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80वें जन्‍मदिन पर: सांसारिकता का गान और कविता से अभिसार करते अशोक वाजपेयी

कविता में गए छह दशक से स्‍थापित और सक्रिय अशोक वाजपेयी 80 वर्ष के हो गए. उन्होंने कविता, कला, साहित्‍य, संस्कृति के क्षेत्र में विमर्श, विवाद, संवाद, प्रतिवाद का एक सुदीर्घ जीवन जीया है. उनकी कविताओं में कोमलता और सांसारिकता का गान भी है कवि का उत्‍तरदायित्‍व भी.

कला, कविता, संस्कृति मर्मज्ञ अशोक वाजपेयी, एक छवि कला, कविता, संस्कृति मर्मज्ञ अशोक वाजपेयी, एक छवि

अशोक वाजपेयी के विपुल काव्य संसार से गुज़रते हुए कभी-कभी अचरज होता है कि हमारे समय में एक ऐसा व्यक्ति है जो कविता भी करता है, कविता की राजनीति भी, कविता और कवियों का हितैषी है तथा अपनी कवि परंपरा से प्रतिकृत भी. यह शख्स प्रशासनिक सेवा में होता है तो प्रशासनिक और मानवीय गौरव की कसौटियों पर खरा उतरता है. कविता और कलाओं को एक मुक्त मंच मिले इसके लिए भारत भवन जैसे संस्थान की परिकल्पना को मूर्त रूप देता है, जो कविता करता है तो जीवन के किसी भी पहलू को अदेखा नहीं करता. जिसका अपना संघर्ष चाहे नगण्य हो पर नगण्य की परवाह से मुँह नहीं मोड़ता. भाषा की उत्सवता उसकी कविता में साफ दीख पड़ती है, जिसके बौद्धिक चिंतन में जीवन को बेहतर और जीने योग्य बनाने की तमाम कलात्मक सरणियां शामिल हों, जो इस देश की बौद्धिक इकाइयों के प्रति समादर और सहचिंतन से भरा हुआ दिखता हो, ऐसा शख्स अशोक वाजपेयी के सिवा कोई दूसरा नहीं हो सकता.  

अशोक वाजपेयी की कविता यात्रा सुदीर्घ और बहुवस्तुस्पर्शी है. वह युवतर उम्र मे प्रकाशित संग्रह 'शहर अब भी संभावना है' से लेकर 'कम से कम' तक कई जिल्दों और लगभग हजार पन्नों तक फैली है. वह उनकी युवतर कवि चेतना, प्रेम, आसक्ति और अकेलेपन से लेकर अवसान, पारिवारिकता, कलाप्रियता से होती हुई सांप्रदायिक संकीर्णता और जनविरोधी होती जाती व्यवस्था को लेकर एक कवि के सुदृढ़ आलोचन पर केंद्रित है. अक्सर बहुवचनीयता के पक्ष में बोलने और लिखने वाले अशोक वाजपेयी पर साहित्य में कलावाद को प्रश्रय देने के आरोप लगते रहे हैं तथा उनकी इस कलाप्रियता को कलावाद को खाद पानी देने के अर्थ में लांक्षित भी किया जाता रहा है. उनके अभिनिंदन में लंबे अरसे तक नामवर सिंह प्रभृति वामपंथी आलोचक लगे रहे हैं तथा अशोक वाजपेयी भी वामपंथियों को एक अरसे तक ललकारते रहे हैं. लेकिन यह दुनिया वास्तव में इतनी गोल है कि अंतत: अशोक वाजपेयी जैसे कलावादी कवि का हाथ मार्क्सवादियों को भी थामना पड़ता है. हाल के असहिष्णुतावादी आंदोलन में अशोक वाजपेयी के नेतृत्व में वामपंथियों का लामबंद होना यही बताता है. यह और बात है कि वामपंथियों ने अशोक वाजपेयी के कवि कर्म को कभी उत्सुकता से ग्रहण नहीं किया. लेकिन इसके बावजूद अशोक वाजपेयी एक जागरूक कवि का परिचय देते हुए कविता की सरणि पर अग्रसर रहे हैं. सेतु द्वारा प्रकाशित अशोक वाजपेयी कविता समग्र इसका प्रमाण है.

