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जयंती विशेषः प्रतिरोध का एक विरल स्‍वर ओम भारती

यों तो बेहतरीन लेखन के बावजूद ओम भारती हिंदी की मुख्य धारा की कविता में ज्यादा जगह नहीं घेरते; पर अब जब वे नहीं हैं, यह कहने में हिचक नहीं कि कविता में आज के दौर में उन जैसा प्रतिरोधी स्वरों वाला कवि हिंदी में नहीं है. कवि की जयंती पर पढ़िए यह लेख

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ओम भारतीः अपनी तरह के अनूठे कवि ओम भारतीः अपनी तरह के अनूठे कवि

हिंदी कविता में चार दशकों से लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करते रहने वाले ओम भारती जब पिछले साल  11 दिसंबर 2021 को रक्त कैंसर का शिकार होकर अचानक बहुत ही खामोशी से चले गए तो उनके जाने की सूचना कहीं भी प्रमुखता से नहीं आ सकी, जिसके वे हकदार थे. और तो और सोशल मीडिया और फेसबुक जैसे मंचों पर दिन भर साहित्य का राग अलापने वालों में से भी किसी समूह ने प्रमुखता से उनके काम को याद किया न ही उन पर कोई ढंग का स्मृति लेख ही पढ़ने में आया. 
साहित्य की दुनिया यों तो लगातार सिकुड़ती जा रही है यह तो सच है पर यह इतनी भी संकीर्ण न थी कि अपने ही बीच के दिवंगत हुए कवि को ढंग से याद भी न कर सके. भोपाल जैसे कला और साहित्य की राजधानी के केंद्र में भी वहां के अखबारों में उन पर कुछ ध्यातव्य न आ सका. आज पहली जुलाई है, और आज ही जब ओम भारती की जयंती है, तब उनके संग्रह जिसका नाम ही 'इस तरह गाती है जुलाई' की शिद्दत से याद आ रही है और इसी बहाने याद आ रहे हैं ओम भारती भी.  
इटारसी में 1 जुलाई, 1948 को पैदा हुए ओम भारती ने बैचलर आफ इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद एक राष्ट्रीयकृत बैंक में लंबे अरसे तक किया और बाद में भोपाल में रहकर स्वतंत्र लेखन कर रहे थे. वे कवि, अनुवादक और एक प्रखर आलोचक थे. 'कविता की आंख', 'इस तरह गाती है जुलाई', 'कोरी उम्मीद नहीं', 'पटरियों की कविता', 'जोखिम से कम नहीं', 'वह छठवां तत्व', 'अब भी शेष', 'इतनी बार कहा है' और 'विरासत में खाईं' जैसे कविता संग्रहों के अलावा उनके दो कहानी संग्रह 'एक पल का रंज' और 'स्वागत अभिमन्यु' का भी आ चुका था. पिछले दिनों ही उनकी एक शोधपरक कृति 'मुक्ति समर में शब्द' प्रकाशित हुई थी. 
भोपाल निवासी कवियो में भगवत रावत और राजेश जोशी के बाद सबसे बड़े कवि थे और जन प्रतिरोध की तो सबसे बड़ी आवाज़ थे ही. चाहे वह किसी जनवादी मंच से जुड़े रहे हों या नहीं- वे मिजाज से एक प्रगतिशील कवि थे. परिवार में चाचा विनय कुमार भारती एक सहज सिद्ध कवि थे. इस तरह साहित्य रचना का गुण उन्हें  विरासत में मिला और इंजीनियरिंग करते हुए उनकी कविता यात्रा भी साथ साथ चलती रही. 
वे पैदा भले इटारसी में हुए किन्तु इंजीनियरिंग करने और बैंक सेवा में आने के साथ ही विभिन्न जगहों भोपाल, सतना, जबलपुर व सिंगरौली आदि में रहते हुए इटारसी उनसे छूट ही गया. वह बस उनकी कविताओं में बार-बार आता रहा. संयोग से एक ही वित्तीय संगठन में काम करते हुए मेरा उनसे परिचय तीन दशकों पहले जबलपुर की एक हिंदी कार्यशाला में हुआ था तथा तब से ही उनकी कविता पर मेरी दृष्टि बनी रही. उनके अनेक संग्रहों पर लिखा है तथा पाया कि वे एक संवेदशनशील कवि थे. कविता में बाजारवाद की आहट जिन कवियों में प्रमुखता से सुनाई देती है और जिनके यहां मनुष्य के विरोध में खड़ी शक्तियों का तीखा प्रतिरोध मिलता है, उनमें ओम भारती का नाम अग्रगण्य है. अपने प्रभूत कविता संसार में ओम भारती एक परिपक्व और उत्तरदायी कवि के रूप में उभरे हैं. उनकी कविता के स्वभाव और कार्यभार पर टिप्पणी करते हुए भगवत रावत का कहना है कि ये एक ऐसे कवि की कविताएं हैं जो एक खासी धूल धूसर खाँटी कस्बाई चेतना की खुली और सजग आँख से संसार को देख रहा है. इसलिए उसके शब्दों का चुनाव और उनका विन्यास उसे बरबस उस देसी लय की ओर ले जाता है, जहां गद्य भी पद्यमय होता दिखता है और जाने-अनजाने अतुकांत गद्यात्मकता में से भी कविता का शब्द बाकायदा विकसित होता है. उन्होंने एक और महत्त्वपूर्ण बात इन कविताओं के बारे में कहीं है, वह यह कि ये कविताएं केवल मुखर ही नहीं, वाचिक हैं और यह वाचिकता मुखर पाठ की अपेक्षा पठनीयता से ही अधिक प्रकट होती है. इस संस्तुति के परिप्रेक्ष्य में इन कविताओं के पाठ-बल पर ध्यान दें तो निश्चय ही इनमें जहां भरे-पुरे संवाद की गत्यात्मकता निहित है, वहीं कलात्मकता का गहरा आवेग भी इनकी काया में पर्यवसित है.
