भारतीय समाज पितृसत्तात्मक रहा है और प्राचीन समय में 'पति परमेश्वर है' जैसी मान्यताओं को भी भारतीय समाज में जगह मिली है. शादी दो पवित्र आत्माओं का मिलन है. शादी समझदारी, भरोसे और एक-दूसरे के सम्मान पर आधारित होनी चाहिए जिसमें दोनों ही परमेश्वर बन सकें लेकिन आज तक इस रिश्ते में भी महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा नहीं मिल सका है तो इसके पीछे की मानसिकता को समझना जरूरी है.
पाश्चात्य सभ्यता में जिस रिश्ते को हसबैंड-वाइफ का नाम दिया गया, उसे हम पति-पत्नी कहते हैं. पति शब्द का अर्थ होता है- स्वामी या मालिक. उदाहरण के तौर पर, वेदों में हमें कई शब्द मिलते हैं जैसे-बृहस्पति, प्रजा-पति. वाचस-पति, पशु-पति, भू-पति. पति प्रत्यय का इस्तेमाल '...का मालिक' के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे ही करोड़पति और लखपति जैसे शब्दों का मतलब है- करोड़ों या लाखों का स्वामी.
अगर एक स्वामी है तो तार्किक रूप से दूसरा दास है. दांपत्य जीवन में इस शब्द को साकार भी किया जा रहा है. 'स्वामी' शब्द से खुद ही कई विशेषाधिकार मिल जाते हैं. क्या यही 'स्वामी भाव' पतियों को पत्नियों पर हाथ उठाने का भी अधिकार दे देता है?
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नारीवादी कार्यकर्ता और 'संगत-साउथ एशियन फेमिनिस्ट नेटवर्क' की सलाहकार कमला भसीन का कहना है कि समाज में जिस तरह महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ रहे हैं, ऐसे में कानून में बदलाव लाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि समाज अपनी मानसिकता में बदलाव लाए. वह कहती हैं, 'हमारी हर परंपराओं में ही पितृसत्तात्मक सोच गहरे बसी हुई है, रक्षाबंधन पर मेरा भाई बड़ा होकर खड़ा हो जाता है चाहे मैं सालों से उसे पढ़ा रही हो, उसकी देखभाल कर रही हूं लेकिन राखी पर वह कहता है कि मैं तेरी रक्षा करूंगा. मैं उसकी 15 साल से रक्षा करती आ रही हूं लेकिन राखी पर मुझे वहीं खड़ा कर दिया जाएगा. एक अच्छा उदाहरण है कि भारतीय महिलाएं पतियों की लंबी आयु के लिए करवाचौथ का व्रत रखती हैं. अगर यही सोच है तो अमेरिका के सभी पतियों को तो मर जाना चाहिए क्योंकि वहां महिलाएं करवाचौथ का व्रत नहीं रखती हैं.'
घरेलू हिंसा पर वह कहती हैं कि अगर पति मालिक है तो वह क्यों ना मारे और मालिक मारकर उसे ठीक जगह रख सकता है. ऐसा नहीं है कि मर्द के अंदर जन्म से ही हिंसा की भावना होती है. अगर ऐसा होता तो महात्मा गांधी और बुद्ध नहीं होते. 60 प्रतिशत जो मर्द किसी को नहीं मारते हैं, वे भी मर्द होते हैं. आप कहते हैं कि मर्द को रोना नहीं चाहिए. यह उनकी मर्दानगी के खिलाफ है. इससे मर्दों की भी मानवीयता और इंसानियत छीनी जा रही है.
महिलाएं अत्याचारों को क्यों सह लेती हैं? वह कहती हैं, 'दरअसल महिलाएं और पुरुषों दोनों के अंदर ही पितृसत्तात्मक सोच रची बसी हुई है. मध्य वर्ग में महिलाएं चुपचाप सभी अत्याचारों को बर्दाश्त करती हैं जबकि आदिवासी महिलाएं ज्यादा आजाद हैं. पुरुष दिन भर काम करके थकने और अपनी फ्रस्टेशन निकालने की बात करते हैं जबकि कई रिपोर्ट्स से पता चलता है कि महिलाएं पुरुषों से ज्यादा घंटे काम करती हैं. वह कहती हैं कि पत्नी ही है जो अपने पतियों के अहम को फिर से कायम करती हैं.'
पितृसत्ता अगर गलत है तो इसका उल्टा क्या है? मातृसत्ता? लेकिन कमला भसीन कहती हैं कि पितृसत्ता का उल्टा मातृसत्ता हो ही नहीं सकता है क्योंकि अलग पितृसत्ता अगर गलत है तो मातृसत्ता भी गलत है. इसके बजाए इसका जवाब बराबरी होनी चाहिए. जब तक घरों में बराबरी नहीं होगी तब तक सच्ची मोहब्बत नहीं हो सकती है. इसके लिए जरूरी है कि पति देवों को बाहर भेजा जाएं और जीवनसाथी को अंदर लाया जाए. अगर आप दोनों जीवनसाथीनुमा जीवन बिताते आपके बच्चे देखेंगे तो आपके बच्चे भी इंसान बनेंगे और आपकी बेटियां भी दासी नहीं बनेंगी.