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जयंती विशेषः प्रेमचंद की महाकाव्यात्मक कृति है गोदान

'रामचरितमानस' में अगर कल का हिंदुस्तान है तो 'गोदान' में आज का हिंदुस्तान है और यों 'गोदान' मानो 'रामचरितमानस' की अगली कड़ी है.

गोदान का आवरण-चित्र और लेखक प्रकाश मनु [इनसेट में] गोदान का आवरण-चित्र और लेखक प्रकाश मनु [इनसेट में]

आज याद करता हूं, तो लगता है, शुरू से ही 'गोदान' मेरा पीछा कर रहा है. किशोरावस्था में जब इसे पहली बार पढ़ा था, तभी से. तब से 'गोदान' कई बार पढ़ा. घटनाएं पता थीं. यानी कथा-विन्यास परिचित, पात्रों से तो पहले ही मिल चुका था. मगर हर बार 'गोदान' को पहले से अधिक अर्थमय, पहले से अधिक व्यंजक, काशिशभरा और असरदार पाया. कुछ और अपनत्व और तेजी से अपनी ओर खींचता हुआ.
'गोदान' में यह क्या है जो इतना अधिक अपना-सा है? 'गोदान' में यह क्या है जो इतना अधिक खींचता है? 'गोदान' की इस कशिश का राज क्या है?...'गोदान' पढ़कर हर बार यही सवाल मेरे आगे आकर खड़ा हो जाता है. और मैं स्वीकार करता हूं कि इसका ठीक-ठीक जवाब मुझे कभी मिल नहीं पाया. या शायद यह कि सवाल तो हर बार वही रहते थे, पर जवाब हर बार बदल जाता था. जो कि बदलकर भी पूरी तरह बदलता नहीं था. जैसे कि गोदान की तासीर! किशोरावस्था में पढ़ा था, तब की याद है. और अभी सत्तर बरस की उम्र में एक बार फिर पढ़कर खत्म किया, तब भी उस जाने हुए को और अधिक गहरा-गहरा होकर जाना.
और तभी यह जाना कि 'गोदान' की यह खासियत- उसकी हमेशा वैसी ही बनी रहने वाली तासीर उसे महज एक उपन्यास नहीं रहने देती. उपन्यास एक-दो बार पढ़ने के बाद बासी लगने लगता है, लेकिन 'गोदान' नहीं. वह उससे कहीं अधिक है. बल्कि शायद उससे बहुत अधिक. और सच ही वह हमारे आधुनिक समाज का महाकाव्य है जिसमें समूचा हिंदुस्तानी समाज अपनी शक्ति, मनोरथ, सपनों और कमजोरियों के साथ प्रतिबिंबित हुआ है. 'गोदान' इतना बड़ा उपन्यास है कि उसमें हिदुस्तानी समाज के जो अक्स आए, उनमें खुद-ब-खुद इतिहास से कहीं अधिक सच्चा इतिहास चला आया....और यों उपन्यास, इतिहास और भारतीय समाज की सच्ची छटपटाहट और सपनों ने मिलकर 'गोदान' को एक ऐसे 'संपूर्ण' महाकाव्य में बदल दिया, जो जितना यथार्थ के स्तर पर सही उतरता है, उतना ही रूपक के स्तर पर भी.
देखा जाए तो 'गोदान' का हर पात्र अनायास ही खुद में एक गहरी प्रतीकात्मकता भी लिए हुए है, मानो वह हिंदुस्तानी समाज की किसी खास चित्त-वृत्ति का प्रतीक हो. और यों 'गोदान' सिर्फ एक उपन्यास नहीं रहा, आज का हिंदुस्तान हो गया, जिसे शब्द-शब्द पढ़कर हम अपने आप को कहीं अधिक पास से और कहीं अधिक उत्कटता से जान लेते हैं....ठीक वही बात जो गोस्वामी तुलसीदास के 'रामचरितमानस' के बारे में कही जाती है. 'रामचरितमानस' में अगर कल का हिंदुस्तान है तो 'गोदान' में आज का हिंदुस्तान है और यों 'गोदान' मानो 'रामचरितमानस' की अगली कड़ी है. बल्कि मानस के बाद अगर सच में कोई बड़ा महाकाव्य हमारे यहां लिखा गया जो समूचे हिंदुस्तानी समाज के यथार्थ और अंतर्मन को गहराई से प्रतिबिंबित करता है, तो वह 'गोदान' ही है.
'कामायनी' हो 'साकेत' या 'प्रियप्रवास', इस मामले में 'गोदान' के आगे टिक नहीं पाते. यह इन प्रसिद्ध काव्य-कृतियों की महाकाव्यात्मकता और विशेषताओं का नकार नहीं, बल्कि इस बात को रेखांकित करना है कि अपनी तमाम कलात्मक विशेषताओं के बावजूद, वे उस तरह हिंदुस्तानी समाज की प्रतिनिधि कृतियां नहीं हैं, जैसा 'गोदान' है.
'गोदान' उपन्यास होकर भी, उनसे बड़ा महाकाव्य है, क्योंकि उसकी जड़ें हिंदुस्तानी समाज में कहीं गहरे जाती हैं और वह हमारे रोजमर्रा के संघर्षों और यथार्थ के इतना करीब है! यों 'गोदान' एक अनूठे बल्कि चमत्कारी ढंग से हिंदुस्तानी समाज के एक सच्चे और प्रतिनिधि महाकाव्य में खुद-ब-खुद बदलता गया है.
'गोदान' उपन्यास है तो क्या! 'गोदान' गद्य में लिख गया है तो क्या!...'गोदान' सच ही गद्य में लिखी गई कोई चार सौ पन्ने की प्रदीर्घ कविता है. 'गोदान' उपन्यास की शक्ल में लिखा गया आज के हिंदुस्तान का बहुत सच्चा, खरा और कालजयी महाकाव्य है. 'गोदान' जितनी बार भी पढ़ें, हम रंग-रंग के पात्रों, भावनाओं, आदर्शों और जीवन-स्थितियों के महासिंधु में इसी तरह डुबकियां लगाते और थपेड़े खाते हैं, जैसे 'रामचरितमानस' को पढ़ते हुए. इसीलिए 'गोदान' का महत्त्व दिनोदिन बढ़ता ही जाता है. 'गोदान' की सार्वजनीनता दिनोदिन बड़ी और गहरी होती जाती है.
यह महत्त्व बेशक 'गोदान' की उपन्यास कला का तो है, लेकिन उससे बढ़कर 'गोदान' की महाकाव्यात्मकता का है, जो उसे आम हिंदुस्तानी आदमी के सच्चे और खरे जीवन-संघर्षों के महाकाव्य के रूप में अपार स्वीकृति प्रदान करता है.

2.
'रामचरितमानस' के राम और सीता हुए थे या नहीं, हम ठीक-ठीक नहीं जानते. और हुए थे, तो क्या वे ठीक-ठीक वैसे ही थे, जैसे वे मानस में वर्णित हैं? यह भी हम ठीक-ठीक नहीं जानते. लेकिन हम यह जरूर जानते हैं कि ऐसे राम और सीता जैसे मानस में हैं, संभावित बिल्कुल हैं और उन्हें सिर्फ तुलसी ने ही नहीं उपजाया, वे समूची हिंदुस्तानी कल्पनाभूमि, समूचे हिंदुस्तानी मानस और आदर्श की उपज हैं. यही कारण है कि राम-सीता थे, राम-सीता हैं और जब तक हिंदुस्तानी समाज रहेगा, राम-सीता भी रहेंगे. वे हमारे दिलों और हिंदुस्तानी समाज की मिट्टी में रले-मिले हुए हैं.