जहां 'इस तरह गाती है जुलाई' में बाजारवाद, अमेरिकी प्रभुत्व और उदारतावाद के संकटों को ओम भारती ने कहीं अधिक बल देकर चिह्नित किया है, कविताओं में जीवन से क्षय होती जीवंतता को भी अपनी अनुभूति का विषय बनाया है. सिंगरौली के कोयला बहुल क्षेत्र के जीवन में समाये कोयले को लेकर ओम भारती ने अबूझ आनुभूतिक शक्ति का परिचय दिया है. वे लिखते हैं: 
        इतना कोयला है यहां/ और ऊर्जा ही ऊर्जा
        लेकिन कितना कम/ और कितनी कम
        जीवन की ऊर्जा
        यहां कोयला उत्खनन का पूरा हिसाब है
        यहां ऊर्जा-उत्पादन का पूरा हिसाब है
        पाई पाई हिसाब है यहां लगे धन का
        खप रहे जीवन का यहां कोई हिसाब नहीं.
सिंगरौली में जब वे बतौर बैंक प्रबंधक कार्यरत रहे तो वहां के दुर्वह जीवन को उन्‍होंने बहुत करीब से जाना-परखा. इस सुविस्तृत कोयला क्षेत्र में कुछ वर्षों रहे ओम भारती के कवि ने कोयले के लिए राख होते जीवन को नज़दीक से देखा और उसे अपने तीखे काव्यविवेक से काव्यानुभवों में परिणत किया है. कोयला उत्खनन के व्यावसायिक ठाट की सचाई जानने वाले कवि के अनुभव बताते हैं कि यहां मनुष्य की भूख में, रोटी में, जीवन में कोयले का दखल है- यहां तक कि झटको इन किताबों का मेरी/ या कागद-कविताओं को/ दे देंगी कुछ न कुछ कोयला. इस कविता से यह जाना जा सकता है कि कवि अपने आसपास के भूगोल, जन-जीवन तथा रोजमर्रा के प्रसंगों को कितनी बारीकी से देखता-परखता है और यह सब उसके जीवनानुभवों का हिस्सा बनता हुआ कैसे उसके कवित-विवेक में शामिल होता चलता है. 
उनके भीतर का विज्ञानी यहां की आबोहवा में क्या-क्या नहीं देखता जो मानव जीवन को ग्रस रहा है. कोयले और जीवन का रूपक रचते हुए इसी कविता का एक और अंश देखें: यहां रोयों में, भौंहों में त्वचा में, यहां तक कि नाभि में भी/ फँसा-धँसा-बसा होगा/ काला स्याह, नामालूम-सा कोयला.../ अलग छाप होगी उसकी फेफड़ों के एक्सरे फोटो में/ इलाज-घर का सफ़ेद कोट/ देखते ही कहेगा- काला फेफड़ा/ नहीं नहीं,पढ़ा-लिखा होता है डाक्टर/ कहेगा-सिलिकोसिस फाइबोसिस या न्यूरो कोनियोसिस/ प्रबंधन कहेगा छुट्टी/ फेफड़ों से बाहर नहीं आएगा/ आखिरी सफर में चलेगा वो साथ/ साथ में ही जलेगा. 
सौभाग्य से ओम भारती उन कवियों में हैं, जिन्होंने कविता-कला की सैद्धांतिकी में गहरे धंसने के बजाय जीवन और जीवन को प्रभावित करने वाले घटकों, मुद्दों और प्रसंगों को कविता के वस्तुनिष्ठ संसार में दर्ज किया है. इसीलिए उनकी कविताओं के बारे में यह कहा जाना अकारण नहीं है कि इनमें कविताई कम,जीवन ज्यादा है.
