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कांग्रेस MLA के पति को SC से नहीं मिली बेल, हत्या के आरोप में हैं बंद

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुनवाई और जांच की इस स्थिति में आरोपी की जमानत रद्द ही होनी चाहिए. इस मामले में हाईकोर्ट का आदेश उचित नहीं था.  बता दें कि गोविंद सिंह पर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी और कांग्रेस नेता देवेंद्र चौरसिया की हत्या का आरोप है.

सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट
स्टोरी हाइलाइट्स
  • कांग्रेस विधायक पर कांग्रेस नेता की हत्या का है आरोप
  • हाई कोर्ट से मिल गई थी जमानत
  • SC ने HC के फैसले को खारिज किया

सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस विधायक रामबाई के पति को हत्या के एक मामले में जमानत देने से इनकार कर दिया है. इस मामले में अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया है. हाईकोर्ट से आरोपी को जमानत मिलने पर अभियोजन पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुनवाई और जांच की इस स्थिति में आरोपी की जमानत रद्द ही होनी चाहिए. इस मामले में हाईकोर्ट का आदेश उचित नहीं था. बता दें कि गोविंद सिंह पर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी और कांग्रेस नेता देवेंद्र चौरसिया की हत्या का आरोप है. इस मामले में हाईकोर्ट द्वारा जमानत दिए जाने के फैसले के खिलाफ देवेंद्र चौरसिया के बेटे सोमेश चौरसिया ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई थी. 

हाई कोर्ट के फैसले को बदला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने आरोपी को बेल देते समय केस से जुड़ी बड़ी चिंताओं पर विचार नहीं किया. अदालत ने कहा कि दूसरा मामला हाईकोर्ट द्वारा बेल दिए जाने के आदेश के असर का है. इस आदेश में जांच की प्रक्रिया पर असर डालते की क्षमता है. हाई कोर्ट के आदेश ने पुलिस के गलत इस्तेमाल की इजाजत दे दी.  

अदालत ने हाई कोर्ट के आदेश पर टिप्पणी करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय न्याय की पवित्रता को संरक्षित रखने में नाकामयाब रहा. 

इसके अलावा अब रामबाई के पति को दूसरे जेल में ले जाया जाएगा ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि कानून की निष्पक्ष प्रक्रिया में किसी तरह की बाधा न पहुंचे. 

जिले की अदालतें फर्स्ट लाइन ऑफ डिफेंस

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों की कार्यशैली पर टिप्पणी की. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिले की न्यायपालिका का स्वतंत्र रहना न्याय प्रक्रिया के पूर्ण होने के लिए बुनियादी शर्त है. जिले की अदालतें लोगों के लिए फर्स्ट लाइन ऑफ डिफेंस हैं. जिला जजों को अपने वरिष्ठों से भी स्वतंत्र रहने की जरूरत है, उन्हें कोई बाहरी सत्ता न तो प्रभावित कर सकें और न ही नियंत्रित. 

अदालत ने कहा कि भारत में दो समानांतर न्याय व्यवस्थाएं नहीं हो सकती हैं, एक में अमीरों, शक्तिशाली लोगों को न्याय मिलता हो और दूसरी अदालतें सामान्य लोगों के लिए हों. 
 

 

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