इन दिनों जब कोरोना अपने चरम पर है, और गए पूरे साल, यहां तक कि लॉकडाउन में भी हिंदी के वयोवृद्ध साहित्यकार डॉ रामदरश मिश्र अनवरत सक्रिय रहे हैं. गए साल उनकी चुनिंदा ग़ज़लों का चयन 'बनाया है मैंने ये घर धीरे धीरे आया, तो 'मेरा कमरा' शीर्षक डायरी संग्रह एवं शीर्षक लेखकों के संस्मरणों की पुस्तक 'सुरभित स्मृतियां' हाल ही में हंस प्रकाशन से छप कर आई है. इन दिनों भी वे लगातार सक्रिय हैं. उन्होंने कोरोना काल में इस बीमारी और उससे उपजे माहौल पर अनेक रचनाएं लिखीं, जिनमें गीत, ग़ज़ल व कविताएं शामिल हैं. उनकी एक ग़ज़ल के चंद अशाअर हैं:
तेरे डर से चुप रही दीपावली की रौनकें
गा नहीं फागुन सका निज फाग जा़लिम कोरोना.
आदमी को आदमी से दूर तूने कर दिया
छा गया रिश्तों के पथ में झाग जा़लिम कोरोना
जुल्म कर ले किन्तु सुन कल आदमी आखिर तुझे
चीथड़े- सा कहीं देगा टांग जा़लिम कोरोना.
कोरोना ने मिलने-मिलाने के अवसर बंद करा दिए, वरना एक दौर था, वाणी विहार उत्तम नगर नई दिल्ली स्थित उनके निवास पर रोज दो-चार लेखक मिलने आते थे. बैठकी चलती रहती थी. लेकिन आज शहर में सन्नाटा व्याप्त है. इधर वे उत्तम नगर की भीड़ से निकल पर अपनी बेटी डॉ स्मिता मिश्र के सोनीपत रोड पर स्थित कोंडली के प्रशस्त फ्लैट में आ गए हैं, जहां वे और उनकी नब्बे वर्षीया पत्नी सरस्वती मिश्र आपस में गपियाते हैं और फुरसत में कोई ख्याल आया तो कविताओं गीतों ग़ज़लों में पिरोते रहते हैं. कोरोना के संदर्भ में ही एक संवेदनशील ग़ज़ल अभी हाल ही में उन्होंने लिखी तो साहित्य आजतक को भेजना नहीं भूले, जो पाठकों के लिए प्रस्तुत है-
ग़ज़लः आज तो मिलना दिलों का बस फसाना हो गया
- डॉ रामदरश मिश्र
कल यहां था बाग बिक कर कारखाना हो गया
खेत था अब वह शहर का आशियाना हो गया.
दिल से दिल मिलते रहे यह थी हकीकत कल, मगर
आज तो मिलना दिलों का बस फसाना हो गया.
गांव से निकला था रहबर बनके तब मासूम था
देखते ही देखते कितना सयाना हो गया.
कल तलक तो घर घरों में पैठ बतियाते रहे
हाट का अब तो घरों में आना-जाना हो गया.
लोग कल मिलकर लगातें थे हजारों कहकहे
आज तो मुश्किल लबों का मुस्कराना हो गया.
रह गयी आंखें खुली ही कटु तपिश ढोती हुई
ख्वाब देखे हुए तो इनको जमाना हो गया.
कल को तो त्योहार गाते थे उमंगों से भरे
आज ही गायब कहां उनका तराना हो गया.
वे उन्हें देंगे रकम देंगे हिफाजत वे उन्हें
जुल्म की चादर की खातिर ताना बाना हो गया.
वक्त का इंसाफ भी क्या आज है ऐ दोस्तों
जुल्म तो उसने किया पर मैं निशाना हो गया.
है अभावों से घिरा लेकिन कलम है हाथ में
जिन्दगी जीने का सुंदर सा बहाना हो गया.
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डॉ रामदरश मिश्र हिंदी के जाने-माने कवि, कथाकार, उपन्यासकार, आलोचक, गद्यलेखक एवं ग़ज़लगो हैं. 15 अगस्त, 1924 को गोरखपुर जिले उप्र के डुमरी गांव में पैदा हुए. लंबे अरसे तक दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन करने के बाद प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्त होकर स्वतंत्र लेखन में रत हैं. अब तक उनके कोई दो दर्जन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें 'पथ के गीत', 'बैरंग बेनाम चिटि्ठयां', 'पक गई है धूप', 'कंधे पर सूरज', 'दिन एक नदी बन गया', 'जुलूस कहां जा रहा है', 'आग कुछ नहीं बोलती', 'बारिश में भीगते बच्चे', 'आम के पत्ते', 'कभी कभी इन दिनों', 'मैं तो यहां हूं', 'रात सपने में' आदि प्रमुख हैं. ग़ज़ल के भी उनके अब तक चार संग्रह आ चुके हैं. उपन्यास विधा में भी उनके 'पानी के प्राचीर', 'जल टूटता हुआ', 'सूखता हुआ तालाब', 'रात का सफर', 'अपने लोग', 'आकाश की छत', 'आदिम राग', 'बिना दरवाजे का मकान', 'दूसरा घर' सहित डेढ दर्जन उपन्यास प्रकाशित हैं. दो दर्जन कहानी संग्रह और 'कितने बजे हैं', 'बबूल और कैक्टस', 'घर-परिवेश' तथा 'नया चौराहा' जैसी ललित निबंधों की कृतियां छपी हैं. 'तना हुआ इंद्रधनुष', 'भोर का सपना', 'पड़ोस की खुशबू' व 'घर से घर तक' जैसे यात्रा-वृतांतों के लेखक एवं 'स्मृतियों के छंद', 'सर्जना ही बड़ा सत्य है' सहित कई संस्मरणात्मक कृतियों के रचयिता की आत्म कथा 'सहचर है समय' काफी चर्चित रही है. अब तक उनकी रचनावली के चौदह खंड प्रकाशित हो चुके हैं. एक लंबे अरसे से वे डायरी लेखन कर रहे हैं. 'आस-पास', 'बाहर-भीतर', 'विश्वास जिन्दा है' सहित हाल के कोरोना काल में आये डायरी संकलन 'मेरा कमरा', ग़ज़ल चयन 'बनाया है मैंने ये घर धीरे धीरे' के साथ पिछले दिनों ही प्रकाशित 'सुरभित स्मृतियां' शीर्षक संस्मरणात्मक कृति चर्चा में हैं. उन्हें भारत भारती, साहित्य अकादेमी, दयावती मोदी कवि शेखर पुरस्कार, शलाका सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है.
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