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लाइफस्टाइल

इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं, प्रेग्नेंट महिला को खून देने के लिए तोड़ा रोजा

इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं, प्रेग्नेंट महिला को खून देने के लिए तोड़ा रोजा
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भारत को विभिन्न धर्मों और बोलियों का देश माना जाता है. यहां सभी धर्मों के लोग बहुत प्रेम के साथ सभी त्योहार मनाते हैं. इस्‍लाम धर्म में अल्‍लाह की इबादत का महीना रमजान बेहद पाक महीना माना जाता है. मुस्लिम लोग इस महीने को रहमत और बरकत का महीना कहते हैं.

(प्रतिकात्मक तस्वीर)
इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं, प्रेग्नेंट महिला को खून देने के लिए तोड़ा रोजा
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रमजान के महीने में अल्‍लाह की इबादत करते हुए 30 दिन तक रोजा रखा जाता है. कहा जाता है कि रोजे रखने वाले व्यक्ति को सबाब मिलता है. लेकिन राजस्थान में एक व्यक्ति ने इस सबाब को पाने का मौका एक महिला की मदद करते हुए छोड़ दिया.

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रोजे रखने का मतलब सिर्फ भूखा रहना नहीं होता है, बल्कि यह खुदा ही नहीं खुद की भी इबादत है. रोजे रखने का अर्थ जरूरतमंदों की मदद के साथ अपनी आदतों और अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखना भी होता है.जो लोग इस अस्था के साथ रोजे रखते हैं असल में उनका ही रोजा कामयाब माना जाता है.

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हाल ही में राजस्थान में रहने वाले एक व्यक्ति ने सिर्फ इसलिए अपना रोजा तोड़ दिया क्योंकि एक गर्भवती महिला को उसकी मदद की जरूरत थी. दरअसल इस व्यक्ति का नाम अशरफ खान है.

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एमरजेंसी के दौरान सवित्रि देवी नाम की एक गर्भवती महिला के शरीर में खून की कमी हो गई. अशरफ खान बताते हैं कि जैसे ही उन्होंने खून मांगने वाले उस व्यक्ति का मैसेज देखा जिसे अपनी साली के लिए खून की जरूरत थी उसे तुरंत कॉल किया. उन्होंने उसे बताया कि वो अभी रोजे में है और शाम तक खून देने पहुंच जाएंगे.

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अशरफ खान को लड़की के परिजनों ने बताया कि लड़की की हालत नाजुक बनी हुई है और उसे तुरंत खून की जरूरत है. अशरफ खान ने तुरंत अपना रोजा तोड़ते हुए लड़की की मदद करने का फैसला किया.

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