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प्रकाश मनु: एक शख्स बिल्कुल अलग सा, सहधर्मिणी की नजर से साहित्यकार

बहुत दिनों से सोच रही थी, प्रकाश मनु जी पर कुछ लिखूं, जिनके साथ जिंदगी का एक लंबा सफर तय किया है. पर लिखना इतना आसान है क्या? अनंत उतार-चढ़ाव, लंबे सुख-दुख और अनकही व्यथाओं वाली एक लंबी कहानी है, उसे कहां से शुरू करूं?

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वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश मनुः एक अलहदा अंदाज वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश मनुः एक अलहदा अंदाज

बहुत दिनों से सोच रही थी, प्रकाश मनु जी पर कुछ लिखूं, जिनके साथ जिंदगी का एक लंबा सफर तय किया है. पर लिखना इतना आसान है क्या? अनंत उतार-चढ़ाव, लंबे सुख-दुख और अनकही व्यथाओं वाली एक लंबी कहानी है, उसे कहां से शुरू करूं? क्या लिखूं और क्या छोड़ूं, तय कर पाना भी तो इतना आसान नहीं. लेकिन कहीं न कहीं से तो शुरू करना ही होगा. तो चलिए, शुरू से ही लिखती हूं, जहां से अचानक एक दिन अनजाने ही एक कहानी चल पड़ी थी. हालांकि वह कहां तक जाएगी, कहां नहीं, उसका ओर-छोर कुछ पता न था. अगर पता हो, तो भला वह कहानी भी कैसी कहानी!
उन दिनों मैं कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में शोध के लिए नई-नई आई थी. उसी सिलसिले में एक दिन मैं अपने विभाग के शोध-कक्ष में गई, तो मनु भी वहीं थे. ये मुझसे पहले से शोध कर रहे थे, कोई डेढ़ साल पहले से. तब मैंने पहली बार इन्हें देखा था. वहां दो शोधछात्राएं और भी थीं. वे खूब मजे में आपस में हंसी-मजाक कर रही थीं, जैसे लोग घर में खुलकर बातें करते हैं, पर मनु चुपचाप अपने काम में लगे हुए थे. मेरे वहां पहुंचने पर उन शोधछात्राओं ने मेरी बातों में रुचि ली. जब उन्हें पता चला कि मैं भी शोध के लिए आई हूं तो उनकी रुचि और भी बढ़ गई, क्योंकि अब मुझे भी उसी शोधकक्ष में बैठकर अपना काम करना था. लेकिन आश्चर्य, मनु जो अपने काम में लगे हुए थे, उन्होंने अपना चेहरा एक बार भी ऊपर नहीं उठाया, कि जरा देख तो लें कि कमरे में कौन आया है, क्यों आया है. पूरी तरह अपने काम में मग्न...! मुझे बहुत अजीब सा लगा कि भई, यह कैसा आदमी है? इतना बेसुध होकर कोई कैसे काम कर सकता है कि कोई नया बंदा कमरे में आया है, पर उसे देखने की भी फुर्सत नहीं. कोई आदमी भला अपने काम में इतना डूबा हुआ कैसे हो सकता है?
कुछ देर बाद लिखते-लिखते मनु ने धीरे से चेहरा उठा के देखा, तो मेरा ध्यान सबसे पहले उनकी आंखों पर गया. कुछ अलग सी आंखें थीं वे. मुझे लगा कि बहुत गहरे कुएं से जैसे दो आंखें आपको देख रही हों, कुछ वैसी ये आंखें हैं. उन्होंने मुझे तसल्ली से देखा, दो-एक बातें भी कीं, और फिर अपने काम में लग गए. बस, मनु का पहला प्रभाव मेरे मन पर वही था. यानी पहली बार उनका मुझे देखना. उसकी एक गहरी छाप मेरे मन पड़ी. हालांकि मुझे कुछ अजीब भी लगा. सोचा, यह आदमी औरों जैसा नहीं है. कुछ अलग ही है....पर वह अलग क्या है? यह एक सवाल मेरे भीतर उठा, और यह भी कि इस आदमी को थोड़ा समझना चाहिए कि यह है कैसा!
यह सन् 1977 की बात है. जल्दी ही मेरा विषय भी तय हो गया, 'हिंदी कविता की वर्तमान गतिविधि-सन् 1960 से 1975 तक'. मनु भी आधुनिक कविता पर ही शोध कर रहे थे. इनके शोध का विषय था, 'छायावाद एवं परवर्ती काव्य में सौंदर्यानुभूति'. लिहाजा इनसे कभी-कभी थोड़ी बात होने लगी. जो दो शोधछात्राएं और थीं, उनकी सीट भी उसी कमरे में थी. लेकिन आश्चर्य, उन्हें पढ़ाई-लिखाई से कोई खास मतलब नहीं था. बस, स्कॉलरशिप मिल रही है इसलिए वहां हैं. लेकिन मनु तो पूरी गंभीरता से हर वक्त अपने काम में ही लगे रहते थे. 
विषय इनका और मेरा मिलता था, क्योंकि ये भी आधुनिक कविता पर शोध कर रहे थे, मैं भी. तो जब भी बात होती, हम लोग अपने-अपने शोध के विषय में चर्चा करते. और फिर ऐसे ही पढ़ी हुई किताबों के बारे में बातचीत होने लगी, किताबों की विवेचना भी होने लगी. लाइब्ररी से मैं जो किताबें लाती थी, उन्हें ये भी रुचि से पढ़ते. यों इनके पास काफी साहित्य था. काफी किताबें खरीदते भी थे. तो इनका ढंग यह था कि ज्यादातर अपनी सीट पर बैठे-बैठे ही घंटों पढ़ते या लिखते रहते थे. कभी-कभी शोधकक्ष के बाहर पेड़ों की छांह में बैठकर पढ़ते रहते थे. इस कदर तल्लीन होकर कि आसपास का कुछ होश ही नहीं रहता था.
मैं अकसर लाइब्रेरी में जाती थी, तो देखती थी कि कौन सी नई किताब आई है कविता में? समकालीन कविता ही मेरा विषय था. तो नए कवियों की जो भी किताब दिखाई पड़ती, मैं उसे इशू करा के ले आती थी. फिर लाकर इनको भी दिखाती थी कि यह नई किताब आई है. फिर हम दोनों ही वे कविताएं पढ़ते थे. इस तरह बहुत कुछ हम लोग साथ-साथ पढ़ने लगे. उस पर आपस में चर्चा भी होती. तो इस तरह अनजाने ही एक-दूसरे को समझने की शुरुआत हई. कहीं इधर-उधर जाने के बजाय हम लोग या तो लाइब्रेरी जाते, या फिर जो भी समय मिलता, कमरे में गंभीरता से बैठकर पढ़ते. 
