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संस्मरण: रामविलास शर्मा के शब्द मेरे लिए राह बन गए

हिंदी साहित्य और आलोचना का विशाल हिमालय मेरे सामने खड़ा था. मैंने उनके पैर छुए, तो उनके मुंह से निकला, 'लिखो, खूब लिखो...खूब अच्छा लिखो'...हिंदी के सर्वाधिक प्रतिष्ठित आलोचकों में से एक, संस्कृति चिंतक और सभ्यता विचारक, डॉ रामविलास शर्मा की जयंती पर प्रकाश मनु की यादें

प्रोफेसर रामविलास शर्मा [फाइल फोटो] प्रोफेसर रामविलास शर्मा [फाइल फोटो]

रामविलास शर्मा हिंदी के बड़े आलोचक थे, संस्कृति चिंतक और सभ्यता विचारक भी. वे हिंदी के ऐसे गौरव शिखर थे, जिन पर पूरे हिंदी जगत को नाज था. पर इसके साथ ही उनके व्यक्तित्व में एक सम्मोहक खुलापन भी था. निर्मल सच्चाई की आब उनके चेहरे पर हमेशा झिलमिलाती थी. संवाद प्रारंभ होते ही वे सच को थाहने के लिए जैसे हमारी उंगली पकड़कर आगे चल देते थे. इसलिए जहां पहले अंधेरा ही अंधेरा हमें लगता था, वहां अब कुछ उम्मीद की रोशनी हमें झिलमिलाती नजर आ जाती थी. ये बड़े सुकून के पल होते थे. जीवन, साहित्य और संस्कृति के एक नए साक्षात्कार सरीखे. साथ ही यह हमारे लिए पुनर्नवा होने जैसा अनुभव होता. लगता, मन और आत्मा से हम रिचार्ज्ड हो गए हैं. यही रामविलास जी की शक्ति थी, यही उनके व्यक्तित्व का आकर्षण था, जिसके कारण वे दूर से ही खींचते थे. एक बार मिलने के बाद फिर-फिर उनसे मिलने का मन होता था.
याद पड़ता है, रामविलास जी से पहली मुलाकात सन् 72-73 में आगरा में हुई थी. उनके नई राजामंडी वाले निवास पर. तब मैं प्रकाश मनु नहीं हुआ था, चंद्रप्रकाश रुद्र था. आगरा कॉलेज, आगरा में पढ़ता था और भौतिक विज्ञान में एम.एस-सी. कर रहा था. उस मुलाकात की कुछ पुलक भरी स्मृतियां आज भी जेहन में दस्तक देती हैं. उन दिनों मैंने नए-पुराने कवियों का एक संकलन तैयार किया था, 'रोशनी के बीज', जिसमें आगरा के कुछ अन्य कवियों के साथ रामविलास जी की भी एक कविता है और वही संग्रह की पहली कविता भी है.
पर रामविलास जी से लंबी और कहीं अधिक खुली मुलाकात हुई बरसों बाद, सन् 1992 में दिल्ली में. पत्नी के निधन के बाद रामविलास जी अब दिल्ली में ही, विकासपुरी में अपने बेटे विजय के साथ रह रहे थे. यही समय था, जब उन्हें फिर से जानने का मौका मिला और एक छूटा हुआ तार जुड़ा. सन् 1992 में के.के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा रामविलास शर्मा को व्यास सम्मान प्रदान किया गया. दृढ़निश्चयी रामविलास जी ने सम्मान की राशि लेने से इनकार कर दिया और बड़ी मुश्किल से इस बात के लिए राजी हुए कि बिड़ला जी उनके घर जाकर, उन्हें एक नारियल और प्रशस्ति-पत्र प्रदान करेंगे. रामविलास शर्मा बड़े कद के लेखक थे और निराला पर उनका काम मुझे बेहद रोमांचित करता था. पर अपनी अडिग सैद्धांतिकता के कारण पुरस्कार की राशि ग्रहण न करने के उनके निर्णय ने मेरी निगाहों में उनके कद को कहीं अधिक बड़ा कर दिया था.
इस अवसर पर 'दैनिक हिंदुस्तान' के रविवासरीय परिशिष्ट के लिए मुझे रामविलास जी का एक लंबा और खुला इंटरव्यू लेने का काम सौंपा गया. मेरे लिए यह प्रसन्नता और आनंद की बात थी. मैंने तब तक उनकी 'निराला की साहित्य साधना और 'आस्था और सौंदर्य' आदि पुस्तकें, 'रूप-तरंग' और 'तारसप्तक' की कविताएं तथा कुछ निबंध पढ़ रखे थे. पर इस इंटरव्यू की तैयार के लिए उन्हें दोबारा पढ़ना जरूरी था. सो रामविलास शर्मा की जितनी पुस्तकें संभव थी, मैंने एकत्र कीं और उनका अध्ययन शुरू कर दिया. उनमें गंभीर और भारी-भरकम आलोचनात्मक किताबों के साथ-साथ 'घर की बात' जैसी नितांत घरेलू और अनौपचारिक किताब भी थी. कुछ किताबें भाषावैज्ञानिक अध्ययन से संबंधित थीं. इन्हें पढ़कर मैं चकित था, रामविलास जी की विद्वत्ता से अधिक उनके ज्ञान और रुचियों की विविधता का देखकर. हालांकि उनका बात कहने का अंदाज इतना सीधा-सादा और प्रभावी था कि बात सीधे दिल में उतरती थी. यह बात शुरू से ही मुझे खींचती रही है और इससे बड़े लेखक की एक कसौटी मेरे मन में बनी कि वह 'उरझावनहारी' नहीं, 'सुरझावनहारी' बात करता है और उसके बाद भी अपनी गहरी छाप छोड़ता है.
मैंने रामविलास शर्मा जी को फोन करके कहा कि मैं 'दैनिक हिंदुस्तान' के लिए उनसे लंबी बातचीत करना चाहता हूं, तो उन्होंने तुरंत स्वीकृति दे दी. बोले, "आप शाम को छह बजे आ जाइए. दिन में तो मैं अपना लिखने-पढ़ने का काम करता हूं."
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मैं शाम को उनके घर का पता मालूम करके उनके घर पर (सी-358, विकासपुरी) पहुंचा. हड़बड़ी में शाम छह बजे के बजाय मैं वहां पांच, सवा पांच बजे ही पहुंच गया था. संकोच में था, कहीं वे बुरा तो नहीं मानेंगे? वे घूमने जाने के लिए तैयार थे. मेरा नाम सुना तो उन्हें तुरंत याद आ गया. बोले, "मैं पार्क में घूमने जा रहा हूं. आप चाहें तो मेरे साथ ही चलिए."
मेरे लिए भला इससे अधिक आनंददायक और क्या हो सकता था? मुझे लगा, समय से पहले जा धमकने की जो गलती हुई, वही शायद अब मुझे रास आ रही है.
पार्क उनके घर से थोड़ी ही दूर था, कोई डेढ़-दो फर्लांग. मैं उनसे बातें करते हुए उनके साथ-साथ चल पड़ा. बातचीत यहां से शुरू हुई कि यहां दिल्ली की सड़कों पर बेहद शोर है और अकसर वाहनों वाले लोग, खासकर बस ड्राइवर बहुत अनियंत्रित रूप से चलाते हैं.
रामविलास जी मूड में थे और उत्साहपूर्वक बातें कर रहे थे. पार्क में पहुंचने पर पता नहीं पार्क की हरियाली का असर था या किसी और बात का, वह और ज्यादा उत्फुल्ल अवस्था में आ गए और बातचीत खासी अनौपचारिक तर्ज पर चल पड़ी. मालूम पड़ा, रामविलास जी रोज इस पार्क में आते हैं और कोई दो-तीन चक्कर रोज लगाते हैं. मेरे लिए यह जानकारी आश्चर्यचकित कर देने वाली थी कि इस उम्र में भी वे इतना तेज चल लेते हैं. उनका साथ देने के लिए मुझे सायास कुछ तेज चलना पड़ रहा था.
