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संस्मरणः कवि नागार्जुन, सादतपुर की इन गलियों में हमने बाबा को देखा है!

बाबा नागार्जुन यानी आम आदमी के गौरव और ठसके के लेखक, जिनसे बात करो तो लगता था, पूरा हिंदुस्तान आपसे मुखातिब है.

जनकवि बाबा नागार्जुन [चित्र सौजन्यः लेखक] जनकवि बाबा नागार्जुन [चित्र सौजन्यः लेखक]

बाबा नागार्जन यानी आम जन के राग-विराग के लेखक. बाबा नागार्जुन यानी आम आदमी के सुख-दुख और करुणा के लेखक. बाबा नागार्जुन यानी आम जनता के नितांत अपने लेखक. बाबा नागार्जुन यानी ठेठ गंवई लेखक, जिन्हें अपने सामने बैठा देखकर लगता था, हिंदुस्तान और हिंदुस्तानी संस्कृति का आम आदमी अपनी पूरी धज के साथ आपकी आंखों के आगे मौजूद है. बाबा नागार्जुन यानी आम आदमी के गौरव और ठसके के लेखक, जिनसे बात करो तो लगता था, पूरा हिंदुस्तान आपसे मुखातिब है.
बाबा की शख्सियत में, उनकी गंवई सादगी और सरलता में, उनके गुस्से, उनकी बच्चों की सी प्रफुल्ल हंसी और कभी-कभी नजर आ जाने वाले विचित्र ठसके में एक गौरव था. उसे शब्द दे सकूं, यह सामर्थ्य मुझमें नहीं है.
सादतपुर में बाबा से दर्जनों बार मिलने का सुयोग हुआ. उनसे भेंट करवाई थी मेरे बहुत-बहुत प्यारे कलाकार दोस्त हरिपाल त्यागी ने. मुझमें कुछ था जो बाबा को भा गया. फिर तो उनसे दर्जनों प्यारी और आत्मीय मुलाकातें हुईं, जिन्हें याद करो, तो आज भी छाती में प्रकंप सा होता है. ऐसा सहज बहता स्नेह, जैसे कोई सोता फूट पड़ा हो. मुझे उसमें डूब-डूबकर नहाने का सौभाग्य मिला.
मेरे जीवन के ये सबसे आनंदमय पल थे. लग रहा था, मेरा लेखक होना धन्य हो गया.
आज भी मुझे बहुत अच्छी तरह याद है कि बाबा से मेरी पहली मुलाकात हरिपाल त्यागी के घर पर हुई थी. उस मुलाकात की जैसे कोई फिल्म बार-बार मेरी स्मृतियों में चल पड़ती है. असल में हुआ यह कि मेरा और मेरे मित्र देवेंद कुमार का पहला सम्मिलित कविता संकलन निकला था, 'कविता और कविता के बीच'. उसी को मित्रों और वरिष्ठ साहित्यकारों को भेंट करने के लिए मैं और रमेश तैलंग सादतपुर गए थे.
मन में कहीं था कि अगर बाबा नागार्जुन मिले तो उन्हें भी संकलन भेंट करेंगे. इस बहाने उनसे दो-चार बातें भी हो जाएंगी. पर हरिपाल त्यागी जी के घर हम लोग पहुंचे तो वहीं बाबा से भेंट हो गई. वे चारपाई पर बैठे एक घरेलू किस्म की बतकही में लगे थे. पास ही कुर्सी पर हरिपाल त्यागी जी बैठे थे. शायद एक-दो जन और भी थे. साथ ही शीला भाभी जी भी घरेलू काम से इधर-उधर आते-जाते हुए, इस अनौपचारिक संवाद में शामिल हो जाती थीं.
