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जन्मदिन विशेष: भाषा की सन्निधि में सांस लेती शख्सियत ओम निश्‍चल

हिंदी कविता के विवेचन मूल्यांकन पर गए दो-तीन दशकों को गौर से देखा जाए तो इस क्षेत्र में ओम निश्चल नामक एक शख्स पूरे मन और समर्पण से संलग्न रहा है. निश्चल के जन्मदिन पर उनके साहित्यिक अवदान की चर्चा कर रहे हैं डॉ आनंद वर्धन द्विवेदी

अपने प्रिय लेखकों, साहित्यकारों के साथ डॉ ओम निश्चल अपने प्रिय लेखकों, साहित्यकारों के साथ डॉ ओम निश्चल

गए दो-तीन दशकों में हिंदी कविता के विवेचन मूल्यांकन को गौर से देखा जाए तो इस क्षेत्र में एक शख्स पूरे मन और समर्पण से संलग्न रहा है. उसकी आलोचनाएं, समीक्षाएं, कविताएं, गीत सब उसकी शख्सियत के विधायक तत्व हैं. इस शख्स ने हिंदी समीक्षा-आलोचना को एक प्रांजल और समावेशी भाषा दी है. साथ ही भाषा को आम आदमी तक ले जाने के अपने प्रयासों को मूर्त रूप दिया है. पिछले दिनों एक पुस्तक भाषा को लेकर चर्चित रही है वह थी: भाषा की खादी. भाषा का आम आदमी से वही रिश्ता है जो हिंदी का हिंदुस्तानी से. भाषा की खादी जैसी अवधारणा पर पहली बार किसी ने इतनी सक्षमता से कलम चलाई तथा हिंदी-हिंदुस्तानी, भाषा, राजभाषा तथा हिंदी के प्रचार-प्रसार में आने वाली कठिनाइयों का समाधान देती व भाषा व संस्कृति के ताने-बाने को खूबसूरती से सहेजती ऐसी पुस्तक केवल वही शख्स लिख सकता था जिसका भाषा से सघन रिश्ता हो.

बीते चार दशकों से काव्य, आलोचना और भाषा-चिंतन के क्षेत्र में कार्यरत ओम निश्चल की अनेक खूबियां हैं. आलोचना के क्षेत्र में नंद किशोर नवल, परमानंद श्रीवास्तव, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, अजय तिवारी तथा विजय कुमार की अगली पीढ़ी के जिन कुछ लेखकों और सहृदय आलोचकों की समावेशी आलोचना पर निगाह जाती है उनमें एक नाम डॉ. ओम निश्चल का भी है. उन्होंने कविताओं और गीत लेखन से शुरुआत की किन्तु धीरे-धीरे आलोचना में उनका पथ प्रशस्त होता गया और मुख्यत: आलोचक के रूप में प्रतिष्ठित होते गए. हाल के वर्षों में उनकी लिखी कृतियां: 'शब्द सक्रिय हैं', 'कविता के वरिष्ठ नागरिक' तथा 'समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिदृश्य' उनकी आलोचकीय सक्रियता का साक्ष्य हैं. साठोत्तर कविता के वैचारिक पहलुओं पर शोध करने वाले ओम निश्चल ने साठ से अब तक के अनेक कवियों पर उदारता और विवेक के साथ लिखा है.