बातों-बातों में मैंने उनके मित्रों की चर्चा छेड़ी तो बात अमृतलाल नागर की ओर मुड़ गई. बोले, "अभी मैं नागर जी के उपन्यासों पर एक लंबा लेख लिखने के लिए उनके उपन्यास दुबारा पढ़ रहा था, तो मैं उनकी भाषा देखकर दंग रह गया. और कई जगह तो मैं अकेले में हंसता रहा कि यह शहर का आदमी भला इतनी ठेठ बैसवाड़ी के शब्द जान कैसे गया?" कहते-कहते रामविलास जी जोरों से हंस पड़े.
फिर नागर जी से अपनी लंबी मित्रता और संबंधों का जिक्र करते हुए, छेड़छाड़ का एक मजेदार प्रसंग उन्होंने सुनाया. बोले, "नागर जी मुझसे साल-दो साल छोटे थे. हम उनसे कहा करते, 'तुम हमसे छोटे हो. क्या 'तुम-तुम' करते हो? आप कहा करो! इस पर नागर जी कहते, 'हमसे 'आप' नहीं कहा जाएगा हम तो 'तुम' ही कहेंगे.'...खूब छेड़छाड़ होती थी. कभी रूठ भी जाते थे, पर फिर आसानी से मान जाते थे." कहते-कहते रामविलास शर्मा जी बड़ी मीठी-सी हंसी हंस देते हैं. मैंने नोट किया, मित्रों की स्मृति उनकी आंखों में एक बड़ी प्यारी और स्वप्निल-सी चमक भर देती है और उनका पूरा चेहरा मुलायम-मुलायम हो उठता है.
ये मेरे लिए आत्मविभोर कर देने वाले क्षण थे. ऐसे भावुक क्षण, जब आप भूल जाते हैं कि आप आए किस काम के लिए थे.
बस, रामविलास जी थे, मैं था, और चारों ओर हरियाली व प्रकृति की रम्य छटाओं के बीच, प्रशांत हवाओं की तरह धीरे-धीरे उनका अतीत खुल-खुलकर मेरे सामने आ रहा था.
मैं अवाक सा उनके साथ मानो समय के एक लंबे गलियारे में जा पहुंचा था, जहां हिंदी साहित्य के समृद्ध अतीत की कभी न भूलने वाली प्रसन्न छवियां, एक-एक कर मेरी आंखों के सामने आ रही थीं....  
मैं विस्मित सा सुन रहा था और सोच रहा था, जो हमारे लिए आज इतिहास है, कभी रामविलास जी ने उसे देखा था. बल्कि देखा क्यों, उसी के साथ-साथ, उसी के बीच वे जिए. उन्होंने हिंदी साहित्य का इतिहास भले ही न लिखा हो, पर उस इतिहास का निर्माण जिन बड़ी शख्सियतों ने किया, उनमें एक रामविलास शर्मा भी थे.

***
फिर लखनऊ में रामविलास शर्मा के पढ़ाई के दिनों की चर्चा चल निकली. वहीं निराला जी से रामविलास जी की पहली मुलाकात हुई थी. उसकी बड़ी आत्मीय चर्चा हुई. वह मानो मुग्ध होकर बताने लगे-
"तब के निराला एकदम यूनानी देवताओं जैसे लगते थे. लंबा ऊंचा कद, चौड़ी छाती, दमकता हुआ माथा. आंखों में तेज....हर समय कविताओं में खोए रहते थे. सैकड़ों कविताएं उन्हें याद थीं. और वे अपने से ज्यादा दूसरों की कविताएं सुनाया करते थे. खासकर रवींद्रनाथ ठाकुर की कविताएं सुनाना और उनकी व्याख्या करना उन्हें बहुत पसंद था."
इसी प्रसंग में पंत और निराला के आपसी संबंधों को लेकर दिलचस्प बातचीत हुई. इनके आपसी तनाव और प्रतिस्पर्धा के बारे में पूछने पर रामविलास जी ने मुसकराते हुए कहा, "इन लोगों के संबंध बड़े अद्भुत थे. निराला जी पंत की आलोचना भी करते थे, पर अगर कोई और पंत की आलोचना करता तो उस पर पिल पड़ते थे....पंत को निस्संदेह वे बड़ा कवि मानते थे, पर खुद को उनसे ज्यादा बड़ा कवि मानते थे."
कहते-कहते फिर उनके होंठों पर वही मीठी और मोहक मुसकान आ गई, जो अतीत की स्मृतियों में जाकर अपने स्नेहीजनों से मिलते समय उनके होंठों पर आ जाती है.
मैं उत्साहपूर्वक अपने 'इंटरव्यूकार' को ठकठकाता हूं. इसलिए कि रामविलास के भीतर का यह रामविलास मुझे भा रहा है. मैं समय से प्रार्थना कर रहा हूं कि वह थोड़ा रुक जाए और रामविलास शर्मा को इसी रूप में मैं थोड़ा और देखता रहूं. अचानक मैंने रामविलास जी से पूछ लिया, "अगर आप निराला से न मिले होते, तो क्या तब भी आप लेखक होते और कविताएं लिखते?"
इस पर उन्होंने मुसकाकर दृढ़ता से कहा, "हां, लेखक तो मैं तब भी होता!" और झांसी में किशोरावस्था के दिनों को और चटर्जी मास्साब तथा अपने प्रिय अन्य अध्यापकों को याद करने लगे, जिन्होंने उनमें लेखकीय ऊर्जा का स्फुरण किया था. उन्होंने बताया कि उनके निबंध इतने अच्छे होते थे कि चटर्जी मास्साब क्लास में सभी को सुनवाते थे. उन्हीं दिनों एक नाटक के लिए उन्होंने थोड़ी तुकबंदी भी की थी. नाटकों में हिस्सा भी लिया....यानी लेखन की जमीन तो पहले ही बन चुकी थी. निराला से मिलने के बाद बेशक वह और उर्वरा हुई.
अलबत्ता जब हम पार्क से घूम-घामकर कोई पौने घंटे बाद घर पहुंचे तो एक छोटा-मोटा अनौपचारिक इंटरव्यू तो हो ही चुका था. और मैं देहरी से कुछ आगे बढ़ आया था.
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घर पहुंचकर रामविलास शर्मा बाहर वाली बैठक में सोफे पर बैठ गए. बाईं तरफ मुझे बिठाया. कहा, "इधर मुझे साफ सुनाई पड़ता है. दूसरी तरफ दिक्कत होती है."
फिर उन्होंने पूछा, "आप टेप करेंगे या नोट्स लेंगे?" मैंने कहा, "मुझे याद रहता है. फिर भी कहीं-कहीं नोट्स लूंगा."
कुछ देर बाद मेरे लिए चाय आई. रामविलास जी के लिए दूध. रामविलास जी ने दूध पीने के लिए उठाया, तो मैंने देखा, उनके हाथ बुरी तरह कांप रहे हैं. बहुत-सा दूध उनके हाथों और मेज पर छलक गया. देखकर मैं भीतर ही भीतर थरथरा गया. ओह, उन जैसे साहित्य के महाबलिष्ठ आदमी का यह क्या हाल! मैं ऊहापोह में था, क्या मैं मदद करूं! कुछ बुरा तो न मान जाएंगे? तब तक उन्होंने भीतर आवाज दी और दूध को गिलास में डालकर लाने के लिए कहा. गिलास में दूध आया तो उन्होंने उन्हीं कांपते हाथों से दूध पिया...और मैंने चाय और चाय के साथ-साथ आंसू पिए.
और फिर थोड़ा सिलसिलेवार इंटरव्यू शुरू हुआ. इस इंटरव्यू में अनौपचारिकता हालांकि कम न थी और सवालों का कोई बना-बनाया ढांचा भी मेरे पास न था. पर अपेक्षाकृत यह थोड़ा गंभीर किस्म का इंटरव्यू था. मेरी कोशिश यह थी कि इसमें रामविलास के व्यक्तित्व और कामों का एक जायजा लिया जाए और उनके लेखकीय व्यक्तित्व के अंतर्विरोधों वगैरह पर खुलकर चर्चा हो. रामविलास जी पर अकसर लगाए जाते आरोपों और आक्षेपों को भी इस इंटरव्यू की जद में लिया जाए और उन पर खूब जमकर बातचीत हो.