हम यदि 'कम से कम' के कविता संसार से उनकी सुदीर्घ कविता यात्रा का पूर्वावलोकन करें तो यह कहना लाजिमी होगा कि जहां उनकी निज की सांसारिकता कविता में अनेकविध व्यंजित होती रही है जिसका कि सदैव कविता में अपना मूल्य और स्पेस रहा है, वह हमारे आस पास के परिदृश्य, विचार, चिंतन और परिवेश और राजनीति से कभी विमुख नहीं रही है. इसलिए नामवर सिंह ने जिस देह और गेह की कविता का लेबल उन पर कभी चस्पा किया था वह न केवल अशोक वाजपेयी के कवि वैशिष्ट्य का एक मजबूत गुणसूत्र सिद्ध हुआ बल्कि यह भी कि उनकी कविता के गार्हस्थ्‍य में जीवन की तमाम गतिविधियां और कार्यकलापों का सूक्ष्म ब्यौरा उद्धाटित हुआ है. जहां तक पहले संग्रह का ही सवाल है, वह काव्येतिहास में अशोक वाजपेयी का कीर्तिस्तंभ निर्मित करता है. उस नरम अवस्था तक मॉं को खो चुके अशोक के भीतर शोक के इसी पर्यावरण से गुजरते हुए कवि का उन्मेष होता है. कहना न होगा कि किसी भी कवि में प्रेम की व्यंजना को उसके कवित्व को परखने में कभी कमतर नहीं ऑकना चाहिए. यदि ऐसा होता तो हमारे समय में कुमार संभव के रतिचित्रण कालिदास की कीर्ति में कुछ बट्टा लगाने वाले सिद्ध होते. पर यह एक महाकवि की सफलता थी कि राजन्य कीर्तिगाथा- रघुवंश, विक्रमोर्वशीय लिखने वाले कालिदास को अभिज्ञान शाकुंतल और मेघदूत में संयोग और वियोग श्रृंगार को साधने वाले विरल कवि के रूप में माना गया तो गार्हस्‍थ्‍य के कामोद्दीप्त संसार को कुमार संभव के माध्यम से उद्घाटित करने का सुअवसर मिला.

'शहर अब भी संभावना है' में जो ताजगी अशोक वाजपेयी के यहां दिखती है वह उन्हीं के कई संग्रहों में मुश्किल से दिखती है. यद्यपि 'शहर अब भी संभावना है' से लगभग 18 साल बाद 'एक पतंग अनन्त में' संग्रह आया और फिर थोड़े कम कम अंतराल पर दूसरे संग्रह 'अगर इतने से', 'तत्पुरुष' और 'कहीं नहीं वहीं' आदि संग्रह आए. परन्तु 1984 तक वे अपनी युवतर सीमा से बहुत आगे आ चुके थे. 'शहर अब भी संभावना है' के बाद यह अशोक वाजपेयी की कविता में एक मोड़ था जब उनकी कविता से मासूमियत विदा हो चुकी थी और एक गहरी जीवन-संवदेना के प्रांगण में लौट रहे थे.

शहर अब भी संभावना है--उनकी कवि-संभावना का प्रवेश द्वार था. वे कविता में अपनी भाषा गढ़ रहे थे. उस मुहावरे को पाने की कोशिश में थे जिससे उनकी कविता कविता के अंबार में दूर से पहचानी जा सके. हालांकि लंबी काव्यसाधना के बाद भी वे अपने वक्तव्यों  में अपनी कविता को लेकर कुछ संशयी नजर आते रहे हैं जो कि उनके विनयी भाव का परिचायक हैं पर अपनी इसी भाषा को लेकर वे बाद में अपनी कविता में पहचाने गए. हालांकि न तो उनके भाषाई संस्कारों में संस्कृतनिष्ठता है न हिंदुस्तानी का तथाकथित दबाव किन्तु इन दोनों भाषाई संस्कारों से अलग उनकी कविता भारतीय भाषा संस्कारों की उपज लगती है. उनकी अध्यवसायिता ने उन्हें अपने पूर्वजों से सीखने की ललक अंत तक बनाए रखी. कविता को जटिल न बनाते हुए बोलचाल की शैली में उपनिबद्ध करते हुए ठीक उस जगह पर छूना जहां लगे कि हां यह कविता हुई- यह सलीका अशोक वाजपेयी ने पहले ही संग्रह में पा लिया था जब वे लिख रहे थे-
खिड़की से एक पीला गुलाब रह रह कर टकराता रहा
वहीं वह झुकी खड़ी रोती रही
मैं सुनता रहा--
कोई अपनी उंगलियों से
कॉंपता काला आकाश
मेरी ओर खींचता रहा
खींचता रहा (अली अकबर खॉं का सरोदवादन:1)
कहां सरोदवादन और कहां कवि की समव्ययथी संवेदना जैसे सरोद के तारों से टकराती हुई --एक समानांतर प्रतीति में डुबोती हुई. कुछ बहुत मार्मिक कविताएं मॉं पर होते हुए भी इस संग्रह में एक वासंती आभा थी जिसमें संगीत और कविता की लय दोनों घुली मिली थी. जैसे प्रतीक्षा की गोधूलि में ये सारी कविताएं लिखी गयी हों --
हम हो एक दूसरे से कविताओं में बोलते थे
आवेश में कस कर चूमते थे
देर तक चांद की प्रतीक्षा करते थे
अंधेरे में पेड़ पहचानते थे
सड़कों के मोड़ भूल जाते थे(प्यार के बाद)

कवि का सौंदर्यबोध आलंबन और उद्दीपन से टकरा कर बार-बार जैसे अपनी संवेदना में लौट आता है, धूप में चमकती एक पत्ती को निहारते हुए. पत्ती तो धूपतपा है- नवोदित आभा में जिसका आगम हुआ है. पत्ती या कोंपल सृष्टि या सृजन के पर्याय हैं. तभी तो यह पत्ती भांति-भांति ढंग से अशोक वाजपेयी की कविताओं में आती है. प्राय: ऐसे उपादान के लिए वे कुदरत के संग ही गलबहियां करते हैं तभी तो कह पाते हैं:
शब्द से भी जागती है देह
जैसे एक पत्ती के आघात से होता है सबेरा.
अमूर्तन का इतना ध्वन्यात्मक विन्यास शायद हिंदी कविता में कम मिले. पत्ती के आघात से होता है सबेरा . कितनी कोमल और ऋजु किन्तु कितनी असंभव कल्पना है यह. किन्तु कवि तो कल्पनाओं के उदात्त वैभव में ही जीता जागता है. बल्कि जीता मरता हैं- कहना चाहिए तभी तो दुष्यंत ने इस कौल को कुछ इस तरह अपने लिए तय किया था: जिएं तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले/ मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए. यह संग्रह कुदरत की इन्ही छायाभ गतिविधियों व रंगतों से विन्यस्त है. वर्षान्त, वसंत, सुबह, शाम सूर्यास्त और सॉझ के बड़े स्नेहिल बिम्ब यहां हैं, जो कविता का एक पूरा पर्यावरण रचते हैं. ये वे दिन थे जब वे 'पहला चुंबन' में लिख रहे थे:
एक जीवित पत्थर की दो पत्तियां
रक्तभ, उत्सुक
कांप कर जुड़ गयीं
मैंने देखा: मैं फूल खिला सकता हूँ.'  इस संग्रह की कविताएं प्रतीक्षा और अभिसार के कोमल बिम्ब भी रचती हैं और मॉं पर रची मर्म भेदी कविताओं से हमें समव्यथी भी बनाती हैं. यह कन्ट्रैस्ट ही उनके इस संग्रह को मूल्यवान बनाता है.

आसन्नप्रसवा मॉं के लिए तीन गीत- सचमुच आधुनिक हिंदी कविता के लिए वरदान की तरह हैं. मॉं पर तो इधर कविताओं का अंबार मिलेगा पर आसन्‍नप्रसवा मां पर सिर्फ अशोक वाजपेयी ने लिखा है. मॉं की सुंदरता का ऐसा बखान कविता में विरल है. जब वे लिखते हैं,
तुम्हारे होठों पर नयी बोली की पहली चुप्पी है
और तुम्हारी उंगलियों के पास कुछ नये स्पर्श हैं' तो लगता है यह सृष्टि के आगमन की आहट के क्षण हैं. मॉं पर लिखी एक दूसरी कविता में जब वे कहते हैं, 'भोर होने के बहुत पहले तुम्हा‍री दैनिक भोर होती है' तो जैसे वे इस महादेश की सारी स्त्रियों की दिनचर्या लिख रहे होते हैं. मां के मोह और प्यार में डूबे हुए इस कवि को मृत्यु के पश्चात भी मां अपने उसी जाने पहचाने वात्ससल्य के साथ दुलार करती नजर आती है :
वहां मृत्यु के चिकने चुपड़े भवन में
क्या  वह एक नीरव स्त्री  
गाती होगी काया की अमरता का गान
या वहां भी चुप बैठी होगी
गरम दूध से भरा गिलास लिए? (अमर मेरी काया; एक पंतग अनंत में)

प्रेम कविताओं के संग्रह तो आते ही रहते हैं. हर कवि का प्राय: कविता की ज़मीन पर पहला चरण प्रेम की पुलक के साथ ही पड़ता है पर उसे उसी पुनर्नवता के साथ दर्ज कर पाना भाषा की परतदार अर्थमयता को छूना होता है जो हर एक के वश का नहीं. आखिर वे 'संभावना' कविता में इस प्रेम का इज़हार कर ही देते हैं:
'शहर अब भी संभावना है/
जाड़ों की एक दोपहर
एक व्यस्त सड़क पर
श्वेता के मित्र-हाथों को छूकर मैंने जाना...' यह प्रेम के इज़हार की एक नई इबारत थी जो छायावादोत्तर कवियों में पहली बार अशोक वाजपेयी के यहां दीख पड़ी थी. फिर तो वे काफी दिनों तक इसी प्रेम में डूबते उतराते रहे. प्रेम की अनेकविध सांसारिक व्यंजनाओं में उनकी कविता खोई रही. वे प्रेम के अनंत आकाश में चंद्रोदय की एक नई परिभाषा गढ़ रहे थे:
''मैं सब कुछ स्पर्श के बिना भी छू सकता हूँ
उसके बिना जाने कि इस तरह भी होता है चंद्रोदय.'' एक पतंग अनंत में- प्यार की अधीर पुकार में खोया हुआ संग्रह है जहां पुकार, कामना, प्रार्थना और समर्पण का मिला जुला ऐश्वर्य झरता है.

जिस मां की बाहें ऋतुओं की तरह युवा लगती हैं, जो अलसायी धूपतपा मुख लिए एक नए झरने का कलरव सुनती है उसी मां पर ''मौत की ट्रेन में दिदिया'' कविता लिखते हुए कवि का हृदय कितना विषण्ण हो उठा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है. मातृविहीन नरेश मेहता अपने संस्‍मरणों में मॉं के बारे में बताते हुए कितनी विषण्णता से भर उठते थे. कहते थे उन्होंने जब से आंखें खोलीं अपने ऑंगन में कभी साड़ियां सूखती नहीं देखीं और तीन-तीन पत्नियों से उत्पन्न पुत्र के प्रति पिता में ऐसा निरासक्त भाव था कि बनारस पढ़ने भेजते समय कुछ ऐसे पेश आए जैसे जाओ यह पृथ्वी तुम्हें सौंप दी, इस पर यथेष्ट विचरण करो, ज्ञानार्जन करो, जो चाहे. मॉं बचपन में ही अपने छोटे बच्चों को छोड़ कर अनंत की यात्रा पर निकल गयी. मुझे यहीं मॉं पर लिखी राजस्थान के कवि प्रभात की कविता ध्यान में आती है जो अपनी प्रश्नाकुलता में कचोटती है. मॉं की याद में यह कवि भी सजल और करुण हो उठता है. अपनी कविता में वह पूछता है,
''जिन्हें मॉं की याद नहीं आती,
उन्हें मॉं की जगह किसकी याद आती है? और उसके न होने की पीड़ा को शब्द देते हुए कहता है:
'तुम नहीं थी इसलिए मेरा बचपन
दूसरों के घरों के चूल्हे‍,
आंगनों को ताकने झॉंकने में ही गुजरा.' अशोक वाजपेयी एक तरफ ऐसी द्रवित करने वाली कविताएं अपने युवा दिनों में ही लिख चुके थे दूसरी तरफ वे अपनी कविताओं में कुछ दार्शनिक किस्म की प्रत्यभिज्ञा और प्रश्नाकुलता के साथ भी दीख पड़ते थे. एक पतंग अनंत में, अगर इतने से व तत्पुरुष में ऐसी कविताएं हैं जो उदात्त चिंतन की ऊर्ध्वमुखता की ओर ले जाती प्रतीत होती हैं. पर जैसा कि लक्ष्य है अशोक जी के भीतर सांसारिकता का उज्वल गान भी है और अवसान, लोप और मरणधर्मा संसार में वैराग्य उपजाती कविताएं भी. इस पृथ्वी पर कितनी ही पृथ्वियों से गुजरते हुए वे इस नक्षत्र के वैशिष्ट्य को कई कविताओं में उकेरते हैं. तोतों से बची पृथ्वी, वैसी पृथ्वी न हो पाने का दुख, इस पृथ्वी को, पृथ्वी के रहस्य, पृथ्वी लिखती है पृथ्वी को, असंभव है पृथ्वी- जैसी कविताएं पृथ्वी के साथ उनके सहचिंतन का परिणाम हैं. वे पृथ्वी की पार्थिवता को जैसे लक्ष्य करते हुए कहते हैं, 'पृथ्वी लिखती है पृथ्वी को' की तरह ही कहते हैं: देह को प्रगट करती है देह ही या देह की पुकार सुनती है देह ही. ये वे दिन से जब वे दृश्यातीत स्पर्शातीत व्यंजनाओं में खोए हुए थे. उन्हें विश्वास हो चला था कि आत्मा भी शरीर के स्वप्न देखती है. वे पृथ्वी पर प्रेम के लिए जगह बना रहे थे- पुलक और लज्जारुण आभा से भरी. मैंने उसे छुआ, क्या उसने वही कहा जो उसके शरीर ने, आओ जैसे अंधेरा आता है अंधेरे के पास, जैसे जल मिलता है जल से/ जैसे रोशनी घुलती है रोशनी में- जैसी पदावलियां अंतत: जिस भोग और ऐश्वर्य के आलोक में खुलती हैं वहां इस सांसारिक कवि का यह स्वीकार गूँजता है :