ठीक यही बात 'गोदान' के पात्रों, खासकर होरी और धनिया के बारे में कही जा सकती है कि प्रेमचंद तो सिर्फ एक माध्यम, एक बहाना हैं, वरना उन्हें समूची हिंदुस्तानी कल्पना-भूमि, समूचे हिंदुस्तानी मानस और आदर्शों ने जन्म दिया है. उन्हें सिर्फ पचासी बरस पहले प्रेमंचद ने नहीं सिरजा, वे तो सदियों से थे और आगे अभी सदियों तक बने रहेंगे. प्रेमचंद ने तो बस उन्हें बीसवीं शताब्दी में आधुनिक आकार भर दिया है, वरना वे कब नहीं थे! सच पूछा जाए तो होरी और धनिया हिंदुस्तानी मिट्टी में पैदा हुए ऐसे सच्चे और खरे पात्र हैं, जो अपने मामूलीपन के बावजूद देखते-ही-देखते इतने बड़े हो गए और लगातार इतने बड़े होते जा रहे हैं कि ताज्जुब होता है.
एक उपन्यास के पात्रों का समय के साथ-साथ लगातार बड़ा होते जाना- और होते-होते इतना बड़ा हो जाना कि वे एक अरब लोगों के समाज के सर्वाधिक प्रतिनिधि पात्र बन जाएं- गोदान के पात्रों की यह अचरज भरी विशेषता साबित करती है कि अब वह एक उपन्यास से ऊपर उठकर, एक अद्भुत महाकाव्य में तब्दील हो चुका है.

3.
अलबत्ता 'गोदान' ऐसा महाकाव्य है जो आदर्शों की दुनिया में विचरण करते हुए भी, पूरी तरह यथार्थ की जमीन पर खड़ा है. यही चीज उसे मानस से अलगाती है तो साथ ही उसे मानस की अगली यथार्थवादी कड़ी भी साबित करती है. यानी मानस जहां 'गुजरे हुए कल' का महाकाव्य है, वहीं 'गोदान' आज का महाकाव्य है और कोई आठ दशक गुजर जाने पर भी, वह आज का ही महाकाव्य लगता है. मुझे लगता है, अभी अगले कम से कम सौ बरसों तक वह 'आज' का ही महाकाव्य रहेगा. 'गोदान' की निरंतर पुनर्नवा होने की यही विकट अंत:शक्ति है, जो हमें चकित करती है. पर 'गोदान' की यही अंत:शक्ति हमें उसे उपन्यास से अधिक महाकाव्य कहने के लिए बार-बार उकसाती भी है.
और मैं तो यहां तक कहना चाहूंगा कि यथार्थ की जमीन पर खड़े होरी और धनिया इस महाकाव्य के नए नायक-नायिका ही नहीं, नई युग-परिस्थितियों में ढले हमारे आज के राम-सीता हैं और उनकी लड़ाइयां किसी बाहरी रावण यानी लंका देश के राक्षसराज और उसकी सेना से नहीं, बल्कि बुर्जुआ शक्तियों, अन्यायी व्यवस्था और पूंजीवाद से है.
यों मिट्टी में सने, एक सरल किसानी जीवन जीते होरी और धनिया को प्रेमचंद ने अपनी सादा कलम के कमाल से हमारे नए राम, नई सीता में ढाल दिया. यही प्रेमचंद और उनके 'गोदान' की इतनी बड़ी ताकत है कि बरसों पहले लिखा गया उनका यह उपन्यास अभी कल का ही लगता है. और उसे पढ़ते हुए होरी और धनिया ही नहीं, गोबर, झुनिया, सिलिया, सोना, हीरा, झिंगुरीसिंह, पं. दातादीन, पं. नोखेराम, पटेश्वरी, मि. खन्ना, मि. मेहता, मालती, गोविंदी जैसे दूसरे तमाम पात्रों की छवियां भी इस तरह मन में उतर आती हैं कि लगता है, आज के हिंदुस्तानी समाज का यथार्थ अपने विविध रंगों, छटाओं, एक ओर अपनी समूची जड़ता तो दूसरी ओर उससे निरंतर टकराती विकास की इच्छाओं, सपनों और संभावनाओं के साथ हमारे सामने एकाएक मूर्त हो उठा है.
ऊपर-ऊपर से देखें तो लगता है कि 'गोदान' में हिंदुस्तानी समाज का एक सीधा-सरल चेहरा है. पर नहीं, ऊपर से सीधी-सरल लगती हुई भी यह खासी जटिल और विविधरंगी तसवीर है, जिसे प्रेमचंद इतने अनायास और इतने स्वत:स्फूर्त अंदाज में पेश करते हैं कि यह हमें खासी सरल, बल्कि इकहरी तसवीर लगती है. मगर 'गोदान' की सरलता एक धोखे भरी सरलता है. इसलिए कि यह एक ऐसे उस्ताद कलमगो के हाथों से निकली है जो अपने पाठकों को आतंकित करके, उन पर अपनी विद्वता का रोब नहीं डालना चाहता. बल्कि उनमें रमकर, उनका-सा दिखकर ही धीरे-धीरे अपनी महत्ता या बड़प्पन उजागर करते हुए बड़ा होता है. देखा जाए तो यही खासियत तुलसीदास की भी है. वे भी अति सीधे, अति सरल हैं. इतने सरल कि हजारों-लाखों अनपढ़ भी उनकी काव्य की धारा में रसमग्न होकर बहते नजर आएंगे. पर तुलसी की इस सरलता के पीछे कितनी बड़ी उस्तादी और विद्वत्ता है, इसे तुलसी-काव्य के विद्वान ही समझ सकते हैं. प्रेमचंद की सरलता भी मुझे ऐसी ही लगती है, जो जनता के साथ एकाकार होकर बड़े होते गोर्की, टॉलस्टाय, चेखव जैसे बड़े लेखकों में मिलती है.
और अगर होरी और धनिया की फिर से चर्चा करें- ऐसे दो पात्र जिन पर 'गोदान' की पूरी इमारत खड़ी है, तो अब ये महज पात्र नहीं रह जाते. बल्कि ऐसी शख्सियतें हैं, जिनमें प्रेमचंद ने मानो हिंदुस्तानी आत्मा ही उतार दी है. हिंदी में एक से एक महान पात्रों की रचना हुई है. पर याद रखिए, होरी और धनिया से बड़े पात्र आज तक नहीं रचे जा सके. देखा जाए तो वे अत्यंत मामूली पात्र हैं, जैसे मामूली लोग आपको अपने इर्द-गिर्द चारों तरफ मिल जाएंगे. पर अपने मामूलीपन और एक हद तक निरीहता के बावजूद वे बड़े से बड़ा कुतूहल पैदा करने या बड़ी से बड़ी जंग लड़ने वाले कद्दावर पात्रों से भी ज्यादा बड़े हैं. इसलिए कि होरी और धनिया की यह साधारणता ही उनकी सबसे बड़ी असाधारणता है, जिसमें हिंदुस्तानी जनता के रोजमर्रा के अथक संघर्षों के साथ-साथ उसका दैन्य, विवशता, कातरता, आंसू और स्वाभिमान सब कुछ उतर आया है.... उनके पीछे समूची हिंदुस्तानी जनता का बल और जीवन-संघर्ष है. तो फिर भला होरी और धनिया से बड़े पात्र कौन होंगे, कहां होंगे?
