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जयंती विशेषः अपने एकांत और लेखकीय सरोकारों के बीच कृष्‍णा सोबती

सोबती की जयंती जब भी आती है, उनके लेखन का जादू सिर चढ़कर बोलता है. उन्हें गए दो साल हो गए. वे यों तो सभा समारोहों में बहुत नहीं जाती थीं पर जहां जाती थीं, आकर्षण का केंद्र होती थीं.

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कृष्णा सोबती ( फाइल फोटो- सौजन्यः India Today Archive)
कृष्णा सोबती ( फाइल फोटो- सौजन्यः India Today Archive)

कृष्‍णा सोबती की जयंती जब भी आती है, उनके लेखन का जादू सिर चढ़कर बोलता है. उन्हें गए दो साल हो गए. वे यों तो सभा समारोहों में बहुत नहीं जाती थीं पर जहां जाती थीं, आकर्षण का केंद्र होती थीं. अपने बोलने को लेकर वे सदैव उत्‍तरदायित्‍व से भरी रहीं. अपने लिखित ड्राफ्ट को पढ़ कर बोलने में उन्‍हें कोई संकोच नहीं होता था. कथा-उपन्‍यास, वैचारिक गद्य, लेखकीय प्रोफाइल अथवा बातचीत में वे दो टूक कहने में विश्‍वास करती थीं. उनका अपना एकांत था जो लगभग अभेद्य था. जैसे उनके विचारों को चुनौती देना सहज न था, उनके एकांत को हम लेखकीय स्‍वायत्‍तता का एकांत कह सकते हैं, उस स्‍वायत्‍तता को चुनौती देना सहज नहीं था. न वे अनावश्‍यक किसी का मखौल उड़ाती थीं न अपना मखौल उड़ाने की किसी को स्‍वतंत्रता देती थीं. इसलिए अपने पहनावे, रहन-सहन व चिंतन को लेकर वे पर्याप्‍त खुली होने के बावजूद अबूझ बनी रहीं. प्रारंभ से ही उनकी तालीम ऐसे वातावरण में हुई जहां अपने स्‍त्री होने को लेकर उन्‍हें कोई पछतावा कभी नहीं हुआ. उनका एकांत केवल एक स्‍त्री का एकांत न था, वह सच्‍चे अर्थों में एक लेखक का एकांत था.

हर लेखक का अपना एकांत होता है, जहां उसकी लिखने-पढ़ने की गृहस्थी होती है. वह और उसकी तनहाई होती है. जहां एक का भी अंत हो जाए. ऐसा एकांत दुर्लभ होता है. नितांत एकल इकाई. लिखने की मेज. इस बारे में बहुधा लोगों ने उनसे सवाल किए हैं. पर जैसा कि कुंवर नारायण अपनी डायरी में लिखते हैं, लिखना मेरा शौक है, बीमारी नहीं. केवल दस-पंद्रह कृतियां देकर वे गए पर सारी की सारी क्लासिक. अभिव्यक्ति के चरम शिखरों को छुआ उन्होंने. कृष्णा सोबती का भी यही हाल रहा. लगभग डेढ़ दर्जन कृतियां. दो-एक इधर-उधर. इसी में पूरा जीवन समेट दिया उन्होंने. वे कहती हैं, ''मात्र लिखने के लिए लिखना- यह मेरे निकट कभी घटित नहीं हुआ. लिखित में दोहराने से बहुत कतराती हूं.'' लेखक अपने ठीहे पर बैठता नहीं समाधिस्थ-सा होता है. अपनी रचना प्रक्रिया समझाते हुए वे कहती हैं,'' अक्सर रात को ही काम करती हूं. यह सोचकर सुख होता है कि इस पर्यावरण को मैंने हर पल अपने में महसूस किया है. पन्नों पर पाठ में घुलने दिया है. रात अपनी मेज के आसपास बहती निपट खामोशियां कुछ ऐसी जैसे टीन की छत पर हल्की हल्की बूँदाबांदी हो रही हो.'' लेखन को वे अपने आपसे संवाद मानती हैं.