सुबह दस बजे से लेकर शाम को 5 बजे तक हमें वहां रहना होता था, तो लंच भी साथ ही होता था. जो किताबें मैं पढ़ती, उनके नोट्स वगैरह भी ले लेती थी. बीच-बीच में कुछ चीजें उलझाऊ लगतीं या कोई मुश्किल आती, तो मनु से भी डिस्कस कर लेती थी. इस तरह साथ पढ़ते हुए कुछ चीजें ऐसी भी होती थीं, जो मुझे भी अच्छी लगीं और इनको भी बहुत अच्छी लगती थीं. तो इस तरह शायद अनजाने में ही हम निकट आते गए.
मैं तो लंच के लिए घर से खाना लाती थी, पर मनु हॉस्टल में रहते थे. कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में शोधार्थियों का अलग से हॉस्टल था, टैगोर हॉस्टल. उसमें ये रहते थे. तो लंच के लिए ये हॉस्टल के मैस में जाते थे. पर कभी-कभी काम में ज्यादा तल्लीन होते तो ये हॉस्टल में जाने के बजाय वहीं कैंटीन से कुछ मंगवा लेते थे. तो हम लोग लंच भी साथ-साथ ही कर लेते थे. इस तरह बातचीत और मिलना-जुलना कुछ बढ़ गया. फिर एक ऐसा क्षण भी आया, कि हम दोनों ने तय कर लिया कि हम जीवन साथ-साथ जिएंगे. पहल न शायद इनकी ओर से हुई, न मेरी ओर से, बस मन ने खुद ही मन को अपनी बात कह दी थी और बहुत कुछ होता चला गया. हमें लगा, हम एक-दूसरे के लिए ही बने हैं.
साथ ही शोध का काम तो चल ही रहा था. मनु का तो काफी काम हो गया था, हालांकि उसे सिलसिलेवार लिखना बाकी था. अपने विषय से संबंधित कुछ शोध-पत्र भी इन्होंने लिखे, जो अच्छे जर्नल्स में छपे थे. फिर भी अभी कोई साल-छह महीने का काम बाकी था. उसी बीच यह हुआ कि मेरे ऊपर घरवालों का शादी के लिए दबाव बढ़ रहा था. पर घर में मैं अभी कुछ बता नहीं सकती थी. मुझे लगा कि मेरी पी-एच.डी. पूरी हो जाए और मनु की कहीं नौकरी लग जाए, तो फिर हम घर में बताएं, यह ज्यादा अच्छा होगा. अभी तो न मेरा कोई आर्थिक आधार था, और न इनका. यू.जी.सी. के फेलोशिप के चार सौ रुपए इन्हें मिलते थे, और मुझे स्कॉलरशिप के तीन सौ रुपए. यानी कुल सात सौ रुपए हर महीने. पर थीसिस जमा होते ही यह आधार भी खत्म हो जाना था. तो फिर आगे कैसे जीवन चलेगा? यह चिंता मनु की भी थी, मेरी भी.
आज यह सोचकर हैरानी होती है कि उस समय भी हमने छोटी-बड़ी एक-एक चीज पर विचार किया था और बहुत सोच-विचारकर निर्णय लिया था. यह केवल ऊपरी आकर्षण वाली बात नहीं थी. कोई सचमुच बड़ी चीज थी, जिसे जीवन भर साथ निभाने का संकल्प आप कह सकते हैं. यानी जीवन की डगर पर साथ-साथ चलना. इसमें कोई बड़ा, कोई छोटा नहीं था. दोनों बराबर थे, बल्कि कहना चाहिए कि दोस्त थे. यानी पति-पत्नी से ज्यादा दोस्त....तो घर में जब दबाव ज्यादा बढ़ने लगा तो फिर मुझे लगा कि अब निर्णय लेने का समय आ गया है, नहीं तो मुझे कहीं भी बांध दिया जाएगा. तो फिर हम दोनों ने निर्णय लिया कि हमें विवाह करना है. और जो थोड़े-बहुत पैसे हमें स्कॉलरशिप के मिल रहे हैं, उसी से हम अपना काम चलाएंगे. आगे कोई छोटी-बड़ी नौकरी तलाश लेंगे.
तो आखिर विवाह हुआ, हमारे घर पर ही. उस समय मनु के सिर्फ बड़े भाई कृष्ण भाईसाहब थे और दो-तीन यूनिवर्सिटी के दोस्त थे. कुल मिलाकर पांच लोग. इसके अलावा हमारे घर के थोड़े से लोग थे. सबको यह बताया गया कि लड़का दहेज नहीं लेता है, इसलिए ये लोग बारात लेकर नहीं आए. हमारे रिश्तेदारों में बता दिया गया कि जिसको शगुन देना है, बस, एक रुपया दे देना. इस तरह बड़ी सादगी से कोई घंटे-डेढ़ घंटे में यह विवाह हुआ. फिर हम चल पड़े वहां से.
आज सोचती हूं, यह सब कुछ ठीक से संपन्न हुआ, इसका सबसे बड़ा श्रेय तो मां को जाता है. मां ने ही घर में सबसे पहले यह निर्णय लिया, यानी अपना मन बनाया और सबको समझाया भी. और आज भी मैं इस बात के लिए मां की बड़ी अहसानमंद हूं कि मेरी मां ने हमें समझा. अगर हम स्वीकृति नहीं देंगे तो फिर इनका क्या होगा, आगे इनका जीवन कैसे चलेगे, इन सब बातों पर विचार करके अपना निर्णय लिया. उस समय के हिसाब से तो यह बहुत बड़ा निर्णय था. 

2.
फिर कुरुक्षेत्र में ही हम लोग रहने लगे. किराए पर एक कमरा और रसोई हमने ली, पर घर साफ-सुथरा था. मेरे मां-बाप के घर से थोड़ी ही दूरी पर था. पहले मनु हॉस्टल में ये रहते थे, पर विवाह के बाद इन्होंने हॉस्टल छोड़ दिया. इनका फेलोशिप और मेरा स्कॉलरशिप चल रहा था, यानी कुल सात सौ रुपए घर में आते थे. लेकिन इसी बीच हमारे विभागाध्यक्ष रामेश्वरलाल खंडेलवाल जी हमसे नाराज हो गए. उन्हें लगा, अपनी मर्जी से विवाह करके हमने कोई बड़ी अनुशासनहीनता का कार्य किया है, जिस पर कार्यवाही होनी चाहिए. वह जमाना भी कुछ ऐसा ही था! तो उन्होंने कहा कि क्यों न तुम दोनों का वजीफा बंद कर दिया जाए? 
हमारे जीवन का यह बड़ा कठिन समय था, और हमें बहुत सारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था. पर हम बहुत धीरज और बहादुरी से इन स्थितियों का सामना कर रहे थे. यानी उस तरुणाई के समय भी हम जैसे बुजुर्ग हो चुके थे, और आगे की बहुत सारी चीजों के बारे में सोच रहे थे. तो यह उस तरह का प्रेम नहीं था, जिसे खाली शारीरिक आकर्षण या देह की लालसा कहा जा सके, बल्कि एक गंभीर निर्णय था, जिसकी गंभीरता से हम परिचित थे.
हमारे पास न पैसा था, न सुविधाएं. नौकरी नहीं होगी तो हम क्या करेंगे, क्या होगा, क्या नहीं? कुछ भी साफ नहीं था. तो ऐसे-ऐसे दिन देखने पड़े कि बताना मुश्किल है. खंडेलवाल जी ने मनु का फेलोशिप तो बंद नहीं किया, पर यह कहकर कि आपका काम संतोषजनक नहीं है, मेरा स्कॉलरशिप बंद कर दिया गया. तो अब घर में केवल चार सौ रुपए आते थे. उसी में घर चलाना था, और अपना-अपना थीसिस का काम भी पूरा करके देना था....हम दोनों रात दिन लगे रहते काम में. फिर इनका थीसिस जमा हुआ तो वे चार सौ रुपए आने भी बंद हो गए. और मेरा स्कॉलरशिप तो पहले ही रोक ही दिया गया था. तो अब हमारा हाथ बिल्कुल खाली था. घोर आर्थिक संकट था. बहुत मुश्किल से विवाह के बाद के ये दो साल हमने काटे.
उन दिनों मनु के घर से चार सौ रुपए हर महीने आ जाते थे, और मेरे घर से हर हफ्ते मेरा भाई हफ्ते भर की सारी सब्जियां, दाल, आटा वगैरह सब कुछ दे जाता था, क्योंकि मेरे मां-बाप वहीं थे. न चाहते हुए भी हमें यह सब स्वीकार करना पड़ रहा था. मनु को भी समझ में आ गया था कि अभी नौकरी नहीं है और स्कॉलरशिप भी बंद हो गया है, सुनीता की पी-एच.डी. पूरी होनी है, तो इन्हें भी स्वीकार करना पड़ा. भले ही यह इनके स्वाभिमान के खिलाफ था. पर इतना तो जानते ही थे कि जब नौकरी नहीं है तो घर कैसे चलेगा? फिर तो भूखे मरने के हालात आ जाएंगे. तो वे दो साल कुरुक्षेत्र में इस तरह हम लोगों ने काटे, कि याद करें तो आज भी झुरझुरी होती है.
अकसर जब मनु के घर से चार सौ रुपए आते थे, तो पैसों का मनीऑर्डर मैं ही लेती थी. लेकिन डाकिए से मनीऑर्डर लेने के बाद घर के अंदर आते ही मेरा बुरी तरह रोना छूट जाता था. सोचती थी कि वह दिन कब आएगा, जब हम अपनी रोटी खुद खाएंगे. कहीं अंदर से लगता था कि यह जो हम ले रहे हैं, एक तरह की भीख है! हमने इतना बड़ा पाप कर दिया है अपनी सहमति से विवाह करके कि हमें भीख लेनी पड़ रही है. सोचकर बहुत दुख होता था.
बहरहाल, मनु का थीसिस पूरा हुआ तो मैंने फिर अपने थीसिस पर खूब तेजी से काम करना शुरू किया. कुछ ही दिनों में एक साथ तीन चैप्टर लिखकर गाइड को दिखाए. तो एक अच्छी बात यह हुई कि गाइड ने काम को संतोषजनक बताते हुए अपनी रिपोर्ट लिखकर भेजी, जिससे मेरा रुका हुआ स्कॉलरशिप फिर से चालू कर दिया गया. यानी तीन सौ रुपए हर महीने आने लगे. उससे थोड़ी सांस में सांस आई. हिम्मत भी....
फिर जब आप अपना घर बसाते हैं तो घर का कुछ प्रबंध भी करना होता है. हमने विवाह किया तो घर में राशन-पानी का सामान आना तो जरूरी था. इससे पहले मैं कभी घर से बाहर नहीं निकली थी. बस, पढ़ने के लिए ही यूनिवर्सिटी जाती थी. मुझसे छोटे चार भाई हैं. मैं अकेली बड़ी बहन हूं, और मां-पिता जी हैं. तो घर में कभी आटा, दाल, चावल लाना हो तो मेरे भाई ही सब कुछ करते थे, या फिर पिता जी जाते थे. मुझे कुछ भी पता नहीं था कि दुकान से सामान कैसे लेना होता है, सब्जी कैसे लेनी होती है. और मनु के साथ तो और भी मुश्किल थी. इन्हें दुनियादारी नाम मात्र को भी नहीं आती थी. तो विवाह के बाद मुझे खुद ही राशन लाना होता था. 
उस समय इतना बेरोजगारी का तनाव था, और इतना ज्यादा परेशानियों का समय था कि मनु उस समय बीड़ी पीने लगे थे. मुक्तिबोध इनके आदर्श थे, तो मुक्तिबोध की तरह बीड़ी पीना शायद इनके मन को कुछ सुकून देता था. इसलिए मैं राशन का जो सामान लाती, उनमें कुछ बीड़ी के बंडल और माचिसें भी ले आती थी. गुस्सा उस समय इनके अंदर बहुत था और हर समय गुस्से में अपना खून जलाते रहते थे. कविताएं, कविताएं और कविताएं. सारे दिन बस एक ही इनकी दुनिया थी. और वे गुस्से और आक्रोश से जलती हुई कविताएं थीं.
आज याद करती हूं तो यह सोचकर हृदय में कुछ कंपकंपी सी होती है कि कितनी मुश्किल से उस समय हमारा गुजारा हुआ. केवल दो सूती साड़ियां थीं मेरे पास. यूनिवर्सिटी जाना होता तो एक दिन पहली वाली पहनकर जाती, दूसरे दिन दूसरी. बस, यही सिलसिला चलता रहा लगभग दो सालों तक. हालांकि मन में कोई हीनता ग्रंथि नहीं थी. लगता था, जो कुछ अपने पास है, उसी में खुश रहना चाहिए और स्वाभिमान से जीना चाहिए. 
आज भी मैं पूरे यकीन से कह सकती हूं कि उन अभाव के दिनों में कम से कम इस बात के लिए कभी मुझे कोई शर्म नहीं महसूस हुई. अंदर से कोई एक चीज थी, जो कि तना हुआ रखती थी और ढीला नहीं पड़ने देती थी. कहीं भीतर से आवाज आती थी कि नहीं, हमने एक फैसला किया है तो हम जैसे भी हो, उसे पूरा करेंगे. इस संघर्ष से पार पाएंगे, और आज नहीं तो कल अपने मुकाम पर पहुंचेंगे. अपने सपनों का घर बनाएंगे.

3.
अलबत्ता उसी बेरोजगारी के दिनों का एक प्रसंग है. हमारे हिंदी विभाग का एक पियन था, मानसिंह. वह हमसे बहुत प्रेम करता था. हम दोनों से ही. हम लोगों से उम्र में काफी बड़ा था वह. कोई पंद्रह-बीस साल. पहले वह फौजी रहा था, और फिर यहां हिंदी विभाग में पियन लग गया था. मनु समय-समय पर उसकी मदद करते रहते थे. जैसे घर से घी आया या कुछ और खाने-पीने का सामान आया, पिन्नियां वगैरह आईं तो खुद खाने का तो मतलब नहीं. इन्हें याद ही नहीं रहता था. बाद में वह सब कुछ मानसिंह के हवाले.
वह सोचता था कि यह आदमी कुछ अलग तरह का है. तो फिर उसने अपना दुख इनसे बांटने की कोशिश भी की कि बाऊ जी, मेरा बच्चा दसवीं क्लास में पढ़ रहा है और उसको साइंस और मैथ्स में बड़ी मुश्किल पड़ रही है, इंग्लिश में भी. क्लास में मास्टर लोग ट्यूशन रखने के लिए कहते हैं, पर ट्यूशन मैं करवा नहीं सकता. अगर आप उसकी थोड़ी मदद कर दो, तो आपका बड़ा उपकार होगा. इस पर इन्होंने कहा कि मानसिंह, ट्यूशन की कोई जरूरत नहीं है. साइंस और मैथ्स मैं पढ़ा दूंगा. फिर मेरी ओर इशारा करके कहा, और बीबी जी की इंग्लिश बहुत अच्छी है, ये इंग्लिश पढ़ा देंगी इसको. मनु ने फिजिक्स में एम.एस-सी. किया हुआ है, तो साइंस और मैथ्स पढ़ाना इनके लिए बहुत आसान था. यानी उस बेरोजगारी के वक्त में भी जितना किसी के लिए कर सकें, वह करने की कोशिश हमने की.  
हमारे लिए वह बहुत मुश्किलों का समय था, लेकिन ऐसे हालात में भी हमने उस बच्चे को पढ़ाया और उसके बहुत अच्छे नंबर आए. महिपाल उसका नाम है. बाद में उस लड़के ने बी.एस-सी. किया, एम.एस-सी. किया और फिर वह साइंस टीचर बना. यहीं दिल्ली में एक स्कूल में पढ़ा रहा है. कुछ बरस पहले वह अचानक हमारे घर भी मिलने के लिए आया. उस पर मेरी एक कहानी भी है. इतने साल बाद उससे मिलना वाकई हैरान कर देने वाला अनुभव था हमारे लिए. वह बच्चा तब 15 साल का था, जब हमने उसे पढ़ाया था. पर जब मिलने के लिए आया तो वह कोई पैंतीस साल का युवक हो चुका था. चौदह साल की तो उसकी बेटी ही थी. 
महिपाल जब घर आकर हमसे मिला और बताया कि आंटी, मैं वही महिपाल हूं, जिसे आप लोगों ने तब पढ़ाया था, तो उस समय की उसकी खुशी का अंदाजा लगा पाना मुश्किल है. और हम दोनों तो एकदम अभिभूत से हो गए. जैसे यह कोई सुंदर सा सपना हो.
उस समय यूनिवर्सिटी में मनु के दो बड़े गहरे दोस्त थे, ब्रजेश भाई और पीडी शर्मा. दोनों का विवाह हमसे पहले हो चुका था. ब्रजेश भाई की पत्नी रमा बहुत स्नेहशील हैं, और उनकी छोटी सी बेटी पाली तो हमें बिल्कुल अपनी बेटी लगती थी. पीडी की पत्नी विमला भी बड़े खुले मन की हैं. तो वे लोग जैसे छुट्टी वाले दिन इतवार को या कभी शाम-वाम को हमारे घर आते. दो छोटे-छोटे कमरों का तब किराए का घर था हमारा. वे लोग आते तो खाना भी हम लोग साथ-साथ खाते थे. बस, एक ही सब्जी होती थी, ज्यादातर आलू का रसा, साथ में गरम-गरम रोटियां. तो वे अकसर वही खुश होकर खा लेते थे. हमें भी कभी नहीं लगा कि उनकी ठीक से खातिर नहीं हुई. 
तो दिल बड़ा पक्का बना लिया था हमने, कि इस चीज को लेकर रोना-झींकना नहीं है. जो है, उसी में संतुष्ट रहना है. और यह सिलसिला तो लगभग पूरी जिंदगी ही चलता रहा. न कभी ज्यादा पैसे आए घर में, और न हमने उसकी कोई चिंता ही की.
पहले मनु की नौकरी सहारनपुर के महाराज सिंह डिग्री कॉलेज में लगी. सिर्फ एक-डेढ़ महीने की लीव वेकेंसी थी. टीचर लंबी छुट्टी पर थे और इम्तिहान एकदम नजदीक ही थे. इन्हें बहुत थोड़े से समय में ही बच्चों का कोर्स पूरा कराना था. तो कुछ दिनों के लिए इन्होंने वहां पढ़ाया था. बहुत थोड़ा सा सामान लेकर हम वहां पहुंच गए थे, जिससे रोटी-पानी चल जाए. साथ में हलका सा बिस्तर, बस. पर वहां मनु ने बच्चों को खूब मन से पढ़ाया और हर किसी पर अपनी छाप छोड़ी. बाद में वहां की स्थितियों पर इन्होंने दो-एक कहानियां भी लिखीं. कुल मिलाकर सहारनपुर में बिताया गया वह समय काफी अच्छा था और आज भी हमें याद आता है.