होरी और धनिया ने कोई महान युद्ध भले ही न लड़ा हो, पर वे करोड़ों हिंदुस्तानी स्त्री-पुरुषों की वेदना, टीस और आहत अभिमान को अपने भीतर समोए साधारण पात्र हैं, तो यह साधारणता भी क्या छोटी चीज है? सच तो यह है कि साधारण होकर भी वे हर क्षण इतने अद्भुत और असाधारण लगते हैं कि जब वे सामने होते हैं तो उनकी एक-एक बात, एक-एक शब्द, एक-एक करुण टिप्पणी हमारे सीने में नक्श हो जाती है.
ज्यादा आगे न जाना चाहें तो 'गोदान' की शुरुआत ही देख लें. इतनी कसी हुई और इतनी रसमय शुरुआत भला आपने किस उपन्यास में देखी हैं? और कितनी मामूली चीजों से उपन्यास का यह शुरुआती हिस्सा रचा गया है! होरी और धनिया यहां एक-दूसरे के प्रति प्रेम से सराबोर किसान दंपति के रूप में हमारे सामने आते हैं. पर यह प्रेम कितना छिपा हुआ है और कितना रुक-रुककर मानो बहाने से प्रकट होता है. बल्कि कई जगह तो परस्पर कटाक्ष और हल्के लड़ाई-झगड़े की शक्ल में भी! पर इससे प्रेम क्या हल्का होता है! मुझे तो लगता है, वह कहीं अधिक गाढ़ा और अंतर्मुखी प्रेम है जो जीवन के रोजमर्रा के काम-काज, तनाव और चिंताओं के बीच से प्रकट होता है और उनके रूखे, कठोर जीवन में थोड़ी-सी लोच और उजास पैदा कर देता है.
यहां प्रसंग कुल मिलाकर यह है कि होरी जमींदार यानी राय साहब के बुलाने पर उनसे मिलने के लिए जा रहा है. धनिया यह बात पता चलते ही उसके कपड़े, जूते, लाठी सामने लाकर रख देती है. इस पर होरी हंसकर कहता है, "भला पाचों पोशाक रखने की क्या जरूरत थी, मैं क्या ससुराल जा रहा हूं?"
इस पर परस्पर कटाक्ष का जो एक रस-भीना सा अंतर्मुखी नाटक शुरू होता है, उसमें दोनों का परस्पर प्रेम ही नहीं, करुणापूरित हृदय के आंसू भी शामिल हैं. यह प्रेमचंद का यह निराला ढंग है बात की बात में कोई बड़ी बात कह जाने, या कोई स्मरणीय दृश्य सामने रखने का. इसी का नतीजा यह है कि 'गोदान' के पहले सफे में ही होरी ओर धनिया को अपने सामने बातें करते देख, हमें लगता है कि नहीं, हम खाली होरी ओर धनिया को ही नहीं सुन रहे, बल्कि समूची हिंदुस्तानी जनता से रू-ब-रू हो रहे हैं. और उसकी कई परतों के नीचे दबी-ढकी पीड़ा पहली बार पिघलकर सीधे हमारे कानों में उतर रही है. यह है प्रेमचंद की आसानी से नजर न आने वाली उस्तादी और कला का जादू!
यही वजह है कि 'गोदान' पढ़ें, तो वह इतना भीतर तक धंस जाता है कि हमें पता ही नहीं चलता, हम खुद कब साथ बहते 'गोदान' का एक हिस्सा हो चुके होते हैं. 'गोदान' में धनिया और गोबर की लड़ाइयां तथा मजबूरियां खुद हमारी लड़ाइयां और मजबूरियां बन जाती हैं. शायद इसीलिए 'गोदान' का अंत थरथरा देता है. पल-पल छीजते होरी की मृत्यु अवश्यंभावी थी, तो भी! इसलिए 'गोदान' को जिसे पहले भी कई बार पढ़ चुका था, इस बार फिर से पढ़ा तो उपन्यास पूरा होते-होते मैं फफकने लगा. जैसे कोई तीर अंदर धंसा रह गया हो और उसकी पीड़ा कभी कम न होने वाली हो!
क्यों भला? होरी की मृत्यु- नितांत जर्जर हो चुके होरी की मृत्यु भी हमसे झिलती क्यों नहीं? होरी की मृत्यु का वर्णन पढ़ते-पढ़ते उसकी मृत्यु का दृश्य एकाएक खुद हमारी मृत्यु का दृश्य कैसे हो जाता है!
मैं समझता हूं, यही प्रेमचंद की ताकत है -उनकी सार्वजनिक अपील जिससे होरी, होरी नहीं रह जाता. वह हिंदुस्तानी मन और आत्मा का साकार रूप लगने लगता है. और यों 'गोदान' पढ़ते हुए लगता है, हम कोई उपन्यास नहीं, गोर्की के 'माँ' या टालस्टाय के 'युद्ध और शांति' की तरह जनता के दुख और संघर्षों का सच्चा इतिहास पढ़ रहे हैं. और इतिहास ही नहीं, बल्कि एक ऐसा महाकाव्य जो हमारे रोजमर्रा के जीवन के आदर्श और यथार्थ की टकराहटों के बीच से जन्म लेता है तथा उपन्यास और इतिहास को खुद में समेटकर कहीं अधिक बड़ा, अनुपमेय सिंधु बन जाता है.

4.
अगर 'रामचरितमनास' से 'गोदान' की तुलना करें तो इस बात पर ध्यान जाए बगैर नहीं रहता कि रामचरितमानस की कथा की असली शक्ति उसकी करुणा है और 'गोदान' की शक्ति भी उसकी करुणा ही है. होरी के जीवन में तुलसी-नायक राम की तरह बहुत बड़ी-बड़ी लड़ाइयां भले ही न हों, पर एक किसान के रोजमर्रा के जीवन में आने वाली रोज-रोज की लड़ाइयां, जमींदारी व्यवस्था और गरीबी की मार- और उनके बीच अपनी पत, अपनी मर्यादा की रक्षा की निरंतर चिंता- होरी की यह लड़ाई क्या किसी बड़े से बड़े महाभारत से कम है? महाजनी सभ्यता के चक्के में पिसकर होरी कैसे छीजता गया, कैसे उसके छोटे-छोटे सुख भी उससे छीन लिए गए और अंतत: सब कुछ चले जाने पर, वह बुढ़ापे की हालत में अपने जर्जर शरीर के साथ सड़क खोदने के काम में जुट जाता है, जहां काम करते-करते उसकी मृत्यु होती है- यह विडंबना और त्रासदी क्या किसी बड़ी से बड़ी त्रासद कथा से कम है!
मुक्तिबोध के शब्दों में कहें तो यह किसान के रोजमर्रा के जीवन की 'नीच ट्रेजडी' है! इसे शायद किसी और तरह से कहा नहीं जा सकता.
उपन्यास में जिस समय होरी से हमारी पहली मुलाकात हुई थी, उस समय भी उसकी हालत पतली सही, पर इतनी विपन्न नहीं थी. भले ही उसने दो-एक छोटे-मोटे कर्जे लिए थे और वे चुकाए नहीं जा सके थे. लिहाजा बढ़ते ही जा रहे थे. पर ऐसे कर्जे कौन नहीं लेता? और उससे क्या घबराना! होरी मामूली किसान भले ही है, पर उसकी हैसियत इतनी मामूली भी नहीं है. रायसाहब उसे औरों से थोड़ा अलग और बुद्धिमान समझकर बुलवाते हैं और यह इसरार करते हैं कि वह गांव के लोगों को इस बात के लिए तैयार करे कि वे थोड़ी-बहुत बेगार के लिए तैयार हो जाएं.
