पशुओं के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था पेटा ने एक अनोखा दावा किया है. पेटा ने एक ट्वीट में दावा किया कि गाय का दूध 'व्हाइट सुप्रीमेसी' (श्वेत लोगों की सर्वोच्चता) का प्रतीक है.
पेटा (पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स) ने पिछले वर्ष एक ब्लॉग पोस्ट लिखी थी जिसका शीर्षक था- ' गाय का दूध क्यों श्वेत लोगों के लिए परफेक्ट ड्रिंक है.'
इस संस्था ने शुक्रवार को अपने इस दावे को दोहराया और इस ब्लॉग को रीपोस्ट करते हुए एक ट्वीट कर दिया.
पेटा ने लोगों से इसके साथ अपील की कि वे बिना डेयरी वाली चीजों का सेवन करें क्योंकि दुग्ध उत्पादों को दिल की बीमारियां और प्रोस्टेट, ब्रेस्ट और ओवरियन कैंसर के खतरे से जोड़कर देखा जाता है.
पेटा ने कहा, अगर पाठकों को डेयरी उत्पाद छोड़ने की एक और वजह चाहिए तो बता दें कि डेयरी इंडस्ट्री हिंसा और रेप को बढ़ावा देती है.
डेयरी की गायें प्रेग्नेंसी के दौरान और प्रेग्नेंसी के बाद ही दूध देती हैं. प्रेस रिलीज में कहा गया कि उत्पादन बनाए रखने के लिए डेयरी फर्म्स गायों को जबर्दस्ती प्रेग्नेंट करती हैं.
पेटा ने लिखा, कुछ लोगों को यह जानकर हैरानी होगी कि डेयरी इंडस्ट्री में इस्तेमाल की जाने वाली गायें 5 साल के भीतर ही मार दी जाती हैं क्योंकि उन्हें लगातार प्रेग्नेंट कर पूरी तरह से खपा लिया जाता है.
संस्था ने कई तर्क देते हुए बताया कि दूध सुप्रीमेसी का प्रतीक कैसे है.
इस ब्लॉग में यह भी लिखा गया कि किसान जिसे 'रेप रैक्स' कहते हैं, उनमें गायों को रखा जाता है. इस आर्टिकल में दावा किया गया कि गाय तीन मामलों में मानव सभ्यता से संबंधित हैं- उनके शरीर पर नियंत्रण, उनके दिमाग पर नियंत्रण और ताकत न्याय पर भारी है.
गायों के साथ जो कुछ भी किया जाता है, उसके बारे में उनके पास कोई विकल्प नहीं है. उनकी सींगें जलाई जाती है, पूंछ काट दी जाती है, कानों में छेद कर दिए जाते हैं.
दर्द से जूझ रहीं गायों को सामान्य से 10 गुना ज्यादा दूध का उत्पादन करने पर मजबूर किया जाता है.
इसके बाद पेटी ने मूवी के किरदारों के दो उदाहरण भी पेश किए जिसमें दूध पीने को वाइट सुप्रीमेसी से जोड़कर दिखाया गया था.
पेटा ने लिखा कि अगली बार शॉपिंग पर जाएं या फिर कॉफी ऑर्डर करने वाले हों तो सोयाबीन, बादाम, चावल, काजू या कोकोनट मिल्क का विकल्प चुनें.
शिकागो एवॉल्यूशनरी बायलॉजिस्ट के डॉ. जॉन नवेम्बर ने बातचीत में एक तस्वीर
का इस्तेमाल किया. इस तस्वीर में श्वेत लोगों को दूध पीते हुए दिखाया गया
था जिससे एक आनुवांशिकी गुण का संकेत भी हो रहा था- वयस्क होने पर लैक्टोज
को पचाने की क्षमता.
आर्टिकल के मुताबिक, दुनिया के बाकी लोगों में लैक्टोज के पाचन की अनुमति देने वाला जीन बचपन के बाद ही काम करना बंद कर देता है.
फिलहाल, पेटा का यह ट्वीट वायरल हो गया है और इस पर हजारों कॉमेंट्स आ चुके हैं.
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