मैंने और तैलंग ने हाथ जोड़कर बाबा को नमस्कार किया. त्यागी जी ने मेरा परिचय कराते हुए कहा, "बाबा, ये प्रकाश मनु हैं, आजकल बहुत लिख रहे हैं. हिंदुस्तान टाइम्स की 'नंदन' पत्रिका में हैं. और साथ में इनके मित्र रमेश तैलंग हैं. बच्चों की बहुत अच्छी कविताएं लिखते हैं."
मैंने थैले में से 'कविता और कविता के बीच' की एक प्रति निकाली. फिर बाबा के लिए कुछ आदरपूर्ण शब्द लिखकर, पुस्तक बाबा की ओर बढ़ाई. बाबा की निगाह कमजोर थी. उन्हें कुछ भी पढ़ने के लिए लेंस की जरूरत पड़ती थी, जिसे वे हमेशा अपने साथ रखते थे.
बाबा लेंस से उस पुस्तक के आवरण को गौर से देखते रहे. फिर किताब खोली तो उनकी निगाह लाल पेन से लिखी गई पंक्ति पर गई, जिसमें मैंने बड़े भावनात्मक शब्दों में बाबा को अपना प्रणाम निवेदित किया था. उसे पढ़ते ही बाबा ने बड़े प्यार से डांटा, "आप नीली स्याही वाला पेन रखा कीजिए. लाल स्याही वाली लिखाई को पढ़ने में हमारे जैसे बूढ़ों मुश्किल आती है....देखते नहीं, मेरी निगाह अब कमजोर हो गई है."
'नंदन' कार्यालय में संपादन का कार्य अकसर लाल स्याही से ही करना होता था. इसलिए अकसर दो पेन हमेशा मेरे पास होते थे. एक लाल, दूसरा नीली स्याही वाला. आज नीली स्याही वाला पेन कहीं इधर-उधर छूट गया था. तो मैंने सोचा, क्या हर्ज है, लाल पेन से ही लिख देता हूं.
पर बाबा की एक ही डांट से मेरी संपादकीय अकड़ ढीली हो गई. मैंने क्षमा मांगते हुए कहा, "बाबा, गलती हो गई. अब आगे यह गलती कभी न होगी. मेरी अगली किताब जब भी आएगी, तो मैं नीली स्याही से ही दो शब्द लिखकर आपको भेंट करूंगा."
"हां, ठीक...!" बाबा खुलकर हंसे थे. एक ऐसी प्रसन्न हंसी, जो हिंदुस्तान के किसी भी गांव के बूढ़े आदमी के होंठों पर छलछलाती आपको नजर आ जाएगी.
सादतपुर भले ही दिल्ली में आता हो, पर यह दिल्ली जैसे महानगर में बसा एक गांव ही था, जिसमें बाबा पूरे गंवई ठसके के साथ रहते थे, और शहरी अकड़ को अपनी एक ही डांट से पानी-पानी कर दिया करते थे.
अलबत्ता, बाबा के इस पहले साक्षात्कार ने ही मुझे जरा ठकठका सा दिया. इसके बाद वे देर तक उत्सुकता से कविताओं को बीच-बीच में देखते रहे. कहा, "मैं इसे अच्छी तरह पढ़ूंगा. फिर आपसे बात करूंगा." और खूब लिखने का आशीर्वाद दिया.
धीरे-धीरे उन्हें और गहराई से जाना तो बाबा का स्वभाव, उनके गुस्से और लाड़-प्यार के हाव-भावों के साथ बहुत कुछ मेरे आगे खुलता चला गया.
अलबत्ता बाबा से अगली मुलाकात बड़े प्रेमपूर्ण माहौल में हुई. मैं अपने गुरु देवेंद्र सत्यार्थी की रचनाओं का एक संचयन 'देवेंद्र सत्यार्थी की चुनी हुई रचनाएं' निकाल चुका था और उन पर दूसरी किताब 'देवेंद्र सत्यार्थी : तीन पीढ़ियों का सफर' की तैयारी कर रहा था. बल्कि किताब का काफी काम हो भी चुका था. मैं चाहता था कि हिंदी की तीन पीढ़ियों के लेखकों के लेख और संस्मरण उस किताब में शामिल हों. बहुतों के लेख आ भी चुके थे. पर कुछ वरिष्ठ लेखकों के लेख अभी आने बाकी थे.
