आज सविता सिंह का जन्मदिन है. वह हमारे दौर की महत्त्वपूर्ण कवयित्री हैं. 'साहित्य आजतक' के पाठकों और उनके प्रशंसकों के लिए स्त्री मन की इस कुशल चितेरी की 5 कविताएं, दो नई और तीन पुरानीः
1. अभी कोई बारिश नहीं हो रही है
यहीं ठहरी हुई हूं कुछ देर
ज्यों एक सांस व्यर्थ-सी थमी हुई
यहीं तुम्हें आना होगा अपने पंख समेट कर
फिर से उड़ जाने की मंशा को स्थगित करके
इस बार यहीं मिलन होगा हमारा
मैं नहीं जाना चाहती
उस अनजान नदी के किनारे
जहां तुम बुलाते हो बिना अता-पता दिए
चांदनी रात है
तुम्हारे आंगन का कुदाल चमक रहा है अब भी
मधुमक्खियों का छत्ता शांत लटका हुआ है
छज्जे के कोने में
तुम्हारी चिरपरिचित प्रेमिका —
मृत्यु
नीले वस्त्र पहन साथ ही बैठी है
मैं उसे भगाने वाली हूं
अपने पांव उधार देकर
इस समय रात है—
सूखी रात
चंपा खिली हुई है
नीबू के फूल अपनी सुगंध से इस जगह को भर चुके हैं
हमारी दो बेटियां फिर से जन्म ले रही हैं
तुम आओ
अभी कोई बारिश नहीं हो रही है
***
2. चीज़ें खोती रहती हैं
वे चीज़ें जिन्हें हम जानते थे
अपनी देहों की तरह
वासना की तरह
वे चीज़ें जो ठोस थीं
हमारी औलादों की इच्छाओं की तरह
उनकी कामनाओं से संयत संरचित सृष्टि की तरह
उस क्रांति की तरह
जिसके लिए जीवन की धार मोड़ दी गई थी
सब कहां गईं
कल ही सोच रही थी घर के पीछे वाली खिड़की के सामने
जो कंटीली गुलाब की लतर
अपने गुच्छेदार फूलों के साथ
हवा में हौले-हौले झूमा करती थी
कब सूख गई
कहां गईं वे तितलियां जो इन पर
प्यार चुआती थीं
वह महक जो खींच लाती थी
न जाने कितने दूसरे कीटों को
किसी ने एक दिन कहा था
जब हम साथ चाय खरीदने गए थे
ऑरेंज फ्लावरी पीको
और वह नहीं मिल रही थी
फिर मिल भी गई थी
कि चीज़ें खोती रहती हैं
उनके ठोस या तरल होने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता
एक ख़ालीपन ख़ालीपन को भरता रहता है
एक ख़ला ख़ुद को बचाती रहती है
***
3. स्वप्न
किसकी नींद स्वप्न किसका
एक दिन छूट जाने वाली चीज़ें हैं
नदी पहाड़ प्रिय का साथ
प्रेम, हर तरह की याद
स्वप्न और उन्माद
और यह जीवन भी जैसे अपना ही हाथ उलटा पड़ा हुआ
किसी पत्थर के नीचे
इसे सीधा करते रहने का यत्न ही जैसे सारा जीवन
तड़पना पत्थर की आत्मीयता के लिए ज्यूँ सदा
हल्के पाँव ही चलना श्रेयस्कर है इस धरती पर तभी
एक नींद की तरह है सब कुछ
नींद उचटी कि गायब हुआ
स्वप्न-सा चलता यह यथार्थ
वैसे यह जानना कितना दिलचस्प होगा
किसकी नींद है यह
जिसका स्वप्न है यह संसार
***
4. मैं किसकी औरत हूँ
मैं किसकी औरत हूँ
कौन है मेरा परमेश्वर
किसके पांव दबाती हूँ
किसका दिया खाती हूँ
किसकी मार सहती हूँ
ऐसे ही थे सवाल उसके
बैठी थी जो मेरे सामने वाली सीट पर रेलगाड़ी में
मेरे साथ सफ़र करती
उम्र होगी कोई सत्तर-पचहत्तर साल
आँखें धँस गई थीं उसकी
माँस शरीर से झूल रहा था
चेहरे पर थे दुख के पठार
थीं अनेक फटकारों की खाइयाँ
सोचकर बहुत मैंने कहा उससे
'मैं किसी की और नहीं हूँ
अपना खाती हूँ
जब जी चाहता है तब खाती हूँ
मैं किसी की मार नहीं सहती
मेरा कोई परमेश्वर नहीं'
उसकी आँखों में भर आई एक असहज ख़ामोशी
आह ! कैसे कटेगा इस औरत का जीवन !
संशय में पड़ गई वह
समझते हुए सब कुछ
मैंने उसकी आँखों को अकेलेपन के गर्व से भरना चाहा
फिर हँसकर कहा - मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन है
मेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रा
लेकिन कुछ घटित हुआ जिसे तुम नहीं जानतीं -
हम सब जानते हैं अब
कि कोई किसी का नहीं होता
सब अपने होते हैं
अपने आप में लथपथ, अपने होने के हक़ से लकदक
यात्रा लेकिन यहीं समाप्त नहीं हुई है
अभी पार करनी है कई और खाइयाँ फटकारों की
दुख के एक दो और समुद्र
पठार यातनाओं के अभी और दो चार
जब आख़िर आएगी वह औरत
जिसे देख तुम और भी विस्मित होओगी
भयभीत भी शायद
रोओगी उसके जीवन के लिए फिर हो सशंकित
कैसे कटेगा इस औरत का जीवन फिर से कहोगी तुम
लेकिन वह हँसेगी मेरी ही तरह
फिर कहेगी -
उन्मुक्त- हूँ देखो
और यह आसमान
समुद्र यह और उसकी लहरें
हवा यह
और इसमे बसी प्रकृति की गंध सब मेरी हैं
और मैं हूँ अपने पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूर
पूर्णतया अपनी।
***
5. चली जाती हूँ
चली जाती हूँ
आंधी सी उस हवा में ऐसे
जैसे जानती हूँ उसकी भीतरी अहिंसा
जानती हूँ वह आकर थमेगी मुझ में ही
भर देगी जाने कैसी-कैसी अतृप्तियों से फिर
अधीर होने पर सुला देगी
मेरे ही सपनों की बाँहों में आख़िर
चली जाती हूँ दुर्धर्ष उन घाटियों में भटकने
जहाँ कतई उम्मीद नहीं है उससे मिलने की
मेरी कल्पना ने जिसे चुना है
जाती हूँ लौटने हर बार नए सिरे से
उन्हीं अक्षरों के बीच
जिनसे मिलती-जुलती हूँ
मिलती-जुलती हैं जो कितनी उन बिम्बों से फिर
जिनके अर्थ छिपे रहते हैं
उजागर होकर भी
तभी तो समा जाती हूँ निःस्वर
समय के आईने में हर रात
जहाँ संचित है वह आलिंगन
या कि बिम्ब उसका
जिस में है वह
और उसकी उत्तप्त बाँहें?