रामविलास जी पार्क में घूमते समय इतना बोलकर आए थे, पर अभी थके न थे. आवाज उनकी वैसी ही कड़क और बुलंद थी. हाथों में कंपन भले हो, आवाज में कंपन जरा भी न था!...इस बात ने मुझे भी जरा जोश दिलाया. और मैंने एक के बाद एक सवालों की झड़ी लगा दी. इनमें कुछ तो बेहद तीखे और अप्रिय सवाल थे. और रामविलास शर्मा गो कि दो-एक बार खासे उत्तेजित हुए, पर ज्यादातर उनका भाव 'बड़े भाई' वाला बना रहा, जो छोटे भाई के सवालों और जिज्ञासाओं का बडी शांति और धैर्य के साथ खूब समझा कर जवाब देता है.
यह इंटरव्यू कोई बहुत लंबा तो नहीं है, पर यह एक ऐसा इंटरव्यू है जिसे मैं अपने जीवन की एक उपलब्धि मानता हूं. इसलिए कि रामविलास शर्मा ने इतने ठोस और सधे हुए ढंग से सवालों के जवाब दिए कि यह सघन इंटरव्यू उनके काम और शख्सियत को एक तरह की समग्रता के साथ उद्घाटित करता है. शायद यही वजह है कि इस इंटरव्यू को बाद में भी कई बार, कई जगह उद्धृत किया जाता रहा है.
ये वे यादगार क्षण थे, जब मैंने साफ तौर से यह जाना कि रामविलास शर्मा दूसरे साहित्यकारों से किस मानी में अलग हैं. वे कम बोलते हैं लेकिन बहुत ठोस ढंग से बोलते हैं. और उनमें यह सेंस है कि कब रुक जाना चाहिए. बहुत लंबे जवाब उन्होंने नहीं दिए और बहके तो बिलकुल ही नहीं. लेकिन बहुत सटीक जवाब दिए और सवालों को बहुत ध्यान से सुनने के बाद बहुत रमकर और तल्लीन होकर जवाब दिए. इससे यह भी पता चला कि उन्होंने कितने कठिन संतुलन को कितनी दृढता और कठोरता से साध रखा है.
मैंने जैसा कि पहले भी कहा, बहुत-से असुविधाजनक सवाल उनसे पूछे. इसके पीछे शायद यह जिज्ञासा भी हो कि रामविलास शर्मा जैसा बड़ा आलोचक उत्तेजित होता है या नहीं? लेकिन ज्यादातर रामविलास जी मेरी परीक्षा में खरे उतरे. उन्होंने गुस्से में जवाबी प्रहार करने के बजाय ज्यादातर तो शांत ढंग से अपनी बात मेरे सामने रखने और पूरी तरह समझाने की ही कोशिश की. एकाध दफा मेरी उत्तेजना को किसी निजी चुटकी में भी दबा देना चाहा और उनके साथ-साथ बेसाख्ता मेरी भी हंसी छूट निकली. ऐसे क्षण जबकि एक 'इंटरव्यूकार' इंटरव्यूकार नहीं रह जाता, वह एक निर्मल प्रेमधारा, एक आनंदधारा में निमज्जित होने लगता है.
यह इंटरव्यू लिखकर मैंने अपने मित्र विजयकिशोर मानव को दिया जो रविवासरीय के प्रभारी थे. उन्होंने इसे इधर-उधर से टटोलकर शरारती आंखों से मुझे देखा. जाहिर है, इंटरव्यू उन्हें पसंद आया था. अगले हफ्ते वह 'दैनिक हिंदुस्तान' के 'रविवासरीय' में काफी धज के साथ छपा था. लगभग पूरे पन्ने पर. कहना न होगा, उस इंटरव्यू की खासी धूम रही.
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कुछ समय बाद साहित्य अकादमी में डॉ. रणजीत साहा से मुलाकात हुई, तो उन्होंने भी उस इंटरव्यू की तारीफ की. फिर कहा, "इधर रामविलास शर्मा अपने इंटरव्यूज की किताब तैयार कर रहे हैं, जो शायद किताबघर से छपेगी."
मैंने कहा, "'दैनिक हिंदुस्तान' में जो लंबा इंटरव्यू छपा था, वह तो शायद उनके पास होगा. लेकिन वह पूरा इंटरव्यू नहीं है. उसके कुछ हिस्से अखबार में स्थान की सीमा के कारण निकाल दिए गए थे, जबकि किताब में वह पूरा ही छपे, तो अच्छा है." साहा ने सुझाया, "तब तो आप वह पूरा इंटरव्यू रामविलास शर्मा के पास पहुंचा दें. अच्छा है, उसका उपयोग हो जाएगा."
इसके दूसरे-तीसरे रोज समय लेकर मैं रामविलास जी के पास गया. बताया, "पूरा इंटरव्यू जो मैंने लिया था, साथ लाया हूं. अगर आप अपनी इंटरव्यू की किताब में देना चाहें, तो इसी को दें, यह अच्छा रहेगा. अगर आप एक बार स्वयं इसे देख लें, तो मुझे खुशी होगी."
रामविलास जी ने कहा, "यह तो आपने अच्छा किया. मैंने आपको पत्र लिखा भी था 'दैनिक हिंदुस्तान' के पते पर." मैंने कहा, "मुझ पत्र तो मिला नहीं." फिर बताया, "मैं 'दैनिक हिंदुस्तान' में नहीं हूं. बाल पत्रिका 'नंदन' के संपादकीय विभाग में हूं."
रामविलास जी बोले, "अच्छा, मेरा अनुमान था कि आप 'दैनिक हिंदुस्तान' में हैं." फिर रुककर उन्होंने कहा, "आप यइ इंटरव्यू छोड़ जाइए, मैं इस देख लेता हूं. आप दो-तीन दिन बाद आकर ले लीजिए. मैं इसका जेरॉक्स कराकर एक प्रति अपने पास रख लूंगा."
तीसरे दिन मैं सुबह-सुबह रामविलास शर्मा के घर पहुंचा. वे भीतर से इंटरव्यू की सुधारी हुई प्रति लेकर मेरे पास आए. उसी तरह कांपते हुए हाथ, लेकिन चेहरे पर अपार दृढ़ता और गांभीर्य. बोले, "मैंने पूरा इंटरव्यू देख लिया है. मेरे विचार आपने ठीक-ठीक लिखे हैं, पर भाषा में कहीं-कहीं अंतर है. उदाहरण के लिए आपने, 'बजाय', 'बावजूद', 'दीगर', 'इस्तेमाल' जैसे कुछ उर्दू शब्दों का प्रयोग किया है. मैं इनका ज्यादा प्रयोग नहीं करता. मैंने कहीं-कहीं ये शब्द बदल दिए हैं, कहीं रहने दिए हैं. एकाध जगह मुझे बात साफ करने के लिए एक-दो वाक्य जोड़ने पड़े."
फिर कुछ रुककर उन्होंने कहा, "हां, सोवियत संघ के पतन वाले आपके सवाल का जवाब मैं कुछ अलग ढंग से चाहता हूं. यों तो पहले वाला जवाब भी सही है, पर आज हो हालात हैं, उनमें उससे गलत मैसेज भी जा सकता है. आप जरा कागज-कलम निकालकर लिख लीजिए. मैं बोल देता हूं."
असल में मेरा सवाल यह था कि क्या वे मानते हैं कि सोवियत संघ के पतन से पूरी दुनिया में कम्युनिस्ट आंदोलन को धक्का पहुंचा है. इस पर उन्होंने जवाब दिया था, "क्यों धक्का पहुंचा है? मुझे तो कोई धक्का नहीं पहुंचा, इसलिए कि वहां कम्युनिज्म था ही कहां!" लेकिन इस बार जो जवाब उन्होंने लिखवाया, वह एकदम अलग था. उनका कहना था कि 'सैटबैक' तो निश्चित रूप से पहुंचा है, इसलिए कि आगे चलकर इसका पूरी दुनिया में मजदूर आंदोलन पर बहुत बुरा असर पड़ेगा.
जवाब लिखने के बाद मैंने कृतज्ञ भाव से इंटरव्यू की वह प्रति ली और चलने लगा. अचानक मुझे न जाने क्या सूझा. मैंने कहा, "आप इस पर दस्तखत कर दीजिए और तारीख डाल दीजिए. क्योंकि अब यह एक दस्तावेज है."
रामविलास जी मुसकराए. उन्होंने कांपते हुए हाथों से उस पर दस्तखत किए और तारीख भी डाल दी.
