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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ जयंती विशेषः नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं

फै़ज़ अहमद फ़ैज़ उर्दू शायरी के एक ऐसे अजीमुश्शान शायर हैं जिन्होंने अपनी शायरी को अपने लहू की आग में तपाकर अवाम के दिलो-दिमाग़ को प्रभावित कर दिया. उनकी जयंती पर उनकी पांच शानदार नज़्में

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का रेखाचित्र, सारे सुख़न हमारे के कवर से साभार फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का रेखाचित्र, सारे सुख़न हमारे के कवर से साभार

आज फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की जयंती है. फै़ज़ अहमद फ़ैज़ उर्दू शायरी के एक ऐसे अजीमुश्शान शायर हैं जिन्होंने अपनी शायरी को अपने लहू की आग में तपाकर अवाम के दिलो-दिमाग़ तक ले गए और कुछ ऐसे अन्दाज़ में कि वह दुनिया के तमाम मजलूमों की आवाज़ बन गई. उनकी शायरी की ख़ास पहचान है - रोमानी तेवर में खालिस इंक़लाबी बात! यही कारण है कि ग़ालिब और इक़बाल के बाद जितनी शोहरत फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को मिली उतनी शायद किसी अन्य शायर को नहीं.

फ़ैज़ मूलतः पाकिस्तान के थे किन्तु प्रगतिशील जीवन-दृष्टि के कारण उन्होंने देश की सीमा ही नहीं, भाषा, जाति और धर्म की भी मानवता के आगे कभी परवाह नहीं की. वे भारत में वैसे ही पसन्द किए जाते थे जैसे कि पाकिस्तान में उनकी शायरी मानवीयता, सामाजिकता और राजनीतिक सच्चाइयों का पर्याय बनी थी. यह और बात है कि फ़ैज़ अपने जीवनकाल में ही पाकिस्तानी हुक्मरानों की आंख की कितकिरी बन गए थे, और हाल ही में उनकी एक नज़्म पर भारत में भी खूब सियासी कोहराम मचा था.  

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी के बारे में यही कहा जा सकता है कि उनके लेखन की पहचान बस इतनी सी है कि फूलों के रंगो-बू से सराबोर शायरी से अगर आँच भी आ रही हो तो समझिए कि वो फ़ैज़ की शायरी है, फ़ैज़ की ही शायरी है. राजकमल प्रकाशन ने ‘सारे सुख़न हमारे’ नाम से फ़ैज़ की बेहतरीन शायरी का उर्दू से हिंदी में किया गया अनुवाद प्रकाशित किया है. इस संकलन में फ़ैज़ की तमाम ग़ज़लों, नज़्मों, गीतों और क़तआत को पहली बार हिंदी में एक जगह प्रकाशित किया गया है. इस संकलन में फ़ैज़ का आख़िरी कलाम भी शामिल है. 397 पृष्ठ संख्या के पेपरबैक संस्करण का मूल्य 399 रुपए है.

आज फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की जयंती पर उनके संकलन ‘सारे सुख़न हमारे’ से उनकी ये पांच उम्दा रचनाएं:

1-
नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं
क़रीब उनके आने के दिन आ रहे हैं

जो दिल से कहा है, जो दिल से सुना है
सब उनको सुनाने के दिन आ रहे हैं

अभी से दिलो-जाँ सरे-राह रख दो
के: लुटने-लुटाने के दिन आ रहे हैं
 
टपकने लगी उन निगाहों से मस्ती
निगाहें चुरने के दिन आ रहे हैं
 
सबा फिर हमें पूछती फिर रही है
चमन को सजाने के दिन आ रहे हैं
 
चलो 'फ़ैज़’ फिर से कहीं दिल लगायें
सुना है ठिकाने के दिन आ रहे हैं

2-   
इ’ज्ज़े-अह्ले-सितम की बात करो
इ’श्क़ के दम-क़दम की बात करो
 
बज़्मे-अह्ले-तरब को शरमाओ
बज़्मे-असहाबे-ग़म की बात करो

बज़्मे-सरवत के खुशनसीबों से
अज़्मते-चश्मे-नम की बात करो
 
ख़ैर, हैं अह्ले-दैर जैसे हैं
आप अह्ले-हरम की बात करो
 
हिज्र की शब तो कट ही जायेगी
रोज़े-वस्ले-सनम की बात करो
 
जान जायेंगे जानने वाले
'फ़ैज़’ फ़रहादो-जम की बात करो
 
3-   
तिरे ग़म को जाँ की तलाश थी, तिरे जाँ-निसार चले गये
तिरी रह में करते थे सर तलब, सरे-रहगुज़ार चले गये
 
तिरी कज-अदाई से हारके शबे-इंतज़ार चली गयी
मिरे ज़ब्ते-हाल से रूठकर मिरे ग़मगुसार चले गये
 
न सवाले-वस्ल, न अ’ज़ेर्-ग़म, न हिकायतें न शिकायतें
तिरे अ’ह्द में दिले-ज़ार के सभी इख्तियार चले गये
 
ये हमीं थे जिनके लिबास पर सेर-रू सियाही लिखी गयी
यही दाग़ थे जो सजा के हम सरे-बज़्मे-यार चले गये
 
न रहा जुनूने-रुख़े-वफ़ा, ये रसन ये दार करोगे क्या
जिन्हें जुर्म-इ’श्क़ पे नाज़ था वो गुनाहगार चले गये
 
4-   
बेबसी का कोई दरमाँ नहीं करने देते
अब तो वीराना भी वीराँ नहीं करने देते
 
दिल को सदलख्त किया सीने को सदपार: किया
और हमें चाक गरेबाँ नहीं करने देते
 
उनको इस्लाम के लुट जाने का डर इतना है
अब वो काफ़ि‍र को मुसलमाँ नहीं करने देते
 
दिल में वो आग फ़रोज़ाँ है अदू जिसका बयाँ
कोई मजमूँ किसी उन्वाँ नहीं करने देते
 
जान बाक़ी है तो करने को बहुत बाक़ी है
अब वो जो कुछ के: मेरी जाँ नहीं करने देते
 
5-   
चंद रोज़ और मिरी जान

चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
जुल्म की छाँव में दम लेने पे मज़बूर हैं हम
और कुछ देर सितम सह लें, तड़प लें, रो लें
अपने अजदाद की मीरास हैं मा’ज़ूर हैं हम
जिस्म पर क़ैद है, जज़्बात पे ज़ंजीरें हैं
फ़ि‍क्र महबूस है, गुफ्तार पे ता’ज़रें हैं
अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जिये जाते हैं
जि़ंदगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है जिसमें
हर घड़ी दर्द के पैबंद लगे जाते हैं
लेकिन अब जुल्म की मी’याद के दिन थोड़े हैं
अ’र्स:ए-दह्र की झुलसी हुई वीरानी में
हमको रहना है तो यूँ ही तो नहीं रहना है
अजनबी हाथों के बे-नाम गराँबार सितम
आज सहना है हमेश: तो नहीं सहना है
ये तिरे हुस्न से लिपटी हुई आलम की गर्द
अपनी दो रोज़: जवानी की शिकस्तों का शुमार
चाँदनी रातों का बेकार दहकता हुआ दर्द
दिल की बे-सूद तड़प, जिस्म की मायूस पुकार
चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़.

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