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जनपद के हर्षपुर गांव में 15 दिसंबर, 1958 को जन्मे ओम निश्चल ने गांव व स्थानीय इंटर कालेज से शिक्षा के बाद लखनऊ विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातकोत्तर और अवध विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की और पीएचडी भी की. वह सूचना विभाग उत्तर प्रदेश में 'उत्तर प्रदेश' पत्रिका के संपादकीय विभाग से संबद्ध हुए. तत्पश्चात भारत सरकार के केंद्रीय हिंदी निदेशालय में कुछ दिनों भाषाविद डॉ नगेंद्र के पर्यवेक्षण में कोश निर्माण में संलग्न रहने के बाद एक राष्ट्रीयकृत बैंक की राजभाषा-सेवा में आ गए. यहां उन्होंने हिंदी को बैंकिंग कामकाज की भाषा के रूप में विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की. शब्दावली, पत्राचार, प्रशिक्षण, अनुवाद एवं टिप्पण-प्रारुपण सहित बैंकिंग वाड्.मय सीरीज के पांच वृहद खंड उनके हिंदी प्रेम का परिचायक हैं, जिसका लोकार्पण तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने किया. बैंकिंग के क्षेत्र में ऐसा वृहद परियोजनामूलक काम अन्य किसी ने संभव नहीं किया है.   

मुख्यत: आलोचक, गौणत: कवि

ओम निश्चल की साहित्यिक शख्सियत के अनेक पहलू हैं. वे मूलत: कवि-गीतकार हैं तथा गौणत: एक आलोचक लेकिन संयोगवश वे धीरे-धीरे मुख्यत: आलोचक ही होते गए और गौणत: कवि. भाषा से उनका रिश्ता व्यावसायिक रहा है. हिंदी गीत रचना में जैसा पद-लालित्य उनके गीतों में देखा जाता है, वैसा अन्य गीतकार-कवियों में कम. 'शब्द सक्रिय हैं' संग्रह कविता में उनकी उपस्थिति का साक्ष्य है, जो 1987 में प्रकाशित हुआ. कहना न होगा कि वे नवगीत के बेहतरीन रचनाकारों में शुमार किए जाते हैं. इसकी वजह शायद यह है कि उन्होंने ठाकुरप्रसाद सिंह, शंभुनाथ सिंह सरीखे कवियों के संपर्क में रह कर गीत की संरचना एवं पदलालित्य की सीख ली है. कोरोना समय में भी ओम जी की अनेक कविताएं पत्र-पत्रिकाओं एवं महत्त्वपूर्ण वेब पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं, जिनमें मजदूरों, और आम आदमियों को कोरोना विस्थापन से जो कष्ट हुआ, उसे बहुत ही मार्मिक ढंग से अभिव्यक्ति मिली.

ओम निश्चल के गीत 'पर्सनल पोयट्री' के गुणों का निदर्शन करते हैं, तो यथार्थ और समकालीनता के प्रवाह में सत्ता व्यवस्था का क्रिटीक भी रचते हैं. आज की राजनीति में दिनों-दिन आते क्षरण को उनके गीत हमारे समय की आधुनिक भाषा में रूपायित करते हैं, तो किसान आंदोलन, किसान आत्महत्याओं और गांधीचिंतन से विपथ होते समाज की आलोचना भी करते हैं. कहां खो गया गांधी पथ? कह कर वे गांधी चिंतन को नेपथ्य में डाल देने वाले समाज को आड़े हाथों लेते हैं तो हिंदी को राजभाषा बनाने वाली सत्ता की नाक के नीचे पुरस्कारों को लेकर होने वाली जोड़-तोड़ को भी मुखर गीत 'हिंदी के चेहरे पर चांदी की चमक है' में उदघाटित करते हैं. उनके गीत कुदरत की खूबसूरती का बयान करते हैं, तो आपातकाल के दौरान इस समय को क्या हुआ है -जैसे गीत के माध्यम से उन दिनों की भयावहता का चित्र भी खींचते हैं. जिन दिनों पंजाब में उग्रवाद चरम पर था, सत्ता की नाकामयाबी पर प्रकाशित ओम जी का यह गीत बहुत ही मौजूँ तरीके से हिंसक कार्रवाइयों पर आंख मूंदे सरकार की आलोचना करता हुआ प्रकाशित हुआ था-
राजा का फरमान हुआ है
मंत्रीगण सोएं
हत्याओं से नहीं कांपते
सत्ता के रोएं
आड़ धरम की लिए सियासत
बेच रही सपने
टूट रहा है लोकतंत्र के नट का वशीकरण.