इस बीच राय साहब जमींदार होते हुए भी, अपनी विवशता का ऐसा रोना रोते हैं कि खुद होरी के भीतर उनके लिए करुणा की एक लहर पैदा होती है. उसे यह अजीब लगता है कि इतनी संपन्नता के बावजूद ये पैसे वाले लोग कितने दुखी हैं. होरी के भीतर अपने मामूलीपन को लेकर एक हल्के गर्व की भावना भी उठती है कि ठीक है, वह किसान है. खूब मेहनत करके खाता है, मगर किसी का दिया हुआ तो नहीं खाता! उसके पास ईश्वर का दिया सब कुछ है. बस, गाय खरीदने की बरसों पुरानी साध है. भोला से उधार में गाय खरीद ली जाती है तो होरी के घर में सचमुच किसी उत्सव का-सा माहौल है. हालांकि इस गाय के कारण होरी से जलने वाले लोग भी हैं. खुद होरी का भाई हीरा गाय का जहर दे देता है. एक तो गाय के न रहने का दुख और फिर पुलिस के अचानक आ धमकने और तफ्तीश का डर! होरी की हालत लगातार छीजती जाती है. कहानी धीरे-धीरे आगे बढ़ती हुई, अब एक करुण कथा में बदल चुकी है.
फिर गोबर और झुनिया के प्रेम-संबंध और विवाह के कारण हुक्का-पानी बंद और डांड़ भरने की हालत! सारी फसल इस चक्कर में चली जाती है. मकान तक कुल अस्सी रुपए में गिरवी रखना पड़ता है. गोबर भागकर लखनऊ चला जाता है. फिर सोना और रूपा के विवाह के समय लिए गए कर्जे! ...हालत यह होती है कि कल का स्वाभिमानी किसान होरी छीजते-छीजते आज एक मामूली मजदूर रह गया है. और अब भी उसके दुखों का कोई अंत नहीं. मगर हां, गाय खरीदने की साध अब भी मन से गई नहीं. अंत में सड़क खोदते-खोदते जब सिर में चक्कर आ गया, हाथ-पांव ठंडे होने लगे तो होरी को मृत्यु बिल्कुल पास आती दिखाई दी. जरा प्रेमचंद के शब्दों में होरी की मृत्यु का यह करुण दृश्य देखें :
"मृत्यु समीप आ गई थी, आग दहकने वाली थी, धुआं शांत हो गया था. धनिया को दीन आंखों से देखा. दोनों कोनों से आंसू की दो बूंदें ढलक पड़ीं. क्षीण स्वर में बोला- मेरा कहा-सुना माफ करना धनिया, अब जाता हूं. गाय की लालसा मन में ही रह गई. अब तो यहां के रुपए क्रिया-कर्म में जाएंगे. रो मत धनिया, अब कब तक जिलाएगी? सब दुर्दशा तो हो गई. अब मरने दे."
और जब होरी के प्राण निकल जाने पर आवाजें आई- 'गोदान करा दो', तो पत्थर की शिला बन चुकी धनिया की हालत देखें:
"धनिया यंत्र की भांति उठी. आज जो सूतली बेची थी, उसके बीस आने पैसे लाई और पति के ठंडे हाथ में रखकर सामने खड़े दातादीन से बोली- महाराज, घर में न गाय है, न बछिया, न पैसा. यही पैसे हैं, यही इनका गोदान है. और पछाड़ खाकर गिर पड़ी."
मैंने शुरू में कहीं कहा था कि 'गोदान' आज के युग की रामायण है और होरी और धनिया आज के राम-सीता. होरी का संघर्ष राम के संघर्ष से कम नहीं है और धनिया के दुख भरे हृदय का हाहाकार आज के नए जमाने की नई सीता का दुख है. होरी और धनिया का समूचा जीवन राम और सीता की तरह निरंतर तपते और काम करते ही तो बीता है. ठीक है, होरी ओर धनिया मामूली जीवन जीते, मामूली किसान सही, लेकिन दुख अगर मांजता है, तो अहर्निश दुख ने उनके हृदयों को मांज-मांजकर सोने से अधिक चमकीला बना दिया और वे किसी ऊंचे से ऊंचे सिंहासन पर बैठे किसी ऊंचे से ऊंचे पुराण-पुरुष से कम नहीं हैं.

5.
फिर एक बात और. हिंदुस्तानी जीवन की एक बड़ी खासियत उसकी पारिवारिकता और समाजिकता है, जो घोर गरीबी और दुरवस्था के बावजूद कायम रहती है. प्रेमचंद न सिर्फ हिंदुस्तानी समाज की इस केंद्रीय धारा को जानते हैं, बल्कि 'गोदान' में हिंदुस्तानी सामाजिकता और पारिवारिकता की एक से एक जीवंत और अविस्मरणीय छवियां सामने रखते हैं. यह 'गोदान' की शक्ति है जो उसे एक खास ढंग की भारतीय तासीर से जोड़ती है. यानी कहा जा सकता है कि 'गोदान' इसलिए भी बड़ी कृति है क्योंकि इसमें हिंदुस्तानी पारिवारिकता और सामाजिकता की बड़ी जीवंत और प्रीतिकर लहरें हैं, जो उसे उपन्यास होते हुए भी, महाकाव्यात्मकता के निकट ले जाती हैं.
याद करें, दो किसान भाइयों होरी ओर हीरा का संबंध. होरी और धनिया ने हीरा को छुटपन से पाला है. फिर घर का बंटवारा हुआ तो स्वाभाविक रूप से आपस में थोड़ी अनबन भी हुई, और दोनों के मन में थोड़ा-बहुत क्लेश भी हुआ. यह हीरा ही है, जो अपने बड़े भाई होरी का सुख नहीं देख पाता और गाय को जहर देकर मार डालता है. होरी ने हीरा को संदेहास्पद हालत में गाय के निकट देखा था. उसके मन में पक्का यकीन है कि हीरा ने ही यह अनर्थ किया है. हीरा घर से भाग जाता है. मगर अब होरी क्या करता है? उसे हम आश्चर्यजनक रूप से इस बात की ताबड़तोड़ कोशिश करते देखते हैं कि हीरा के सिर पर कोई कलंक न आए.
यहां तक कि धनिया जब यह बात लोगों को बताने लगी, तो वह उसे बुरी तरह पीटने पर आमादा हो गया. वह अपने बेटे गोबर के सिर की झूठी कसम खाता है कि नहीं, उसने हीरा को गाय के नजदीक नहीं देखा. तफ्तीश के लिए आई पुलिस हीरा के घर की तलाशी लेना चाहती है तो अपनी लोक-मर्यादा और भाई के अपमान का इतना डर उसे है कि कर्जा लेकर भी पुलिस वालों के हाथ में पैसे रखना चाहता है, ताकि वे यहां अनर्थ न करें. चाहे इसे आज कोई सही कहे या गलत, लेकिन सच तो यह है कि दुख की इस घड़ी में होरी किसी बहादुर सैनिक की तरह अपने घर-परिवार की मर्यादा की रक्षा करने के लिए खड़ा है और यहां यह बात बहुत छोटी रह जाती है कि हीरा गाय को जहर देकर भाग गया.