मै बिछाता हूँ धरती का हरा बिछौना
मै खींचता हूँ आकाश की नीली चादर
मैं सूर्य और चंद्रमा के दो तकिये सम्हायलता हूँ
मै घास के कपड़े हटाता हूँ
मैं तुमसे केलि करता हूँ  (अगर इतने से. सेतु समग्र 1, पृष्ठ 169)

कविता के भव्य भुवन में अशोक वाजपेयी तब वास्तव में सांसारिकता का गान लिख रहे थे. देह और गेह के यथार्थवादी परिप्रेक्ष्य में खोए हुए किन्तु गांधी की तरह आत्मसत्य को न छुपाते हुए. कविता में निज के भाव को अगोपन रहने देते हुए तथा कहीं कहीं कविता का शीलभंग करते हुए भी. किन्तु जहां साठोत्तर दौर की कविता में एक तरफ व्यववस्था से मोहभंग का वातावरण रहा है, जहां राजकमल चौधरी आक्रोश की मशाल जला चुके थे, धूमिल तेजाबी शब्दावली से एक तरफ अकविता का छ्द्म जाल तोड़ रहे थे वहीं कविता को एक नाराज आदमी के वक्तव्य के रूप में भी प्रस्तुत कर रहे थे. इस दृष्टि से देखें तो अशोक वाजपेयी की कविता यथार्थ से मुँह फेरे नजर आती है किन्तु् जैसा कि ऊपर कह आया हूँ एक कवि के रूप में अशोक वाजपेयी को अपनी वैयक्तिकता में डूबने का पूरा अधिकार है. आखिर काम और प्रेम पुरुषार्थ चतुष्टय का अंगीभूत ही है. तब बसंत के मिजाज में कवि का अपना मिजाज बोलता हुआ दिखता है --वहीं है वसंत/ जहां चूम कर टॉंक गयी वह/ पुष्प एक अनंत. यहीं मुझे एक अलक्षित कवि का उपमेय याद आता है: तुम जहां हो वहीं है शरदपूर्णिमा. कविता में वे अभिसार करने का अवसर कभी नहीं चूकते (वह कैसे कहेगी--हॉं! हॉं कहेंगे उसके अनुरक्त नेत्र/उसके उदग्र उत्सुक कुचाग्र/ उसकी देह की चकित धूप/उसके आर्द्र अधर कहेंगे--हॉं!) बल्कि मुझे तो लगता है वे शब्दों से भी अभिसार करते हैं, सलीके से उनके आने की बाट जोहते हैं.  

कविता से यह अभिसार सच कहें तो कविता में सांसारिकता का गान है ---अशोक वाजपेयी इसे प्रारंभ से ही रचते सिरजते और सहेजते आए हैं तथा प्रतिरोध और प्रतिपक्ष की आवाज बनते हुए भी वे अपनी कोमलता पर कोई आघात नहीं पड़ने देते.

अशोक वाजपेयी को उनके अस्‍सीवें जन्‍मदिन पर इन शब्‍दों के साथ साहित्‍य आजतक की बधाई.
 
# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक, कवि एवं भाषाविद हैं. शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित व अन्वय एवं अन्विति सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं.  हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार, आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हैं.  
संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059, मेलः dromnishchal@gmail.com
मेल dromnishchal@gmail.com

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