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जन्मदिन विशेषः फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की आज जयंती है. वह उर्दू के महान शायर थे, उनके लेखन में एक रवानी थी. जब वह लिखते तो गम और मोहब्बत जैसे एक ही सांचे में ढलते और ग़ज़ल की शक्ल में बह निकलते.

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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (फेस बुक से साभार)
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (फेस बुक से साभार)

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा...

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के एक ग़ज़ल का यह एक शेर है. उनके लेखन में एक रवानी थी. गम और मोहब्बत जैसे एक ही सांचे में ढलते और ग़ज़ल की शक्ल में बह निकलते. यों भी फ़ैज़ का अर्थ होता है, उपकार, भलाई, दानशीलता. उनका जन्म 13 फ़रवरी, 1911 को लाहौर के पास सियालकोट शहर में हुआ था. पिता सुल्तान मुहम्मद खां बैरिस्टर थे, पर परिवार प्रगतिशील न होकर बेहद रूढ़िवादी था. उनकी पांच बहनें और चार भाई थे.     

उनकी आरंभिक शिक्षा उर्दू, अरबी तथा फ़ारसी में हुई. कुरान शरीफ को कंठस्थ करना उनकी दैनिंदनी का हिस्सा था. उन्होंने आगे की पढ़ाई स्कॉटिश मिशन स्कूल तथा लाहौर विश्वविद्यालय में की. जिनमें अंग्रेजी तथा अरबी से एमए की डिग्री शामिल है.

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पढ़ाई पूरी करने के बाद वह अमृतसर के एमएओ कालेज में लेक्चरर हो गए. वहीं वह मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभाव में आए. साल 1936 वह 'प्रगतिवादी लेखक संघ' से वह जुड़े और उसके बाद सज्जाद ज़हीर के साथ मिलकर पंजाब शाखा की स्थापना की. उन्होंने लगभग नौ साल तक उर्दू साहित्यिक मासिक 'अदब-ए-लतीफ़' का संपादन किया.

साल 1941 में उनके छंदो का पहला संकलन 'नक़्श-ए-फ़रियादी' नाम से छपा, जिसने उनकी शोहरत को एक मकबूल ऊंचाई दी. इसी दौर में उन्हें एक अंग्रेज़ समाजवादी महिला एलिस जॉर्ज से मोहब्बत हुई और उनसे शादी कर वह दिल्ली में आ बसे. ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती हुए और 1942 से लेकर 1947 तक सेना में रहे. सेना में वह कर्नल के पद तक पहुंचे.

देश का विभाजन हुआ तो पद से इस्तीफ़ा देकर वह लाहौर चले गए. वहां जाकर 'इमरोज़' और 'पाकिस्तान टाइम्स' नामक प्रकाशनों का संपादन किया. लेकिन 6 महीने के भीतर ही उन्हें यह समझ में आ गया कि यह वह आजादी नहीं थी, जिसकी लड़ाई वतनपरस्तों ने लड़ी थी. इसी मानसिकता में उन्होंने ने 'सुबह-ए-आजादी' जैसी महान कृति की रचना की.

'सुबह-ए-आजादी' की शुरुआत करते हुए फैज़ ने लिखा था-

'ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शबगज़ीदा सहर

वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं'.

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फैज़ हमेशा एक आजाद ख्याल इंसान रहे. वो हमेशा बराबरी की बात करते रहे. उन्होंने खुद को किसी एक दायरे में बंधने नहीं दिया. मजे की बात यह कि जिस पाकिस्तान को अपने मुल्क के रूप में उन्होंने चुना था, वहीं लियाकत अली ख़ाँ की सरकार के तख़्तापलट की साजिश रचने के जुर्म में वह कैद कर लिए गए. यहां जेल में रहते हुए भी उन्होंने सत्ता के आगे कभी सिर नहीं झुकाया. हुकूमत ने ज्यादती की तो फैज़ ने तंज करते हुए लिखा-