उसी सिलसिले में मैं हरिपाल त्यागी से मिला था. त्यागी जी ने स्वयं तो बड़ा भावनात्मक लेख लिखा ही, साथ ही मुझे लेकर बाबा के घर पहुंचे. उन्होंने बाबा को बताया, "बाबा, मनु जी आपसे मिलने के लिए आए हैं. ये सत्यार्थी जी पर एक बड़ी किताब तैयार कर रहे हैं, 'देवेंद्र सत्यार्थी: तीन पीढ़ियों का सफर'. इनकी इच्छा है कि आप भी सत्यार्थी जी पर कुछ लिखकर दें. इससे पहले भी ये उन पर एक किताब निकाल चुके हैं, 'देवेंद्र सत्यार्थी की चुनी हुई रचनाएं'."
सुनकर बाबा के आनंद की कोई सीमा न रही. सत्यार्थी जी का नाम सुनते ही उनकी आंखों से जैसे प्रेमधारा बहने लगी. एकदम प्रफुल्ल और रोमांचित होकर मुझसे बोले, "बहुत अच्छा काम कर रहे हैं आप. सत्यार्थी जी को लोगों ने भुला दिया. एक वक्त था, जब इस आदमी का इतना रोब था कि देश के बड़े से बड़े लेखकों का सिर भी सत्यार्थी जी का नाम सुनते ही आदर से झुक जाता था. लोग इनसे मिलने के लिए तरसते थे....पर आजकल कौन याद करता है पुराने लोगों को?"
कहते हुए बाबा के चेहरे पर एक भाव आ रहा था, एक जा रहा था. फिर कुछ सोचकर बोले, "मैं जरूर सत्यार्थी जी पर लिखूंगा. पर उनकी रचनाएं पढ़े हुए लंबा अरसा हो गया. आप क्या उनकी कोई पुस्तक मुझे पढ़ने के लिए दे सकते हैं? मैं एक बार फिर से उन्हें पढ़ना चाहता हूं."
मैंने बताया, "बाबा, सत्यार्थी जी की चुनिंदा रचनाओं का मैंने एक संचयन तैयार किया है. आप चाहें तो मैं वह पुस्तक आपको भेंट कर सकता हूं."
बाबा ने कहा, "तो वह किताब आप मुझे जल्दी पढ़ने को दीजिए. उसे पढ़कर मैं जरूर सत्यार्थी जी पर लिखूंगा."
यह तो मेरे मन की ही बात थी. इसलिए कि लगभग तीन चौथाई किताब तैयार थी. केवल कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों के लेख या संस्मरण आने बाकी थे.
वे कड़कती सर्दियों के दिन थे. शायद जनवरी का महीना. पर किताब काफी कुछ तैयार थी. उसमें बाबा का आलेख जोड़ने की उत्सुकता इतनी अधिक थी कि मैंने कहा, "ठीक है बाबा, कल मैं किताब आपके पास पहुंचा दूंगा."
मैं फऱीदाबाद रहता था, जहां से सादतपुर जाने में कोई दो-ढाई घंटे लग जाते थे. लिहाजा त्यागी जी कुछ चकराए. बोले, "मनु जी, कल तो आपको आफिस जाना होगा न. तो फिर कल कैसे आप सादतपुर आ पाएंगे...?"
खुद बाबा भी अचरज में थे और एकटक मेरी ओर देख रहे थे. मैंने निश्चिंत भाव से कहा, "आप चिंता न करें बाबा. कल किताब आपको मिल जाएगी."
***

मुझे आज भी याद है, अगले दिन ऐसी सर्दी थी कि हड्डियों तक में कंपकंपाहट होती थी. पर मैं सुबह चार बजे उठा. आधे-पौने घंटे में नहाना-धोना. तब तक सुनीता जी ने चाय और आम के अचार के साथ गरम परांठा मेरे आगे रख दिया. जल्दी से मैंने परांठा किसी तरह चाय के साथ निगला और दौड़ लगा थी, मथुरा रोड की ओर, जहां से मुझे दिल्ली जाने वाली बस मिलनी थी.
सौभाग्य से सुबह-सुबह एक रिक्शे वाला भी मिल गया. बड़खल मोड़ से मैंने दिल्ली बस अड्डे की बस पकड़ी, फिर वहां से दो बसें और. और कोई छह-साढ़े छह बजे 'देवेंद्र सत्यार्थी की चुनी हुई रचनाएं' पुस्तक के साथ मैं बाबा के घर पर उपस्थित था.
बाबा उठ गए थे और छोटी सी अंगीठी पर हाथ सेंक रहे थे. बाहर का दरवाजा हलका सा उढ़का हुआ था.
मैंने हल्की सी दस्तक दी, फिर अंदर आया तो वे हैरान रह गए "अरे मनु जी, आप इतनी सुबह...?"
मैंने कहा, "बाबा, आपको किताब तो देनी थी न...!" कहकर मैंने सत्यार्थी जी की चुनी हुई रचनाओं का संचयन उन्हें भेंट किया.
पहले बाबा को लगा कि मैं रात को त्यागी जी के घर पर ही सोया था. वहीं से उठकर आ रहा हूं. पर उनके पूछने पर मैंने बताया, "बाबा, मैं तो इस समय फरीदाबाद से आया हूं."
"फरीदाबाद से इतनी सुबह...?" कहते-कहते उन्हें बहुत लाड़ हो आया मुझ पर. उन्होंने भीतर चाय के लिए आवाज लगाई. कहा, "अरे देखिए, इतनी सुबह-सुबह प्रकाश मनु आए हैं फरीदाबाद से. इन्हें जल्दी से गरम चाय पिलाइए."
और फिर चाय आई, देर तक सत्यार्थी जी को लेकर बातें चलती रहीं. मैंने सत्यार्थी जी से हुई अपनी मुलाकातों के बारे में बताया, तो बाबा बड़ी रुचि और उत्सुकता से सुनते रहे.
अचानक बातें करते-करते बाबा एकदम भावुक हो गए. बोले, "आपने सच में बहुत काम किया है सत्यार्थी जी के लिए. वरना आज की पीढ़ी में कौन याद करता है पुराने लोगों को? बूढ़ा होते ही आदमी को जल्दी से जल्दी वेस्ट पेपर बास्केट में फेंकने की होड़ लग जाती है, जैसे यह भी बेकार पड़ा रद्दी का ढेर है. जल्दी से इसे कूड़ेदान में डालो, और मुक्त हो जाओ. वरना बेकार बुड्ढा सिर खाता रहेगा...! नई पीढ़ी आजकल ऐसी ही हो गई है."
कहते-कहते बाबा की आंखों से आंसुओं की धारा फूट पड़ी....वे सचमुच रो रहे थे और उनके दोनों गाल आंसुओं से भीग गए थे.
"आपने सत्यार्थी जी पर इतना काम किया है. आगे और भी करना चाहते हैं. यह बड़ी बात है, बहुत बड़ी बात...!" कहते-कहते उऩका प्यार और आशीर्वाद मुझ पर बरसने लगा.
"बाबा, इसके बाद मैं आप पर भी कुछ अलग सा काम करना चाहूंगा." मैंने कहा.
"हां, ठीक है करना....पर पहले मैं एक बार तुम्हारा घर देखना चाहता हूं. कुछ दिन वहां रहूंगा, तुम्हारे साथ. बोलो, कब लेने आ रहे हो तुम मुझे?" बाबा की भावमुद्रा अचानक बदल गई. अब उनके चेहरे पर एक बड़ी आत्मीय सी मुसकान थी.
मैंने उत्साहित होकर कहा, "बाबा चलिए, अभी चलिए. यह तो मेरा बड़ा सौभाग्य होगा."
"तो ठीक है, चलो, ले चलो मुझे...!" बाबा बोले
"चलिए, बाबा!" मैं उठकर खड़ा हो गया.
"पर कैसे ले जाओगे तुम मुझे?" बाबा ने कहा. फिर मुसकराए, "अच्छा, तुम मुझे गोदी में उठाकर ले चलो...!" कहते हुए सचमुच किसी शिशु की तरह उन्होंने दोनों बांहें फैला दीं.
चेहरे पर ऐसी अजब भंगिमा कि क्या कहूं? आंखें जैसे कुछ-कुछ हंस रही हों.
"हां-हां, चलिए बाबा, मैं ले चलता हूं...!" कहते-कहते मैं आगे बढ़ा उन्हें उठाने के लिए तो बाबा इतनी जोर से हंसे कि मैं उस हंसी के सोते में नहा सा गया.
बाबा बोले, "इस समय तो आपको दफ्तर जाना होगा. चलिए, जल्दी से भागिए, आपको देर हो रही होगी....हम जब भी फरीदाबाद आएंगे, त्यागी जी के साथ आएंगे. आप उनके साथ प्रोगाम बना लीजिए."
फिर चलते-चलते दो एक बातें और भी. अगले इतवार तक उन्होंने सत्यार्थी जी पर लिखकर देने का भरोसा दिया. फिर मैं वहां से दफ्तर चला आया.
***