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अपने लिखने के समय के बारे में अन्यत्र वे बताती हैं कि 'मैं रात में लिखती हूँ- रात का अंधकार जब मेरे अकेले टेबल लैंप के रहस्य में आ सिमटता है तो शब्द मुझे नए राग, नई लय और नई धुन में आ मिलते हैं.' (लेखक का जनतंत्र, पृष्‍ठ 199)  वे स्वीकार करती हैं कि लेखक सिर्फ निज की लड़ाई नहीं लड़ता. न अपने दुख-दर्द और हर्ष-विषाद का ही लेखा-जोखा पेश करता है. अपने अंदर बाहर को रचनात्मक सेतु से जोड़ता है. उसे लगातार उगना होता है- हर मौसम, हर दौर में.''(सोबती वैद संवाद, पृष्‍ठ 30)

लिखना क्या हमेशा एक-सा होता है, शायद नहीं. इसलिए कि जीवन में भी सारे काम एक से नहीं होते. बड़े लेखक की कोई रचना उम्दा हो सकती है कोई हल्की भी. यह मन मिजाज मौसम और अनुभूति की गहराई पर निर्भर करता है. अनुभव के बीज बहुत अच्छे हों पर संवेदना की जमीन में वैसी नमी न हो तो शायद रचना की पैदावार बहुत अच्छी नहीं होगी. इस बात को वे स्वीकारती हैं. कहती हैं, ''लेखन में सूखे के अंतराल तो आते ही रहते हैं. सभी रचनाएं एक जैसी ऊर्जा में से नहीं फूटतीं. कई बार ऐसा भी होता है कि बड़े-बड़े लेखक अचानक चुक जाते हैं, दो-तीन अच्छी रचनाएं देने के बाद. यह अंदेशा हर लेखक के सर या कलम पर मंडराता रहता है." (वही, पृष्‍ठ 164) सोबती लिखने के लिए सनलिट् ब्रांड का कागज और सिग्नेचर पेन पसंद किया करती थीं. चन्ना और डार से बिछुड़ी सनलिट ब्रांड कागज पर ही लिखे गये.

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जहां तक लेखक के सरोकार का सवाल है, वह आखिरकार अपनी विषय वस्तु से ज्यादा अपने सरोकारों से जाना जाता है. वह किसी विचारधारा का पक्षधर न भी हो तो उसके लेखन की गहराई कम नहीं होती. विभाजन व फिरकापरस्ती के चरम यथार्थ से गुजरने के बावजूद आपको एक सच्चे लेखक में कहीं भी संकीर्णता की बू नहीं दिखाई देगी. भीष्म साहनी के तमस से गुजरिए. विभाजन की खौफनाक दास्तान किन्तु यह नहीं कह सकते कि वे कहीं भी संकीर्णतावादी मनोवृत्ति का शिकार होकर किसी हिंदू समुदाय का पक्ष ले रहे हैं या कुछ ऐसा रच रहे हैं कि उनका किसी एक रुख की पक्षधरता तय की जाए.

लेखक की मेज न्याय की वह तुला है जिस पर हर कोई अपने वजन के अनुसार तुलता है. वह हर किसी का पैरोकार है. वह सच का पहरुआ है. विभाजन के दोनों ओर से उखड़े परिवारों की तबाह दुनिया के मंजर से गुजरी सोबती कमाल अहमद से बातचीत में यह स्वीकार करती हैं कि मैं उन खौफनाक वक्तों की पौध हूं, विभाजन को झेले हुए हूं, फिर भी बांटना चाहती हूं आपसे कि मेरी धर्मनिरपेक्षता को पिछले पचास वर्षों में शक-सुबह से किसी सांप्रदायिकता ने जख्मी नहीं किया. (लेखक का जनतंत्र, पृष्‍ठ 138)