चलते समय मैंने कहा, "मेरी इच्छा है, आपका वह कमरा देखूं, जहां बैठकर आप लिखते हैं."
"आइए, देख लीजिए." कहकर वे मुझे भीतर ले गए. एक सादा-सा कमरा. चारपाई के किनारे एक छोटी-सी मेज पर मालकिन (पत्नी) की छोटी-सी तसवीर. कुछ किताबें. कागज, पेन....फिर मुझे वे साथ वाले कमरे में ले गए, जहां उनकी किताबें थीं. पूरी दीवार में फैली किताबों की अलमारी.
"पहले यही मेरा पढ़ने का कमरा था. लेकिन बसों और ट्रैफिक का इतना शोर यहां आता है कि अब मैं यहां नहीं पढ़ता...."
रामविलास जी बता रहे थे, तो पूरी दीवार में बनी अलमारी पर फिर से मेरी नजर गई. इतनी ऊंची अलमारी से वे कैसे किताबें निकालते होंगे? कैसे अपने मतलब की किताब ढूंढ़ पाते होंगे? सोचकर मैं सिहर गया.
रामविलास जी खड़े थे और मैं चलते-चलते भी अटका था. श्रद्धा से ऊभ-चूभ हो रहा था.
"आपको क्या किसी सहयोगी की जरूरत नहीं होती, जो आपके काम में कुछ मदद करे?" अचानक मैंने पूछ लिया.
"नहीं, मुझे अकेले काम करने की आदत है." रामविलास जी ने कहा. कुछ देर बाद हंसकर बोले, "और अगर सहयोगी मिले भी, तो दो-एक से मेरा काम नहीं चलेगा. फिर तो मुझे सैकड़ों लोग चाहिए जो मेरे अधूरे काम को पूरा करें और उसे लोगों तक पहुंचाएं."
इस पर मैंने कुछ इस विश्वास से उनकी ओर देखा कि 'कभी जरूरत पड़े तो मुझे भूलिएगा नहीं.' पर प्रकट में कुछ नहीं कहा.
पैर जमीन में जैसे जड़ गए थे. न आगे जा पा रहा था, न पीछे. अचानक भावाविष्ट होकर मैंने कहा, "आपके पैर छू सकता हूं?" उन्होंने कुछ कहा नहीं, मुसकरा भर दिए. एक अजब तरह की प्रशांत मुद्रा उनकी थी, जैसे देखते ही देखते वे एक विशाल चट्टान में बदल गए हों, जिसके आसपास से कई नदियां हरहराती हुई निकल रही हों.
हिमालय! हिंदी साहित्य और आलोचना का विशाल हिमालय मेरे सामने खड़ा था. मैंने उनके पैर छुए, तो उनके मुंह से निकला, "लिखो, खूब लिखो...खूब अच्छा लिखो."
मैंने उन्हें नमस्कार किया और तेज चाल से बाहर आ गया. जैसे उनसे आंखों बचाना चाहता होऊं. मेरी आंखें गीली थीं.
वह इंटरव्यू पूरा का पूरा रामविलास शर्मा की किताब 'मेरे साक्षात्कार' में छपा. उसमें रामविलास जी की आलोचना-पद्धति को लेकर कुछ सख्त और अप्रिय सवाल भी हैं. लेकिन रामविलास जी ने पूरा इंटरव्यू ज्यों का त्यों दिया है, कहीं एक शब्द भी नहीं बदला.
आज हिंदी में 'विचारों के लोकतंत्र' की बात तो बहुत की जाती है, पर सही मायने में विचारों का यह लोकतंत्र कितने लेखकों के पास है? और कितने लेखक हैं जो अब भी अपने से छोटे या अगली पीढ़ी के लेखकों के आत्सम्मान की चिंता करते हैं! रामविलास जी ऊपर से चाहे कुछ रुक्ष और कठोर लगते हों, पर भीतर से कितने ममतालु हैं, यह मैंने प्रत्यक्ष देख लिया था.
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इसके कोई ढाई-तीन वर्ष बाद रामविलास शर्मा से एक और लंबी और तन्मयतापूर्ण बातचीत हुई, निराला को लेकर. यह इंटरव्यू मैंने उन दिनों लिया, जब निराला की जन्मशती मनाई जा रही थी.
मैं चाहता था, रामविलास जी खुद अपने से जुड़े निराला के जीवन के कुछ प्रसंग सुनाएं, और उन्होंने सचमुच ही कुछ ऐसे प्रसंग सुनाए भी. निराला से हुई पहली मुलाकात की सुखद स्मृति से लेकर उनकी निकटता और अंतरंग सान्निध्य. उनके साथ एक ही मकान में रहने की प्रसन्न यादें. उनके सुख-दुख और हादसों के साक्षी होने के एक साथ शोकातुर और रोमांचित कर देने वाले प्रसंग. और उसमें यह भी शामिल था कि निराला कविताएं लिखते कैसे थे, सुनाते कैसे थे! कविताओं पर बात करने का उनका ढंग कैसा था. और क्या अंतिम दिनों में वे ज्यादातर उत्तेजित और असामान्य अवस्था में ही रहते थे या...?
सवाल-दर-सवाल-दर-सवाल. मैंने सवालों का पूरा एक पहाड़ रामविलास शर्मा के आगे खड़ा कर दिया था. और वे बड़ी शांति, तन्मयता और गंभीरता से सवालों के जवाब दे रहे थे. उन्होंने व्यथित होकर बताया कि हालत यह थी कि मैं आगरा से उनसे मिलने जाता था, तो इलाहाबाद के लेखक पूछते थे कि निराला जी कैसे हैं? मैं कहता था, "आप लोग तो इलाहाबाद में ही हैं. जाकर उनसे मिल क्यों नहीं लेते?" लेकिन शायद ही इलाहाबाद का कोई बड़ा साहित्यकार उनसे कभी मिलने गया हो. हां, ज्यादातर यश: प्रार्थी नए लेखक ही उन्हें घेरे रहते थे.
फिर मौजूदा समय पर आते हुए रामविलास शर्मा ने एक बात बहुत दुख और चिंता के साथ कही कि आज निराला का नाम लेने वाले तो बहुत हैं, पर सच यह है कि लोगों ने निराला को पढ़ना बंद कर दिया है. उन्होंने कहा कि निराला की कविताएं ही नहीं, उनका गद्य भी बहुत महत्त्वपूर्ण है, पर उनका गद्य और भी कम लोगों ने पढ़ा है.
बातों-बातों में निराला जी से अपनी पहली भेंट का रामविलास जी ने बहुत दिलचस्प वर्णन किया है. मैं एक बार पहले भी उनसे यह सुन चुका था. पर इस बार ज्यादा रसपूर्ण ढंग से और तरतीबवार उन्होंने इस मुलाकात के बारे में बताया. हुआ यह कि रामविलास शर्मा जी लखनऊ के किसी प्रकाशक के लिए चार आने प्रति पेज के हिसाब से विवेकानंद के व्याख्यानों की एक किताब का अनुवाद कर रहे थे. वहां निराला जी भी आते थे. उन्होंने प्रकाशक से तारीफ करते हुए कहा, "अनुवाद बहुत बढ़िया है."
एक दिन रामविलास शर्मा उस प्रकाशक से मिलने गए तो थोड़ी देर में निराला जी भी आ गए. रामविलास शर्मा ने उस प्रकाशक से निराला की कविताओं की किताब 'परिमल' खरीदी थी, जो उस समय भी उनके हाथ में थी.
प्रकाशक ने रामविलास शर्मा से निराला का परिचय कराते हुए कहा, "निराला जी, यही रामविलास शर्मा हैं, जिन्होंने विवेकानंद की किताबों का अनुवाद किया है."
निराला जी बहुत प्रसन्नता से रामविलास शर्मा से मिले. फिर उनके हाथ में अपनी कविताओं की किताब देखकर बोले, "इसमें कुछ मुक्तछंद कविताएं हैं. वे शायद आपको ज्यादा पसंद न आएं."
रामविलास जी ने मुसकराकर कहा, "वही तो मुझे ज्यादा पसंद हैं."