बड़ी बात तो यह है कि होरी हीरा का भाई है, तो पुलिस द्वारा हीरा के घर की तलाशी लिए जाने पर भला बड़े भाई होरी की क्या इज्जत रह जाती! मैं समझता हूं कि होरी द्वारा पारिवारिकता की रक्षा की यह एक आत्यंतिक विरल कोशिश है, जिसके पीछे इतना गहरा प्रेम है जिसे आज ठीक-ठीक समझ पाना भी हमारे लिए मुश्किल है. यही चीज पुनिया के बर्ताव में देखने में आती है. पुनिया तेज जबान है और साफ लफ्जों में कहें, तो अपने पति हीरा को भाई-भाभी से काटने वाली भी वही है. मगर जब होरी पर दुख का भार आ पड़ता है, गोबर और झुनिया के विवाह के बाद डांड़ भरने के चक्कर में होरी का पूरा परिवार जब एक तरह से कंगाली की हालत में आ जाता है, तो यह पुनिया ही है, जो जैसे भी हो सके, धनिया और बच्चों की थोड़ी-बहुत मदद करके होरी के परिवार को इस संकट से निकालने की कोशिश करती है.
परिवार पर कोई दुख का पहाड़ आया तो पिछले वैर की दीवारें एक-एक कर बिलाने लगीं. और फिर परिवार के लोगों में वही प्रेम निर्बंध बहने लगता है, जिसे 'गोदान' की कथा के बीच-बीच में भले ही हम थोड़ा मैला और गंदला होते देखते हैं, लेकिन जीवन की अजस्र धारा उसे फिर-फिर निर्मल और निमज्जित करती है.
यही बात घोर बदहाली और गरीबी के बावजूद गांव वालों की उस उत्सवप्रियता में झलकती है, जिसे कोई बड़े से बड़ा अभाव कुचल नहीं पाता. गांव में ज्यादा पढ़े-लिखे लोग भले ही न हों, लेकिन कला का आनंद लेना वे जानते हैं. होली के मौके पर किया जाने वाला ठिठोली भरा प्रहसन हो या राय साहब द्वारा करवाया गया नाटक- सबमें होरी और गांव के दूसरे किसानों की मौलिक सूझ ऐसे प्रकट होती है कि कई बार चकित रह जाना पड़ता है.
यह जीवन के निरंतर संघर्ष, शोषण और हाहाकार के बीच भी सुख-आनंद की कुछ घड़ियां बचाए रखना है, जिससे जीवन में जिजीविषा और लड़ने की ताकत बनी रहे. लेकिन साथ ही साथ इससे गांव वालों की उस सामाजिकता का भी पता चलता है, जिसमें ऐसे कला-विनोद ओर आह्लाद के क्षणों में ऊंच-नीच और छोटे-बड़े की दीवारें ढह जाती हैं और पूरे गांव को हम आनंद की एक मुक्त धारा में बहते देखते हैं. 'गोदान' में होरी के जीवन मे अथक संघर्ष की कथा है तो ऐसे आनंद-विनोद के क्षण भी कम नहीं, जो होरी और उसी की तरह दूसरे सभी किसानों के जीवन में खाद-पानी देने का काम करते हैं.
शायद ऐसे ही क्षणों में प्रेमचंद किसान जीवन के एक बड़े सच से हमें रूबरू करा रहे होते हैं कि चक्की के दो पाटों के बीच निरंतर पिसते रहने पर भी, उसके मन और आत्मा को कुचला नहीं जा सकता. यह शायद प्रकृति के निकट रहने का ही परिणाम है कि गांव के आदमी की जिजीविषा और मस्ती भी कम नहीं होती. फटेहाली और घोर आर्थिक तंगी के बावजूद जब भी फुरसत की दो घड़ियां उसे नसीब होती हैं, वह मजे से ठहाके लगाता दिखाई देता है. मानो ऐसे क्षणों में दुख-दारिद्र्य की छाया तक उससे दूर भाग जाती है. प्रेमचंद ऐसे क्षणों का चित्रण करने में निपुण हैं, लेकिन 'गोदान' में तो आनंद-विनोद के ये क्षण जहां-जहां भी आए हैं, वे हमें एक प्रकृति-उत्सव में होने का-सा आभास कराते हैं और साथ ही अनायास 'गोदान' को एक बड़ी जीवंत, रसमय और अनेकायामी कृति में भी बदल देते हैं.

6.
यहीं एक बात और गौर करने लायक है कि 'गोदान' किसान-जीवन की महाकथा है, पर वह खाली किसानों तक ही सीमित नहीं है. यह तो एक बड़ा सीधा-सरल सा रास्ता होता, अगर प्रेमचंद होरी और कुछ दूसरे किसानों को सामने रखकर उनके दुख-अभाव और पीड़ाओं का वर्णन करना शुरू कर देते. पर प्रेमचंद ऐसा नहीं करते.
वे किसान-जीवन की एक बड़ी और संश्लिष्ट कथा कहना चाहते हैं, जिससे किसान जीवन के दुख और समस्याओं की जड़ों तक पहुंचा जाए. और उसके सही कारणों का विश्लेषण हो. लिहाजा वे केवल किसान-जीवन की कथा ही नहीं कहते, बल्कि भारतीय जीवन का एक महा आख्यान प्रस्तुत करते हैं, होरी जिसक केंद्र में है. यह ऐसा समाज है जिसके कई स्तर, कई परतें हैं, लेकिन दो ध्रुवांत तो एकदम साफ-साफ दिखाई देते हैं. 'गोदान' में यथार्थ के एक छोर पर यदि होरी खड़ा है, तो दूसरे छोर पर राय साहब हैं जो जमींदार हैं, अपार संपत्ति के स्वामी हैं. लेकिन खुद को उदार विचारों का मानते हैं. 'सुराज' की लड़ाई में शामिल होकर जेल भी हो आए हैं. यों उन्होंने बड़ा नाम कमाया है और आदर्श या भावनात्मकता के स्तर पर वे स्वाधीनता संग्राम से भी जुड़े है. लेकिन जहां तक व्यवहार की बात है, वे किसी भी और जमींदार से अलग नजर नहीं आते, चाहे बेगारी का सवाल हो या किसानों से जबरन लगान वसूल करना हो. उनकी रियासत में ये चीजें किसी और जमींदार की तुलना में कम नहीं हैं.
यह दीगर बात है कि अपनी ज्यादतियों और अन्यायों पर अकसर वे सिद्धांत और मजबूरियों का मुलम्मा चढ़ा लेते हैं और एक नेक और भला-भला-सा चेहरा पहनकर अकसर अपनी मजबूरियों का बखान करते नजर आते हैं. यहां तक कि होरी से मिलने पर वे उसके आगे अपने दुख और मजबूरियों का कुछ इस कदर वर्णन करते हैं कि होरी को लगता है कि अरे, ये तो अपने से भी ज्यादा दुखी हैं! घर आकर वह धनिया को यह सब बताता है तो धनिया राय साहब के कृत्रिम दुख पर सही निशाना लगाते हुए पत्थर फेंकती है कि अगर वे इतने ही दुखी हैं तो फिर वे यह जमींदारी हमें क्यों नहीं दे देते? हमे दे दें! और होरी जब राय साहब के पूजा-पाठ को लेकर एक भावनात्मक विभोरता का वातावरण रचता है, तो गोबर की एकदम सही और करारी टीप उसे ध्वस्त कर डालती है कि जब कमाने की चिंता न हो, तो हम भी घंटों पूजा-पाठ कर सकते हैं. मगर हमें इसकी फुरसत कहां है? हमें तो रात-दिन खटना है, वरना खाएंगे क्या!...