इधर उनके गीतों में प्रतिरोध का तेवर प्रबल रहा है. प्रतिबद्ध मार्क्सवादी लेखक, कवि न होते हुए भी वे प्रगतिशील रचनाकार के रूप में उभरे हैं तथा जनविरोधी व्यवस्थाओं की सदैव आलोचना की है. उनकी आलोचना भी जहां रचना के बुनियादी तत्वों को विमर्श के दायरे में रखती है, वहीं रचना के विश्लेषण, विवेचन, आलोचन में अपना प्रगतिशील तेवर बरकरार रखती है.

आलोचना: वैशिष्ट्य एवं विवेचन

जहां तक ओम निश्चल के एक अन्य किन्तु महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक पक्ष का सवाल है, वह पक्ष बहुत मजबूत है. संस्कृत काव्यशास्त्र के मर्मज्ञ ओम निश्चल एक भाषा चिंतक होने के नाते आलोचना में भाषा के वैशिष्ट्य पर विशेष ध्यान देते हैं. आप उनकी कोई भी समीक्षा आलोचना या विवेचन पढ़िए, सबसे पहले आपका ध्यान उस पाठ की भाषा पर जाता है. आपको लगेगा कि यहां भाषा की कोई नई जलवायु बह रही है. ओम जी हर कवि को उसके शब्दों की रोशनी में देखते, निरखते, परखते हैं. वे साठोत्तर कविता के अध्ययनशील आलोचक हैं. कविता और विचारदर्शन पर उनका गंभीर किस्म का शोधकार्य है. कविता की वैचारिकी पर वे अरसे से कार्यरत रहे हैं. हिंदी का ऐसा कोई महत्त्वपूर्ण कवि न होगा, जिस पर ओम निश्चल ने गंभीरता से कलम न चलाई हो. आलोचना की शुरुआत उन्होंने बच्चों के कवि द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी के रचना संसार के विवेचन से की थी. लेकिन बच्चों के कवि के बाद वे मुख्य‍ धारा के कवियों के अध्य्यन की ओर मुड़े, तो गंभीर आलोचना का एक अलग ही माहौल पैदा किया. अपने समय के बड़े लेखकों डॉ रामविलास शर्मा, रामदरश मिश्र, श्रीलाल शुक्ल, कुंवर नारायण, कैलाश वाजपेयी, ठाकुर प्रसाद सिंह, द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी, प्रभाकर श्रोत्रिय, विद्यानिवास मिश्र, लीलाधर जगूड़ी, ज्ञानेन्द्रपति जैसे लेखकों के सान्निध्य में रह कर साहित्य के अंतस्तत्‍व को समझना सीखा.

कितने ही कवियों, कथाकारों चिंतकों से उनकी बातचीत आज भी बेहतरीन इंटरव्यूज के मानक हैं. 'शब्दों से गपशप' और 'कविता के वरिष्ठ नागरिक' और अन्य कृतियों में हिंदी की परंपरा के लगभग चालीस वरिष्ठ कवियों- अज्ञेय, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, रामदरश मिश्र, कुंवर नारायण, मलय, केदारनाथ सिंह, विनोद कुमार शुक्ल,नरेश सक्सेना, अशोक वाजपेयी, लीलाधर जगूड़ी, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, ऋतुराज, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, भगवत रावत, विष्णु खरे, नंदकिशोर आचार्य, विष्णु  नागर, ज्ञानेंद्रपति, मनमोहन, आलोक धन्वा, लीलाधर मंडलोई, उदय प्रकाश, दिनेश कुमार शुक्ल , विजय कुमार, अरुण कमल, ओम भारती, हेमंत शेष, अष्टभुजा शुक्ल, सविता सिंह, अनामिका, गगन गिल, कात्यायनी आदि पर उनके आलोचनात्मक लेख उत्कृष्ट समालोचन के पर्याय हैं. ओम निश्चल ने युवा लेखकों, कवियों पर भी श्रृंखलाबद्ध लेखन किया है तथा आज के अधिकांश सक्रिय युवा कवियों पर उनकी राय को निर्णायक माना जाता है. आलोचना के उच्चादर्श पर कायम रहने वाले निश्चल की हाल ही आई पुस्तक 'समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य' साठोत्तर कविता की विवेचना का सुविस्तृत इतिहास है. कविता की समकालीनता और उसके बौद्धिक तेवर को लेकर ऐसी पुस्तकें कम मिलती हैं. ऐतिहासिक अनुशीलन होते हुए भी एक पटकथा की तरह आलोचना को बातचीत के लहजे में ढाल लेना ओम निशल की विशेषता है.

