scorecardresearch
 

बंटवारा और विस्थापन: अपनी ही मिट्टी से दो बार बिछड़ने की कहानी

आजादी की खुशी के बीच बिछड़ने के गम को एक किताब में पिरोया गया है. किताब का नाम ‘बंटवारा और विस्थापन’ है, जो कि विजय गुप्ता बंटी ने लिखी है. किताब की खास बात ये है कि बिछड़ने की एक क्रिया जिंदगी में दो बार घटी और ऐसी घटी जिसने जिंदगी ही बदल दी.

किताब में बंटवारे के दर्द को बताया गया है (फाइल फोटो) किताब में बंटवारे के दर्द को बताया गया है (फाइल फोटो)

दुनिया में बिछड़ने से बड़ा दर्द शायद ही कुछ हो. आप अपनों से बिछड़ें, अपने घर से बिछड़ें... ये दर्द आपको हर जगह सताता रहता है. चाहे आप उसे भुलाने की कोशिश कितनी बार भी करें. करीब सात दशक पहले जब देश आजाद हुआ, तो आजादी के साथ बंटवारे का सबसे बड़ा दर्द भी लेकर आया. जिसने ना जाने कितने अपनों को बिछड़ने पर मजबूर कर दिया. 

आजादी की खुशी के बीच बिछड़ने के गम को एक किताब में पिरोया गया है. किताब का नाम ‘बंटवारा और विस्थापन’ है, जो कि विजय गुप्ता बंटी ने लिखी है. किताब की खास बात ये है कि बिछड़ने की एक क्रिया जिंदगी में दो बार घटी और ऐसी घटी जिसने जिंदगी ही बदल दी.

साल 1947 में जब भारत का बंटवारा हुआ तो पाकिस्तान बना, वहां से लाखों की संख्या में हिन्दू, सिख, पंजाबी परिवारों को अपनी जान बचाते हुए हिन्दुस्तान आना पड़ा. इसे शायद सबसे बड़ा विस्थापन माना गया. लेकिन ऐसा ही एक विस्थापन 90 के दशक में कश्मीर में हुआ था, जब कश्मीरी पंडितों को घाटी में बढ़ते आतंक के खौफ के कारण अपनी जमीन को त्यागना पड़ा था.

बंटवारा और विस्थापन एक परिवार की कहानी है. जिसकी पीढ़ियां पंजाब के लाहौर (आजादी से पहले वाले हिन्दुस्तान) में बसती हैं, सबकुछ सही चल रहा था लेकिन जब आजादी की हलचल बढ़ती है तो पाकिस्तान के जन्म लेने की कहानी भी शुरू होती है. लाहौर में रहने वाला राजवीर जो पाकिस्तान में हिन्दुओं और सिखों के खिलाफ बढ़ती हिंसा को महसूस कर पा रहा है, वो तब कैसे मुस्लिम लीग की नापाक हरकतों से लड़कर अपने परिवार, लाहौर के गवर्नर और उनके परिजनों को बचाता है. 

बंटवारा और विस्थापन: किताब का कवर.


लाहौर में रहने वाले परिवार के सदस्य कैसे अलग-अलग विचारधाराओं के बीच बदलती कांग्रेस, देश के बदलते नक्शे और सामने फैलते आतंक को जीते हैं और अपने घर-दुकान-जमीन को छोड़ने पर मजबूर होते हैं, ये दर्द आपको किताब में महसूस करने को मिलेगा.

किताब का दूसरा हिस्सा आपको वक्त में ज्यादा दूर नहीं बल्कि नजदीक की ही कहानी बताता है. जहां विजय एक मुस्लिम लड़की शब्बो से इश्क करता है लेकिन 90 के दशक में कश्मीर में बढ़ता आतंकवाद, पाकिस्तान परस्त आकाओं के चंगुल में फंसते युवाओं का खतरा कैसे बढ़ता जाता है. कैसे आतंक की जड़ों में आकर जम्मू और कश्मीर का रंग बदल जाता है और फिर मौजूदा वक्त का सबसे बड़ा विस्थापन अंजाम लेता है. 

किताब के अंदर दो वक्त, दो जगह की कहानी एक साथ चल रही हैं. जो काल्पनिक किरदार होने के बाद भी आपको उस दर्द को सह पाने और महसूस कर पाने का अवसर देती है. जो आप अक्सर अपने बड़ों से किस्सों के जरिए सुनते हैं, उसका ही एक चरितार्थ इस किताब में देखने को मिलता है.

किताब का नाम: बंटवारा और विस्थापन
लेखक का नाम: विजय कुमार बन्टी
प्रकाशक: कनिष्क पब्लिशर्स
कीमत: 700 रुपये

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें