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पद्मा सचदेव सर्वोच्च लेखकीय सम्मान 'साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता' से सम्मानित

प्रख्यात साहित्यकार एवं विद्वान वरिष्ठ लेखिका पद्मा सचदेव को साहित्य अकादमी ने जब साहित्य जगत के सर्वोच्च सम्मान 'महत्तर सदस्यता' से विभूषित किया तो उनकी लिखी कविता की ये पंक्तियां 'सच्चो सच्च बताना साईं, आगे-आगे क्या होना है' अनायास याद हो आयीं.

साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता अर्पण समारोह के दौरान प्रख्यात लेखिका पद्मा सचदेव साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता अर्पण समारोह के दौरान प्रख्यात लेखिका पद्मा सचदेव

सच्चो सच्च बताना साईं
आगे-आगे क्या होना है

प्रख्यात साहित्यकार एवं विद्वान वरिष्ठ लेखिका पद्मा सचदेव को साहित्य अकादमी ने जब साहित्य जगत के सर्वोच्च सम्मान 'महत्तर सदस्यता' से विभूषित किया तो उनकी लिखी कविता की ये पंक्तियां अनायास याद हो आयीं. इस आयोजन की खास बात यह थी कि सचदेव का यह सम्मान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष और स्वयं में अनूठे कन्नड़ लेखक चंद्रशेखर कंबार के हाथों मिला.

संगीत नाटक अकादमी और भारतीय ज्ञानपीठ से पुरस्कृत लेखक कंबार ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में पद्मा सचदेव के लेखकीय अवदान का उल्लेख करते हुए कहा कि पद्मा सचदेव उत्कृष्ट कवयित्री तो हैं ही वे एक श्रेष्ठ अनुवादक भी हैं. उनका अपनी मातृभाषा से प्रेम और उसको आगे बढ़ाने का जुनून काबिले तारीफ़ है. हमारी पीढ़ी सौभाग्यशाली है कि हम उनके समय में रचनात्मक कार्य कर रहे हैं.

महत्तर सदस्यता प्राप्त करने के बाद अपने स्वीकृति वक्तव्य में पद्मा सचदेव ने कहा कि '‘देश की सर्वोच्च संस्था, साहित्य अकादमी द्वारा मुझे सर्वोच्च सम्मान दिए जाने पर मैं गद्गद् हूँ.’ उन्होंने साहित्य अकादमी के पूर्व सचिव प्रभाकर माचवे और इंद्रनाथ चौधुरी का ज़िक्र करते हुए कहा कि इन दोनों ने ही मुझे लेखकों के एक बड़े परिवार से जोड़ा. अपने जीवन में डोगरी लोक गीतों की भूमिका का ज़िक्र करते हुए कहा कि इन्हीं के करीब जाकर मैंने छंद जोड़ना सीखा. हिंदी में गद्य लेखन का श्रेय उन्होंने चर्चित साहित्यकार धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारती को दिया.

महत्तर सदस्यता अर्पण समारोह के प्रारंभ में अतिथियों एवं श्रोताओं का स्वागत करते हुए साहित्य अकादमी के सचिव के श्रीनिवासराव ने कहा कि भारत साहित्य और लेखन की भूमि है. इसका सबसे महत्त्वपूर्ण आयाम देश की महिला रचनाकारों का योगदान है. उन्हें इस दिशा में अभी बहुत कार्य करना है फिर भी लंबे समय से सभी भारतीय भाषाओं में महिलाओं के उत्कृष्ट योगदान को भुलाया नहीं जा सकता. इनकी संख्या भले ही अधिक न हो लेकिन सभी भाषाओं में उनके लेखन की सामग्री और गुणवत्ता विश्व की बाकी लेखिकाओं से उत्कृष्ट है, चाहे वह पद्य हो या गद्य. अपने स्वागत भाषण के बाद उन्होंने पद्मा सचदेव के लिए लिखा गया प्रशस्ति पत्र प्रस्तुत किया. चंद्रशेखर कंबार ने पद्मा सचदेव का सम्मान शॉल और ताम्रफलक देकर किया.

अर्पण समारोह के बाद संवाद कार्यक्रम के अंतर्गत प्रख्यात डोगरी लेखक दर्शन-दर्शी की अध्यक्षता में इंद्रनाथ चौधुरी, चित्रा मुद्गल और मोहन सिंह ने पद्मा सचदेव से जुड़े अपने सृजनात्मक और व्यक्तिगत संबंधों को साझा किया. ज्ञात हो कि पद्मा सचदेव अकादेमी की महत्तर सदस्यता सम्मान प्राप्त करने वाली आठवीं लेखिका हैं. अपनी रचनाओं के माध्यम से, चाहे वे कविताएँ हों, या गीत हों अथवा गल्प, उन्होंने एकनिष्ठ भाव से डोगरी साहित्यिक परिदृश्य को समृद्ध किया है.