और यह अंतर्विरोध खाली राय साहब के ही नहीं हैं, बल्कि उस सारे शहरी वर्ग के हैं जो अमीरी का एक सुविधापूर्ण जीवन जी रहा है, लेकिन नहीं जानता कि उसके लिए खटने वाले वे दीन-हीन, कामगार लोग हैं जिन्हें दो वक्त का सही खाना भी नहीं मिल पाता या तन ढकने को ढंग के कपड़े भी नहीं मिल पाते. देखा जाए तो यह अमीर शहरी वर्ग गांव वालों के लिए एक विषबेल या 'पैरासाइट' की तरह है जो उनका खून चूस-चूसकर अपनी समृद्धि बढ़ाता रहता है. राय साहब के मित्रों में मिस्टर खन्ना, मिर्जा, तंखा, मिस्टर मेहता, मालती जैसे पात्रों के भीतर नजर गड़ाकर देखें, तो लुभावनी शक्ल में वही शोषक बैठा नजर आएगा जो अपने को गरीब मजदूर-किसानों का शुभ चिंतक तो कहता है, लेकिन असल में उन्हीं की मेहनत की कमाई को हड़पकर अपना मोटा पेट भी भरता है.
इनमें मिस्टर मेहता कुछ अलग नजर आते हैं, जो कहीं ज्यादा संजीदगी ओर सहानुभूति से गरीब आदमी के दर्द को समझ पाते हैं. लेकिन वे उसके लिए व्यवहार में कुछ खास कर पाते हों, ऐसा नजर नहीं आता. यही हालत शराब में हर वक्त धुत्त रहने वाले मिर्जा की भी है. प्रेमचंद के 'गोदान' में ये पात्र महज पात्र नहीं, बल्कि एक तरह से अलग-अलग वर्गों के प्रतिनिधि भी है, जो ऊपर से चिकने-चुपड़े, लेकिन भीतर से निहायत खोखले हैं. कुल मिलाकर वे शहराती वर्ग की एक मुकम्मल सच्चाई सामने रख देते हैं.
दूसरी ओर, गांव में ही एक किसान के चारों ओर जो शिकंजा है और उसका सब ओर से शिकार करने के लिए तैयार जो शिकारी बैठे हैं, प्रेमचंद ने बड़ी सच्चाई से उनका भी चित्रण किया है-चाहे ठाकुर झिंगुरीसिंह और पं. दातादीन हों या फिर दुलारी सहुआइन, बिसेसर, पं. नोखेराम. होरी जैसा गरीब किसान सब ओर अपने इर्द-गिर्द एक चक्रव्यूह ही देखता है. और यों होरी की कहानी सिर्फ होरी की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि वह महाजनी तंत्र में शोषण की चक्की में पिसते हर गरीब किसान की कहानी बन जाती है.
किसान का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि वह खून-पसीना एक करके फसल उपजाता है, लेकिन उसका वाजिब दाम उसे नहीं मिल पाता. लिहाजा साल भर मेहनत करने के बावजूद उसका हाथ खाली का खाली रहता है. अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के अलावा शादी-ब्याह और दूसरे कामों के लिए उसे नकद पैसे की जरूरत होती है. लिहाजा मजबूरी में वह गांव के धनी लोगों के आगे कर्ज के लिए हाथ फैलाता है. खूब अहसान करके उसे कर्ज दिया जाता है, मगर इन शर्तों पर कि मूल तो जस का तस रहता है, मगर ब्याज कुछ इस तेजी से बढ़ता जाता है कि उसे चुकाने में किसान की जान पर बन आती है.
याद कीजिए, दुलारी सहुआइन ने होरी को कुल तीस रुपए दिए थे. ब्याज लगते-लगते जब वे सौ रुपए हो गए तो उसकी लिखत हुई. और अब तो वह राशि बढ़ते-बढ़ते इतनी बढ़ गई कि खुद होरी उससे दबा हुआ नजर आता है. फिर एक चक्कर यह है कि किसान कर्ज लेता है तो बाकायदा कागज पर अंगूठा लगवाकर उसे पैसे दिए जाते हैं. पर जब वह पैसे जमा करता है, तो उसे इसकी कोई रसीद नहीं मिलती. सब कुछ मुंहजबानी रहता है. और अगर महाजन के दिल में बेईमानी आ जाए या वह मुकर जाए, तो समझिए कि किसान को कर्ज के पहाड़ की चढ़ाई नए सिरे से चढ़नी पड़ेगी और उसकी जान पर बन जाएगी!...
यों किसान के हिस्से दबना और अपना हाड़-गोड़ काट-काटकर महाजन को सौंपना ही लिखा है. और फिर उस पर तितरफा हमला गांव के उन गलत रिवाजों और रूढ़ियों से होता है जो न जाने कब से चले आते हैं, मगर जिनके पीछे कोई तार्किक आधार नहीं है. गोबर ने भोला की विधवा बेटी झुनिया से विवाह कर लिया, इसकी सजा होरी को हुक्का-पानी बंद करके दी गई. आखिर होरी डांड़ भरने को तैयार होता है तो उसकी सारी फसल तो छीन ही ली जाती है, साथ ही मकान भी गिरवी रख लिया जाता है....यह गांव का 'न्याय' है, जहां 'न्याय-मंदिर' में पैसे वाले विषधर (सर्पों) और प्रेतों की चलती है!
किसान जीवन के ये दुख भरे अध्याय 'गोदान' में अपनी पूरी मार्मिक अभिव्यंजना के साथ उपस्थित हैं और 'गोदान' के महा-आख्यान में एक से एक ऐसी करुणा भरी लहरें पैदा करते हैं कि उनसे सारा 'गोदान' करुणापूरित हो उठता है, मानो वह किसान के दुख और आंसुओं से भीग गया हो! यों 'गोदान' में खाली किसान की पीड़ा नहीं है, 'गोदान' भारतीय जीवन का महा-आख्यान है, मगर उसमें किसान की पीड़ा बढ़ते-बढ़ते इतनी बढ़ जाती है कि उस पूरे महा-आख्यान को एक गाढ़ी उदासी से भर देती है. यही प्रेमचंद और 'गोदान' की सफलता भी है, जहां दुख कहा नहीं जाता, व्यंजित होता है और व्यंजित होकर विराट होते-होते, वह खुद एक महाकाव्य का रूप लेता है.

7.
और अब स्त्रियां!...अगर 'गोदान' एक महाकाव्य है, तो इस महाकाव्य की सबसे जबरदस्त लहरें है 'गोदान' की स्त्रियां, जो सचमुच जीवन और जिजीविषा से भरपूर हैं और अपने दुख-दैन्य के घेरे के बावजूद खासी सक्षम और शक्तिशाली हैं.
याद कीजिए धनिया को, कि किस तरह बार-बार होरी सरीखे सीधे-सरल और पुरखों की मर्यादा में बंधे आदमी को वह चेताती है और व्यावहारिक राह पर लाने की भरसक कोशिश करती है. होरी की तुलना में वह कहीं अधिक दुनियादार, साहसी और मजबूत है तथा सिर्फ आज को ही नहीं देखती, आने वाले कल को भी देखती हैं. स्थितियों ने उसे कहीं अधिक चौकन्ना और समझदार बना दिया है. इसीलिए गोबर जब गाय लेकर आता है और उत्साह से छल-छल होकर होरी उस गाय को घर के द्वार पर बांधना चाहता है, ताकि आने-जाने वाले भी उसे देखें, तो धनिया झट विरोध करती है. वह उसे घर के बाहर नहीं, भीतर आंगन में बांधती है. उसका तो मन है कि सारी दुनिया की नजरों से उसे बचा के रखे, ताकि कोई उस गाय को कभी नुकसान न पहुंचा सके.