अगले इतवार को मैं सादतपुर गया तो त्यागी जी ने बताया कि इस बीच बाबा ने न सिर्फ सत्यार्थी जी वाली पुस्तक को पढ़ा, बल्कि सादतपुर के दो-एक लेखकों के घर जाकर उसे दिखाया भी. कहा, "देखो, सच्चा लेखक कैसा होता है और कैसे काम किया जाता है, यह तुम्हें प्रकाश मनु से सीखना चाहिए."
और फिर हाड़ कंपाती सर्दी में मेरे सुबह-सुबह उनके घर पहुंचने की कहानी भी उन्होंने बहुतों को सुनाई. मैंने सत्यार्थी जी सरीखे भुला दिए गए लेखक पर काम किया था, इसे उन्होंने बड़े ही प्रशंसात्मक सुर में बताया और कहा, "कोई काम करना चाहे, तो ऐसा ही करना चाहिए."
बाद में बाबा ने सत्यार्थी जी पर एक बड़ी ही आत्मीयता भरी कविता लिखी, जिसमें लोकगीतों के लिए उनकी दीवानगी को उन्होंने बड़े प्यार से याद किया था. साथ ही लोक साहित्य में उनके द्वारा किए गए ऐतिहासिक काम का अभिनंदन भी था. मैंने 'तीन पीढ़ियों का सफर' पुस्तक के एकदम प्रारंभ में ही इस कविता को बाबा की ही लिखावट में दिया, और उसे काफी सराहा गया.
फिर तो बाबा से एक के बाद एक आत्मीय मुलाकातों का ऐसा सिलसिला चल निकला कि मेरे लिए समझ पाना मुश्किल है, क्या लिखूं, क्या नहीं.
पर कुछ बातें तो एकदम नहीं भूलतीं. इन्हीं में एक प्रसंग वह भी है, जिसमें मैंने बाबा का एक अजब किस्म का ठसका देखा, जिसके आगे अच्छे-अच्छे पानी भरते थे. हुआ यह कि एक बार मैं सादतपुर गया तो वहां हरिपाल त्यागी मुझे बाबा से मिलवाने ले गए. बाबा शायद कृषक जी के घर थे, और वहां महेश दर्पण समेत सादतपुर के बहुत सारे लेखकों का जमावड़ा था. बाबा की बतकही चालू थी, और उसमें न जाने कहां-कहां के प्रसंग आ रहे थे.
बात देखते ही देखते कहीं से कहीं पहुंच जाती. पर उनमें बाबा के खुद के अनुभव और बड़े खरे संस्मरण थे, इसलिए सुनने में आनंद आ रहा था.
तभी कोई व्यक्ति आया और कहा, "चलिए, बाबा, मैं आपको लिवाने के लिए आया हूं."
बाबा एक क्षण के लिए चुप. फिर बोले, "भई, आज तो नहीं हो सकता....आप देख रहे हैं न, यहां इतने सारे लोग हैं. प्रकाश मनु फरीदाबाद से आए हैं, और भी कितने सारे लोग हैं. इनसे बातें हो रही हैं. तो फिर आगे कभी देखेंगे...!"
"बाबा, कल आ जाऊं मैं...?"
बाबा ने कुछ देर सोचा, फिर कहा, "ठीक है, आ जाना. बोल देना, आज बहुत लोग मिलने आए हुए थे, तो आना मुश्किल था."
"ठीक है बाबा." कहकर वह व्यक्ति हाथ जोड़कर चला गया.
यह क्या चक्कर है? बाबा को कहां जाना था, जो हम लोगों की वजह से नहीं गए, मेरे लिए समझ पाना मुश्किल था. पर दिमाग में विचित्र घर्र-घर्र के साथ चक्की तो चल ही रही थी.
बाद में त्यागी जी ने बताया कि बिहार के कोई आईएएस अधिकारी हैं. शायद केंद्र सरकार में सचिव या फिर ऐसे ही किसी बड़े पद पर हैं. उनकी बड़ी इच्छा है कि बाबा उनके घर आएं और कुछ दिन रहें. पर बाबा लगातार टालते आ रहे हैं. आज चौथा दिन हैं....उन्होंने बाबा को लाने के लिए गाड़ी और ड्राइवर भेजा था. पर बाबा का मन नहीं हुआ तो उन्होंने उसे वापस भेज दिया. कहा, "आज नहीं, फिर आएंगे...!"
सुनकर मुझे बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ. साथ ही एक अजीब सी खुशी भी मिली कि आखिर ऐसा एक बड़ा लेखक, बड़ा साहित्यकार हमारे बीच है तो, जो बड़े-बड़ों के रोब में नहीं आता, और ऊंचे पदों पर बैठे हुए बड़े अफसरों पर भी अपना ठसका जता सकता है, कि वह अपने प्रिय लेखकों से मिलने में व्यस्त है, इसलिए नहीं आ पाएगा.
सच पूछिए तो यह कोई गरूर नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के आम आदमी से जुड़े होने का गौरव है, जिसने बाबा को इतनी ऊंचाई पर ला बैठाया है कि उनसे मिलने और दो बातें करने के लिए बड़ी से बड़ी कुर्सियों पर बैठे लोग भी ललकते हैं.
इसीलिए बाबा के होने से सादतपुर एक तरह की साहित्य नगरी या साहित्यपुर ही बन गया था. बाबा केवल सादतपुर में रहते ही न थे, बल्कि वे पूरे सादतपुर में सबके अपने कवि, सबके अपने चहेते कवि बन चुके थे. छोटे-बड़े, स्त्री-पुरुष सबके. वे सादतपुर के हर घर-परिवार के सदस्य और सुख-दुख के सहचर थे. सबके परिवारी कवि भी. इसलिए किसी बड़े से बड़े आदमी के रोब में वे नहीं आते थे. जिसे मिलना हो, वह दौड़-दौड़कर सादतपुर आए और सिर झुकाए उस बीहड़ कवि के आगे, जो सादतपुर के बच्चों-बड़ों सबके अपने बाबा हैं.
बाबा जिस तरह सादतपुर के जर्रे-जर्रे में बसे हुए थे और हर घर के द्वार पर उनकी दस्तक पड़ती थी, उसे देखकर मैंने उन पर एक कविता लिखी थी. उसकी चंद सतरें यहां देने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा-