सुनकर निराला ने चकित होकर रामविलास की ओर देखा. उनके चेहरे पर संतोष झलकने लगा. शायद इसलिए कि उन दिनों निराला की मुक्तछंद कविताओं की आलोचना ज्यादा हो रही थी. उन्हें पसंद करने वाले लोग कम थे. अलबत्ता यही वह क्षण था, जब निराला और रामविलास में मैत्री की शुरुआत हुई और वह लंबी, बहुत लंबी चली. निराला जितना प्यार रामविलास शर्मा को करते थे, उतना बहुत कम लोगों को करते थे.
कुछ दिनों बाद रामविलास शर्मा को रहने के लिए कमरे की जरूरत पड़ी, तो निराला ने कहा, "तुम अपना सामान उठा लाओ. मेरे साथ ही रहो."
रामविलास जी के लिए इससे अधिक आनंद की बात और क्या हो सकती थी? इस दौरान उन्होंने निराला को बहुत निकटता से देखा और उनका एक दुख भरा इतिहास पहली बार रामविलास शर्मा के आगे खुला. यही वह दौर था जब निराला ने 'राम की शक्तिपूजा' जैसी बड़ी कविता लिखी. 'सरोज स्मृति' जैसी महान शोकांतिका लिखी, 'तुलसीदास' जैसा गंभीर और उदात्त प्रबंध काव्य लिखा.
निराला ने किन हालात में ये कविताएं लिखीं और उस समय उनकी मन:स्थिति क्या थी? खुद उनके जीवन में क्या कुछ अघट घट रहा था? रामविलास जी से यह सब सुनना एक रोमांचक अनुभव था और शायद मैं जीवन भर इसे भूल नहीं पाऊंगा. खासकर पुत्री सरोज की मृत्यु की सूचना पाकर निराला की अवसन्न हालात! उनका रात-रात भर कमरे में चक्कर लगाना, बड़बड़ाना. फिर कागज की छोटी-छोटी पर्चियों पर 'सरोज स्मृति' का लिखा जाना....उन टुकड़ों को जोड़कर निराला द्वारा उसे एक पूरी कविता का रूप देना. निराला बुरी तरह टूट रहे थे, लेकिन भीतर उन्होंने कहीं अपने आपको बड़ी कठिनाई से साधा भी था. 'सरोज स्मृति' की यह रचना-प्रक्रिया सुनकर मुझे याद है कि मैं भीतर तक थरथरा गया था.
इसी इंटरव्यू में रामविलास शर्मा ने यह प्रसंग सुनाया कि निराला जी 'साहित्यकार संसद' की आलीशान इमारत छोड़कर फिर एक छोटी-सी कुठरिया में कैसे आ गए? जबकि साहित्यकार संसद तो बनवाया ही गया था साहित्यकारों के लिए. खासकर निराला ही महादेवी जी के जेहन में सबसे पहले थे. पर निराला तो बस कुछ दिन ही वहां रह पाए. हुआ यह कि साहित्यकार संसद में रहते हुए निराला ने एक दिन सर्दी से ठिठुरती हुई एक नौकरानी को देखा, तो दरवाजे पर लटकते हुए परदे को खींचकर उस नौकरानी को दे दिया कि, "लो, इसे ओढ़ लो."
महादेवी जी को यह पता चला तो उन्हें बुरा लगा. उन्होंने इस पर क्या कहा, यह तो पता नहीं चला लेकिन निराला उसी दिन साहित्यकार संसद की भव्य इमारत छोड़कर अपनी उसी पुरानी कुठरिया में आ गए. फिर वे कभी साहित्यकार संसद की उस भव्य और आलीशान इमारत में झांकने नहीं गए.
इस इंटरव्यू में रामविलास शर्मा ने एक महत्त्वपूर्ण उद्घाटन किया. उन्होंने कहा कि निराला के प्रबंध काव्य 'तुलसीदास' की भूमिका पर राय कृष्णदास का नाम गया है. पर यह भूमिका दरअसल उन्होंने लिखी थी. रामविलास शर्मा तब विद्यार्थी थे. प्रकाशक का विचार था कि किसी प्रतिष्ठित लेखक का नाम भूमिका पर जाना चाहिए. रामविलास शर्मा से कहा गया कि तुम लिख दो. उन्होंने भूमिका लिख दी और वह राय कृष्णदास के नाम से छपी.
रामविलास जी मुसकराते हुए बताते हैं, "इसके काफी समय बाद मैं राय कृष्णदास से मिलने गया, तो उन्होंने बड़े गर्व के साथ बताया कि कितने श्रम से उन्होंने 'तुलसीदास' की भूमिका लिखी." कहते-कहते वे जोरों से हंस पड़े.
बहरहाल, निराला से जुड़े ये तमाम जानदार प्रसंग जो रामविलास शर्मा ने मुझे सुनाए, आज भी भीतर ज्यों के त्यों गूंज रहे हैं. उस दिन रामविलास जी इस कदर 'निरालामय' थे कि उनसे मिलना एक तरह से निराला से ही मिलना था. और मेरे जीवन के सबसे बड़े सुखों में से एक सुख यह भी है कि मैंने रामविलास शर्मा से निराला पर इतनी देर तक बातें की हैं.
इसके बाद तो रामविलास जी से अऩगिनत मुलाकातें हुईं. मैं दौड़-दौड़कर उऩके पास जाता था, और वे हर बार मेरी झोली भर देते थे. वे मेरे अपने रामविलास हो चुके थे, जिनसे मिले बिना चैन नहीं पड़ता था. और वे भी अपनी स्मृतियों का आगार मेरे लिए खोल देते थे.
***

मैंने देखा, रामविलास शर्मा से लिए गए ज्यादातर इंटरव्यू विचारप्रधान हैं. उनमें देश, समाज, भाषा या साहित्य से जुड़े विभिन्न प्रश्नों पर उनकी सुचिंतित राय या विचार जानने की आकुलता रहती है. लिहाजा उनसे रामविलास जी की विचारदृष्टि स्पष्टता से सामने आती है, विद्वत्ता भी. कुछ इंटरव्यू उनके साहित्य या उनकी लिखी किसी पुस्तक को केंद्र में रखकर किए गए हैं. कुछ में उनकी जीवनकथा या किसी कालखंड विशेष में उनकी जीवन स्थितियां और मनोदशा आदि भी खुल पड़ी है. पर रामविलास जी की व्यक्तिगत रुचियां या निजी जीवन की पसंद-नापसंद भी सामने आए, ऐसा कोई इंटरव्यू नहीं लिया गया.
संयोग से ऐसा ही एक इंटरव्यू लेने का अवसर मुझे मिला. हालांकि इसका श्रेय प्रियदर्शन को है, जो उन दिनों 'जनसत्ता' में थे और 'रविवारी जनसत्ता' का काम देखते थे.
यह रामविलास शर्मा से मेरी चौथी और कहीं ज्यादा अनौपचारिक मुलाकात थी.
10 अक्तूबर को रामविलास शर्मा का जन्मदिन पड़ता है. उससे कोई पंद्रह-बीस रोज पहले मैंने प्रियदर्शन से कहा, "जनसत्ता की रविवारी पत्रिका में ज्यादातर वरिष्ठ लेखकों पर विशेष सामग्री गई है, पर रामविलास जी के बारे में नहीं छपा. मेरी इच्छा है कि इस दफा रामविलास जी के जन्मदिन पर आप उन पर एक पूरा पन्ना निकालिए. मैं उनसे एक लंबा इंटरव्यू लेना चाहता हूं, जिसमें उनकी दिनचर्या और निजी रुचियों को लेकर विविध किस्म के सवाल और उनका पूरा व्यक्तित्व पाठकों के आगे खुले. आप चाहें तो इसे अपने यहां ले सकते हैं. उनकी शख्सियत और अब तक के कामों को लेकर एक लंबा लेख भी मैं लिखना चाहता हूं."
प्रियदर्शन ने बहुत रुचि दिखाई. कहा, "आप कीजिए, जरूर कीजिए. रामविलास शर्मा पर हम जरूर कुछ विशेष सामग्री देना चाहेंगे."
प्रियदर्शन की इच्छा थी कि रामविलास शर्मा से खुला इंटरव्यू हो. एकदम अनौपचारिक बतकही जैसा, जिसमें उनके व्यक्तित्व की कई परतें खुलें. और यही मैं भी चाहता था. एकाध सवाल उन्होंने अपनी ओर से सुझाया, "मसलन आप उनसे पूछ सकते हैं कि पहली दफा उन्होंने कोट-पैंट कब पहना? वे तो गांव के व्यक्ति हैं न!" सुनकर मुझे हंसी आ गई. मैंने कहा, "ठीक है, मैं पूछूँगा. हालांकि अपनी आत्मकथा में उन्होंने इसका हलका-सा जिक्र किया है."