इसके बाद मनु ने एक साल पानीपत के आर्य कॉलेज, पानीपत में पढ़ाया. पार्ट टाइम लेक्चरशिप की पोस्ट थी वहां. उसी के तहत. पर ये पढ़ाते थे बहुत मगन होकर. वहां के छात्र ही नहीं, प्राध्यापक भी इनके मुरीद थे. यहां तक कि प्रधानाचार्य भी प्रशंसा करते थकते न थे. यों पैसे बहुत कम मिलते थे. कुल साढ़े चार सौ रुपए महीना. वहां मैंने भी कुछ समय एक स्कूल में पढ़ाया, जो इन्हीं के एक कुलीग का था. फिर उसके बाद इनका सेलेक्शन डी.ए.वी. कॉलेज, मलोट में हो गया, और मेरा गुड़गांव में. पी-एच.डी. तो मेरी पूरी हो ही गई थी. तो मेरा सेलेक्शन गुड़गांव के द्रोणाचार्य कॉलेज में हो गया. अस्थायी नियुक्ति ही थी वह एक सत्र के लिए. इनकी भी डी.ए.वी. कॉलेज, मलोट अस्थायी नियुक्ति ही थी, जो बाद में एक साल और बढ़ गई. इस तरह मुझे गुड़गांव में रहना पड़ा और मनु पंजाब चले गए. 
पंजाब में भटिंडा और अबोहर के पास ही मलोट शहर है, जहां इन्होंने कोई दो साल पढ़ाया. तो इस समय आर्थिक स्थिति तो कुछ ठीक सी हो गई, पर हम दोनों अब अलग-अलग हो गए थे. तो घर तो कहीं था ही नहीं. फिर अगले बरस मेरा सेलेक्शन अमृतसर के डी.ए.वी. कालेज फॉर वीमेन में हो गया. तो हम दोनों ही पंजाब में तो पहुंच गए, पर थे दूर-दूर ही, क्योंकि अमृतसर और मलोट में फासला बहुत ज्यादा था. महीने में मुश्किल से एक-दो बार हम लोग मिल पाते थे. यों एक बड़ा तूफान था जिंदगी में और हम सोचते थे, क्या हमें पूरी जिंदगी ऐसे ही गुजारनी होगी?

4.
बहरहाल वह सत्र पूरा होते ही हम लोग वापस कुरुक्षेत्र आ गए. उन्हीं दिनों मनु अपनी किसी रचना के बारे में बात करने दिल्ली प्रेस में विश्वनाथ जी से मिलने गए. वहां पंजाब के हालात पर कुछ बात चली तो मनु ने कहा कि मैं वहां से छोड़ना चाहता हूं. इस पर विश्वनाथ जी ने कहा कि हमें एक मेहनती आदमी चाहिए. आप चाहें तो आज से ही यहां ज्वाइन कर लें. तो फिर ये दिल्ली प्रेस के संपादकीय विभाग में आ गए. 
पंजाब छोड़ने का एक बड़ा कारण यह था कि वहां हालात अब बड़ी तेजी से बिगड़ने लगे थे. भिंडरावाले का आतंक काफी ज्यादा हो गया था. बिना बात खून-खराबा होने लगा. उसका आतंक तेजी से फैलता जा रहा था. साथ ही धर्म के आधार पर नफरत भी. खालिस्तान वगैरह का चक्कर चल पड़ा. तो फिर घर के लोगों ने कहा कि तुम लोग इधर आ जाओ. वहां पंजाब में मत रहो, क्योंकि तुम सही बात बोलने से रह नहीं सकते. और वहां बहुत कुछ गलत हो रहा है, तो कोई अप्रिय घटना घट सकती है.
तो इस तरह सन् 1983 में मनु दिल्ली प्रेस में आ गए. वहां संपादन का काम था इनका. वेतन तो कम ही था, कुल सात सौ रुपए. पर काम बहुत ज्यादा था. सारी पत्रिकाओं में आने वाली रचनाओं की कॉपी एडिटिंग. इनकी आंखें दुखने लगती थीं सुबह से शाम तक काम करते-करते. पर कोई रिवार्ड नहीं. साल भर बाद कुछ थोड़े से पैसे बढ़ जाते थे. पर मनु जी-जान से अपने काम में लगे रहते थे. इन्हें लगता था, कभी तो मेरा काम बोलेगा. साथ ही इनकी रचनाएं भी दिल्ली प्रेस की पत्रिकाओं में निरंतर छपती थीं. 
वहीं संपादन विभाग में एक बड़े भले से व्यक्ति थे, कृष्ण कुमार. वे मनु का काम देखते तो बहुत प्रभावित होते थे. उन्होंने 'नंदन' के संपादक भारती जी को इनके बारे में बताया. भारती जी ने इनसे बात की तो काफी अच्छा लगा उन्हें. फिर हिंदुस्तान टाइम्स के एग्जीक्यूटिव प्रेसीडेंट नरेश मोहन जी ने एक दिन इंटरव्यू के लिए इन्हें बुलाया. जल्दी ही वहां से पत्र भी आ गया तुरंत ज्वाइन करने के लिए कहा. तो यों मनु 31 जनवरी, 1986 को 'नंदन' में आ गए. 
हमारी बेटी ऋचा उन दिनों छोटी ही थी. दिल्ली के सेंट स्टीफन अस्पताल में सन् 1984 में वह जनमी थी. फिर कोई ढाई साल बाद सन् 1987 में अपर्णा का जन्म हुआ. मनु ने कहा कि हम दोनों नौकरी करेंगे तो बच्चों की ठीक से परवरिश नहीं हो पाएगी. इन्हें लगता था कि घर बंद नहीं रहना चाहिए. ऐसा नहीं कि बच्चे स्कूल से आकर खुद ताला खोलें और ब्रेड वगैरह खाकर किसी तरह काम चलाएं. मुझे भी यह ठीक लगा. मनु 'नंदन' में कोई पच्चीस साल रहे. अप्रैल 2010 में वहां से मुक्त हुए. तब से अब घर में ही इनका पढ़ना-लिखना जारी है, बल्कि पहले से भी और ज्यादा हो गया है. 
हालांकि मुझे इस बात की तसल्ली है कि घर के हालात चाहे जैसे भी रहे हों, मनु का लिखना-पढ़ना कभी नहीं छूटा. जब बेरोजगार थे, तब भी खूब लिखते थे. बल्कि रात-दिन लिखते ही रहते थे. इनकी बच्चों के लिए लिखी गई बड़ी प्यारी सी कविता है, 'धीरे से मुसकाती चिड़िया'. यह बेरोजगारी के कष्ट भरे दिनों में ही लिखी गई थी. तो उसी तनाव के माहौल में बच्चों की कविताएं इन्होंने लिखनी शुरू कीं. ऐसे ही 'जल्दी आओ भैया चांद, ले लो एक रुपैया चांद', 'चिट्ठी है घर का अखबार' जैसी एक से एक सुंदर बाल कविताएं उस दौर में मनु ने लिखीं! उस समय इनके भीतर से एक तरह से झरना सा फूट पड़ा था बच्चों की कविताओं का. हैरानी की बात यह कि उस समय कहां तो एक तरफ बड़ी-बड़ी कविताएं लिख रहे थे, मुक्तिबोध जैसी. बहुत गहरे तनाव और विद्रोह वाली कविताएं, और दूसरी तरफ बच्चों के लिए ऐसी कोमल चीजें कि अगर बड़े भी पढ़ें तो थोड़ी देर के लिए बच्चे बन जाएं.
