हर उस बेटे के नाम
जिसे मां याद है
इतना ही नहीं उन्होंने मां की याद में एक संस्था बनाई, नाम रखा 'मां फ़ाउण्डेशन'. 'मां' ग़ज़ल संकलन की भूमिका में उन्होंने लिखा, 'इस किताब की बिक्री से हासिल की गई तमाम आमदनी 'मां फ़ाउण्डेशन' की ओर से जरूरतमंदों की इमदाद के लिए ख़र्च की जाएगी. वह इस संकलन के चलते पूरी दुनिया में मशहूर हुए. ढेरों सम्मान हासिल किया. मां को लेकर उनके शेरों की बानगीः
सुलाकर अपने बच्चों को यही मांएं समझती हैं
कि इन की गोद में किलकारियां आराम करती हैं
मुनव्वर राना का जन्म रायबरेली में 26 नवंबर 1952 को हुआ था. साल 2014 में उन्हें कविता "शाहदाबा" के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. मुनव्वर ने मां पर इतनी ग़ज़लें लिखीं कि पूछिए मत. उसी 'मां' संकलन से उनकी चुनिंदा दो ग़ज़लें, जो पुकार सी रहीं, मुनव्वर ठीक हो जाओ.
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गले मिलने को आपस में दुआएं रोज़ आती हैं
अभी मस्जिद के दरवाज़े पे मांएं रोज़ आती हैं
कभी कभी मुझे यूं भी अजां बुलाती है
शरीर बच्चे को जिस तरह मां बुलाती है
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में मां आई
ऐ अंधेरे! देख ले मुंह तेरा काला हो गया
मां ने आंखें खोल दीं घर में उजाला हो गया
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
मां बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊं
मां से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं
मेरा खुलूस तो पूरब के गांव जैसा है
सुलूक दुनिया का सौतेली माओं जैसा है
रौशनी देती हुई सब लालटेनें बुझ गईं
ख़त नहीं आया जो बेटों का तो माएं बुझ गईं
वो मैला सा बोसीदा सा आंचल नहीं देखा
बरसों हुए हमने कोई पीपल नहीं देखा
कई बातें मुहब्बत सबको बुनियादी बताती है
जो परदादी बताती थी वही दादी बताती है
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किसी को देख कर रोते हुए हंसना नहीं अच्छा
ये वो आंसू हैं जिनसे तख़्ते-सुल्तानी पलटता है
दिन भर की मशक़्क़त से बदन चूर है लेकिन
मां ने मुझे देखा तो थकन भूल गई है
दुआएं मां की पहुंचाने को मीलों मील जाती हैं
कि जब परदेस जाने के लिए बेटा निकलता है
दिया है मां ने मुझे दूध भी वज़ू करके
महाज़े-जंग से मैं लौट कर नजाऊंगा
खिलौनों की तरफ़ बच्चे को मां जाने नहीं देती
मगर आगे खिलौनों की दुकां जाने नहीं देती
दिखाते हैं पड़ोसी मुल्क आंखें तो दिखाने दो
कहीं बच्चों के बोसे से भी मां का गाल कटता है
बहन का प्यार मां की ममता दो चीखती आंखें
यही तोहफ़े थे वो जिनको मैं अक्सर याद करता था
बरबाद कर दिया हमें परदेस ने मगर
मां सबसे कह रही है कि बेटा मज़े में है
बड़ी बेचारगी से लौटती बारात तकते हैं
बहादुर हो के भी मजबूर होते हैं दुल्हन वाले
खाने की चीज़ें मां ने जो भेजी हैं गांव से
बासी भी हो गई हैं तो लज़्ज़त वही रही
बता दें कि जब भारत -पाकिस्तान का बंटवारे के दौरान उनके कई रिश्तेदार भारत देश को छोड़कर पाकिस्तान लौट गए लेकिन मुनव्वर के पिता भारत में ही रहे. मुनव्वर राना की शुरुआती शिक्षा कोलकाता में हुई थी. फिलहाल वे अभी लखनऊ में रहते है. उन्हें भारतीय शास्त्रीय संगीत सुनना काफी पसंद है. मुनव्वर राना की बड़ी बेटी सुमैया राना ने बताया कि उनकी तबीयत सुधार दिख रहा है और वह खतरे से बाहर हैं.
उनकी कविताएं मां और तमाम मुक़द्दस रिश्तों पर होती है. उनकी रचनाओं का ऊर्दू के अलावा अन्य भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है. उन्होंन ग़ज़लों के अलावा संस्मरण भी लिखे हैं. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि "खराब खाना, खराब शायरी और खराब आदमी है नाकाबिल-ए-बर्दाश्त" है. बता दें, साल 2014 में सरकार से बेरूखी के कारण उन्होंने साहित्य अकादमी अवॉर्ड को लौटा दिया था.
मुनव्वर राना की रचनाएं
मां
ग़ज़ल गांव
पीपल छांव
बदन सराय
नीम के फूल
सब उसके लिए
घर अकेला हो गया
कहो ज़िल्ले इलाही से
बग़ैर नक़्शे का मकान
फिर कबीर
नए मौसम के फूल
पुरस्कार एवं सम्मान
1993 – रईस अमरोहवी अवार्ड (रायबरेली)
1995 – दिलकुश अवार्ड
1997 – सलीम जाफरी अवार्ड
2001 – मौलाना अब्दुर रज्जाक़ मलीहाबादी अवार्ड (वेस्ट बंगाल उर्दू अकादमी )
2004 – सरस्वती समाज अवार्ड, अदब अवार्ड
2005 – डॉ॰ जाकिर हुसैन अवार्ड (नई दिल्ली), ग़ालिब अवार्ड (उदयपुर), शहूद आलम आफकुई – अवार्ड (कोलकाता), मीर तक़ी मीर अवार्ड
2006 – अमीर खुसरो अवार्ड (इटावा)
2012- ऋतुराज सम्मान पुरस्कार
2014 – साहित्य अकादमी पुरस्कार
भारती परिषद पुरस्कार, अलाहाबाद
बज्मे सुखन पुरस्कार, भुसावल
मौलाना अबुल हसन नदवी अवार्ड
उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अवार्ड
कबीर अवार्ड