अंतत: धनिया की ही आशंका सही निकलती है. गाय को विष दिया गया है और यह अनर्थ किसी और ने नहीं, बल्कि होरी के भाई हीरा ने किया है. वह हीरा जिसे होरी और धनिया ने छुटपन से पाल-पोसकर बड़ा किया है. यहीं घटना-चक्र फिर ऐसे करवट लेता है. होरी यह जानते हुए भी कि हीरा ने गाय को जहर दिया है, उसे बचाना चाहता है. लेकिन धनिया मानो चिल्ला-चिल्लाकर सारे गांव को यह बता देना चाहती है कि कर्तव्यपालन और भलमनसी का उन्हें क्या नतीजा मिला! अंतत: पुलिस का दारोगा आता है और हीरा के घर की तलाशी लेना चाहता है.
तब होरी कर्जा लकर रुपए-पैसे देकर उसे टरकाने की सोचता है. लेकिन धनिया इस समय धनिया न रहकर सचमुच रणचंडी हो जाती है. गांव के सारे बड़े लोगों और दारोगा की उपस्थिति में वह चिल्ला-चिल्लाकर एक नीतिगत सवाल पूछती है कि बताइए, हम किस बात के पैसे दें? हमारी ही गाय मरी है और हम इतना बड़ा दुख झेल रहे हैं, ऊपर से कर्जा लेकर इनका पेट भरें? क्यों भरें? यह कौन-सी नीति, कौन-सी मर्यादा है!
धनिया की इतनी तीखी और खरी-खरी बातें सुनने के बाद दारोगा बगलें झाकने लगता है और दया और नीति के अवतार बने गांव के बड़े लोगों की गरदनें शर्म से नीचे झुक जाती हैं. लिहाजा दारोगा को बगैर कुछ लिए वहां से लौटना पड़ता है.
धनिया का यही क्रोधभरा तेजस्वी रूप हम तब देखते हैं जब गोबर के झुनिया से विवाह कर लेने पर डांड़ भरने का चक्कर चलता है. होरी इतना सीधा-सादा किसान है कि अपनी मर्यादा की रक्षा के नाम पर फसल कटते ही रात-दिन की मेहनत से उपजाया हुआ सारा अनाज खुद ही भर-भरकर झिंगुरी के यहां जमा करने लगता है. धनिया से यह बर्दाश्त नहीं होता और जब सोने-सी सारी फसल चली गई और सिर्फ मन-डेढ़ अनाज रह गया, तो वह शेरनी सी बिफरती है कि- यह अनाज बच्चों के लिए है. इसे देने का हरिगज तुम्हें कोई हक नहीं! और इस तरह परिवार को भूखों मरने की हालत से कुछ हद तक तो वह बचा ही लेती है.
धनिया सख्त है और सही समय पर सही निर्णय लेना जानती है -फिर चाहे वह कितना ही कठोर क्यों न हो? पर इसका यह मतलब नहीं कि उसका दिल भी कठोर है. गोबर और झुनिया के विवाह-संबंध का वह भरसक विरोध करती है, लेकिन जब झुनिया को लगता है कि उसी के कारण घर पर इतनी विपत्तियां आ रही हैं, वही सबके दुखों का कारण है, तो धनिया जैसे अपने स्नेह और प्रेम के कवच में लपेटकर उसे अभय बना देती है. इसी तरह सिलिया चमारिन जब अपने ब्राह्मण पति मातादीन के हाथों ठुकराई जाती है तो उसे प्रेमपूर्ण आश्रय देने वाली धनिया ही है.
मजे की बात यह है कि 'गोदान' में भले ही औरतें पिटती हों, मार खाती हों, पर वे दबती हरगिज नहीं हैं और अपनी बात मनवाना जानती हैं. वे मर्दों की तुलना में कमजोर नहीं हैं, बल्कि सच तो यह है कि घर और दुनिया उन्हीं से चलती है. बल्कि जब भी जरूरत पड़ती है, दुख में वे मर्द के कंधे से कंधा मिलाकर उसे मुश्किलों से निकलाती हैं. यहां तक कि मालती जैसी विलासिनी नजर आने वाली स्त्री भी अंत तक आते-आते इस कदर बदल जाती है कि उसमें हमें एक नई ही मालती नजर आती है. स्त्रियों के जरिए प्रेमचंद 'गोदान' में प्रेम-रस ही पैदा नहीं करते, वे जीवन-रस भी पैदा करते हैं. बल्कि सच तो यह है कि पुरुष के संघर्ष को सही रूप स्त्री के साथ आने पर ही मिलता है. तो 'गोदान' की स्त्रियों को 'गोदान' के महाकाव्यात्मक सिंधु की सबसे उज्ज्वल लहरें भला क्यों न कहा जाए!

8.
बेशक कोई कालजयी महाकाव्य महत् कथा के साथ-साथ महत् विचारों से भी बनता है. यानी कोई विचारहीन महाकाव्य नहीं हो सकता. यह दीगर बात है कि किसी अच्छे महाकव्य में विचार आरोपित नहीं होते. वे अंत:सलिला की धारा की तरह होते हैं जो पूरी कृति को शक्ति और दिशा देते हैं. इस लिहाज से भी गोदान की महाकाव्यात्मकता की चर्चा की जानी चाहिए.
प्रेमचंद 'गोदान' में एक बड़े विचार को अपनी पूरी ताकत और धमक के साथ सामने रखते हैं और वह विचार यह है कि मजदूर हो या किसान, वे ही इस धरती के सच्चे पुत्र हैं जो अपने खून-पसीने से इस धरती को सुंदर भी बनाते हैं. वे सबसे अधिक रूखे-सूखे और विपन्न हैं. लेकिन वे ही धरती के सबसे सुंदर प्राणी हैं. और जो बड़े-बड़े जमींदार, धनपति, वकील, डॉक्टर, पत्रकार और दूसरे सुविधापरस्त लोग हैं, वे ठाट भरा जीवन जीते हुए भी किसान से हेठे हैं, क्योंकि उनकी सारी सुविधाओं के पीछे स्वार्थ, चालबाजियां और दोहरापन है.
वे किसान-मजदूरों की मेहनत के बल पर ही सारे सुख-भोग और सुविधाएं इकट्ठी कर लेते हैं और मजदूर या किसान को रूखा-सूखा जीवन जीने या फिर मेहनत करते-करते मर जाने के लिए छोड़ देते हैं. इससे बड़ा अन्याय कोई दूसरा नहीं हो सकता. इस तरह प्रेमचंद पूरी महाजनी सभ्यता और व्यवस्था के विरोध में किसान को ला खड़ा करते हैं और होते-होते उसका कद इतना बड़ा हो जाता है कि बड़े से बड़े पैसे वाले और पढ़े-लिखे लोग उसके आगे छोटे नजर आते हैं.
फिर किसान का स्वाभिमान और निर्भयता उसे वह अंतर्भेदी दृष्टि देती है कि बड़ी से बड़ी सच्चाइयां उसके आगे खुद-ब-खुद खुलने लगती हैं. इसीलिए जब दारोगा गाय के मरने पर उलटा पैसे वसूलने के लिए होरी के घर डटा है और पंडित दातादीन जैसे गांव के तथाकथित बड़े लोग उस समय तुरंत थैलियां खोलकर कर्जा देने को तैयार बैठे हैं, उस समय धनिया पल भर में सारी दुरभिसंधि भांप जाती है और आजादी की लड़ाई में पंडित दातादीन के हिस्सा लेने पर तीखा व्यंग्य करते हुए कहती है कि सिर्फ जेल हो आना ही काफी नहीं, जब धरम नहीं है तो इस सबसे क्या मतलब?