ओम भारती की कविता कला का परिचय पाने के लिए उनकी इतिहास के पर्चे से, असाधारण, सख्तीपसंद का गीत, टीवी पर जूतों के दर्शन से कृतकृत्य हो, बाजार रुचिर न बनइ बरनत और हर्षचरितम् जैसी कविताएं देखी जानी चाहिए. ओम भारती के कवि हृदय को सख्ती पसंद है. बौद्धिक सख्ती उनकी अभिव्यक्ति को तीखा और पैना बनाती है, यद्यपि कहीं-कहीं उनकी कविताएं इससे आहत भी होती हैं. वे कहते भी हैं: ''थोड़े सख्त हृदय मुझे ज्यादा पसंद हैं/ क्योंकि वही ज्यादा जानते हैं मृदु भावनाओं को/ हाथ पसंद हैं जिनकी पकड़ सख्त हो/ पैर जिनके कदम लंबे और सख्त हों/ रंग सख्त पसंद हैं और पक्के/ जैसे इस्पात और सीमेंट/ क्योंकि सख्ती ही तोड़ना जानती है और जोड़ना/ लिहाजा मुझे दलदल नहीं पठार पसंद हैं/ और इस तरह पसंद के क्षेत्र में मैं सख्तीपसंद हूं.'' उनका उद्देश्य कविता के जरिये समाज, संस्कृति और हमारी सभ्यता में दखल देते जीवन मूल्यों का पुनरीक्षण है. ओम भारती छंदों के भी पारखी हैं, लयात्मकता के भी अन्वेषक-साधक किन्तु उन्होंने अपनी कविता को छंद के ढाँचे और साँचे में ढालने की अपेक्षा लोक जीवन के टूटे-बिखरे छंद को, लय की अटूट रागात्मकता को उकेरने-सहेजने और बुनने की कोशिश की है. ओम भारती बाज़ार के वशीकरण को जानते-बूझते हैं- इसके आच्छादन से नष्ट होती फूल सी कोमलता उनके भीतर बेचैनी भर देती है. फूलों में फूलों का होना बच्चे खोज सकें, फूल होकर देख सकें फूल अपना फूल होना- कवि की यह चाहत जीवन को उसके मौलिक आवेग-उद्वेग के साथ बाजार के घटाटोप से बचाने की है. एक बड़े अर्थ में कवि का यह उपक्रम मनुष्य में मनुष्यता, फूलों में प्रफुल्लता और जीवन में जीवन्तता को बचाने जैसा है. 
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वैचारिक फलक के कवि 
ओम भारती का कविता-फलक बहुत बड़ा है. बाज़ारवाद की शक़्तियों के प्रत्याख्यान में रची गई कविताओं के साथ-साथ आधुनिक सभ्यता के नवाचारों पर ओम भारती की टिप्पणियां अनूठी हैं. पहल-60 में छपी कविता 'वे हमारी पहुंच के बाहर हैं' को देखें तो हमारी जीवन शैली को आच्छादित करते विज्ञापनों के नेटवर्क ने आधुनिक सभ्यता को बाजार के केन्द्र में ला खड़ा किया है. पूरी कविता बताती है कि कुछ भी आम आदमी की पहुंच में नहीं है. कविता के अंत में कवि-कथन गौरतलब हैः शोक, महाशोक कि प्रजावत्सल/ सरकार बेचारी नहीं जान पाएगी/ कि उसकी उदारता के उफान के बावजूद/ कुछ भी हमारी पहुंच में नहीं है/ जबकि हम आधी सदी से आजाद हैं/ जैसा कि इश्तहार बताते रहे साल भर. इसी तरह निशानेबाज जानते हैं खेल का मानी इस देश में चल रहे उपभोक़्तावादी आखेट का वॄत्तांत है कि किस तरह विज्ञापन के महाप्रभु अपने भावी उपभोक़्ताओं को अपने शिकंजे में ले रहे हैं. मल्टीनेशनल्स के विमुग्धकारी विज्ञापनों के पीछे उनके उपभोक़्तावादी प्रबंधन का संजाल कितना आक्रामक है, यह कोई सजग कवि ही भाँप सकता है वरना केवल रमणीयार्थ प्रतिपादक कविताओं के निर्माण में ही संलग्न कवियों को ये खतरे दिखाई नहीं देने वाले. इस कविता के अंश हैं-
    यह पक़्के निशानेबाजों का दौर है
    और अभी उस दिन वे माध्यमों से बाहर आ
    सीधे सीधे स्कूल जा धमके, मुफ्त में बाँटे टूथपेस्ट और टूथब्रश उन्होंने
    मुफ्त में दाँतों की जाँच की
    हां मुफ्त में ही करीब से देखे उनने अपने शिकार भी
    देखा कि दूध के दाँत हैं जो टूटेंगे जल्दी
    जल्दी फँसेंगे ये बच्चे और अबोध सी
    जिद्द में उनकी
    फँसे चले आएंगे जमाने के माँ-बाप
            (-साक्षात्कार, फरवरी, 99)