प्रभूत आलोचनात्ममक लेखन के अलावा ओम निश्चल अनेक कृतियां संपादित की हैं. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी एवं कुंवर नारायण पर आलोचनात्मचक कृतियों के संपादन के अलावा मलय, केदारनाथ अग्रवाल, अशोक वाजपेयी, लीलाधर मंडलोई जैसे लेखकों की रचनाओं के संपादन के साथ कोशकारिता के क्षेत्र में तत्सम शब्दकोश के संबद्ध रहे. समीर रायचौधुरी के साथ संपादित अधुनांतिक बांग्ला कविता का चयन मुख्य धारा की बांग्ला कविता से अलग जनपदीय बांग्ला कविता का एक श्रेष्ठ संचयन है, जो सही मायने में पोस्ट माडर्न पोएट्री यानी अधुनांतिक कविता के आस्वाद से लैस है. कहना न होगा कि बंगाल की कविता मुख्य धारा की कविता से अलग दूरदराज गांवों और कस्बों में जिस शिद्दत से लिखी जा रही है, वह न केवल बांग्ला कविता का बल्कि बांग्ला समाज और संस्कृति का भी श्रेष्ठ चित्रण है. पोस्ट मार्डन पोएट्री के विशेषत्व क्या होने चाहिए इसे लेकर पुस्तक की लंबी भूमिका इस अवधारणा को सही तरीके से प्रस्ता‍वित करती है, जो कि उत्तर आधुनिकता की मान्य परिभाषा से अलग और अधुनांतिक है जो बांग्ला चिंतन की अपनी विशेषता है. कविता परिदृश्य पर बात करते हुए वे अपनी पुस्तक 'शब्दों से गपशप' में कहते हैं, ''काव्य रचना केवल शाब्दिक नहीं होती, वह मनुष्‍य चित्त की सबसे कोमल रिफाइनरी से छन कर कागज पर उतरती है और सच कहें तो अब भी बाजार से होड़ लेने की हिम्मत केवल कविता में है जो प्रतिरोध के उर्वरक से पनपती और विकसित होती है.''

आलोचना की सर्जनात्मक भाषा

ओम निश्चल के लेखन में जो चीज सर्वाधिक ध्यान खींचती है वह है उनकी धारदार एवं प्रांजल भाषा. किन्तु यही उनकी आलोचना की सीमा भी है. उन्हें पढ़ते हुए लगता है हम आलोचना नहीं, एक ललित निबंध पढ़ रहे हैं. वे जिस किसी पर लिखते हैं, उसका पूरा वैशिष्ट्य एवं गुणसूत्र उकेर देते हैं. उनकी भाषा बेशक तत्‍सम प्रधान है जिसका कारण उनका संस्कृत का अध्ययन रहा है. पर पद लालित्य बताता है कि वे कविताओं में बहुत सलीके से पेश आते हैं. आलोचना को रम्य सर्जनात्मक भाषा देने की एक परंपरा हिंदी में रही है. ओम निश्चल इस परंपरा के अनुगामी लगते हैं. उनकी दृष्टि में पड़ कर कविता नए अर्थ की संभावनाओं से भर उठती है. वे चाहते हैं आलोचक को चाहिए कि वे धीर गंभीर मुद्रा बाहर निकलें. वे कहते हैं कि आलोचक अपनी रूढ़ छवि के चौखटे से बाहर आए और कविता के प्रशस्त गलियारे से एक यायावर की तरह गुजरे, उसकी अर्थछवियों में कहीं दूर सैर के लिए निकल जाए और जब वह बोले तो आलोचना की भाषा भंगिमा भी कुछ बदली बदली सी लगे. (शब्दों से गपशप, पृष्ठ-12)