पद्मा सचदेव को साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता अर्पण कार्यक्रम में हिंदी की महत्त्वपूर्ण लेखिकाएँ मृदुला गर्ग, ममता कालिया, निर्मला जैन, चंद्रकांता, अनामिका के अतिरिक्त साहित्य अकादमी की उत्तरी भाषाओं के संयोजक भी उपस्थित थे. कार्यक्रम से पहले पद्मा सचदेव पर साहित्य अकादमी द्वारा निर्मित एक वृत्तचित्र का भी प्रदर्शन किया गया.

याद रहे कि हमारे दौर में डोगरी की महान लेखिका पद्मा सचदेव का जन्म 17 अप्रैल, 1940 को जम्मू में हुआ. 1947 में भारत के विभाजन का शिकार बने संस्कृत के विद्वान प्रोफ़ेसर जयदेव बादु की तीन संतानों में सबसे बड़ी पद्मा जी ने अपनी शिक्षा की शुरुआत पवित्र नदी ‘देवका’ के तट पर स्थित अपने पैतृक गाँव पुरमंडल के प्राथमिक विद्यालय से की. उनके लेखन में प्रकृति की झलक शायद इसीलिए संपूर्णता में मौजूद है.

पद्मा सचदेव के छंदों की लयबद्ध सुंदरता संस्कृत काव्य के साथ आपके परिचित होने का प्रत्यक्ष परिणाम है. लोककथाओं और लोकगीतों की समृद्ध वाचिक परंपरा के साथ स्वतंत्रता संग्राम के दौरान डोगरी के आकर्षण की पुनर्खोज ने आपको साहित्य की सेवा, लेखन व विकास के लिए प्रेरित किया तथा आपको एक कवयित्री के रूप में उत्कृष्ट बनाया. आज इतने ऊंचे मुकाम तक पहुंचने के बाद भी पद्मा जी यह मानती हैं कि उनकी कविता पर सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव उनके प्रिय डुग्गर प्रदेश के मधुर लोकगीतों से आया है.

पद्मा सचदेव ने 1969 में अपने पहले कविता-संग्रह 'मेरी कविता मेरे गीत' के साथ राष्ट्रीय साहित्यिक परिदृश्य में पर्दापण किया. विशेष बात यह कि इसकी भूमिका हिंदी के क़द्दावर कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने लिखी थी. इस पुस्तक को अंततः 1971 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

खास बात यह कि पद्मा सचदेव डोगरी भाषा में लिखी अपनी आत्मकथात्मक रचना 'चित्त चेते' के लिए सरस्वती सम्मान से भी सम्मानित हो चुकी हैं. 662 पृष्ठों की इस पुस्तक का फलक अत्यंत विस्तृत है. उनकी यह कृति कई प्रादेशिक, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को भी समेटे हुए है. पद्मा सचदेव की इस आत्मकथात्मक रचना की शुरूआत उनके गृह प्रदेश जम्मू कश्मीर में बिताए उनके बचपन से शुरू होती है और कालांतर में दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों की आपाधापी में अपनी संस्कृति और अस्मिता को बचाने के संघर्ष की कहानी बन जाती है.

जम्मू-कश्मीर कल्चरल अकादमी, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से सम्मानित डोगरी भाषा की इस प्रख्यात लेखिका एवं कवयित्री ने जम्मू-कश्मीर रेडियो में स्टाफ कलाकार के तौर पर कार्य किया और बाद में दिल्ली रेडियो पर डोगरी समाचार वाचक के पद पर भी कार्य किया. जम्मू कश्मीर के कला संस्कृति और भाषा अकादमी ने उन्हें 'रोब ऑफ आनर' सम्मान से भी नवाजा था. उन्हें आंध्र प्रदेश का जोशुआ पुरस्कार और साहित्य अकादमी का प्रतिष्ठित अनुवाद पुरस्कार भी मिल चुका है. साल 2002 में वह डोगरा अवार्ड से भी सम्मानित की गईं थीं

मध्य प्रदेश सरकार के कबीर सम्मान और पद्म श्री से सम्मानित पद्मा सचदेव की प्रमुख कृतियों में- उत्तर बैहनी, तैंथियाँ, तवी ते चनहाँ, अक्खर कुंड, नेहरियाँ गलियाँ (अँधेरी गलियाँ), पोटा पोटा निंबल, लालदियाँ, सुग्गी, चित्त चेते, शब्द मिलावा, दीवानख़ाना, मितवाघर, अमराई, गोदभरी, बू तूँ राज़ी, अब न बनेगी देहरी, नौशीन, मैं कहती हूँ आँखिन देखी, जम्मू जो कभी शहर था, भटको नहीं धनंजय, तथा बारहदरी शामिल है. उनकी आत्मकथा बूंद बावड़ी भी काफी चर्चित रही.

पद्मा सचदेव को उन्हीं के लिखे गीत की इन आखिरी पंक्तियों के साथ इस सम्मान पर हार्दिक बधाई-

दरगाह खुली, खुले हैं मन्दिर
ह्रदय खुले हैं बाहर भीतर
शिवालिक पर पुखराज है बैठा
माथे पर इक ताज है बैठा
सब को आश्रय दिया है इसने
ईर्ष्या कभी न की है इसने
प्यार बीज कर समता बोई
आगे-आगे क्या होना है.

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