निसार मैं तेरी गलियों के ए वतन, कि जहां चली है रस्म

कि कोई न सर उठा के चले

जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले

नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जां बचा के चले

फैज़ ने जेल में रहते हुए 'जिंदान नामा' नाम से एक रचना लिखी. इसमें पाकिस्तानी कारावास में मिले जुल्मोंसितम का पूरा ब्योरा था. हुकूमत को लगा  कि अगर उन्हें लिखने दिया गया तो वह वहां हो रही ज्यादतियों को समूची दुनिया के सामने उजागर कर देंगे. इसलिए जेल में उनके लिखने पर रोक लगा दी गई. कहते हैं फैज़ की कलम छीन ली गई. फैज़ ने तब लिखा-

मताए लौह-ओ-कलम छिन गई तो क्या गम है

कि खून-ए-दिल में डूबो ली हैं उंगलियां मैंने.

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जुबां पे मुहर लगी है तो क्या, कि रख दी है

हर एक हल्का-ए-जंजीर में जुबां मैंने

फैज़ 1951 से 1955 तक पाकिस्ताने जेल में कैद में रहे. उस धरती पर जिसे उन्होंने अपना मान अमृ्तसर और दिल्ली को छोड़ चुना था. जब वह जेल में थे तो आरोपों के मद्देनजर माना यह जा रहा था कि उन्हें फांसी की सजा होगी, पर जुर्म साबित न हो सका. उसी बंदी के दौरान मांटगोमरी जेल में 29 जनवरी, 1954 को फ़ैज़ ने अपनी एक मशहूर ग़ज़ल लिखी, जो बाद में 'हैदर' फिल्म का हिस्सा भी बनी-

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले

चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

क़फ़स उदास है, यारो सबा से कुछ तो कहो

कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

कभी तो सुब्ह तेरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़

कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्कबार चले

बड़ा है दर्द का रिश्ता, ये दिल ग़रीब सही

तुम्हारे नाम पे आयेंगे, ग़मगुसार चले

जो हम पे गुज़री सो गुज़री है शब-ए-हिज़्रां

हमारे अश्क़ तेरी आक़बत संवार चले

हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूं की तलब

गिरह में लेके गरेबां का तार-तार चले

मुक़ाम ‘फ़ैज़’ कोई राह में जंचा ही नहीं

जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले

जाहिर है, जीवन का कोई भी दौर रहा हो, फैज़ से कलम कभी छूटी नहीं. वह सेना, जेल तथा निर्वासन में जीवन व्यतीत करने के बावजूद नज़्म, ग़ज़ल लिखते रहे व अपने लेखन से उर्दू शायरी में आधुनिक प्रगतिवादी दौर को मजबूत किया. वह 1958 में स्थापित एशिया-अफ़्रीका लेखक संघ के संस्थापक सदस्यों में से एक थे.

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जेल से छूटे तो समय बदला. 1962 तक वे लाहौर में पाकिस्तानी कला परिषद् में रहे. 1963 में उन्होंने योरोप, अल्जीरिया तथा मध्यपूर्व खासकर जिनेवा, चीन, लन्दन, मास्को, हंगरी, क्यूबा, लेबनान, अल्जीरिया, मिस्र, फिलिपाइन और इंडोनेशिया का भ्रमण किया. साल 1964 में पकिस्तान वापस लौटे. 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय वे वह पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय में कार्यरत थे.

1978 में एशियाई-अफ़्रीकी लेखक संघ के प्रकाशन अध्यक्ष बने और 1982 तक बेरुत में कार्यरत रहे. 1982 में वापस लाहौर लौटे. उनकी प्रकाशित चर्चित पुस्तकों में कविता-संग्रह- नक़्शे-फ़रियादी, दस्ते-सबा, ज़िन्दाँनामा, दस्ते-तहे-संग, सरे-वादिए-सीना, शामे-शह्रे-याराँ, मेरे दिल मेरे मुसाफ़िर); लेख-संग्रह- मीजान; पत्नी के नाम पत्र - सलीबें मेरे दरीचे में और मताए-लौहो-क़लम शामिल है. 20, नवंबर 1984 को उनका देहांत हुआ. उनका आखिरी संग्रह 'ग़ुबार-ए-अय्याम' मरणोपरांत छपा.

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