मेरा जो थीसिस का टॉपिक था, वह भी बहुत तेज-तर्रार किस्म का था. जिस दौर की कविताओं पर मुझे काम करना था, वह लीलाधर जगूड़ी, धूमिल वगैरह का दौर था. यानी बहुत गहरे आवेश, गुस्से और विद्रोह वाली कविताएं, जिनमें एक तरह की ललकार थी. खुद इनके शोध की परिधि में छायावाद के अलावा प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता और समकालीन कविता शामिल थी, जिनका मिजाज बहुत तीखा था. तो एक ओर ये उन सबमें रमे रहते, दूसरी तरफ बाल कविताओं का यह निर्मल झरना भी फूट पड़ा था. और हैरानी इस बात की है कि ये दोनों चीजें साथ-साथ चल रही थीं. बल्कि यह सिलसिला कभी खत्म नहीं हुआ. आज तक चला आता है.
बीच में जब मनु दिल्ली प्रेस में थे तो प्रेम और सौंदर्य के बड़े कोमल गीत भी इन्होंने लिखे थे, जो 'सरिता', 'मुक्ता' में काफी छपे. कुछ और पत्रिकाओं में भी बड़े आकर्षक ढंग से छपे. पर यह धारा ज्यादा आगे नहीं चली.

5.
अकसर मैं सोचती हूं कि इन तैंतालीस बरसों के साथ में अगर कोई मुझसे पूछे कि मनु कैसे हैं, या इनकी शख्सियत कैसी है, तो मैं क्या कहूंगी? इसके जवाब में बस एक ही बात आती है कि यह आदमी इस दुनिया का है ही नहीं. शायद किसी और ही दुनिया का आदमी गलती से इस दुनिया में आ गया. अगर खाने-पीने या पहनने-ओढ़ने की रुचियों के बारे में बताना हो तो एक ही जवाब है कि कोई रुचि नहीं. जरा भी. कपड़े जो मिल जाएं, वही ठीक. हां, वह ऊटपटांग नहीं होना चाहिए. वैसे शुरू से ही इन सब चीजों की जिम्मेदारी मेरी है. मैं ही कपड़ा लाती हूं, फिर मैं ही दर्जी को सीने के लिए दे देती हूं. साथ ही इनका कोई पुराना कपड़ा नाप के लिए दे देती हूं. वैसे इन्हें कुरता-पाजामा पसंद है, पैंट-शर्ट भी. पर पैंट पर कुरता पहनना सबसे ज्यादा इनके मन को भाता है. सर्दियों में जर्सी, शाल और जैकिट, वो भी खादी आश्रम वाले. 
शुरू में मनु ने कविताएं ही ज्यादा लिखीं, फिर कहानी और उपन्यासों की ओर आए. इनके तीन उपन्यास हैं- 'यह जो दिल्ली है', 'कथा सर्कस' और 'पापा के जाने के बाद'. ये तीनों कहीं न कहीं अभिव्यक्ति के संकट से जुड़े हैं. 'यह जो दिल्ली है' में पत्रकारिता की दुनिया है तो 'कथा सर्कस' साहित्य जगत से जुड़ा है. 'पापा के जाने के बाद' में कला का संसार है. इन तीनों उपन्यासों में 'यह जो दिल्ली है' मुझे बहुत पसंद है. वह इनके जीवन से बिल्कुल जुड़ता हुआ सा है. यानी जैसा इनका जीवन है, उसी तरह का है 'यह जो दिल्ली है' का सत्यकाम. मुझे इनके उपन्यासों में अब भी वही अच्छा लगता है. 
एक बड़ी दिलचस्प बात यह है कि मनु के लेखन में मैंने बरसोंबरस गणेश की भूमिका निभाई है. कोई बीस-पचीस बरसों तक. छुट्टी वाले दिन तो लगभग पूरे दिन ही यह होता था कि मैं कागज-कलम लेकर बैठ जाती. मनु बोलते जाते और मैं लिखती जाती थी. और मजे की बात यह थी कि यह सब बिल्कुल स्वतःस्फूर्त होता था. जैसे साथ-साथ सोच रहे हैं और बोल भी रहे हैं. यहां तक कि इनके तीनों उपन्यास 'यह जो दिल्ली है', 'कथा सर्कस' और 'पापा के जाने के बाद' भी मैंने ही लिखे हैं. मनु बोलते जाते थे और मैं लिखती जाती थी. इनकी लिखाई ज्यादा साफ नहीं है, तो इससे इन्हें बहुत आसानी हो जाती थी. हैरानी की बात यह है कि बोलते समय हर पात्र की मनःस्थिति, भीतर का द्वंद्व, कशमकश और संवाद, जैसे सब कुछ इनके मन के परदे पर साफ लिखा होता था. इसलिए बगैर रुके, बोलते चले जाते थे. कभी मुझे लिखने में कठिनाई आती तो दोबारा जस का तस दोहरा देते थे.  
लिखवाने से पहले कुछ रफ सा तो ये कागजों पर लिख लेते थे, पर उसमें पूरे वाक्य नहीं होते थे. बस, अजब सी लिखाई में यहां-वहां छितरे हुए कुछ शब्द, जैसे कागज पर चिड़िया-कौए बना लिए हों. पर एक-एक शब्द में ही जैसे दस वाक्य छिपे हुए हैं. या पूरी एक सिचुएशन का संकेत उसमें छिपा होता था. तो मनु उन रफ कागजों को हाथ में लेकर कुछ ऐसे बोलते जाते थे, जैसे सब कुछ कागज पर लिखा हुआ हो. बीच में कहीं अटक गए थोड़ा, तो जरा सा सोचा एकाध मिनट के लिए, फिर उसी तरह धाराप्रवाह बोलना शुरू कर दिया. फिर बाद में तो कुछ रफ लिखने की भी इन्हें जरूरत नहीं पड़ती थी, सीधा ही बोल के लिखाते थे. 