कवि-चिंता में शामिल इन विमुगधकारी विज्ञापनों और हमारे दाँतों, चेहरों और सौंदर्य की नकली चिंता में संलग्न शिविरों, प्रदर्शनों के पीछे वह मायावी बाजारवादी दुनिया है, जिसके कदमों में सरकार भी पलक पांवड़े बिछाए हैं और जनान्दोलनों ने तो जैसे घुटने ही टेक दिए हैं. कहना न होगा कि जब जनविरोधी कार्रवाईयां अनेक छद्म वेश धारण कर समाज को नष्ट करने पर आमादा होती हैं तब केवल कवि की आवाज़ ही ऐसी कार्रवाइयों के विरोध में खड़ी होती है. ओम भारती ने सबल और प्रतिरोधी स्वरों में अमरीका के युद्धोन्मादी चेहरे और रवैये की भर्त्स ना ही नहीं की है बाल्कि बाजारवाद के बहुविध प्रलोभनों फर खुली दृष्टि डाली है. सोवियत संघ के विघटन के बाद के परिदृश्य में अमेरिका की बढ़ती  युद्ध- लिप्सा और साम्राज्यवादी वासना को देखें तो वह स्वतंत्र देशों की सम्प्रभुता को पालतू बना देने पर आमादा दिखती है. ओम भारती की कविता उत्तर-अम्पायर आर्थिक-सांस्कॄतिक और भौगोलिक सभी मोर्चों फर अमरीका की सोची-समझी रणनीति का खुलासा करती हैः
    जैसे फुरसती कुत्ते को चाहिए
    हड्डी का टुकड़ा
    नहीं, जैसे आदमखोर जबड़े को चाहिए
    साबुत चबाने का अनंत अहंकार
    बिग ब्रदर अमेरिका को चाहिए...युद्ध
    उसे चाहिए क्रूरता और उन्माद का 
    पाशविक प्रदर्शन
    अपनी नहीं, दूसरे की भूमि पर  विनाश का 
    विमुग्धकारी मंजर
    जो अनेक चैनलों पर बेचा जा सके.                                                            (वसुधा-44)
समूची कविता अमेरिका की हिंसक कार्रवाइयों का एक जलता हुआ दस्तावेज है. एक तीखी-तल्ख पीड़ा प्रताड़ित प्रतिक्रिया - एक कवि की असाधारण हिम्मत का प्रमाण कि वह यह कहने में नहीं चूकता कि उसे तो चाहिए युद्ध -एक दमित सिजोफ्रेनिया. याद करें तो 'भय भी शक्ति देता है' में लीलाधर जगूड़ी अमरीका के बाजारवादी प्रभुत्व का संकेत पहले ही यह कह कर दे चुके हैं कि पैदा तुम कहीं भी होओ/ बिकना तो तुम्हें अमेरिका में ही है. एक बार इराक का युद्ध लड़ चुके अमेरिका के दुबारा इराक पर आक्रमण के पहले ही ओम भारती की यह कविता अमेरिकी साम्राज्यवाद के मनो-मानस का सटीक जायज़ा लेती है. यद्यपि ओम भारती कविता की मर्यादा का अतिक्रमण कर कहीं-कहीं सादा और क्रांतिकारी बयानबाजी के लहजे में भी उतर आए हैं तो भी एक कम्युनिस्ट कवि के रूप में उन्होंने कलात्मकता का उतना ही ध्यान रखा है जितना कविता के कथ्य के लिए आवश्यक रहा है. इसलिए कहीं-कहीं उनकी कविता गद्य-भार से कुछ ज्यादा ही लदी-फंदी दिखती है जिससे कविता के स्वाभाविक ताने-बाने में कहीं कुछ असहज-सा दिखता है. संग्रह की अनेक कविताओं में आख्यान का रस भी समाहित है, जिसे भारती के पहले संग्रह कविता की आँख में ही मैंने लक्षित किया था. एक कॉमिक मुद्रा भी ओम के यहां मिलती है जब वे फेवरिट डॉट काम या सख्तपसंदगी का गीत जैसी कविताएं लिख रहे होते हैं. थोड़े सख्त हृदय मुझे ज्यादा पसंद हैं क़्योंकि वही जानते हैं मॄदु भावनाओं को -लिख कर वे कविता को बौद्धिकता के पड़ोस में देखना शायद ज्यादा पसंद करते हैं. उनकी कविता फर टिप्पणी देते हुए लीलाधर मंडलोई का यह कहना वाजिब ही है कि आज जहां कविगण भी राजनीति छुपाने में माहिर हो चले हैं, ऐसे दौर में ओम भारती अपनी राजनीति को पूरी  गंभीरता और ताकत से उजागर करते हैं. ऐसा ही काव्याचत्मक प्रतिरोध कुबेर दत्त के यहां भी दीखता है जो तमाम वाचिक प्रभावों के साथ जैसे वक्रोक्तियों, फटकारों, विक्षुब्धताओं और अतिकथनों का समुच्चय है. सारी कोमलताओं -यहां तक कि गुडी गुडी- परक कोमल वॄत्तांतों से अलग ओम भारती की कविताओं के वस्तु जगत में बाज़ारवाद, उपभोक़्तावाद, अमरीकी हिंसा, स्पाइस गर्ल्स, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, डंकल और गेट तथा आर्थिक सुधारों के निहितार्थ आदि पूरी तफतीश के साथ शामिल हैं. नव सांस्कॄतिक राष्ट्रवाद के उभरते फासीवादी परिदृश्य में कम्युनिस्ट होना कितना निरापद रह गया है, पहल-53 में छपी ओम भारती की कविता 'निरापद' इसका हल्का संकेत देती है- ''हुजूर, कम्युनिस्ट बढ़ रहे हैं/ जनता में बढ़ रहा है उनका प्रभाव/ उन्हें जेल में डालिये या जान से मारिये/ निर्वासित कीजिए या प्रतिबंधित/ व्यवस्था को ख़तरा है जबर्दस्त.'' तरक़्कीपसंद समुदायों पर लगातार होते हमले क़्या इस तथ्य का सबूत नहीं हैं.     