सादतपुर की इन गलियों में
हमने बाबा को देखा है!

सादतपुर के घर-आंगन में
सादतपुर की धूप-हवा में,
सादतपुर के मृदु पानी में
सादतपुर की गुड़धानी में,
सादतपुर के चूल्हे-चक्की
और उदास कुतिया कानी में-
हमने बाबा को देखा है!
सादतपुर की इन गलियों में
हमने बाबा को देखा है!
***

मन में बाबा नागार्जुन से जुड़ी इतनी स्मृतियां हैं कि कहने बैठा तो भावनाओं की एक नदी उमड़ती चली आएगी. और मैं शायद खुद भी चुप और अवाक सा रह जाऊंगा. पर मैं कोई अकेला नहीं. मेरी पीढ़ी के अनेक साहित्यकारों के मन में बाबा की ऐसी ही स्नेहिल स्मृतियां हैं. भीतर-बाहर से सराबोर कर देने वाली. और सच तो यह है कि जिन लेखकों को पढ़-पढ़कर हमारी पूरी पीढ़ी बड़ी हुई, उनमें बाबा नागार्जुन अन्यतम हैं.
यों देखा जाए तो बाबा नागार्जुन कई मायनों में शताब्दी पुरुष थे. इस लिहाज से भी कि उनके यहां कविताओं और उपन्यासों में जैसी अनोखी जुगलबंदी चलती है और वे इन दोनों ही धाराओं में एकदम अप्रतिम और शिखर पर हैं, वैसे उदाहरण हमारे यहां अधिक नहीं हैं.
यह दीगर बात है कि आलोचकों का ध्यान जितना उनकी कविताओं पर रहा, उतना बाबा के उपन्यासों पर नहीं गया. उनकी कविताएं ही हमेशा चर्चा के केंद्र में रहीं. इसमें शक नहीं कि एकदम बोलचाल की लय में लिखी गई उनकी कविताएं ऐसी हैं जो महज किताबों में ही बंद होकर नहीं रह गईं और लोगों के दिलों में गहरे उतरकर रोजमर्रा की जिंदगी का महाभारत बन गईं. हर शख्स को उनमें अपने दुख-दर्द ही नहीं, बहुत सी कही-अनकही लड़ाइयां भी नजर आती हैं और अपनी मार खाई जिंदगी का करुण क्रंदन सुनाई देता है.
जरा देखें बाबा की एक बड़ी मार्मिक कविता में रिक्शा चलाने वाले का दर्द और तकलीफ. एक गरीब आदमी की अनकही व्यथा को वही समझ सकता है, जो हवा-हवाई नहीं, आम जन का अपना कवि हो. ऐसे ही कवि की निगाह रिक्शा चलाने वाले के खुरदरे और फटी बिवाइयों वाले पैरों पर जा सकती है. ये गुट्ठल पैर किस तरह रबड़ विहीन ठूंठ पैडलों को आगे बढ़ा रहे हैं, यह पूरा चित्र बाबा नागार्जुन की कविता में उतर आया है-

खुरदरे पैर
खुब गए
दूधिया निगाहों में
फटी बिवाइयों वाले खुरदरे पैर

धंस गए
कुसुम कोमल मन में
गुट्ठल घट्टों वाले कुलिठ कठोर पैर

दे रहे गति
रबड़ विहीन ठूंठ पैडलों को
चला रहे थे

घंटों के हिसाब से भार ढोते और धरती का अनहद फैसला नाप रहे ये पैर देर तक कवि की आंखों में टकराते रहे. और फिर एक दिन बाबा के शब्दों में ढलकर साहित्य की चौहद्दी में शामिल हुए, तो लोगों ने जाना कि कविता केवल कोमल, सुकुमार बिंबों का ही नाम नहीं है, बल्कि कविता वह भी हो सकती है, जिसमें आम आदमी का दुख-दर्द बहा चला आता हो-
 
देर तक टकराए
उस दिन इन आंखों से वे पैर
भूल नहीं पाऊंगा फटी बिवाइयां
खुब गईं दूधिया निगाहों में
धंस गईं कुसुम कोमल मन में.
यह कविता भला बाबा नागार्जुन के सिवा और कौन लिख सकता था? भला और किसकी निगाहें गुट्ठल घट्टों वाले कुलिश कठोर पैरों तक भी जा सकती हैं?
इसी तरह ट्राम में यात्रा करते समय बाबा की निगाहें उन गरीब मजदूरों की ओर जाती हैं, जिन्हें गाड़ी में सवार देखकर हर कोई कथित सभ्य आदमी नाक-भौंह सिकाड़ने लगता है. बाबा मानो मध्यवर्गीय चरित्र की कलई खोलते हुए, वह सब कुछ लिख देते हैं, जिसे लिखने के लिए बड़ी हिम्मत चाहिए. बाबा की कविता मानो सीधे आंख में आंख गड़ाकर यह सवाल पूछती है-
घिन तो नहीं आती
पूरी स्पीड में है ट्राम
खाती है दचके पे दचका
सटता है बदन से बदन
पसीने से लथपथ
छूती है निगाहों को
कत्थई दांतों की मोटी मुसकान
बेतरतीब मूंछों की थिरकन
सच-सच बतलाओ
घिन तो नहीं आती है
जी तो नहीं कुढ़ता है
और यही बाबा जब प्यार औऱ भावुकता की तरंग पर सवार हों, तो उनकी कल्पना का जादू भला कैसा कमाल दिखाता है, यह उनकी कविता 'चंदू, मैंने सपना देखा' पढ़कर जाना जा सकता है. अपने साथी चंदू को याद करते हुए उन्हें सपना आता है, और उस सपने में भला क्या-क्या कमाल नहीं होता-
चंदू मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हरनौटा
चंदू मैंने सपना देखा अमुआ से हूं पटना लौटा
चंदू मैंने सपना देखा तुम्हें खोजते बद्री बाबू
चंदू मैंने सपना देखा खेल-कूद में हो बेकाबू