आज मैं सोचती हूं तो बड़ी हैरानी होती है. लगता है कि लेख तो ठीक है, पर कहानी और उपन्यास में इस तरह से संवादों को बोलते हुए लिखवाना कितना कठिन काम रहा होगा. पर शायद मेरे साथ काम करते हुए इन्हें यह दुई का अहसास होता ही नहीं था. लगता था, यह दूसरा जो लिख रहा है, यह दूसरा नहीं है, मैं ही हूं. जब दो लोगों का मन एकमेक हो जाए, तब शायद ऐसा होता होगा. यानी यह दूसरा हाथ जो लिख रहा है, वह भी तो मेरा ही हिस्सा है, तो उसके आगे संकोच कैसा?
मैं अचंभित होकर देखती थी कि यह हो क्या रहा है. जैसे अंदर से कोई सृजन का धागा निकल रहा है, बस, निकलता जा रहा है...और कहीं वह टूटता नहीं था. यहां तक कि खुद मेरा उस कथानक से इतना जुड़ाव हो जाता था कि मुझे भी लिखते समय ऐसा लगता था कि जैसे मैं कुछ अपना ही लिख रही हूं. मनु बोल रहे हैं और मैं लिख रही हूं, यह भाव मन में नहीं आता था. फिर उसमें न थकान होती थी, न कोई मुश्किल. इस तरह बहुत सारा काम हो गया. 
बरसों तक यही सिलसिला चलता रहा. इस दौरान बहुत कुछ लिखा गया. इनमें लेख तो बहुत सारे थे. कई बहुत लंबे-लंबे इंटरव्यू भी थे. कहानियां भी कई इसी तरह लिखी गईं. पर मुझे उपन्यास लिखने में सबसे ज्यादा आनंद आया. शायद इसलिए कि उपन्यास बोलते-बोलते उसका एक सुर सा बंध जाता था. मुझे वह बहुत आकर्षित करता था.
ऐसे ही हिंदी बाल साहित्य का इतिहास मनु ने मुझे बोल-बोलकर लिखवाया. पहला प्रारूप मैंने साफ लिखाई में लिखा. फिर कंप्यूटर आ गया, तो उस पर सारा काम करने लगे और मुझे इस काम से मुक्ति मिली. पर बाल साहित्य के इतिहास को लिखने में इन्हें कोई बीस-बाईस साल लगे. हजारों किताबें इन्होंने खरीदीं, उन्हें पूरी गंभीरता से पढ़ा और अपने इतिहास ग्रंथ में शामिल किया. नई-नई किताबें आती रहीं और यह सिलसिला चलता रहा. एक बार तो थककर बैठ ही गए. फिर मैंने जोर दिया कि ऐसे तो तुम्हारी पूरी जिंदगी खत्म हो जाएगी, और यह काम बीच में ही पड़ा रहेगा. पूरा नहीं होगा. तो इसे कहीं तो विराम देना ही होगा.
तब जाकर इन्होंने फिर से उठाया उस काम को और लगातार कई वर्षों की मेहनत के बाद वह पूरा हुआ. इस तरह हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखा गया. पर उसके लिए कितनी मेहनत इन्होंने की और कितना तनाव झेला, बताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं.

6.
मनु की दिनचर्या अगर पूछी जाए तो कहना होगा कि लिखना, लिखना और बस लिखना. और यह सारा कुछ ये अपने लैपटाप पर खुद ही करते हैं. पहले उमेश से टाइप करवाते थे, जिसे ये अपने छोटे भाई जैसा ही मानते हैं. लेकिन सेवामुक्त होने के बाद इतना पैसा नहीं था कि टाइप के लिए दे सकें. तो धीरे-धीरे खुद सीखा. एक ही उंगली से टाइप करते हैं, हालांकि फिर भी अब स्पीड काफी बढ़ गई है. इससे काम चल जाता है. कम से कम अपना काम तो आराम से कर लेते हैं. इन दिनों आत्मकथा पर काम कर रहे हैं. पहला खंड तो आ गया है, 'मेरी आत्मकथा: रास्ते और पगडंडियां'. अभी इसके तीन खंड और आने बाकी हैं. 
ऐसे ही इनके आत्म-संस्मरणों वाली किताब आ गई है, 'मेरे कुछ आत्म-संस्मरण'. इसमें मां, पिता जी और श्याम भैया पर बहुत भावनात्मक संस्मरण हैं. बचपन के दिनों की बड़ी मीठी यादें भी हैं. अपने अध्यापकों को भी इन्होंने बहुत आदर से याद किया है. 
आत्मकथा के बाद भी बहुत सी योजनाएं हैं इनके मन में. कहते हैं, "अगर जीवन ठीक से चलता रहा, तो अभी बहुत कुछ करना है मुझे." एक अच्छी बात मुझे यह लगती है कि इधर कविताओं की ओर फिर से लौटे हैं. नया कविता संकलन तैयार किया है, जो कोई बीस साल बाद आएगा. कई जगह अपनी कविताएं भेजी भी हैं. वे पत्र-पत्रिकाओं में छप रही हैं. मुझे यह देखकर बड़ा दुख होता था कि इऩका यह पक्ष तो बिल्कुल भुला ही दिया गया. बीच में उपन्यासों के बारे में ज्यादा बात होती थी, तब भी कविता के बारे में बहुत कम लोग चर्चा करते थे. पर अगर बाद की कविताओं का एक संकलन आ जाए तो फिर से लोगों को वे चीजें याद आएंगी. 
कभी-कभी मुझे थोड़ी हैरानी भी होती है कि अच्छा, यों ही साथ-साथ चलते हमें कोई तैंतालीस बरस हो गए! इतनी लंबी यात्रा के बाद अगर कोई पूछे कि इनके व्यक्तित्व का सबसे अच्छा पहलू मुझे कौन सा लगता है, तो मैं कहूंगी कि मन बिल्कुल निर्मल है इनका. अगर किसी को अपने जीवन की कोई बात बताने लगे तो इस चीज की बिल्कुल परवाह नहीं करते कि जो सामने वाला सुन रहा है, वह इस चीज को लेकर कहां-कहां उड़ाएगा. इसकी जरा भी परवाह नहीं है इनको. जो कुछ मन में है, वह एकदम साफ कह देते हैं. इतना साहस कम से कम मुझमें तो नहीं है. शायद किसी भी आम आदमी में नहीं होता. तो यह चीज मुझे बहुत विलक्षण लगती है. कभी मैं मना करती हूं तो कहेंगे कि इसमें क्या बात है, जो मन में है, वही तो कहा है मैंने. तो इन्हें ऐसा कुछ नहीं लगता. मैं समझती हूं, यह बड़े साहस की बात है. 