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सोबती ने अपने स्त्री होने को कभी किसी कमी या अभिशाप के रूप में नहीं लिया. स्त्री को लेकर, स्त्री की स्वायत्तता को लेकर समाज चाहे कितना ही संकीर्ण हो, उन्होंने अपने स्त्री होने का हमेशा सेलीब्रेट किया. कभी शायद ही मन में ख्याल आया हो कि काश मैं पुरुष होती. बड़ी से बड़ी सत्ता के सामने न झुकने की जिद उनमें थी तो किसी भी सहृदय व्यक्ति से सरलता और तरलता से मिलने की कशिश भी उनमें थी. इसलिए उनसे हुई बातचीत की सूची पर निगाह फेरते हुए पाया कि उनसे रचना के क्षेत्र में किसी बहुत बड़े व्यक्ति ने बातचीत नहीं की. उस वक्त के तमाम समकालीन लेखक थे जो अपने-अपने लेखन के शिखर पर थे.

अज्ञेय से बहुत से आला दर्जे के लेखकों ने बातचीत की है. कुंवर नारायण से भी. पर सोबती से पता नहीं क्यों बातचीत करने वालों में युवा लोग ज्यादा रहे हैं. जानी-पहचानी शख्सियतों में कृष्ण बलदेव वैद, अनामिका, आलोक भल्ला, गिरधर राठी और पुराने लोगों में बस रणवीर रांग्रा. बाकी सब युवा हैं....निरंजनदेव शर्मा, कृपाशंकर चौबे, कमाल अहमद, आशुतोष भारद्वाज आदि. हां कृष्ण बलदेव वैद ने लंबी और ठहरावदार बातचीत की है- एक अलग पुस्तक में. उनसे बातचीत में भी वे लेखक के मान-स्वाभिमान को नीचे नहीं गिरने देतीं. आखिरकार 'मित्रो' (मित्रो मरजानी) की काम भावना की आकांक्षा का इज़हार केवल उनके दिमागी खेल की उपज नहीं थी. यह मानव स्वभाव है. हर किसी में सेक्सुअलिटी के गुणसूत्र और परिमाण अलग-अलग होते हैं और वे तो कहती हैं कि 'सेक्स हमारे जीवन का, साहित्य का महाभाव है. जो उपन्यास (समय सरगम) इस समय मेरी मेज़ पर है, उसकी खामोशियों में बूढ़े-सयाने लोगों का यह मौसम भी सेक्स और अनुराग भाव से रिक्त नहीं है. उसका रंग जरूर यौवन से अलग है.'' (सोबती-वैद संवाद, पृष्‍ठ153)

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वे बेशक एक अभिजात परिवार में जनमीं. गुजरात में सोबती स्ट्रीट की सोबती हवेली सदैव उनकी स्मृतियों में रही. बाद में दिल्ली व शिमला में पली बढ़ीं. पर उनके सरोकार सदैव अपने समय व समाज के साथ रहे. वे कहती हैं, मैं, मेरा लेखक, मेरा व्यक्तित्व, मेरा नागरिक स्त्री होते हुए भी उत्पीड़न के रोग से ग्रस्त नहीं. फिर भी वे समाज में सहिष्णुता के लिए अंत तक कार्यरत रहीं. देश के कुछ बुद्धिजीवियों लेखकों की हत्या पर वे सरकार के विरुद्ध लामबंद हुईं. ऐसी ही किसी बात से क्षुब्ध् होकर पद्मश्री स्वीकार करने से मना कर दिया. पर उनके अभिजात व्‍यक्‍तित्‍व के भीतर एक लेखक की समवेदना थी. वे कहती हैं, हमें पिछड़े, निर्धन, आदिवासी, अशिक्षित और स्त्री की भीड़ को नागरिक के स्वरुप में सहज ही स्वीकार करने की तालीम जुटानी होगी. यह जिम्मा शिक्षितों और लेखकों पर है. जनसाधारण से अभिजात की दूरी को हमें पाटना होगा. शायद उनका ध्यान साहित्य में तेजी से स्थापन हासिल कर रहे स्त्री व दलित विमर्शों की ओर था. उनके लेखन व स्वभाव में परिष्कृति की हद तक सुगढ़ता उनके सौंदर्यबोध का परिचायक है. मानवीय जीवन की पेचीदगियों तथा उनके सरोकारों को खोलने में उनके उपन्यास, कहानियां व विचार एक बड़ी भूमिका निभाते हैं.