ओम भारती की कविता के अनेक आयाम हैं. वे बड़े फलक पर अपने समय की चिंताओं का इज़हार करते हैं तो अपने लिए एक निजी कोना भी बनाए रखते हैं. अपने बचपन के इटारसी को वे कविता के बड़े-बड़े प्रश्नों के मध्य भूल नहीं जाते, बाल्कि उसे शिद्दत से याद करते हैं. इटारसी पर एकाधिक कविताएं उनके पिछले संग्रहों में भी हैं, फिर भी हाल ही साक्षात्कार (जुलाई, 2003) में छपी कविता 'घर था जो आखिरी' में इटारसी के खुले आँगन, आकाश भर आकाश, लचीले जीवन, स्वाद-भरी दिनचर्या, तारकों की असंख्य छाँव में फलक गिरते सपनों पर सवार हो लेने और आकाशगंगा की रेत को उछालने के सुख का मार्मिकतापूर्ण बखान कवि के उद्गम के स्रोतों का पता देता है और सपने -जो किसी भी कवि के लिए एक सर्जनात्मक स्पे स रचते हैं...'' देखना कवि अभी भी नहीं भूला है. वह कहता है, सपने देखना तो मैं अब भी नहीं भूला/ जैसे भूला नहीं हूं उस अपने इटारसी को.''  
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कविता का यथार्थवादी तेवर
किसी भी कवि की ताकत केवल सतह के दृश्यों में अटक-भटक कर रह जाने से नहीं, उसकी सतहभेदी यथार्थता से दृष्टिगत हती है. ओम भारती की दृश्य-रचना किसी न किसी कठोर यथार्थ और ठोस वास्तविकताओं पर आधारित होती है. स्पाइस गर्ल्स पर कविता लिखते हुए वे स्त्रियों की एक नई प्रजाति पर दृष्टि रखते हैं और इस प्रजाति की नग्नता और उनके भीतर बसी कारुणिकता का लोमहर्षक वर्णन करते हैं. वे लड़कियां जो विज्ञापनों की माँग फर इतराती-इठलाती स्वादेन्द्रियों को उत्कर्ष पर ले जाती दिखती हैं- वे जैसे कवि के शब्दों में, अपनी आत्मा में गिरती, जमा होती झुर्रियों से बेखबर--बेजान मसाले के रूप में मर्दों की जीभ और लार में आ गिरती हैं. किन्तु यह सब आकस्मिक नहीं -उदारीकरण ने लज्जा और आचारसंहिताओं के सारे बसन उतार दिए हैं, जिसे कवि इस तरह विजुअलाइज़ करता हैः
    सन्निकट सदी की स्त्रियां संयोगवश
    यदि शर्म के अर्थ की गंध भी पा गईं
    तो हँसेंगी भयानक और बेतरह
    अपनी नानियों-पर नानियों का पिछड़ापन पकड़ कर
    लाज तब भी गरीबों में होगी
    पर अगड़ों के अलावा दृश्य में होगा ही कौन
    गाँ की लाज रख लो या दूध की या देश की 
    अंत हो चुका होगा इन मुहावरों का भी 
    यहां तक कि ठीक ठीक मानी लाजवंती शब्द का
     नहीं समझा पाएगा कोई भी उस सदी में
     छुई-मुई का कोई फासिल
    हासिल हो सकता हो तो कर लो विज्ञानियों
    शर्म का तो फॉसिल भी बचना नहीं है
    एक अंजीर की पत्ती
    कित्ती ज्यादा आङे आ रही है बाज़ार के
            (-अंजीर की पत्ती एक)
इस तरह ओम भारती का कविता संसार किसी भावुक और मात्र स्वप्नदर्शी कवि का संसार भर नहीं है, यह दुनिया में तेजी से हो रहे आर्थिक, भौतिक, सामाजिक और सांस्कॄतिक परिवर्तनों के विपुल कथ्य से आच्छादित है. एक तरफ कविता की शर्तों और मांग के अनुरूप और दूसरी तरह इस सीमा से परे जाकर भी ओम भारती ने कविता रचने का जोखिम उठाया है, यह किसी जोखिम से कम नहीं है. गौरतलब यह कि आज जहां कविता अपनी सुकोमल-ऐंद्रियस्पर्शी अनुभूतियों के प्रसार में ही सबसे ज्यादा खर्च हो रही है, ओम भारती की कविताएं इस उनींदेपन से उलट आज के बाज़ारभाव और बाज़ारवाद की सबसे विश्वसनीय पड़ताल कर रही हैं.