वहीं युवा लेखक और प्रियदर्शन के सहकर्मी संगम पांडे भी थे. उन्होंने भी उत्साहपूर्वक चर्चा में हिस्सा लिया. और रामविलास जी की आत्मकथा के एक प्रसंग का जिक्र किया कि रामविलास जी अमृतलाल नागर और राजेंद्र यादव के साथ दक्षिण भारत की यात्रा पर गए थे. रामविलास जी ने लिखा है कि जब वे समुद्र के किनारे पहुंचे, तो समुद्र को देखकर राजेंद्र यादव इतने उत्तेजित हो गए कि अपनी बैसाखियों के सहारे समुद्र की रेती पर दौड़ लगाने लगे.
अलबत्ता उसी दिन यह तय हुआ कि रामविलास जी का इंटरव्यू किया जाए. कुछ इस ढंग का अंतरंग इंटरव्यू जिसमें उनकी निजी रुचियों और व्यक्तित्व चर्चा के साथ-साथ उनके जीवन के कुछ रोचक और अनजाने प्रसंग भी खुलें. जीवन के विविध पहलुओं पर उनकी राय और विचार हों. अपने समकालीन लेखकों पर उनकी खुली टिप्पणियां हों और ऐसे तथ्य भी सामने आएं, जो रामविलास जी को एक बड़ा आलोचक बनाते हैं. यह बातचीत जो रामविलास जी के साथ मेरी आखिरी लंबी बातचीत है, सितंबर के आखिरी हफ्ते में संपन्न हुई.
मैंने फोन पर रामविलास जी से कहा कि अपने पसंदीदा लेखक के बारे में पाठकों की जो हलकी-फुलकी जिज्ञासाएं होती हैं, उन्हें सामने रखते हुए मैं उनका एक अत्यंत निजी किस्म का इंटरव्यू करना चाहता हूं. 'जनसत्ता' वाले आपके जन्मदिन के रोज उसे छापना चाहते हैं. उस दिन वे आप पर संभवत: कुछ विशेष सामग्री भी दे रहे हैं. सुनकर रामविलास जी ने कहा, "ठीक है, आ जाओ."
और सचमुच मैं वहां गया तो एक बिलकुल अलग तरह की बातचीत शुरू हुई. यह रामविलास शर्मा जैसे दिग्गज आलोचक का एक दिलचस्प इंटरव्यू था. सच कहूं तो मुझे अंदाजा नहीं था कि वे इतनी उत्फुल्लता से मेरे सवालों का सामना करेंगे और इतने खुले और अकुंठ ढंग से जवाब देंगे. और सचमुच उनके कुछ जवाब तो इतने खिलंदड़े थे जो मेरे लिए अकल्पनीय थे. इस मानी में कि मैं सचमुच इससे पहले उनका अंदाजा नहीं लगा सकता था. या कहूं कि रामविलास जी को मैंने पहले कभी इतना निकट से और ऐसी रेशा-रेशा बुनावट के साथ नहीं देखा था. मसलन उनकी रुचियों की चर्चा चली तो वे शास्त्रीय संगीत आदि की चर्चा के बाद सीधे क्रिकेट पर पहुंच गए. और कहा कि जिन दिनों क्रिकेट का मैच चलता है, उन दिनों मैं सारे काम छोड़कर मैच देखने में तल्लीन हो जाता हूं.
"ऐं, ऐसा...!" मैं चौंका. फिर पूछ लिया, "आप जो हमेशा अपने काम में जुटे होते हैं तो क्रिकेट मैच के दिनों में क्या वह बिलकुल ठप्प...?" इस पर रामविलास जी हंसे. फिर वही मुलायम-मुलायम हंसी. बोले, "नहीं, इन दिनों लिखने-पढ़ने का क्रम और दिनचर्या थोड़ी बदल जाती है. जिन दिनों क्रिकेट मैच होता है, अपने लिखने-पढ़ने का काम या तो मैं थोड़ा पहले कर लेता हूं या फिर बाद में."
"क्या टीवी देखना आपको पंसद है?" यह सवाल पूछने पर बोले, "मैं बहुत कम समय ही टीवी देखता हूं. ज्यादातर राजनीतिक डिबेट्स देखने के लिए ही टीवी खोलता हूं. इसके अलावा मुझे शास्त्रीय संगीत सुनना प्रिय है. और वह मैं सुनता हूं अपने ट्रांजिस्टर से. मुझे मालूम है, कब कहां से शास्त्रीय संगीत सुना जा सकता है. फिर मेरे पास अपनी कैसेट्स भी हैं. उनसे भी मैं शास्त्रीय संगीत सुनता हूं. हिंदुस्तानी संगीत के अलावा पश्चिमी संगीत भी मुझे पसंद है और वह भी मैं अपनी कैसेट्स से सुनता हूं."
फिर मुझे चकित करते हुए, रामविलास जी ने झांसी में पढ़ाई के दौरान हॉकी खेलने की अपनी 'हॉबी' के बारे में विस्तार से बताया और यह भी कि उनके बड़े भाई भी हॉकी के खासे शौकीन थे. बातों-बातों में रामविलास जी ने बताया कि झांसी में यों भी उन दिनों हॉकी का खासा क्रेज था जो इधर कम ही नजर आता है.
इसी रौ में मैंने उनसे डरते-डरते सवाल किया, "आपकी सबसे बड़ी शक्ति क्या है और सबसे बड़ी कमजोरी क्या है?"
मुझे लगा, रामविलास जी शायद बुरा मान जाएंगे. पर उन्होंने इस सवाल का बहुत अच्छा जवाब दिया. बोले, "मेरी सबसे बड़ी कमजोरी तो यह है कि मैं किसी की बात पर भी सहज ही भरोसा कर लेता हूं. और फिर धोखा खाता हूं. इन दिनों मैंने अपनी यह आदत थोड़ी बदली है, फिर भी खुद को पूरी तरह बदल नहीं पाया." कुछ रुककर बोले, "मेरी एक और कमजोरी यह है कि जो भी मेरे मन में आता है, कह देता हूं. यह परवाह नहीं करता कि कोई अच्छा मानेगा या बुरा. जबकि सभ्यता तो यह कहती है कि मन में क्रोध हो, तो भी उसे प्रकट मत करो. इस लिहाज से आप मुझे अशिष्ट व्यक्ति कह सकते हैं."
फिर इसी सिलसिले में एक उदाहरण भी उन्होंने दिया. हुआ यह कि एक लेखक रामविलास शर्मा के पास आए और अपनी किताब भेंट करने लगे. रामविलास जी ने कहा, "क्यों दे रहे हैं? मैं तो इसे पढ़ूंगा नहीं." इस पर वे बुरा मान गए. बताते हुए रामविलास जी के होंठों पर कुछ संजीदा-सी मुसकान आई. हालांकि यह उनकी विवशता है, इसे कम लोग समझ पाते हैं. जिस काम में भी जुटे होते हैं, उससे संबंधित इतना ज्यादा उन्हें पढ़ना होता है, इतना श्रम करना होता है कि कुछ और पढ़ने का उन्हें अवकाश ही नहीं मिलता. फिर अवस्था की भी एक सीमा है. अठासी वर्ष की अवस्था में अगर वे बाकी सब काम छोड़कर अपना पसंद का कोई काम करना चाहते हैं, तो इसकी सुविधा तो उन्हें देनी ही चाहिए.
पर वह प्रसंग तो छूट ही गया, जिस सिलसिले में यह बातचीत हुई थी. प्रश्न का आधा जवाब रामविलास जी दे चुके थे. बाकी आधे की ओर उनका ध्यान खींचते हुए मैंने कहा, "और आपकी सबसे बड़ी शक्ति?" इसका उत्तर भी उन्होंने दो टूक लहजे में दिया. बोले, "जो काम मैं ठान लेता हूं, उसे करता हूं और उसके लिए किसी बड़े से बड़े आदमी की नाराजगी या बड़े से बड़े विरोध की परवाह नहीं करता. यही मेरी सबसे बड़ी शक्ति है. मैं तो अपने पास आने वाले लेखकों से भी कहता हूं कि जो तुम्हें ठीक लगता है, वह करो. और उसके आगे बड़े से बड़े विरोध की परवाह मत करो."