ओम निश्च‍ल की आलोचना कवियों के गुणसूत्र को परखती है. जैसे वह अज्ञेय में भाव प्रवण बौद्धिकता, नागार्जुन में अनगढ़ उपमान, केदारनाथ अग्रवाल में प्रगतिशीलता, कुंवर नारायण में नैतिक ताकत, अशोक वाजपेयी में भाषिक सौंदर्य, लीलाधर जगूड़ी में प्रयोगों के नवाचार, ज्ञानेंद्रपति में भारतीयता, अष्टभुजा शुक्ल में लोक और शास्त्र की सन्निधि देखती है. आज कविता को अक्सर वादों, या दशकों में बाँट कर देखने का चलन है. ओम निश्चल काव्यालोचन में प्रवृत्तियों को आधार बनाते हैं. अज्ञेय पर लिखते हुए वे एक बड़ी बात कहते हैं कि 'प्रथमद्रष्ट्या हर कवि प्रेम का कवि है, क्योंकि उसके भीतर एक ऐसा अजस्र भाव विद्यमान रहता है जो आस पास की गोचर अगोचर सत्ता से लेकर ब्रह्मांड में फैली नाना किस्म की चीजों से सौहार्द रखता है.' (शब्दों से गपशप, पृष्ठ-13)

कविता को लेकर ओम निश्चल का फोकस साठोत्‍तर समय से लेकर इस शती के दो दशकों तक की कविता पर रहा है. किन्तु समूचे कविता परिदृश्य में उन्हें यह बात कचोटती है कि कविता की भाषा आज अभिव्यक्ति की पटरी पर चलते-चलते घिस गयी है. नए अर्थ के संवाहक और हमारे समय की आधुनिकतम भाषा में जिस तरह कवि को पेश आना चाहिए था, ऐसे कवि कम होते जा रहे हैं. अधिक बोलने वाली कविता की वंशबेल लगातार फूल फल रही है जबकि कविता संयम मांगती है. (कविता के वरिष्ठ नागरिक, पृष्ठ-196) कविता हालांकि ओम निश्चल की आलोचना के केंद्र में सर्वाधिक है पर समय-समय पर उन्होंने कहानियों और उपन्यासों पर भी लिखा है. कृष्णा सोबती, निर्मल वर्मा, नासिरा शर्मा, सूर्यबाला, चित्रा मुद्गल, अलका सरावगी, मधु कांकरिया, भालचंद्र जोशी, हरिओम तथा अन्य तमाम कथाकारों की कृतियों पर उन्होंने विस्‍तार से लिखा है. कवियों में उनके प्रिय कवि कुंवर नारायण व कैलाश वाजपेयी हैं जिन पर उनकी स्वतंत्र पुस्तके हैं.  'कविता की सगुण इकाई' में कुँवर नारायण को उन्होंने उनकी संपूर्णता में देखा परखा है जिसमें उनकी रचना-धर्मिता के समस्त आयामों आशयों, सूक्ष्म से सूक्ष्मतम विशेषताओं को एक वैज्ञानिक तर्कवत्ता और मूल्यपरकता से विश्लेषित-उद्घाटित किया गया है, तो कैलाश वाजपेयी पर लिखते हुए ओम निश्‍चल उनकी कविता और उनके गद्य लेखन में व्या‍प्त विशद भारतीय चिंतन को पश्चिम व भारत की विचार सरणियों की कसौटी पर रख कर देखते हैं.  