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कविता की राजनीति और ओम भारती 
ओम भारती का लेखन लगभग चार दशकों तक फैला है. वे आठवें दशक के एक अनिवार्य कवि रहे हैं किन्‍तु आठवें दशक के कुछ कवियों ने इसे पांच छह कवियों की चर्चा तक ही सीमित रखा तथा इस दुर्ग में औरों को प्रवेश न करने दिया. आलोचक भी इसी गतानुगतिकता का शिकार रहे. लिहाजा आज भी आठवें दशक के अनेक कवियों के साथ न्‍याय नहीं हो पाया है जैसे विजय कुमार, ओम भारती, दिविक रमेश, सवाई सिंह शेखावत, इब्‍बार रब्‍बी, गिरधर राठी, नरेंद्र  जैन, प्रताप सहगल, नरेंद्र मोहन, कुबेर दत्‍त, पंकज सिंह और हेमंत शेष इत्‍यादि. ओम भारती के अब तक एक कविता चयन सहित कुल नौ कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. कविता की एक लंबी पारी खेलने के साथ उनकी कविता ने बाजार की व्याधियों की भी बारीक शिनाख्त की है. कविता और समीक्षा दोनों क्षेत्र में दखल रखने वाले भारती ने यों तो कहानियां भी लिखीं किन्तु  कविता में उनकी पहचान ज़रा ज्यादा उभर कर आई. इटारसी के साहित्यिक परिवार से जुड़े होने के नाते कविता की पाठशाला जैसे उन्हें सहज ही सुलभ रही. फिर मध्य प्रदेश का उर्वर सर्जनात्मजक परिवेश भी उन्हें लगातार रचने की आकांक्षा और ऊर्जा से आह्लादित करता रहा है. वे मध्यप्रदेश के कवियों लेखकों भगवत रावत, लीलाधर मंडलोई, विनय दुबे, राजेश जोशी, कुमार अंबुज, नवल शुक्ल, सुधीर सक्सेना, मोहन सगोरिया के निकट थे.  विचारधारा से प्रतिबद्ध होने का ही यह प्रतिफल रहा कि उनकी कविताएं मार्क्सवादी वैचारिकता का सत्व ग्रहण करते हुए पल्लवित पुष्पित होती रहीं. यह सत्व उनके पहले कविता संग्रह- 'कविता की आंख' से लेकर आखिरी संग्रह 'विरासत में खाईं'  तक बरकरार है.
देश में आर्थिक सुधारों के सूत्रपात के साथ साथ भूमंडलीकरण और उदारतावाद के कपाट ज्यों ज्यों खुलते गए, उनके नकारात्मक पहलू भी सामने आने लगे. कवियों ने इसका तीखा प्रत्याख्यान किया. ओम भारती ने भी एक उत्तरदायी कवि का परिचय देते हुए बाजारवाद, अमेरिकी प्रभुत्‍व और उदारतावाद के संकटों पर अपनी आवाज़ बुलंद की है. उनकी कविता रमणीयार्थ प्रतिपादकता की लीक से हट कर जीवन जगत को प्रभावित करने वाले मुद्दों से ज्यारदा वास्ता रखती है तथा किसी भी तरह अपने समय के ज्वलंत मुद्दों से विमुख नहीं होना चाहती. इसीलिए उनकी छवि अब तक बाजारवाद के विरुद्ध अभियानबद्ध होकर कविता लिखने वाले कवि के रूप में कहीं अधिक रही है जिसके प्रमाण उनके हर संग्रह में मौजूद हैं. 