कहते-कहते उनका चेहरा आत्माभिमान से दिपदिपाने लगा. आंखों में वही चमक, जो रामविलास शर्मा को रामविलास शर्मा बनाती है.
लेकिन इस सवाल पर उन्हें थोड़ा और कुरेदते हुए मैंने पूछा, "लेकिन यह स्वभाव आपका बना कैसे? कुछ सोचकर बताएंगे?" इस पर रामविलास जी ने तत्काल जवाब दिया, "यह मेरा पैतृक गुण है. मुझ पर मेरे बाबा का बड़ा असर है. वे मिलिट्री में थे, पर अफसर से झगड़ा हो जाने पर नौकरी को लात मारकर चले आए थे. यही गुण दऊआ (पिता) में था. वे किसी से दबते नहीं थे और जरा-सा भी स्वाभिमान पर चोट लगने पर फौरन नौकरी छोड़कर चले आते थे. कहीं ज्यादा टिकते नहीं थे...."
इसी सिलसिले में एक अटपटा-सा सवाल मुझे सूझा और मैंने अनायास ही पूछ लिया, "आप क्या चाहेंगे, आपके बाद आपको कैसे लेखक के रूप में याद किया जाए?" इस पर रामविलास जी थोड़े उत्तेजित हो गए. क्षुब्ध स्वर में बोले, "मैं चाहूंगा कि मेरे बाद मुझे बिलकुल याद न किया जाए."
मैं स्तब्ध! क्या मेरे प्रश्न में कोई ऐसी अवज्ञा थी, जिससे वे आहत हुए. मैंने तो जिस हलके-फुलके अंदाज में बात हो रही थी, उसी में पूछ लिया था. पर एक क्षण बाद रामविलास जी खुद ही सहज हुए. अपना आशय स्पष्ट करते हुए बोले, "इसके बजाय मैं चाहूंगा कि जिस काम में मैं जीवन भर लगा रहा, कोई उसे पूरा करे और आगे बढ़ाए. किसी को याद करने का मतलब ही यही होता है. व्यक्ति का क्या है! व्यक्ति तो आता है, जाता है. उसके काम को याद करना चाहिए."
***

और अब जबकि रामविलास शर्मा को गए एक लंबा अंतराल हो गया, वे क्यों इस तरह हजार हाथों से मुझे खींच रहे हैं? उनका होना पहले से अधिक क्यों भासता है? हर बार जब उनकी किताबों के नजदीक होता हूं, उनसे गुजर रहा होता हूं, तब क्यों लगता है, रामविलास जी ऐन मेरे सामने बैठे हैं? उन्हें सुन रहा हूं. उनसे हू-ब-हू साक्षात्कार हो रहा है.
और अब जबकि रामविलास शर्मा नहीं हैं, मेरे भीतर फिर से एक ऊहापोह, एक द्वांद्वात्मक उलझन, एक जंग छिड़ गई है. और मैं फिर से अपने से रू-ब-रू हूं- रामविलास जी से मैंने क्या सीखा?...
यह तय है कि रामविलास जी से मिलने के बाद मैं वह नहीं रहा, जो पहले था. कोई भी उनसे मिलने के बाद वह नहीं रह सकता था. क्योंकि रामविलास जी ललकारते थे. पूर्वाग्रहों से निकलकर खुले में आने के लिए ललकारते थे. खुले संवाद के लिए न्योतते थे और जैसे हम सोचते आ रहे हैं, आदी हो चुके हो सोचने के, उससे अलग तरह से भी सोचा जा सकता है, इस संभावना के साथ आगे चलने और एक खुले विचारोत्तेजक संवाद में उतरने के लिए ललकारते थे.
याद पड़ता है, उनके निधन से कुछ ही महीने पहले मैं हिंदी से जुड़े सवालों को लेकर उनके पास गया, तो खासा उत्तेजित था. 'हा-हा हिंदी दुर्दशा देखी न जाई!' इन शब्दों के साथ, अपने ही देश में हिंदी की दारुण दुर्दशा की तसवीर खींचते हुए, बड़े व्याकुल कर देने वाले प्रश्न मैंने उनसे पूछे थे. एक के बाद एक सवाल, जो बरसों से मेरे भीतर उथल-पुथल मचा रहे थे. रामविलास शर्मा सरीखे हिंदी के दिग्गज साहित्यकार के सामने मैं बैठा था, तो भला पूछे बिना कैसे रहता? मैं यों तो हिंदी से जुड़ी समस्याओं पर उनसे इंटरव्यू करने गया था, पर इंटरव्यू तो पीछे छूट गया. अंदर की पीड़ा ही फूट-फूटकर बाहर आ रही थी.
यों हिंदी के प्रश्न पर रामविलास जी भी बहुत व्यथित थे, और इस संबंध में बहुत बड़ी लड़ाइयां उन्होंने लड़ी थीं. पर उन्होंने बहुत स्पष्टता से, हिंदी की समस्या को एक बड़े आधारफलक पर रखते हुए, मुझे समस्या के मर्म तक पहुंचने की राह सुझाई. और फिर वह तरीका भी बताया, जिससे हिंदी फिर से अपने गौरव को पा सकती है. उसके लिए कैसी लड़ाइयां हमें लड़नी होंगी, उसका पूरा नक्शा उनके जेहन में था. उन्होंने इंटरव्यू में सवालों के जवाब ही नहीं दिए, यह पूरा नक्शा भी मेरी आंखों के आगे उतार दिया.
रामविलास जी का यही तरीका था. समस्या कोई भी हो, वे बिना किंतु-परंतु के, सीधे उसके मर्म को पकड़ने थे. उससे जुड़ी परिस्थितियों और दबावों का अध्ययन करते थे. इस बारे में दूसरे विद्वानों की राय को भी गंभीरता से पढ़ते, समझते और बड़ी ईमानदारी से उससे जिरह करते थे. और फिर यहीं से उसका बड़ा सुलझा हुआ हल भी निकल आता था.
इसी तरह मैं भूल नहीं पाता कि अपने अंतिम दिनों में जब रामविलास जी हिल-डुल भी नहीं पाते थे, तो भी वे अपनी बीमारी के बारे में नहीं, बल्कि अपनी अधूरी पुस्तक 'तुलसीदास और उनका सौंदर्य-बोध' के बारे में सोचते रहते थे. उन्होंने मुझे बताया था, मैं तो उसे पूरा करने के लिए मन ही मन नक्शे बनाता रहता हूं....
सुनकर मैं अवाक् रह गया था.
पर आज समझ में आता है कि रामविलास शर्मा केवल मेरे सवाल का जवाब ही नहीं दे रहे थे, बड़े बेमालूम ढंग से मुझे काम करने का सही ढंग और दिशा भी बता रहे थे. एक सच्चे साधक की तरह काम करना क्या होता है, यह मैंने उऩसे ही सीखा.
रामविलास जी जब भी कोई पुस्तक लिखते थे, तो उसके लिए काफी अध्ययन और चिंतन करने के बाद मन ही मन पूरी पुस्तक का एक नक्शा बना लेते थे. फिर धीरे-धीरे इसी नक्शे के अनुसार काम करते हुए, किताब को पूर्णता तक पहुंचाते थे. हालांकि शुरू में जो नक्शा बना, वही अंत तक रहे, यह भी जरूरी नहीं था. कई बार काम करते-करते आगे की दिशाएं खुलती थीं. तब नक्शे में भी थोड़ा सा फेर-फार भी हो जाता था. पर मूल नक्शा तो वही रहता था.
काश, रामविलास जी आज होते तो मैं उन्हें बताता कि उनका दिया हुआ यह मंत्र मेरे कितने काम आया.