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यह सरोकार ही है कि उन्होंने हम हशमत सीरीज में बहुत से लेखकों पर संस्मरण टॉंके पर मुक्तिबोध पर अलग से एक पूरी पुस्तक (मुक्तिबोध: एक व्यक्तित्‍व सही की तलाश में) की ही परियोजना तैयार की. हालांकि यह उनकी कोई आलोचनात्मक पुस्तक नहीं है तथापि यह एक कवि के लिए उनकी हार्दिक प्रणति है. अकारण नहीं कि वे कविता को साहित्य में अव्वल विधा मानती भी रही हैं. वे कहती भी हैं, ''कवि लौकिक नहीं, अलौकिक शक्ति से ऊर्जा पाता है. उदात्त प्रकृति से सिमटा हुआ नहीं, वह दूर तक जीता है. इसलिए कविता का स्थान गद्य से ऊपर है. गद्य वालों को मान लेना चाहिए कि वे नंबर दो पर हैं. नंबर एक पर कवि है.'' (लेखक का जनतंत्र, पृष्‍ठ 155)  

मुक्तिबोध पर लिखते हुए वे जैसे हिंदी के आधुनिक पुरोधा कवि का ऋण चुका रही हों. यह आलोचना की रूढ़ शब्दावली से अलग कृतज्ञता, सहचिंतन और सहृदयता का एक समावेशी पाठ है जो मुक्तिबोध के रचे-सिरजे शब्दों के आलोक में सोबती के कवि-मन का उद्बोधन है. जैसी अनूठी कृष्णा जी की कथा-भाषा है, वैसा ही अनौपचारिक पाठ मुक्तिबोध पर लिखी इस किताब का है. जिस शिष्ट संवरन-भरे गद्य के लिए वे जानी जाती हैं, उसकी भी एक कौंध यहां अंधेरे में मोमबत्ती की तरह जलती दिखाई देती है. एक बड़े लेखक का आत्मसंघर्ष एक बड़ा लेखक ही समझ सकता है. मुक्तिबोध पर कृष्णा सोबती की किताब मुक्तिबोध के इसी आत्मसंघर्ष और उनके कवि-व्यक्तित्व की खूबियों को समझने की एक कोशिश है.

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आलोचना प्राय: पाठ के जिस वस्तुनिष्ठ संसार का पारायण और परीक्षण करती है, एक सर्जक लेखक जीवन सत्य के उजालों को अपनी रूह में भरता है, जो पाठ के धुंधलके को चीरती हुई आती है. कृष्णा सोबती ने मुक्तिबोध के काव्य की गहन वीथियों से गुजरती हुई कुछ कविताओं के आलोक में उस कवि-मन को पढ़ने की चेष्टा करती हैं जिसकी कविताएं सीमातीत यथार्थ को भेदती हुई किसी भी प्रकार की कंडीशनिंग के विरुद्ध एक प्रतियथार्थ रचती हैं. अपने उत्‍तर जीवन के आखिरी वर्षों में मुक्‍तिबोध पर लिख कर जैसे वे उस कवि परंपरा का ऋण उतारना चाहती थीं, जिसके कारण वे कविता की ताकत को अंत तक गद्य से बेहतर मानती रहीं. अंत तक अपने लेखकीय स्‍वाभिमान पर जीवित लेखक के रूप में वे लेखकों के लिए एक आदर्श थीं. अपने विचारों के लिए किसी भी सत्‍ता व्‍यवस्‍था के सम्‍मुख न झुकने वाली कृष्‍णा सोबती ने ऐसे अनेक अवसरों पर अपना विरोध भी प्रकट किया जब लोग तटस्‍थ रहना या चुप रहना बेहतर मानते हैं.
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक, कवि एवं भाषाविद हैं. शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित व अन्वय एवं अन्विति सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं.  हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार, आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब  द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हैं. संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059, मेलः dromnishchal@gmail.com

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