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उत्‍तर जीवन के अनुभवों की साखी 
तथापि, उनकी कविताएं निरे बाजारवादी प्रतिरोध के स्वर में ही स्वर न मिलाते हुए कवि के उत्तरजीवन के अनुभवों की साखी भी हैं. उसका अनुभव बताता है कि दुनिया कितनी बदल गयी है. यह भी कड़वी सचाई है कि आज लोगों को कविता की जरूरत नहीं रही. नई पीढ़ी सफलता के पीछे भागने वाली पीढ़ी है जिसके एजेंडे में कविता के अलावा सब कुछ है. कवि कविता-विमुख समाज पर कटाक्ष करते हुए कहता है: वे अपना वक्त कुत्ते  को देंगे, कविता को नहीं/ या किसी और शगल को/ जैसे नेट पर सर्फिंग या चलित फोन संवाद/ या टहलेंगे छत पर, उनके सगों में भी / कविता के कीट नहीं. (उसका सही डेरा) फिर भी कवि के शब्दों  में: कविता की आवाज़ अब भी अशेष है. एक अन्य कविता में वे ऐसे कवियों के मिजाज़ का मुआयना भी करते हैं जो अब अपनी कविताऍं गाकर नहीं पढ़ते. दोस्तों की कार पर भी पीछे बैठना पसंद करते हैं. फिर भी कवि इस बात से मुतमइन है कि 'वे ही हैं जो उठाते हैं अपने ही शब्दों  का मिज़राब, पुन: पुन: पाते हैं अर्थ और लय/ कि गा सकें उन्हें उनकी कविताएं अनंत अंत तक.' ओम भारती ने बदलते समय में कवियों पर पड़ते अप्रत्यक्ष दबावों का जिक्र भी किया है. उनका मानना है कि बेशक कुछ शक्तियों की धमनभट्ठी में सख्त से सख्त धातु भी गल कर तरल हो जाती हैं पर ये ताकतें अभी कवियों को तरल बना सकने में सफल नहीं हो पायी हैं. जबकि उनके पास कवियों को पिघलाने के लिए पारंपरिक तौर तरीकों से लेकर आधुनिकतम तौर-तरीके तक हाजिर हैं . इस तरह कवियों के प्रतिरोध को तोड़ने की कार्रवाइयों पर सजग निगाह कवि ने डाली है. 
ओम भारती का लहजा मुख्य़ धारा की कविता के लहजे से अलग लगता है. उनकी मुखरता अखरती नहीं, वे चीजों की आहट को उसी मुलायमियत से सुन सकते हैं जिस स्निग्धता से कला-सजग कवि. 'द्वार-घंटी की बटन'  में किसी आगंतुक के आने और मुखातिब हुए बिना लौट जाने के बाद उसके लौटते पदचापों में अपना ही संयमित अवसाद सुनना एक नए संवेदन का आग़ाज है. ऐसी ही बारीक बुनावट उनकी कविता 'कहां है वह बीज' में दृष्टिगोचर होती है जब एक पुराने पीले पत्ते  में अनमोल पन्ने की छवि देखते हैं और कह उठते हैं: 
उसमें एक आदिम स्वप्न है मनुष्य का
उड़ती जा रही स्याही के बोल हैं वहां
एक चिंता, एक सरोकार में खुलते-से
उसमें सुनी जा सकती है एक उम्मीद
इस तरह एक आशावादी रुख ओम भारती की तमाम कविताओं में देखा जा सकता है. 
उनकी अनेक कविताओं यथा, थोड़ी मुहब्बतें भी, ख़त, आप स्त्री को जानते ही कितना हैं, शंख, थाली, काले से परहेज़, तथा 'दिन ही और थे' में एक सख्त़हृदय से लेकर तरलहृदय कवि तक के दर्शन होते हैं. इन कविताओं में उनका अपना निजी कोना भी है, थोड़ी मुहब्बतें भी हैं, थोड़े भटकाव भी और यह कौल-करार भी कि 'इसी एक जीवन में जीना है अनेक/ रचना है इसी में प्रेम करते हुए/ करना है संभव इसी में/ समूचा विभव और वैभव/ इसी में चढ़ना ऊंचे कंधों पर कि दिखे दूर तक / इसी मे ढोना है कइयों को/ कृतज्ञताएं बोना है.'  वे प्रेम में होते हैं तो जैसे असंख्य शिखरों वाला उजाला नहलाता है उन्हें .