चंदू मैंने सपना देखा कल-परसों ही छूट रहे हो
चंदू मैंने सपना देखा, खूब पतंगें लूट रहे हो
चंदू मैंने सपना देखा लाए हो तुम नया कलैंडर
चंदू मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूं बाहर
चंदू मैंने सपना देखा अमुआ से पटना आए हो
चंदू मैंने सपना देखा मेरे लिए शहद लाए हो

चंदू मैंने सपना देखा फैल गया है सुयश तुम्हारा
चंदू मैंने सपना देखा तुम्हें जानता भारत सारा
चंदू मैंने सपना देखा तुम तो बहुत बड़े डाक्टर हो
चंदू मैंने सपना देखा अपनी ड्यूटी में तत्पर हो
ऐसे ही एक बच्चे की दंतुरित मुसकान किस तरह उनके भीतर गड़ जाती है, और ऐसी कविता लिखवा लेती है, जिसमें वात्सल्य बह रहा हो, यह देखना हो तो 'यह दंतुरित मुसकान' कविता की ये पंक्तियां पढ़नी चाहिए-

तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान
मृतक में डाल देगी जान
धूलि-धूसर तुम्हारे ये गात
छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात

प्रेम पर कविता लिखनी हो, तो बाबा पुराने सारे बिंब और उपमानों को छोड़कर, आम जिंदगी की भागदौड़ के बीच से ही उठाया हुए एक ऐसा विरल और खुरदरा चित्र हमारे आगे उपस्थित कर कर देते हैं कि हम अवाक रह जाते हैं, क्या ऐसी भी हो सकती है प्रेम कविता?
पर सच पूछिए तो आज की जिंदगी की सच्ची प्रेम कविता तो यही है, जिसे लिखने का बड़ा बेढब तरीका अपनाया बाबा नागार्जुन ने. और हम महसूस करते हैं कि इससे सादा और जीवंत प्रेम कविता तो पहले कभी लिखी ही नहीं गई. पढ़िए जरा कविता की ये जादुई पंक्तियां-

तन गई रीढ़
झुकी पीठ को मिला स्पर्श
तन गई रीढ़

महसूस हुई कंधों को
पीछे से
किसी नाक की सहज उष्ण निराकुल साँसें
तन गई रीढ़

इसी तरह प्रेम का एक छोटा सा बिंब बाबा की एक और कविता में आया है. पर जितनी बार इसे पढ़ता हूं, रूप की माधुरी से विभोर हो जाता हूं. सच्चा प्रेम और सच्चा सौंदर्य क्या होता है, अगर जानना हो, तो इससे सादा और अच्छी पंक्तियाँ शायद आपको कहीं न मिलेंगी—