यों कई जगह प्रेमचंद के विचार सामान्य धारा के उलट भी लगते हैं और उन्हें लेकर हो सकता है, कोई उनकी प्रगतिशीलता पर ही सवालिया निशान लगाने लगे. मसलन एक जगह वे कहते हैं कि पुरुष में स्त्री के गुण आ जाएं तो वह देवता हो जाता है, लेकिन स्त्री में पुरुष के गुण आ जाएं तो वह राक्षसी हो जाती है. मैं नहीं समझता कि आज के प्रगतिशील समाज के लिहाज से यह कोई सही विचार है. इसी तरह स्त्री-स्वाधीनता को लेकर मेहता के विचार बड़े दकियानूसी लगते हैं. यह विश्वास नहीं होता कि ये प्रेमचंद के विचार हैं. लेकिन मि. मेहता प्रेमचंद की आदर्श रचना हैं. उपन्यास का अंत होते-होते मालती जिस तरह श्रद्धा से भरकर मेहता के लिए उद्गार प्रकट करती है, उससे भी मेहता का चरित्र खासा ऊंचा जान पड़ता है.
तो मेहता के विचारों को अगर कोई प्रेमचंद के विचार माने, तो क्या यह बहुत गलत होगा? पर लगता है, यह प्रेमचंद की या उनके समय की एक सीमा है. वे स्वतंत्र व्यक्तित्व वाली या स्त्री-मुक्ति की पक्षधर स्त्री को उतना पसंद नहीं करते, जितना भारतीय आदर्शों में ढली स्त्री को, जो घर में रहकर ही पति और बच्चों के उत्कर्ष के लिए अपना जीवन उत्सर्ग करती है और यों अपने ढंग से एक आदर्श समाज-रचना में योगदान देती है.
जो भी हो, 'गोदान' मे वैचारिक बहसें बहुत हैं और वे कुल मिलाकर यथार्थ की तस्वीर के सभी कोण, सभी पहलुओं को हमारे सामने रखती हैं. इनमें से किसी विचार से मतभेद या सहमति-असहमति बुरी नहीं और 'गोदान' में इसकी खासी गुंजायश भी है, पर 'गोदान' का केंद्रीय विचार इतना बड़ा है और पूरी कृति को इस तरह शक्ति और दिशा देने का काम करता है कि इन छोटी-मोटी मुश्किलों पर हमारा ध्यान कम ही जाता है.

9.
निश्चय ही 'गोदान' आलोचनाओं से परे नहीं है, और उसमें दो-चार चीजें ऐसी जरूर ढूंढ़ी जा सकती है जो उसकी महाकाव्यात्मकता को चोट पहुंचाती हैं. पर 'गोदान' इतना बड़ा सिंधु है कि उसमें ये चीजें बहुत मायने नहीं रखतीं. सच तो यह है कि जैसे रामचरित मानस हिंदी का ही नहीं, एक तरह से समूची भारतीयता का महाकाव्य है, ऐसे ही 'गोदान' भी एक उपन्यास से बढ़कर आज समूची भारतीयता की महागाथा बन चुका है. पिछले आठ-नौ दशकों में इसका महत्त्व लगातार बढ़ता ही गया है और कोई ताज्जुब नहीं कि आगे सौ-दो सौ बरस बाद भी वह हमें उतना ही अपना-अपना सा और ताजादम लगे.
यह ठीक है कि 'गोदान' के बाद भारतीय समाज बहुत बदला है, गांव बहुत बदले हैं, पर प्रेमचंद ने किसान-जीवन की त्रासदी पर जिस जगह ऊंगली रखी, वहां कोई बड़ा बदलाव आज भी नजर नहीं आता. भारत के साधारण किसान की जीवन-गाथा आज भी दुख, गरीबी और शोषण में उसी तरह लिपटी हुई है, जैसे 'गोदान' में वर्णित है और उसके मूल कारण भी वही हैं. बस, आज पूंजीवादी व्यवस्था और राजनीति की चालाकियों ने मिलकर उसके इर्द-गिर्द घेरा कहीं अधिक मजबूत बना दिया है और किसान उसी तरह निरंतर तप करते हुए पिट रहा है और मर रहा है, जैसे 'गोदान' में हम होरी को देखते हैं. लिहाजा 'गोदान' आज भी हमें रास्ता दिखाने वाला और भीतर से तिलमिला देने वाला महाकाव्य है, जो इस पूरी शोषक व्यवस्था के प्रति गहरा रोष मन में भरता है.
प्रेमचंद ने एक से एक सुंदर और असाधारण कृतियां हमें दीं, जिनमें भारतीय समाज और उसकी अंत:चेतना की छवियां हैं, पर 'गोदान' बेशक इनमें शीर्षस्थ है. यह इस कदर निर्विवाद है कि किसी ने इस पर बहस छेडऩे की भी जरूरत नहीं समझी. 'गोदान' निस्संदेह प्रेमचंद की सर्वाधिक शक्तिशाली और सिरमौर कृति है, जिससे एक लेखक के रूप में उनकी विराट शक्ति या उनकी कलम की ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है. सच तो यह है कि 'गोदान' भारतीय समाज के हर स्तर पर चल रहे गहरे जनसंघर्षां की गवाही देता हुआ बीसवीं शताब्दी का महाकाव्य है. लिहाजा वह भारतीय समाज की बहुरंगी तस्वीर ही पेश नहीं करता, वह खुद में भारतीय समाज के विकास का एक जीवंत और सच्चा इतिहास भी है.
'गोदान' में भारतीय जीवन के यथार्थ की पकड़ इतनी गहरी है कि वह इतिहास से भी कहीं अधिक सच्चा और प्रामाणिक इतिहास बन गया है. और कहना न होगा कि इतिहास की चूकों को 'गोदान' पढ़कर ठीक किया जा सकता है. क्या सच में ऐसी कोई दूसरी इतनी बड़ी महाकाव्यात्मक कृति हमारे पास है, जिसे सचमुच 'आधुनिक भारतीय जीवन का महाकाव्य' कहा जा सके? कम से कम मुझे याद नहीं पड़ता.
यही कारण है कि वे फासीवादी तथा सांप्रदायिक शक्तियां जो प्रेमचंद से चिढ़ती हैं और उन्हें नकारने का कुचक्र रचती हैं, वे अंतत: इस तरह मुंह के बल गिरती हैं कि उनका झूठ और कालिख सबके आगे उजागर हो जाती है और प्रेमचंद, प्रेमचंद ही बने रहते हैं. उसी तरह दुर्जेय और भारतीय समाज और चेतना के हृदय-हार, जैसे वे शुरू से थे! यहां तक कि बहुत से आलोचक आज उसी 'आदर्शोन्मुख यथार्थवाद' की दुहाई देने लगे हैं, जिसे प्रेमचंद में देखकर वे कभी चिढ़ते थे.
प्रेमचंद बेशक इसके सबसे बड़े व्याख्याकार और कलमकार हैं और 'गोदान' उपन्यास होते हुए भी, सबसे बड़ी महाकाव्यात्मक कृति, जिसकी कीर्ति आगे आने वाली कई सदियों तक धूमिल न होगी.
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संपर्कः प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008, मो. 9810602327, ईमेल- prakashmanu333@gmail.com 

 

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