फिर एक बड़ा गुण इनमें यह भी है कि कोई कितना ही बुरा व्यवहार क्यों न कर दे, या फिर इनकी किसी कविता, कहानी या उपन्यासों के बारे में भी, कितनी ही सख्त आलोचना क्यों न कर दे, उसे ये मन में नहीं लिए फिरते. इस मामले में मन बिल्कुल निर्मल है इनका. पिछली सारी कटु चीजें बड़े आराम से भुला देते हैं, जिन्हें लोग जिंदगी भर नहीं भूल पाते और समय आने पर बदला भी लेते हैं. पर मनु, मैंने देखा है, इन सारी चीजों से बहुत ऊपर उठ चुके हैं. यह चीज मुझे अच्छी भी लगती है, और मन में कुछ हैरानी भी होती है कि भला कोई आदमी ऐसा कैसे हो सकता है!
कभी-कभी मैं कह देती हूं कि भूल कैसे गए तुम कि इसने क्या कहा था? इस पर इनका जवाब होता है कि मैं उसी को लेकर बैठा रहूंगा तो आगे कैसे बढूंगा? मुझे तो अभी बहुत सारे काम करने हैं. तो मैं समझती हूं, इनके लगातार काम करने और आगे चलते जाने का शायद यह भी एक मंत्र है. यह ऐसी चीज है, जो इनकी कलम को रुकने नहीं देती है. 
आज इन तैंतालीस बरसों में जी गई अपनी जिंदगी पर विचार करती हूं तो लगता है, एक के बाद एक जीवन की बहुत कठिन परीक्षाएं थीं, जिनका हम दोनों ने मिल-जुलकर सामना किया. साथ-साथ चलते हुए तमाम अभाव और मुश्किलों के बीच भी हमने एक अच्छी जिंदगी जी है. बार-बार ठोकरें खाईं, गिरे, लेकिन फिर चल पड़े. इस बात की शर्म नहीं कि बार-बार गिरे, बल्कि इस बात की खुशी है कि हर बार गिरने के बाद हम लोग उठे और आगे चल पड़े. 
मुझे इस बात का संतोष है कि जैसे जीवन का सपना हमने देखा था, उसे करीब-करीब सच कर दिखाया. हमारी दो बेटियां हैं, वे भी इसी ढंग की हैं. उम्मीद है, जिस सादगी और सच्चाई से हमने अपना जीवन जिया, वे भी उसी रास्ते पर आगे बढ़ेंगी और अपना मुकाम हासिल करेंगी.

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वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश मनु का कल जन्मदिन था. उन पर यह विशेष लेख उनकी सहधर्मिणी डॉ सुनीता ने लिखा है. उत्तर प्रदेश के शिकोहाबाद में 12 मई, 1950 को जन्मे वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश मनु का मूल नाम चंद्रप्रकाश विग है. आपने आगरा कॉलेज से भौतिक विज्ञान में एम.एस-सी. की डिग्री हासिल की, पर साहित्यिक रुझान ने उनके जीवन का ताना-बाना बदल दिया. 1975 में आपने हिंदी साहित्य में एम.ए. किया और 1980 में यूजीसी की फेलोशिप के तहत कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से 'छायावाद एवं परवर्ती काव्य में सौंदर्यानुभूति' विषय पर शोध किया. मनु अब तक शताधिक रचनाओं का सृजन कर चुके हैं. प्रसिद्ध साहित्यकारों के संस्मरण, आत्मकथा तथा बाल साहित्य से जुड़ी बड़ी योजनाओं पर आपका काम बेहद महत्त्वपूर्ण है.
आपकी प्रकाशित पुस्तकों में उपन्यास: यह जो दिल्ली है, कथा सर्कस, पापा के जाने के बाद, कहानियां; अंकल को विश नहीं करोगे, सुकरात मेरे शहर में, अरुंधती उदास है, जिंदगीनामा एक जीनियस का, तुम कहां हो नवीन भाई, मिसेज मजूमदार, मिनी बस, दिलावर खड़ा है, मेरी श्रेष्ठ कहानियां, मेरी इकतीस कहानियां, 21 श्रेष्ठ कहानियां, प्रकाश मनु की लोकप्रिय कहानियां, मेरी कथायात्रा: प्रकाश मनु, मेरी ग्यारह लंबी कहानियां, जीवनी; जो खुद कसौटी बन गए, आत्मकथा; मेरी आत्मकथा: रास्ते और पगडंडियां. हिंदी के दिग्गज साहित्यकारों के लंबे, अनौपचारिक इंटरव्यूज की किताब 'मुलाकात' बहुचर्चित रही. 'यादों का कारवाँ' में हिंदी के शीर्ष साहित्कारों के संस्मरण. देवेंद्र सत्यार्थी, रामविलास शर्मा, शैलेश मटियानी, रामदरश मिश्र तथा विष्णु खरे के व्यक्तित्व और साहित्यिक अवदान पर गंभीर मूल्यांकनपरक पुस्तकें. साहित्य अकादेमी के लिए देवेंद्र सत्यार्थी और विष्णु प्रभाकर पर मोनोग्राफ. सत्यार्थी जी की संपूर्ण जीवनी 'देवेंद्र सत्यार्थी: एक सफरनामा' प्रकाशन विभाग से प्रकाशित. इसके अलावा 'बीसवीं शताब्दी के अंत में उपन्यास: एक पाठक के नोट्स' आलोचना में लीक से हटकर एक भिन्न ढंग की पुस्तक.
हिंदी में बाल साहित्य का पहला व्यवस्थित इतिहास लिखने का श्रेय उन्हें जाता है. इस ग्रंथ का नाम 'हिंदी बाल साहित्य का इतिहास' है. इसके अलावा मनु ने 'हिंदी बाल कविता का इतिहास', 'हिंदी बाल साहित्य के शिखर व्यक्तित्व', 'हिंदी बाल साहित्य के निर्माता' और 'हिंदी बाल साहित्य: नई चुनौतियां और संभावनाएं' जैसे महत्त्वपूर्ण काम किए हैं. बाल उपन्यास 'एक था ठुनठुनिया' पर साहित्य अकादमी का पहला बाल साहित्य पुरस्कार. उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के 'बाल साहित्य भारती पुरस्कार' और दिल्ली हिंदी अकादमी के 'साहित्यकार सम्मान' और कविता-संग्रह 'छूटता हुआ घर' पर प्रथम गिरिजाकुमार माथुर स्मृति पुरस्कार सम्मानित. प्रसिद्ध साहित्यकारों के संस्मरण, आत्मकथा तथा बाल साहित्य से जुड़ी कुछ बड़ी योजनाओं पर काम करने के साथ ही स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं. साहित्य आजतक की ओर से मनु को सतत सृजनरत रहने की शुभकामनाएं.
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# डॉ. सुनीता, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008, मो. 09810602327
 

 

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