अपनी आत्मकथा के ज़रिये वो अपने उस रचनाकाल के वक़्त को परत दर परत खोलते हुए हमारे सामने ले आते हैं.

सुरेन्द्र मोहन पाठक के जीवन से यह जानना वाकई दिलचस्प होगा कि उन्होंने अपने उपन्यासों द्वारा किस तरह पाठकों के बीच इतनी लोकप्रियता हासिल की. राजकमल प्रकाशन समूह की ओर से स्वागत भाषण में समूह के सम्पादकीय निदेशक सत्यानन्द निरुपम ने कहा कि हिंदी में लोकप्रिय लेखन और साहित्यिक लेखन के दो किनारे हैं, दो दुनिया है. बीच में अकादमिक जमात की आग का दरिया है. ऐसे में पाठक और पाठक के बीच की दूरी को समझा जा सकता है. सुरेंद्र मोहन पाठक और राजकमल प्रकाशन के बीच की जो दूरी रही है उसे समझा जा सकता है. आज वो दूरी जिस हद तक कम हुई है उससे हिंदी की पाठकीयता पर निश्चित रूप से दूरगामी असर पड़ेगा.

बातचीत और लोकार्पण के कार्यक्रम में अपनी बात रखते हुए सुरेन्द्र मोहन पाठक ने कहा कि किताब छप जाने से कुछ नहीं होता, छपते रहने से होता है.  मैं, मेरा ख़ुद का कॉम्पिटिटर हूं. लगातार कोशिश करने से मैंने ये मुक़ाम हासिल किया है.

अपने पाठकों से सीधे मुखातिब होते हुए उन्होंने सलाह दी कि लिखना एक जॉब की तरह है, ये लक्ज़री नहीं है. आलोचक विभास वर्मा ने कहा कि सुरेन्द्र मोहन पाठक को हमने बचपन में सात –आठ साल की उम्र से पढ़ना शुरू किया. अनुवादक एवं ब्लॉगर प्रभात रंजन ने बताया कि दिल्ली विश्वविद्यालय अकेला ऐसा विश्वविद्यालय है जहां सुरेन्द्र मोहन पाठक कोर्स की किताब में पढ़ाये जाते हैं.

यह पहली बार हो रहा है जब पॉकेट बुक्स का कोई लेखक मुख्यधारा के साहित्यिक प्रकाशन से जुड़ रहा है. इस बारे में सुरेन्द्र मोहन पाठक अपनी ख़ुशी जाहिर करते हुए कहते हैं कि हिंदी पुस्तक प्रकाशन संसार में राजकमल प्रकाशन के सर्वोच्च स्थान को कोई नकार नहीं सकता. सर्वश्रेष्ठ लेखन के प्रकाशन की राजकमल की सत्तर साल से स्थापित गौरवशाली परंपरा है. लिहाज़ा मेरे जैसे कारोबारी लेखक के लिए ये गर्व का विषय है कि अपनी आत्मकथा के माध्यम से मैं राजकमल से जुड़ रहा हूं. मेरे भी लिखने का 60वां साल अब आ गया है. यह अच्छा संयोग है.

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