कविता में उनके अब तक के योगदान के भरोसे कहना होगा कि मुख्य धारा के कुछ बड़े कवियों के बीच उनकी ऐसी अनेक कविताओं का लोहा मानना पड़ता है जब उनके साधारण से वाक्यों में ध्वनि की वक्रता दीख पड़ती है. 'थाली'  पर लिखी कविता भूख, तृप्ति और आम आदमी के संबंधों का एक खूबसूरत विन्यास है. अपनी फीकी चमक के बावजूद  घरेलू थाली महज दो कटोरियों और एक चम्मच के साथ आम आदमी की भूख का सबसे बड़ा सहारा है. बल्कि उसकी चमक तो इसी भरोसे पर टिकी है कि वह दुनिया के एक खाली उदर में थोड़ा-सा अन्न  तो देगी. निम्न मध्यवर्गीय जीवन का यही रोजनामचा है. एक अन्य कविता 'शंख' से वे पिता और अपने बीच की मौजूदा दूरी को पढ़ने की कोशिश करते हैं. शंख फूँकते पिता, उसे धोती पोछती मॉं की याद अब ओझल हो चली है और वह शंख भी कहीं पूजाघर के अँधेरे में कैद है. अब नए ड्राइंगरूम में समुद्रतट के शंख शिल्पों  का कलात्मक प्रदर्शन कहीं ज्यादा सुख देता है, ऐसे में पिता,मां और शंख की याद भला कौन करे. टूटते परिवारों के विखंडन पर भी ओम की एक नायाब कविता यहां है: 'ज़मीन पर पुरानी दरी'. पिता की छत्र छाया हटते ही भाइयों का विखंडित हो जाना जैसे समस्त  आश्रयों का छिन जाना होता है. कवि-चिंता तब इन शब्दों में फूटती है: 'चार हैं पर लाचार/ जैसे तस्वीर निकल जाने के पश्चात/ चार खंड फ्रेम, विखंडित होता हुआ.' इन दिनों स्त्री विमर्श का बोलबाला है. 'आप स्त्री को जानते ही कितना हैं'...से ओम भारती ने स्त्री के पुरुषवाची पाठ पर सवालिया निशान खड़ा किया है तो 'कालो से परहेज' रंगभेद की एक नई इबारत है. अश्वेतों के विरुद्ध जिस तरह का रवैया पूरे विश्व में उपनिवेशवादियों का रहा है, उस पर एक झीना-सा कटाक्ष यहां द्रष्टव्य है. हालांकि हमारे देश में भी एक ऐसा वर्ग है जिसका अपना-अलग ही उपनिवेश है, अलग दुनिया है. वह बाकी दुनिया को उपनिवेशवादी दृष्टि से ही देखने की आदी हो चुकी है.
कहना न होगा कि ओम भारती की कविताओं में एक संयमित ऊर्जा संक्रमित होती है. कविता को लेकर अब उस आत्म संघर्ष की बात नहीं की जाती, जिससे कभी निराला, मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन जैसे कवि गुज़रे हैं. अब कवियों पर भी जैसे पूँजी और भौतिकतावादी दुनिया का सुख-चैन हावी हो चला है. 'तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब' -जैसे नारे और मुहावरे नेपथ्य में चले गए हैं. जबकि आज 'मठ' और 'गढ़' कहीं ज्या़दा प्रभावी हो चले हैं. सत्ता समर्थन और अनुशंसा की ओर टकटकी बांधे कवि अब बादल राग लिखना भूल पूंजीराग के वशीभूत हो चले हैं. सत्तान, फेलोशिप, वृत्ति, पुरस्कार और बाजार-अनुकूलित इस दौर में कवि की आवाज़ किस हद तक व्यवस्था का प्रतिकार करती है, यह ओम भारती की कविताएं बताती हैं. वे अंत तक बाजारानुकूलित कवि न हो सके. 'प्रगति की हो गई दुर्गति, रूप का विद्रूप उर्वर--अब नहीं संघर्ष के स्वर' लिखने वाले कवि की इन पंक्तियों में ही कहीं न कहीं आज की कविता के समक्ष आसन्न संकटों की चुनौतियॉं भी छिपी हैं. 
ओम भारती की कविता में सशक्‍त उपस्‍थिति को देखते हुए ही मैंने 2019 में आई अपनी आलोचनात्‍मक कृति 'कविता के वरिष्‍ठ नागरिक' में एक कवि के रूप में उन्‍हें शामिल किया था. उनके आखिरी दिनों के कुछ पहले भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक कवि लीलाधर मंडलोई ने उनकी एक विलक्षण पुस्‍तक प्रकाशित की थी: 'मुक्‍तिसमर में शब्‍द'. यह कृति उनके समस्‍त बौद्धिक लेखन में बेजोड़ है. जब-जब हिंदी कविता में प्रतिरोध की आवाज और बाजारवाद व साम्राज्यवादी शक्तियों से लोहा लेने वाली कविताओं की फेहरिश्त बनाई जाएगी, इन प्रवृत्तियों के कवि के रूप में केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध, गोरख पांडे, मनमोहन, आलोक धन्वा और ज्ञानेंद्रपति की कवि-परंपरा और आलोचना की साफगोई की दृष्‍टि से ओम भारती का जिक्र जरूर होगा, ऐसा विश्वास है. वे बेशक बड़ी खामोशी से हमारे बीच से उठ कर चले गए हों, वे अपनी कविताओं और आलोचनाओं में सदैव जिंदा रहेंगे. 
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डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक, कवि एवं भाषाविद हैं. शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब, कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान और यूको बैंक के अज्ञेय भाषा सेतु सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं. संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली 110059
फोनः 9810042770, मेल dromnishchal@gmail.com
 

 

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