अपने जीवन के कोई बीस-बाईस वर्ष मैंने हिंदी बाल साहित्य का बृहत् इतिहास लिखने में लगा दिए. पिछले सवा सौ वर्षों में छपी हिंदी बाल साहित्य की हजारों दुर्लभ किताबें पढ़कर, इस इतिहास-ग्रंथ को लिखना किसी पहाड़ को उठा लेने से कम न था. पर रामविलास जी का विपुल काम ही नहीं, बल्कि काम करने का तरीका भी मेरे सामने था. और उनका दिया मंत्र भी निस्संदेह, जिससे कोई काम बोझ नहीं लगता. आज सोचता हूं कि अगर रामविलास जी का दिया यह मंत्र मेरे सामने न होता तो मैं शायद इस पहाड़ सरीखे काम के बोझ तले दब गया होता, और यह बृहत् इतिहास-ग्रंथ कभी सामने न आ पाता.
और आज भी कोई पुस्तक लिखते हुए, मैं मन ही मन उसका नक्शा बनाता हूं, और मैं उस पुस्तक पर काम कर रहा होऊं या नहीं, वह नक्शा तो रात-दिन मेरी आंखों के आगे रहता ही है. फिर एक दिन वही उस काम को पूरा भी करवा लेता है....
क्या इसे मैं रामविलास शर्मा सरीखे तपोनिष्ठ गुरु का आशीर्वाद न मानूं?
सच कहूं तो मैं आया तो था उनके पास एक इंटरव्यू करने. एक इंटरव्यूकार की धुन और बेचैनी मेरे भीतर थी, जो उन जैसे धुरंधर लेखक से उसका सर्वश्रेष्ठ पाने के लिए लालायित था. पर यह तो मैं आज भी नहीं जानता कि सवाल पूछते-पूछते न जाने कब मैं उनका शिष्य बन गया.
ऐसे क्षण जीवन में कम ही आते हैं, जब किसी संयोग से हमारा पूरा जीवन ही प्रकाशित हो उठता है. रामविलास जी से मिलना मेरे जीवन का ऐसा ही सौभाग्य है, जिसने मुझे भीतर-बाहर से बदल दिया. उन्होंने मुझे भीतर से जगा दिया, और बहुत लिखने-पढ़ने, बहुत काम करने का आशीर्वाद दिया. इससे बड़ा आशीर्वाद मेरे जीवन में कोई और हो भी नहीं सकता.
***

ऐसे ही पुरस्कार और सम्मानों के लिए उनकी घोर विरक्ति ने मेरी आंखें खोल दीं, और बिन कहे समझा दिया कि एक सच्चा लेखक क्या होता है. एक लेखक का स्वाभिमान क्या होता है! बहुत से लोग और संस्थाएं उन्हें आदर से बुलाती थीं, सम्मानित करना चाहती थीं. पर रामविलास शर्मा के लिए उनका काम ही सब कुछ था. अपना काम बीच में छोड़कर, यहां-वहां सम्मानित होने चल देना उन्हें बड़ा ही हेय, बल्कि हास्यास्पद लगता था. उनका मानना था कि किसी लेखक का सच्चा सम्मान तो उसका साहित्य पढ़ना है. इसलिए कोई उन्हें सम्मानित करने के लिए आमंत्रित करता, तो उनका जवाब होता था, आप मेरा लिखा हुआ पढ़ लीजिए. बस, यही मेरा सम्मान है!
कहना न होगा कि रामविलास जी का यह तरीका मुझे बहुत भाया और उसने पुरस्कारों के मायाजाल के साथ-साथ, बहुत तरह के भटकावों से भी मुझे बचाया. एक ऐसे समय में जब युवा लेखकों को ही नहीं, खासे पहुंचे हुए साहित्यकारों को भी मैं पुरस्कारों के लिए लालायित होकर यहां-वहां दौड़ते देखता हूं, रामविलास शर्मा की दृढ़ता मुझे राह दिखाती रही है.
ऐसे बुरे वक्तों में जब साहित्य की जमीन पर लोभ-लालच की फिसलन कहीं ज्यादा है, रामविलास जी ने मुझे मजबूती से पैर जमाकर, पूरे स्वाभिमान के साथ सिर उठाकर खड़े होने की ताकत दी. यही मेरी जीवनशक्ति भी है, जो मुझे बुरे से बुरे समय और हालात में भी हारने नहीं देती, और कलम के स्वाभिमान के साथ जीने के लिए प्रेरित करती है, जैसे स्वयं रामविलास जी जिए. वे अंतिम सांसों तक काम करते हुए गए. मैं भी मन ही मन यही प्रार्थना करता हूं कि अंतिम सांसों तक काम करते हुए, खुशी-खुशी इस दुनिया से जाऊं!
यों सबसे बढ़कर तो गंभीरता से अपना काम करने का रामविलास जी का मंत्र था, जो मेरे लिए जीवन आदर्श बन गया. उन्होंने ही यह सीख दी थी, कि तुम बस, चुपचाप अपना काम करते रहो, और किसी बात की परवाह न करो. कोई उसकी चर्चा करे या नहीं, इसकी भी नहीं. अगर तुम्हारे काम में दम है, सच्चाई है, तो आज नहीं तो कल लोग उसे समझेंगे ही, और आने वाला समय उसका मूल्यांकन करेगा. हो सकता है, तुम्हारे जीवन-काल में नहीं, बल्कि तुम्हारे जाने के बाद उसका मूल्यांकन हो. पर कभी न कभी तो होगा जरूर!
और रामविलास जी के शब्द मेरे लिए राह बन गए, जिससे मेरे आगे काम करने की दिशाएं खुलती चली गईं.
इसके बाद मेरी बहुत पुस्तकें आईं. बहुत काम भी किया. जल्दी ही एक लंबी समाधि लगाकर काम करने की आदत पड़ गई, तो इसके पीछे भी रामविलास शर्मा ही थे. उनका लिखने और जीने का आदर्श ही था....
इन बीसेक वर्षों में जो कुछ मैंने लिखा, या जो पुस्तकें आईं, उनमें से किसकी चर्चा हुई, किसकी नहीं, यह चीज बहुत मायने नहीं रखती. इसलिए कि गुरु की तरह मेरे अंतःकरण को प्रकाशित करने वाले रामविलास शर्मा तो हर घड़ी मेरे साथ ही हैं. वे हमेशा की तरह मुसकराते हुए, मेरे अंदर हिम्मत से जीने का हौसला भर देते हैं. और बड़े ही बेबाक शब्दों में कह जाते हैं कि देखो प्रकाश मनु, जो काम तुम करते हो, वह कभी बेकार नहीं जाता. वह कहीं न कहीं अंदर से तुम्हें समृद्ध जरूर करता है. कोई उसका नोटिस ले, न ले, पर तुम्हारा किया हुआ काम बोलता जरूर है. तुम्हारे बाद लोग तुम्हें उसी से याद करेंगे....बाकी चीजें लोग भूल जाएंगे, बस, तुम्हारा काम बचा रहेगा....
और ये शब्द काम करने वाले किसी सीधे-सच्चे लेखक के लिए कितना बड़ा हौसला बन जाते हैं, इसका एक गवाह मैं भी हूं.
रामविलास शर्मा जितना कर गए, बगैर बड़े प्रतिष्ठानों की मदद के, अकेले, अपने बूते पर जो कर गए, वह खुद में दस-बीस आलोचकों से बढ़कर हैं. साहित्य, संस्कृति, राजनीति, इतिहास, भाषा-विज्ञान, शायद ही कोई क्षेत्र हो, जिसमें उन्होंने अपनी असाधारण मेधा के बल पर मौलिक और युगांतकारी काम न किया हो! जाहिर है, काम में उनका मुकाबला नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसके लिए बहुत-से प्रलोभनों और 'नाम चमकाने वाली कवायदों' से हटकर गंभीरता से जुटने की जरूरत है.
इसलिए उनके जीवन-काल में ही तमाम लोग थे, जो उनके काम को हंसकर उड़ाने की कोशिश करते रहे. पर रामविलास जी की कीर्ति की प्रतिमा निरंतर बड़ी होती गई. और समय के साथ वह और बड़ी होती जाती है.
मेरे सरीखे बहुत सारे लेखक, जो उन्हें चाहते थे और जिन्होंने उनके पास रहकर सीखा, उनसे खुली मुलाकातों के बाद जिनका 'व्यक्तित्वांतरण' हुआ, उनके लिए तो जैसे वे तब थे, वैसे ही आज हैं. बल्कि आज उनका होना पहले से कहीं अधिक महसूस होता है.
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संपर्कः प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008, मो. 09810602327, मेल आईडीः prakashmanu333@gmail.com

 

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