तथापि, ओम निश्चल की आलोचना की भी अपनी कुछ सीमाएं हैं. जब वह अपने मित्र रचनाकारों पर कलम चलाते हैं तो उनका आलोचक रचनाकारों की आत्मीयता के बोझ तले विनयावनत-सा लगता है. कुछ रचनाकारों से उनकी प्रीति ऐसी है कि किसी न किसी बहाने से वे उनकी आलोचनाओं में अवश्य आते हैं, इनमें ऊपर उल्लेखित कवियों के साथ विदेशी लेखकों में आक्तेवियो पॉज, ब्रेख्त, नेरूदा और कुछ अफ्रीकी कवि-लेखक अक्सर मिल जाते हैं.

इन सीमाओं के बावजूद कहना होगा कि ओम निश्चल के पास वर्तमान में सक्रिय सभी आलोचकों से बेहतर और गहरी भाषिक रसान्विति है. उनकी भाषा जैसे वशीकरण मंत्र के कठिन जप-तप का परिणमन है. वह शब्दों से खेलते हैं और पाठक को तो मुग्ध करते ही हैं, स्वयं भी मुग्ध कापालिक की तरह अपने भाषिक सौन्दर्य से मुग्ध होकर नृत्यरत हो जाते हैं. उनकी पृष्ठभूमि संस्कृत की है और वह इसमें निष्णात हैं. और संस्कृत क्योंकि दुनिया की सबसे अर्थवाही भाषा है, लिहाज़ा वह एक चतुर ग्वाले की तरह उससे अधिक दूध निकालते हैं जितना चारा उसे खिलाते हैं. ओम निश्चल की आलोचना की भाषा में इतना प्रसाद है, मानो वह आलोचना न होकर ललित निबंध हो- उन्हें पढ़कर रामचंद्र शुक्ल के उत्साह, क्रोध, घृणा सरीखे मनोवैज्ञानिक लेखों की याद हो आती है, कई बार गुलाब राय ही नहीं, विद्यानिवास मिश्र, कुबेर दत्त राय जैसे आधुनिक निबंधकार की छायाएं तक आपके ज़ेहन की सांकलें खटकाती हैं.

एक आलोचक, भाषा चिंतक व कवि के अलावा भी ओम निश्चल की अनेक विशेषताएं हैं. सुघर मंच संचालन, बेहतरीन कंठ, सुललित गीत रचनाएं उनकी शख्सियत में चार चांद लगाती हैं. उन्‍हें साहित्‍य साधना के लिए रामचंद्र शुक्‍ल आलोचना पुरस्‍कार, शाने हिंदी खिताब व प्रोफेसर कल्‍याणमल लोढा साहित्‍य सम्‍मान से नवाजा जा चुका है. एक बैंककर्मी होते हुए भी वे जिस तरह कविता, साहित्य, भाषा, कोशकारिता इत्यादि में गए चार दशकों से रमे जमे रहे हैं, उससे यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि ओम निश्चल का रिश्ता अकादेमिक जगत से नहीं है. पर हॉं वे उच्च अकादमिक प्रतिभा से संपन्न होते हुए भी अकादमिक जड़ताओं से मुक्त एक उन्मुक्त उड़ान भरने वाले आलोचक और पारखी भाषाविद हैं इसमें संदेह नहीं .

# डॉ ओम निश्चल के जन्मदिन पर यह आलेख डॉ आनंद वर्धन द्विवेदी ने लिखा है. द्विवेदी समकालीन कविता के अध्येता और विवेचक हैं. संपर्कः 2/217, दूसरा फ्लोर, विजय खंड -2, गोमती नगर, लखनऊ - 226010, फोन : 9415006453

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