यह तुम थीं
कर गई चाक
तिमिर का सीना
जोत की फांक
यह तुम थीं

प्रेम की दीप्ति, सौंदर्य की दीप्ति और उसका मन पर पड़ने वाला गहरा-गहरा सा प्रभाव, एक सच्चा सम्मोहन-सब कुछ इन चंद पंक्तियों में सामने आ जाता है. जैसे इन पंक्तियों को पढ़ते हुए दिल में उजाला हो रहा हो.
शायद इसीलिए बाबा नागार्जुन ऐसे कवि थे जो बगैर महाकाव्य लिखे भी महाकाव्यात्मक कवि थे. प्रेम, सौंदर्य, करुणा, शृंगार, व्यंग्य और यहां तक कि भदेस, इन सारे रसों, भावों और द़श्यावलियों को सहेजती उनकी स्वच्छंद राह चलती कविताएं मिलकर जैसे बीसवीं सदी का एक अंतहीन महाकाव्य रचती हों. हालाँकि बाबा की इन जनधर्मी कविताओं की विस्तृत व्याख्या या भाष्य जानना हो और खुद नागार्जुन के शब्दों में ही जानना हो, तो मैं कहूंगा, हमें उनके उपन्यास पढ़ने चाहिए जिनमें एक अजब तरह का काठिन्य और जिंदगी का रस एक साथ बहता है.
यों सही मायनों में बाबा नागार्जुन अपने उपन्यासों में प्रेमचंद की परंपरा को ही आगे बढ़ा रहे हैं और उनमें आम जिंदगी के उन पात्रों का प्रवेश कराते हैं जो शायद प्रेमचंद की सजग दृष्टि से भी छूट गए हैं. प्रेमचंद ने गांव और गांव के आदमी को जिस तरह अपने उपन्यासों की केंद्रीय भूमि में लाकर भारत का एक नया भाष्य प्रस्तुत किया, वह अपने आप में एक नया संवेदनात्मक इतिहास लिखने की मानिंद है. फिर तो गांवों की पृष्ठभूमि पर एक से एक अच्छे और मानीखेज उपन्यास लिखे गए, जिनमें अपनी जगह ठेठ देशी भारत का ठाठ था. वह हिंदुस्तान जो तमाम पश्चिममुखी अंग्रेजी पढ़ाकुओं के नए कर्मकांड से बेफिक्र, अपनी फक्कड़ी और स्वाभिमान की राह पर बढ़ रहा था. और जिसे अपने ठेठ लहजे और बोली पर शर्म नहीं आती थी.
हालांकि आगे चलकर गांव और गांव की आंचलिक पृष्ठभूमि पर लिखे गए उपन्यासों में एक गड़बड़ भी हुई. कहीं-कहीं रसमयता के नाम पर रसीलापन इतना बढ़ा कि लगा असली आदमी ओट हो गया है और गांव और गांव के आदमी के नाम पर कोई और ही लीला रची जा रही है. पर नागार्जुन के 'बलचनमा', 'वरुण के बेटे', 'बाबा बटेसरनाथ', 'रतिनाथ की चाची' और 'कुंभीपाक' सरीखे उपन्यास गवाह हैं कि वे इस मामले में चूकने और भटकने वाले लेखकों में नहीं हैं.
बाबा नागार्जुन में बेशक भावना का रस है, पर इसके साथ ही एक तीखी और अचूक व्यंग्य दृष्टि भी, जो अकसर धोखा नहीं खाती और समूचे परिद़श्य में उनकी आंख अपने समय के आदमी को टोहती है. इस लिहाज से नागार्जुन के उपन्यासों पर नजर डालें तो लगता है कि वे प्रेमचंद के खरे वारिस हैं जिन्होंने जनजीवन की तमाम अछूती शक्लों और जीवंत पात्रों को अपने उपन्यासों में लाकर, जिंदगी की परिभाषा को बड़ा और विस्तृत किया.
कहना न होगा कि देश के तमाम-तमाम आम लोगों से एकाकार होकर सतासी बरस का लंबा, संघर्षपूर्ण जीवन जीकर गए बाबा नागार्जुन ने खुद अपनी जिंदगी में तमाम तकलीफें और अकथनीय कष्ट झेले. पर इन कष्टों ने उन्हें हराया नहीं और उनके चेहरे पर हमेशा रहने वाली बेफिक्र हंसी और बेधड़क जीवन-शैली पर उनकी स्याह छाया नहीं पड़ी. मानो उन्हें कष्टों से हारना नहीं, अविजित रहना ही पसंद हो. यों अपनी कर्मठता और कठिन तप से उन्होंने साबित कर दिया कि जनता के सीधे-सादे दुखों और संघर्षों से जुड़ा कवि ही आज का 'महाकवि' हो सकता है. और यही बात बाबा के गद्य या उपन्यासकार रूप में भी है, जिसे आज शायद अधिक गहराई से समझने की जरूरत है.
हर वक्त जिंदगी और जिंदादिली से लबालब नजर आने वाले ऐसे जन-जन के प्यारे और दुलारे बाबा का मुझे इतना प्रेम, इतना सान्निध्य मिला, और उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा, बहुत कुछ पाया, इससे बड़ा सौभाग्य मेरे जीवन में भला और क्या होगा? यहां तक कि उनके भीतर से हर पल बह रहे प्रेम के सोते में मैंने जी भरकर स्नान किया. उनसे जीवन भर लिखने और एक सच्चा लेखक होने का आशीर्वाद पाया. साथ ही लिखने की सही दिशा और सही रास्ता भी मिला.
आज भी मेरी स्मृतियों में बाबा नागार्जुन की तमाम छवियां डूबती-उतराती हैं, और मैं मन ही मन उन्हें प्रणाम कर लेता हूं. बाबा सरीखा होना तो मुश्किल है, पर एक सच्चा लेखक कैसा हो, एक आदर्श लेखक कैसा हो, यह प्रश्न मेरे भीतर उठता है तो बाबा का मुसकराता हुआ, खुरदरा गंवई चेहरा मेरे आगे आ जाता है, और मुझे लगता है, पूरे हिंदुस्तानी जनमानस का दुख-दर्द वहां लिखा हुआ है. भला इससे अधिक मौजूं और आदर्श लेखक की छवि और क्या हो सकती है!    
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#लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं. संपर्कः प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008. ईमेल- prakashmanu333@gmail.com

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